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सबसे बड़ी दौलत

 “प्रिया, अपनी जुबान को लगाम दो। तुम जानती भी हो तुम किसके बारे में बात कर रही हो? वो मेरे उस्ताद हैं, मेरे पिता समान हैं। उन्होंने मुझे कचरे के ढेर से उठाकर संगीत का वो मुकाम दिया है जहाँ आज दुनिया मुझे समीर खान के नाम से जानती है। और तुम कह रही हो कि हम उन्हें छोड़कर अलग हो जाएँ?”

समीर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था। उसके हाथ में थमी बांसुरी काँप रही थी। यह बहस पिछले एक महीने से उनके बेडरूम की दीवारों के बीच गूँज रही थी, लेकिन आज यह ड्राइंग रूम तक आ पहुँची थी।

प्रिया ने अपनी बाहें सिकोड़ लीं और समीर की आँखों में आँखें डालकर बोली, “समीर, भावनाओं में बहना बंद करो। मैं तुम्हारे उस्ताद जी की इज़्ज़त करती हूँ, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। तुम एक कलाकार हो, कोई साधु नहीं। तुम्हारी प्रतिभा इस पुराने, सीलन भरे ‘सुर-साधना’ केंद्र में घुटकर रह गई है। तुम्हें पता है, कल ‘ज़ेनिथ म्यूजिक’ से फिर फोन आया था। वे तुम्हें तीन साल का कॉन्ट्रैक्ट देना चाहते हैं—करोड़ों का। लेकिन शर्त वही है, तुम्हें मुंबई शिफ्ट होना होगा और चौबीसों घंटे उनके स्टूडियो के लिए उपलब्ध रहना होगा। और उस्ताद जी? वो तुम्हें कभी अपनी पुरानी रवायतों से बाहर निकलने ही नहीं देंगे।”

“तो क्या मैं अपनी कला बेच दूँ? उस्ताद जी कहते हैं कि संगीत इबादत है, व्यापार नहीं,” समीर ने बेबसी से कहा।

“इबादत से घर नहीं चलता समीर!” प्रिया चिल्लाई। “देखो इस घर को। दीवारों से प्लास्टर झड़ रहा है। तुम्हारे उस्ताद जी आज भी उसी पुराने ज़माने में जी रहे हैं जहाँ रियाज़ सुबह चार बजे शुरू होता है और रागों की पवित्रता के नाम पर हम भूखे मर रहे हैं। मैं एक मॉडर्न दुनिया की लड़की हूँ, समीर। मैंने एमबीए इसलिए नहीं किया था कि यहाँ बैठकर तानपुरे के तार मिलाऊँ। मुझे अपनी ज़िंदगी चाहिए, मुझे अपना स्पेस चाहिए। और सच कहूँ तो, मुझे उस्ताद जी का वह अनुशासन अब घुटन लगता है। हर वक़्त की टोक-टाक—‘प्रिया, जोर से मत बोलो’, ‘प्रिया, ऐसे कपड़े मत पहनना’। मैं उनकी बहू हूँ या कैदी?”

समीर सोफे पर धम्म से बैठ गया। वह दो पाटों के बीच पिस रहा था। एक तरफ वह व्यक्ति था जिसने उसे जीवन दिया, संगीत दिया, जीने का मकसद दिया। उस्ताद रशीद खान साहब, जो न केवल उसके गुरु थे बल्कि एक पिता से बढ़कर थे। अनाथ समीर को उन्होंने ही पाला था। और दूसरी तरफ प्रिया थी, जिससे उसने प्रेम विवाह किया था, जो व्यावहारिक थी और समीर के भविष्य को सुरक्षित करना चाहती थी।

“प्रिया, मैं उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकता। उनकी उम्र हो गई है। उन्हें मेरी ज़रूरत है,” समीर ने अंतिम दलील पेश की।

“उन्हें तुम्हारी ज़रूरत नहीं है समीर, उन्हें तुम्हारी गुलामी की आदत हो गई है,” प्रिया ने निर्ममता से कहा। “और अगर तुम्हें लगता है कि मैं गलत हूँ, तो ठीक है। फैसला तुम्हें करना है। या तो हम अगले हफ्ते मुंबई जा रहे हैं, या फिर मैं अकेले अपने मायके जा रही हूँ। मैं इस घुटन में और एक पल नहीं रह सकती।”

समीर कुछ बोल पाता, उससे पहले ही कमरे के दरवाजे पर एक परछाई उभरी। उस्ताद रशीद खान वहाँ खड़े थे। उनके सफेद बाल और झुर्रियों वाला चेहरा शांत था, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी। उन्होंने सब कुछ सुन लिया था।

समीर घबराकर खड़ा हो गया। “बाबा... आप...?”

