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विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

 "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी।


सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।"


"तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए।


तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था।


दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो आई। अब जाकर चाय बनाओ, मेरा सिर फटा जा रहा है।"


मेधा बिना कुछ बोले, सिर झुकाकर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। सुमित वहीं खड़ा रहा। उसने गहरी सांस ली और पिता की आंखों में देखते हुए बोला, "पापा, मेधा चाय नहीं बनाएगी। वो अभी बहुत परेशान है। बाबूजी (ससुर जी) को कल रात हल्का हार्ट अटैक आया था। वो हॉस्पिटल में हैं।"


दीनानाथ जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें नहीं, बल्कि झुंझलाहट उभरी। "हार्ट अटैक? तो इसमें मेधा क्या डॉक्टर है जो वहां बैठकर इलाज करेगी? वहां डॉक्टर हैं, नर्स हैं, और पैसा तो उनके पास अथाह है ही। फिर बहु का वहां क्या काम? घर-गृहस्थी छोड़कर वहां बैठी रहेगी तो यहाँ का काम कौन देखेगा?"


"पापा, वो उनकी इकलौती बेटी है," सुमित ने संयम बनाए रखने की कोशिश की।


"हाँ-हाँ, पता है मुझे। इकलौती है, इसी बात का तो रोना है," दीनानाथ जी ने सोफे पर पसरते हुए कहा। "शादी के वक्त मैंने सोचा था कि इकलौती बेटी है, तो आगे-पीछे का कोई झंझट नहीं होगा। सारी जायदाद, सारा पैसा सब अपने ही घर आएगा। लेकिन यहाँ तो उल्टा हो गया। जायदाद मिलने से पहले ही जिम्मेदारियों का पहाड़ सर पर आ रहा है।"


सुमित का सब्र अब जवाब देने लगा था। वह जानता था कि उसके पिता की सोच क्या है। तीन साल पहले जब सुमित की शादी की बात चल रही थी, तब दीनानाथ जी ने मेधा को सिर्फ इसलिए चुना था क्योंकि उसके कोई भाई नहीं था। मेधा के पिता, मिस्टर खन्ना, शहर के बड़े व्यापारी थे। दीनानाथ जी का गणित सीधा था—लड़की के कोई भाई नहीं है, तो सारा बिज़नेस और प्रॉपर्टी अंततः दामाद (सुमित) के हाथ ही आएगी। उन्होंने सुमित की न-नुकर को यह कहकर दबा दिया था कि "बेटा, भविष्य सुरक्षित हो जाएगा।"


सुमित, जो एक साधारण बैंक कर्मचारी था, मेधा की सादगी और संस्कारों पर मोहित था, दौलत पर नहीं। लेकिन दीनानाथ जी की नजरें सिर्फ 'खन्ना विला' और बैंक बैलेंस पर थीं।


शाम को घर का माहौल तनावपूर्ण था। मेधा अपने कमरे में थी, अपने पिता की सेहत को लेकर चिंतित। दीनानाथ जी हॉल में अपने एक मित्र, रमेश बाबू के साथ बैठे चाय पी रहे थे।


रमेश बाबू ने पूछा, "सुना है समधी जी बीमार हैं? कोई गंभीर बात तो नहीं?"


दीनानाथ जी ने मुँह बनाते हुए कहा, "अरे रमेश भाई, क्या बताऊँ। बुढ़ापा है, बीमारी तो लगी ही रहेगी। पर मेरी मुसीबत देखो। मैंने सोचा था बिना भाई वाली लड़की लाऊँगा तो राज करूँगा। पर अब लगता है कि फंस गया हूँ। लड़की का ध्यान चौबीस घंटे मायके में लगा रहता है। अब बाप बीमार है, तो कल को उनकी तीमारदारी का जिम्मा भी हमारे सिर आएगा। पैसा तो बाद में मिलेगा, पहले तो सेवा करनी पड़ेगी। और सेवा करने के लिए मैंने बेटा नहीं पाला था।"


सुमित अपने कमरे से पानी लेने बाहर निकला था। उसने पिता के ये शब्द सुन लिए। उसके कदम वहीं ठिठक गए। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उसके पिता इतना नीचे गिर सकते हैं? वह उल्टे पाँव कमरे में लौट गया, जहाँ मेधा फोन पर अपनी माँ से बात कर रही थी।


"माँ, आप चिंता मत करो। मैं कल सुबह फिर आ जाऊंगी। पापा को सूप और दवाइयां समय पर देना..." मेधा सुबक रही थी।


सुमित ने मेधा के कंधे पर हाथ रखा। मेधा ने फोन काटा और सुमित के गले लगकर रो पड़ी। "सुमित, पापा बहुत कमजोर हो गए हैं। माँ अकेली कैसे संभालेंगी? वहां कोई पुरुष नहीं है जो भागदौड़ कर सके। ड्राइवर और नौकरों के भरोसे कब तक छोड़ेंगे?"


