"हे भगवान! कभी तो कोई चीज़ अपनी जगह पर छोड़ दिया करो! क्या कसम खा रखी है कि घर को कबाड़खाना ही बनाकर रखना है?" मालती जी की आवाज़ बैठक से लेकर बालकनी तक गूँज रही थी। हाथ में झाड़न लिए वे कभी मेज पर बिखरी चाय की सूखी पत्तियां साफ करतीं, तो कभी सोफे पर बेतरतीब फेंकी गई अधखुली फाइलों को करीने से लगातीं। सामने आरामकुर्सी पर बैठे प्रोफेसर विश्वनाथ जी चश्मे के ऊपर से उन्हें देखकर बस एक धीमी सी मुस्कान बिखेर देते। उनकी इस शांत मुस्कान को देखकर मालती जी का पारा और चढ़ जाता, "हँस क्या रहे हो? अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं क्या? बाहर पूरी दुनिया के सामने तो बड़े विद्वान प्रोफेसर बनते हो और घर में आते ही बिल्कुल लापरवाह! कभी भीगी छतरी कालीन पर पटक देते हो, तो कभी चश्मे का डिब्बा फ्रिज में रखकर भूल जाते हो। मेरी तो किस्मत ही फूट गई, सारा दिन नौकरों की तरह तुम्हारे बिखेरे कचरे को समेटती फिरूँ!" विश्वनाथ जी ने अखबार का पन्ना पलटते हुए केवल इतना कहा, "अरे छोड़ो भी मालती, अब इस उम्र में आदतें कहाँ बदलती हैं।" मालती जी बड़बड़ाते हुए रसोई की ओर बढ़ गईं, जहाँ कुकर की सीटी बज रही थ...
मिट्टी के कच्चे बरामदे में रखी अपनी माँ की सफेद चादर से ढकी देह को देख उन्नीस साल की तारा की आँखें पथरा चुकी थीं। रोते-रोते उसके आँसू सूख चुके थे और कंठ से केवल धीमी सिसकियाँ निकल रही थीं। पिता तो बचपन में ही छोड़ गए थे, और अब माँ की बीमारी ने उनसे जीवन की अंतिम सांस भी छीन ली थी। उस भरे मोहल्ले में तारा पूरी तरह अकेली पड़ गई थी। माँ के जाते ही बस्ती के कई पुरुषों की आँखों की चमक और उनके हमदर्दी जताने के तौर-तरीके बदल गए थे। हर कोई सांत्वना देने के बहाने उसके कंधे पर हाथ रखने या करीब आने की कोशिश कर रहा था। तारा उस उम्र में भी उनकी भूखी नज़रों को भांप रही थी और भय से कांप उठती थी। इन्हीं चेहरों के बीच एक चेहरा था रंजीत का। रंजीत कस्बे के पास स्थित एक गोदाम में लोडिंग टेम्पो चलाता था। उम्र लगभग अट्ठाईस-तीस वर्ष, देखने में सीधा और बातों में बेहद मीठा। जिस अनाज मंडी के गोदाम में तारा की माँ मजदूरी करती थी, रंजीत वहीं माल पहुँचाने आता था। उसने कई बार तारा को अपनी बातों में उलझाने की कोशिश की थी। माँ जब जीवित थीं, तो उन्होंने तारा को डांटकर समझाया था कि राह चलते मीठे बोल बोलने वाले हर...