उस्ताद जी धीरे-धीरे चलते हुए अंदर आए। उनके हाथ में उनकी पुरानी छड़ी थी। उन्होंने प्रिया की ओर देखा, जिसने नज़रें झुका ली थीं, और फिर समीर की ओर।

“बहू ठीक कह रही है समीर,” उस्ताद जी की आवाज़ में न कोई कंपन था, न कोई शिकायत।

समीर सन्न रह गया। “बाबा, आप यह क्या कह रहे हैं?”

“मैं कह रहा हूँ कि तुम्हें जाना चाहिए,” उस्ताद जी ने सोफे पर बैठते हुए कहा। “बरगद के पेड़ के नीचे दूसरा पेड़ कभी पनप नहीं पाता, बेटा। मैंने तुम्हें जो सिखाना था, सिखा दिया। अब तुम्हारी उड़ान का वक्त है। मेरी पुरानी रवायतें, मेरे उसूल... ये सब मेरी दुनिया के सच हैं। आज की दुनिया अलग है। प्रिया बिटिया सही सोचती है। तुम्हें अपनी पहचान बनानी होगी।”

“लेकिन बाबा, आपको छोड़कर...?” समीर की आँखों में आँसू आ गए।

“अरे पगले,” उस्ताद जी ने हँसते हुए कहा, “मैं कोई बच्चा हूँ जो मुझे संभालने की ज़रूरत है? रामू काका हैं न मेरे पास। और वैसे भी, संगीत की साधना एकांत माँगती है। पिछले कुछ सालों से तुम्हारे और बहू के शोर-शराबे में मेरा रियाज़ भी कच्चा हो रहा था। तुम जाओगे तो मुझे भी सुकून मिलेगा।”

प्रिया के चेहरे पर चमक आ गई, लेकिन समीर को लगा जैसे किसी ने उसका कलेजा निकाल लिया हो। उस्ताद जी ने जानबूझकर कठोर शब्द चुने थे ताकि समीर को जाने में अपराधबोध न हो। यह उनकी आखिरी गुरु-दक्षिणा थी—शिष्य की मुक्ति।

हफ्ते भर के अंदर सामान बंध गया। समीर और प्रिया मुंबई के लिए रवाना हो गए। जाते वक्त समीर ने उस्ताद जी के पैर पकड़े, तो उन्होंने उसे आशीर्वाद तो दिया, लेकिन गले नहीं लगाया। उन्होंने बस इतना कहा, “जाओ, और याद रखना, सुर कभी झूठा नहीं होना चाहिए, चाहे मंच कितना भी बड़ा क्यों न हो।”

मुंबई की चकाचौंध ने शुरुआत में समीर की आँखों को धुंधला कर दिया। प्रिया बहुत खुश थी। आलीशान फ्लैट, गाड़ी, और पार्टियों का दौर शुरू हो गया। ‘ज़ेनिथ म्यूजिक’ ने समीर को स्टार बना दिया। उसके फ्यूज़न एल्बम हाथों-हाथ बिकने लगे। अखबारों में उसके इंटरव्यू छपने लगे। प्रिया अब उसकी पत्नी कम और मैनेजर ज्यादा बन गई थी।

लेकिन इस शोर में कुछ था जो मर रहा था।

समीर जब भी स्टूडियो में रिकॉर्डिंग के लिए जाता, उसे लगता कि वह मशीन बन गया है। प्रोड्यूसर कहते, “समीर, यहाँ थोड़ा और बेस चाहिए, राग को छोड़ो, बीट पर ध्यान दो। पब्लिक को नाचना है, समाधि में नहीं जाना।” समीर अपनी बांसुरी से वो आवाज़ें निकालने पर मजबूर था जो उसके कानों को चुभती थीं।

शाम को जब वह थका-हारा घर लौटता, तो प्रिया अक्सर पार्टियों की योजना बना रही होती। “समीर, आज मेहता जी की पार्टी में जाना ज़रूरी है, नेटवर्किंग के लिए अच्छा है।”

समीर जाना नहीं चाहता था, लेकिन प्रिया की खुशी के लिए चला जाता। धीरे-धीरे, वह अपनी सुबह की रियाज़ छोड़ने लगा। देर रात तक पार्टियों में रहने के कारण सुबह आँख नहीं खुलती थी। उसकी बांसुरी, जो कभी उसकी आत्मा का हिस्सा थी, अब एक 'इंस्ट्रूमेंट' बनकर रह गई थी जिसे वह केवल पैसों के लिए बजाता था।

छह महीने बीत गए। समीर ने एक बार भी उस्ताद जी को फोन नहीं किया। उसे शर्म आती थी। वह उनसे क्या कहता? कि उसने उनके सिखाए रागों को डिस्को बीट्स में बेच दिया?