सुमित ने उसके आंसू पोंछे। "तुम चिंता मत करो मेधा। मैं हूँ ना।"


अगले दिन सुबह, नाश्ते की टेबल पर वही ड्रामा शुरू हुआ।


मेधा तैयार होकर आई। उसके हाथ में एक छोटा बैग था।

दीनानाथ जी ने कड़कती आवाज में पूछा, "अब कहाँ की तैयारी है?"


"पापा, मुझे हॉस्पिटल जाना है। माँ अकेली हैं," मेधा ने डरते हुए कहा।


"खबरदार जो घर से कदम बाहर निकाला!" दीनानाथ जी चिल्लाए। "कल ही तो होकर आई हो। क्या रोज-रोज का तमाशा है? बहू हो इस घर की, कोई विज़िटर नहीं। तुम्हारी माँ के पास बहुत पैसा है, नर्स रख लेंगी। तुम्हारा फर्ज यहाँ है, मेरी और तुम्हारी सास की सेवा करना।"


सरोज जी भी पति के सुर में सुर मिलाते हुए बोलीं, "हाँ बेटा, लोग क्या कहेंगे? नई-नई बहू रोज मायके भागती है। घर में टिकती ही नहीं।"


मेधा की आँखों में आंसू आ गए। वह कुछ बोलने ही वाली थी कि सुमित बीच में आ गया। उसने अपना ऑफिस बैग सोफे पर रखा और मेधा का हाथ थाम लिया।


"मेधा कहीं नहीं जाएगी पापा," सुमित ने शांत स्वर में कहा।


दीनानाथ जी के चेहरे पर विजयी मुस्कान आ गई। "देखा? इसे कहते हैं मेरा बेटा। समझदार है। जानता है कि घर कैसे चलता है।"


"रुकिये पापा, मैंने अपनी बात पूरी नहीं की," सुमित की आवाज में एक अजीब सी सख्ती थी जो दीनानाथ जी ने पहले कभी नहीं सुनी थी। "मेधा अकेली नहीं जाएगी, क्योंकि मैं भी उसके साथ जा रहा हूँ। और हम सिर्फ मिलने नहीं जा रहे, हम वहां रहने जा रहे हैं जब तक बाबूजी ठीक नहीं हो जाते।"


दीनानाथ जी के हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा। "क्या बकवास कर रहे हो? तुम... तुम घर जमाई बनोगे? मेरी नाक कटवाओगे सारे समाज में? मैंने तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा इसलिए किया था कि तुम बुढ़ापे में दूसरों के माँ-बाप की सेवा करो?"


सुमित ने गहरी सांस ली। आज वह वो सब कहने वाला था जो तीन साल से उसके मन में दबा था।

"पापा, जब आपने मेरी शादी मेधा से तय की थी, तब आपने मुझसे क्या कहा था? याद है आपको? आपने कहा था—'सुमित, लड़की इकलौती है, कोई भाई नहीं है, सारी जायदाद अपनी होगी।' आपने उनकी दौलत पर तो हक जमा लिया, पर उनकी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहे हैं?"


दीनानाथ जी का चेहरा लाल हो गया। "तो क्या गलत सोचा था? दुनिया ऐसे ही चलती है। लड़की विदा होकर आती है, तो लड़के वाले उसके मालिक होते हैं।"


"यही तो आपकी गलती है पापा," सुमित ने मेधा का हाथ कसकर पकड़ा। "आप आज भी उसी पुराने युग में जी रहे हैं जहाँ बहुएं संपत्ति होती हैं। आप भूल गए कि जब आप बिना भाई वाली लड़की को बहू बनाकर लाते हैं, तो उस घर का बेटा बनने की जिम्मेदारी भी आपकी ही होती है। आप उनकी जायदाद का वारिस तो मुझे बनाना चाहते हैं, पर उनके बुढ़ापे का सहारा बनने में आपको शर्म आती है?"


