"बेटा, अब आगे क्या सोचा है? अकेले कैसे रहेगी? अभी भी वक्त है, कह तो मैं बात करूं सुमित से..." मां की वही पुरानी हिदायत. "मां," अलका ने उन्हें बीच में ही रोका, आवाज़ में एक दृढ़ता थी. "सुमित से बात करने का वक्त बहुत पहले बीत चुका है. और रही बात अकेले रहने की, तो मां, मैं उस भरे-पूरे घर में ज्यादा अकेली थी. वहां मैं सबकी थी, पर मेरा कोई नहीं था. यहां मैं अकेली हूं, पर कम से कम मैं 'अपनी' तो हूं." खिड़की के शीशे पर बारिश की बूंदों की थपकी ने अलका की नींद तोड़ी. घड़ी की सुइयों पर नज़र गई—सुबह के आठ बज रहे थे. पिछले पच्चीस सालों में शायद यह पहली बार था जब सूरज के इतना ऊपर चढ़ आने के बाद भी वह बिस्तर पर थी. अमूमन, सुबह के छह बजते ही उसके भीतर की घड़ी उसे झकझोर कर उठा देती थी. टिफिन, नाश्ता, पति की शर्ट, सास की दवाइयां—जिम्मेदारियों की एक लंबी फेहरिस्त उसका इंतज़ार कर रही होती थी. लेकिन आज... आज वह फेहरिस्त कोरी थी. अलका ने करवट ली और खाली बिस्तर को देखा. बगल वाला तकिया साफ़ और बिना सिलवटों का था. आज उसे ठीक करने की ज़रूरत नहीं थी. कल ही तो विदा किया था...
गायत्री की आँखों से आंसू छलक पड़े. यह आंसू दुख के नहीं थे. यह उस बर्फ के पिघलने जैसे थे जो बरसों से उनके सीने में जमी थी. 30 साल की गृहस्थी में आज पहली बार उनके पति ने उन्हें अपने हाथ से निवाला खिलाया था. वह भी तब, जब रसोई में काम बाकी था. रसोई में एग्जॉस्ट फैन की घरघराहट के बावजूद जुलाई की उमस ने गायत्री देवी के पसीने छुड़ा दिए थे. तवे पर फुलका डालते ही भाप का एक भभका उनके चेहरे पर लगता, लेकिन उनकी उंगलियां मशीनी रफ़्तार से चल रही थीं. आज रविवार था, और मेनू में मटन कोरमा और गरम-गरम फुलके थे. घर में रविवार का मतलब ही होता था—त्योहार जैसा भोजन, और गायत्री के लिए इसका मतलब था—दोपहर के तीन बजे तक रसोई में खड़े रहना. बाहर डाइनिंग टेबल पर हंसी-मजाक की आवाज़ें आ रही थीं. उनके पति, दीनानाथ जी, और बेटा-बहू खाना खाने बैठ चुके थे. "माँ, और कितनी देर? भूख से पेट में चूहे दौड़ रहे हैं!" बेटे रोहन की आवाज़ आई. "बस बेटा, दो मिनट. गरम-गरम ही अच्छी लगेंगी," गायत्री ने पल्लू से माथे का पसीना पोंछते हुए आवाज़ लगाई. उन्होंने जल्दी से घी लगाया और चार रोटियों का कैसरोल लेकर बाहर निकली...