तभी एक दिन, शहर में ‘अंतर्राष्ट्रीय शास्त्रीय संगीत महोत्सव’ का आयोजन हुआ। आयोजकों ने समीर खान को मुख्य कलाकार के रूप में आमंत्रित किया। यह एक प्रतिष्ठित मंच था जहाँ दुनिया भर के दिग्गज कलाकार आने वाले थे। प्रिया बहुत उत्साहित थी। “यह तुम्हारा मौका है समीर, यह साबित करने का कि तुम क्लासिकल में भी बेस्ट हो।”

समीर डर गया। पिछले छह महीनों में उसने शुद्ध शास्त्रीय संगीत का रियाज़ लगभग छोड़ दिया था।

कॉन्सर्ट की रात आई। हॉल खचाखच भरा था। समीर मंच पर बैठा। उसने तानपुरे की गूँज सुनी। उसने आँखें बंद कीं और राग 'मारवा' शुरू करने की कोशिश की। यह शाम का एक गंभीर राग था, जो उस्ताद जी का पसंदीदा था।

उसने आलाप लिया। पहली कुछ पंक्तियाँ ठीक थीं, लेकिन जैसे ही वह गहरे सुरों में उतरा, उसकी साँसें उखड़ने लगीं। उसकी उंगलियाँ लड़खड़ा गईं। वह सुर जो रूह को छूना चाहिए था, वह बस एक सपाट आवाज़ बनकर रह गया। उसे अचानक उस्ताद जी का चेहरा याद आया—सख्त और अनुशासित। उसे लगा जैसे उस्ताद जी उसे देख रहे हैं और कह रहे हैं, “सुर झूठा है समीर... सुर झूठा है।”

समीर के माथे पर पसीना आ गया। वह फिर से कोशिश करने लगा, लेकिन जितना वह कोशिश करता, वह उतना ही भटकता गया। दर्शकों में बैठी प्रिया के चेहरे पर तनाव साफ दिख रहा था। फुसफुसाहट शुरू हो गई। “यह वही समीर खान है? लगता है बॉलीवुड ने इसे बर्बाद कर दिया।”

समीर ने बीच में ही बांसुरी नीचे रख दी। सन्नाटा छा गया। वह उठा, दर्शकों के सामने हाथ जोड़े और काँपती आवाज़ में बोला, “माफ़ कीजियेगा। आज मेरा साज़ मुझसे नाराज़ है। मैं... मैं नहीं बजा पाऊँगा।”

वह मंच छोड़कर भाग गया। ग्रीन रूम में जाकर उसने अपनी बाँसुरी को दीवार पर दे मारा। वह फूट-फूट कर रोने लगा। वह सफलता, वह पैसा, वह फ्लैट—सब उसे कचरा लग रहा था। उसने अपनी आत्मा को मार डाला था।

प्रिया दौड़ी हुई अंदर आई। “समीर! यह क्या पागलपन था? तुमने हमारा करियर दांव पर लगा दिया! तुम्हें पता है बाहर लोग क्या बातें कर रहे हैं?”

समीर ने आंसुओं से भरी आँखों से प्रिया को देखा। पहली बार उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि असीम दर्द था।

“लोग क्या कह रहे हैं, मुझे परवाह नहीं प्रिया। परवाह इस बात की है कि आज मेरी बांसुरी ने मुझसे बात करना बंद कर दिया। मैं खोखला हो गया हूँ। तुम्हारे इस 'मॉडर्न' जीवन ने, इस पैसे की दौड़ ने मुझसे मेरा संगीत छीन लिया। मैं एक दुकानदार बन गया हूँ, कलाकार नहीं रहा।”

प्रिया ठिठक गई। उसने समीर को इतना टूटा हुआ कभी नहीं देखा था।

“प्रिया,” समीर ने सिसकते हुए कहा, “जब मैं उस्ताद जी के पास था, तो मेरे पास पैसे नहीं थे, लेकिन मैं अमीर था। आज मेरे पास सब कुछ है, लेकिन मैं फकीर हो गया हूँ। तुमने कहा था कि हम तरक्की करेंगे। क्या इसे तरक्की कहते हैं जहाँ इंसान खुद को ही भूल जाए?”