"जुबान लड़ाता है बाप से?" दीनानाथ जी ने मेज पर मुक्का मारा। "अगर तू उस घर गया, तो समझ लेना इस घर के दरवाजे तेरे लिए बंद हो गए। मुझे ऐसा बेटा नहीं चाहिए जो जोरू का गुलाम हो।"


मेधा घबरा गई। वह नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से बाप-बेटे में झगड़ा हो। उसने सुमित का हाथ खींचते हुए कहा, "सुमित, रहने दो। मैं मैनेज कर लूँगी। तुम पापा से बहस मत करो।"


सुमित ने मेधा की तरफ देखा और उसे आँखों से आश्वस्त किया। फिर वह पिता की ओर मुड़ा।

"पापा, यह जोरू की गुलामी नहीं है, यह इंसानियत है। सोचिये, अगर (भगवान न करे) कल को मैं न रहूँ और सिर्फ मेरी बहन होती, और आप बीमार पड़ते... तो क्या आप चाहते कि आपका दामाद यही कहे कि 'बुड्ढे के पास पैसा बहुत है, नर्स रख लेगा'? क्या तब आपको नहीं लगता कि आपकी बेटी और दामाद आपके पास हों?"


दीनानाथ जी चुप हो गए। यह तर्क सीधा उनके कलेजे पर लगा था। लेकिन उनका अहंकार अभी भी हार मानने को तैयार नहीं था।

"वो सब मैं नहीं जानता। अगर तूने उस घर की चौखट लांघी रहने के लिए, तो मेरा मरा मुँह देखेगा।"


सुमित ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कीं। यह फैसला मुश्किल था, लेकिन सही था।

"ठीक है पापा। अगर आपकी यही शर्त है, तो मुझे मंजूर है। मैं उस बाप को लावारिस नहीं छोड़ सकता जिसने अपनी जिगर का टुकड़ा मुझे सौंपा है। जिस दिन उन्होंने मेधा का हाथ मेरे हाथ में दिया था, उस दिन मैं सिर्फ उनका दामाद नहीं, बेटा भी बन गया था। और रही बात जायदाद की... तो आप आज ही लिखवा लीजिये कि मुझे खन्ना परिवार की एक फूटी कौड़ी नहीं चाहिए। मैं अपनी मेहनत की कमाई से उनका भी इलाज कराऊंगा और अपना घर भी चलाऊंगा।"


सुमित ने अपना बैग उठाया और मेधा के साथ दरवाजे की ओर बढ़ गया। सरोज जी रोने लगीं, "बेटा, मत जा! रोक लो इसे जी!"


दीनानाथ जी पत्थर की मूरत बने खड़े रहे। सुमित ने जाते-जाते मुड़कर कहा, "पापा, मैं जा रहा हूँ क्योंकि वहां मेरी जरूरत है। लेकिन याद रखिएगा, जिस दिन आपको मेरी जरूरत होगी, मैं इसी तरह दौड़कर आऊंगा। क्योंकि मैं बेटा हूँ... चाहे इस घर का हो या उस घर का।"


सुमित और मेधा चले गए। घर में सन्नाटा छा गया।


अगले पंद्रह दिन सुमित और मेधा ने हॉस्पिटल और खन्ना हाउस में दिन-रात एक कर दिए। सुमित ने ऑफिस के बाद पूरी रात हॉस्पिटल में जागकर बिताई। मेधा ने घर संभाला। मिस्टर खन्ना की हालत में सुधार होने लगा। उन्होंने देखा कि उनका दामाद, उनके सगे बेटे से बढ़कर उनकी सेवा कर रहा है।


एक दिन हॉस्पिटल में मिस्टर खन्ना ने कांपते हाथों से सुमित का हाथ पकड़ा। "बेटा, लोग कहते थे कि मेरा कोई कुलदीपक नहीं है, मेरा वंश कैसे चलेगा। आज मुझे पता चला कि वंश नाम से नहीं, कर्म से चलता है। तुमने साबित कर दिया कि बेटियां पराई नहीं होतीं और दामाद सिर्फ मेहमान नहीं होते।"


उधर, दीनानाथ जी के घर में अजीब सी उदासी थी। सरोज जी बीमार पड़ गईं। उनका बीपी बढ़ गया था। दीनानाथ जी अकेले पड़ गए। पानी का गिलास भी खुद लेना पड़ता। उन्हें अपनी गलती का अहसास होने लगा था, लेकिन अहंकार आड़े आ रहा था।


एक रात, सरोज जी की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। दीनानाथ जी घबरा गए। उन्होंने एम्बुलेंस को फोन किया, लेकिन वो व्यस्त थी। पड़ोसी भी शहर से बाहर थे। दीनानाथ जी के हाथ-पाँव फूल गए। अंत में, हारकर, कांपते हाथों से उन्होंने सुमित को फोन लगाया।


"सुमित... तेरी माँ..."