प्रिया के पास कोई जवाब नहीं था। वह हमेशा समीर की भलाई चाहती थी, लेकिन उसे अंदाज़ा नहीं था कि उसकी महत्वाकांक्षा समीर की रूह को इस तरह कुचल देगी। उसने समीर की टूटी हुई बांसुरी के टुकड़े देखे और उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। वह जिसे समीर की 'गुलामी' समझ रही थी, वह दरअसल उसकी 'जड़ें' थीं। और जड़ों से कटकर पेड़ कभी हरा नहीं रह सकता।

अगली सुबह, जब सूरज की पहली किरण भी नहीं फूटी थी, एक टैक्सी पुरानी हवेली 'सुर-साधना' के गेट पर रुकी।

समीर और प्रिया गाड़ी से उतरे। हवेली वैसी ही थी—पुरानी, शांत और गरिमामय। अंदर से तानपुरे की धीमी आवाज़ आ रही थी। उस्ताद जी रियाज़ कर रहे थे।

समीर दबे पाँव अंदर गया। आँगन में उस्ताद जी आँखें बंद किए बैठे थे। समीर ने कुछ नहीं कहा, बस जाकर उनके चरणों में अपना सिर रख दिया और बच्चों की तरह रोने लगा।

तानपूरे की गूँज नहीं थमी। उस्ताद जी ने आँखें नहीं खोलीं, बस उनका एक हाथ समीर के सिर पर आया और उसके बालों को सहलाने लगा।

“लौट आए?” उस्ताद जी ने धीमी आवाज़ में पूछा।

“मैं भटक गया था बाबा। मुझे माफ़ कर दीजिये। मेरा सुर खो गया है,” समीर ने सिसकियों के बीच कहा।

उस्ताद जी ने मुस्कुराते हुए आँखें खोलीं। “सुर कहीं नहीं जाता बेटा, वह यहीं हवा में, मिट्टी में, और तुम्हारे अंदर है। बस उस पर दुनिया की धूल जम गई थी। झाड़नी पड़ेगी।”

उन्होंने देखा, दरवाजे पर प्रिया खड़ी थी। उसकी आँखों में भी नमी थी और सर झुका हुआ था। उस्ताद जी ने उसे इशारे से पास बुलाया।

प्रिया धीरे-धीरे पास आई और उनके पैरों में बैठ गई। “बाबा, मैंने समीर को आपसे छीनने की कोशिश की। मुझे लगा मैं उसकी मदद कर रही हूँ, पर मैं उसे बर्बाद कर रही थी। मुझे माफ़ कर दें।”

उस्ताद जी ने हँसते हुए कहा, “गलती तुम्हारी नहीं थी बहू। हर नदी को लगता है कि सागर में मिलना ही उसकी मंजिल है। लेकिन कभी-कभी उसे यह समझने में वक़्त लगता है कि उसका मीठा पानी ही उसकी असली पहचान है। तुमने समीर को दुनिया दिखाई, यह ज़रूरी था। अब इसे पता है कि इसे कहाँ रहना है।”

“बाबा, हम वापस आना चाहते हैं। उसी पुराने कमरे में, उसी दिनचर्या में। क्या आप हमें अपनाएंगे?” प्रिया ने पूछा।

“यह घर ईंट-पत्थर का नहीं, सुरों का है। और सुरों के दरवाजे कभी बंद नहीं होते,” उस्ताद जी ने अपनी दूसरी बांसुरी समीर की ओर बढ़ाई। “ले, पकड़ इसे। राग भैरव का वक्त हो रहा है। दिखा, मुंबई जाकर तूने क्या सीखा और क्या भूल आया।”

समीर ने काँपते हाथों से बांसुरी थामी। उसने होठों से लगाया। एक लंबी साँस ली और फूँक मारी।

शुरुआत में आवाज़ थोड़ी डगमगायी, लेकिन जैसे ही उस्ताद जी ने अपनी बांसुरी से उसे सहारा दिया, समीर का सुर फिर से सधने लगा। सुबह की ठंडी हवा में जब दो बांसुरियों की तान एक साथ गूँजी, तो लगा जैसे किसी भटके हुए पक्षी को वापस अपना घोंसला मिल गया हो।

प्रिया एक कोने में बैठी सब सुनती रही। उसे समझ आ गया था कि जीवन में संतुलन ज़रूरी है। उसने तय किया कि वह समीर के काम को संभालेगी, लेकिन अब उसकी शर्तों पर नहीं, बल्कि संगीत की शर्तों पर। वह मुंबई और इस हवेली के बीच एक पुल बनेगी, दीवार नहीं।

कुछ रिश्ते खून के नहीं, रूह के होते हैं। और जब रूह पुकारती है, तो दुनिया का हर शोर बेमानी हो जाता है। समीर ने अपनी सबसे बड़ी दौलत वापस पा ली थी—उसका गुरु, उसका संगीत और उसका सुकून। और प्रिया ने पा लिया था एक ऐसा पति जो अब अधूरा नहीं, पूरा था।

हवेली की वो पुरानी दीवारें, जो कुछ महीने पहले कैद लग रही थीं, अब सबसे सुरक्षित पनाहगार लग रही थीं।


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