फोन कटने के बीस मिनट के अंदर सुमित की गाड़ी घर के बाहर थी। वह सरोज जी को गोद में उठाकर गाड़ी में लिटाया और हॉस्पिटल भागा। वही हॉस्पिटल, जहाँ मेधा के पिता भर्ती थे।


डॉक्टरों ने सरोज जी का इलाज शुरू किया। सुमित एक पल के लिए भी वहां से नहीं हटा। मेधा भी दौड़कर आई और अपनी सास के पैरों को दबाने लगी।


सुबह जब सरोज जी को होश आया, तो उन्होंने देखा कि एक तरफ सुमित बैठा है और दूसरी तरफ मेधा।

दीनानाथ जी कोने में खड़े यह सब देख रहे थे। उनकी आँखों में पानी था।


सुमित उनके पास गया। "पापा, डॉक्टर ने कहा है अब वो खतरे से बाहर हैं। आप घर जाकर आराम कीजिये, मैं हूँ यहाँ।"


दीनानाथ जी का बांध टूट गया। उन्होंने सुमित को गले लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगे।

"मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैं अंधा हो गया था। मैं पैसों के लालच में रिश्तों का मोल भूल गया था। तूने सही कहा था, तू सिर्फ मेरा बेटा नहीं है, तू उस घर का भी बेटा है। और आज मेधा ने साबित कर दिया कि वो सिर्फ बहू नहीं, बेटी है।"


सुमित ने मुस्कुराते हुए पिता के आंसू पोंछे।

"पापा, परिवार तोड़ने से नहीं, जोड़ने से बनता है। दो घर हैं, तो दोहरे फर्ज हैं। बस इतनी सी बात समझनी थी।"


कुछ दिनों बाद, जब मिस्टर खन्ना हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हुए, तो वह अपने घर नहीं गए। दीनानाथ जी खुद उन्हें लेने आए थे।

"समधी जी," दीनानाथ जी ने हाथ जोड़कर कहा, "अब से आप अकेले उस बड़े बंगले में नहीं रहेंगे। जब तक आप पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते, आप हमारे साथ रहेंगे। आखिर हम एक ही परिवार हैं।"


मिस्टर खन्ना की आँखों में आंसू आ गए।

उस दिन शहर ने एक नई मिसाल देखी। एक ही छत के नीचे दो पिता, दो माँ और उनके बच्चे हंसी-खुशी रह रहे थे। सुमित और मेधा ने यह साबित कर दिया था कि अगर नीयत साफ़ हो, तो शादी के बाद बेटे बंटते नहीं, बल्कि जिम्मेदारियां साझा हो जाती हैं।


दीनानाथ जी अब गर्व से कहते हैं, "मेरा एक बेटा नहीं, दो बेटे हैं। एक सुमित, और एक मेरी बहू मेधा।" और जायदाद? वह तो अब वैसे भी मायने नहीं रखती थी, क्योंकि असली खजाना तो 'रिश्ते' थे जो उन्होंने वापस पा लिए थे।


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**निष्कर्ष:**

समाज अक्सर दामाद को 'ससुराल का मेहमान' मानता है और बेटे को 'बुढ़ापे की लाठी'। लेकिन जब हम बेटे और दामाद, बेटी और बहू का फर्क मिटा देते हैं, तो कोई भी माँ-बाप खुद को अनाथ या बेसहारा महसूस नहीं करते। दहेज और जायदाद की भूख रिश्तों को दीमक की तरह चाट जाती है, लेकिन समझदारी और प्रेम उस घर को स्वर्ग बना देते हैं।


**लेखक का संदेश:**

शादी दो परिवारों का मिलन है, न कि कोई व्यापारिक सौदा। अगर आप किसी की बेटी को अपने घर की लक्ष्मी बनाकर लाते हैं, तो उसके बूढ़े माता-पिता की फिक्र करना भी आपका ही धर्म है। सच्चा मर्द वो नहीं जो पत्नी पर हुक्म चलाए, बल्कि वो है जो उसके सुख-दुःख में उसके साथ चट्टान बनकर खड़ा रहे।


**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। रिश्तों की इस खूबसूरत परिभाषा को दुनिया तक पहुँचाने में मदद करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद!**


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