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मार्च, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दहलीज

  बनारस के घाटों की सीढ़ियों पर बैठी काव्या अक्सर गंगा की लहरों को एकटक देखा करती थी। लहरों का वह अनवरत प्रवाह उसकी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं जैसा था, जो कभी ठहरना नहीं चाहता था। काव्या मध्यम वर्गीय परिवार की एक होनहार लड़की थी, जिसके सपने बनारस की संकरी गलियों से कहीं बड़े थे। उसे लगता था कि उसकी प्रतिभा इस छोटे शहर में घुटकर रह जाएगी। उसे फैशन डिजाइनिंग की दुनिया में अपना नाम बनाना था, और इसके लिए मुंबई की चमक-धमक उसे चुंबक की तरह खींच रही थी। उसके पिता, दीनानाथ जी, एक सेवानिवृत्त अध्यापक थे, जो सिद्धांतों और अनुशासन के पक्के थे। उनका मानना था कि सफलता की नींव धैर्य और संस्कारों पर टिकी होती है, न कि जल्दबाजी और चकाचौंध पर। काव्या के जीवन में अनिकेत एक ठहराव की तरह था। वे दोनों बचपन से साथ पढ़े थे। अनिकेत स्वभाव से शांत, मृदुभाषी और जमीन से जुड़ा हुआ इंसान था। उसने बनारस में ही रहकर अपने पिता की छोटी सी टेक्सटाइल की दुकान को संभालने का फैसला किया था। वह काव्या की हर बात समझता था, उसकी उड़ानों को जानता था, लेकिन वह यह भी जानता था कि काव्या की मासूमियत उसका सबसे बड़ा शत्रु बन सकती है।...

संतोष और प्रेम का नमक

कमरे की खिड़की से छनकर आती सुबह की धूप सीधे राघव की आँखों पर पड़ रही थी, लेकिन उसकी नींद तो कब की उजड़ चुकी थी। वह बिस्तर के किनारे पर बैठा, सिर झुकाए, अपने दोनों हाथों में सिर थामे किसी गहरी सोच में डूबा था। आज फिर वही दिन था—कर्जदारों के फोन, ऑफिस में झूठ बोलने का सिलसिला और घर में पसरा हुआ तनावपूर्ण सन्नाटा। राघव ने घड़ी देखी, आठ बज रहे थे। उसे तैयार होना था, लेकिन शरीर में जैसे जान ही नहीं थी। तभी कमरे का दरवाजा हल्की सी आवाज के साथ खुला। मीरा अंदर आई। उसके हाथ में एक इस्त्री की हुई शर्ट और पैंट थी, और दूसरे हाथ में चाय का प्याला। उसने खामोशी से कप मेज पर रखा और कपड़े बिस्तर पर। राघव ने नजरें उठाकर मीरा को देखा। उसकी आँखों में सूजन थी, साफ पता चल रहा था कि वह पूरी रात रोती रही है। राघव ने दबी हुई आवाज में पूछा, "तुमने मेरे कपड़े क्यों निकाले? कल रात तो तुमने कहा था कि अब तुम्हें मेरी कोई परवाह नहीं। तुमने कहा था कि मैं अपनी जिंदगी के साथ जो चाहे करूँ, तुम अब बीच में नहीं आओगी। फिर ये चाय, ये कपड़े... ये सब क्यों?" मीरा एक पल के लिए रुकी। उसकी नजरें राघव पर टिकीं, जिनमें ग...

आधुनिकता का अर्थ

  बनारस के एक पुराने मोहल्ले की संकरी गलियों में सुबह की अजान और मंदिर की घंटियों के साथ ही सावित्री देवी की आवाज भी गूंजने लगती थी। सावित्री देवी का घर मोहल्ले का सबसे ऊंचा और पक्का मकान था, जिसे वो अपनी नाक और शान दोनों मानती थीं। उनके घर के ठीक सामने एक पुराना, ईंटों वाला मकान था, जिसकी दीवारों से पलस्तर झड़ रहा था, लेकिन उस घर की छत हमेशा हरे-भरे पौधों और रंग-बिरंगे फूलों से लदी रहती थी। उस घर में रहती थी अवनि। अवनि की उम्र यही कोई अट्ठाईस-तीस के आसपास रही होगी। बिखरे बाल, आंखों पर मोटा चश्मा, और अक्सर कपड़ों पर या तो मिट्टी लगी होती या फिर पेंट के दाग। सावित्री देवी रोज सुबह अपनी बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियां लेते हुए अवनि को देखतीं और नाक-भौं सिकोड़ लेतीं। अवनि का काम ही कुछ ऐसा था। वह शहर के एक एनजीओ के लिए काम करती थी जो अनाथ बच्चों और बेजुबान जानवरों के लिए कार्य करता था, साथ ही वह एक फ्रीलांस आर्टिस्ट भी थी। लेकिन सावित्री देवी के लिए 'नौकरी' का मतलब सिर्फ सुबह नौ बजे टिफिन लेकर निकलना और शाम को छह बजे वापस आना था। सावित्री देवी की अपनी दुनिया बड़ी व्यवस्थित और चम...

सामाजिक प्रतिष्ठा

  रात के ग्यारह बज रहे थे। बेडरूम में एसी की हल्की गुनगुनाहट के अलावा एकदम सन्नाटा था। समीर अपने लैपटॉप में सिर गड़ाए कल की प्रेजेंटेशन और घर पर होने वाली पूजा की तैयारियों की लिस्ट को आखिरी बार देख रहा था। बिस्तर के दूसरे कोने पर बैठी वंदना अपने माथे को कसकर दबाए हुए थी। उसके चेहरे पर पसीने की बारीक बूंदें थीं और शरीर तप रहा था। उसने हिम्मत जुटाकर समीर के कंधे पर हाथ रखा। "समीर..." वंदना की आवाज़ में एक अजीब सी लड़खड़ाहट थी। समीर ने बिना नज़रें हटाए ही झुंझलाते हुए कहा, "वंदना, प्लीज! अब और कोई नई मुसीबत मत खड़ी करना। तुम्हें पता है ना कल पापा की बरसी है और घर में सत्यनारायण की कथा भी रखी है। मम्मी सुबह से तैयारियों में लगी हैं और मैं ऑफिस और घर दोनों मैनेज करने में पागल हो रहा हूँ। अब अगर तुम्हें किसी रिश्तेदार की शिकायत करनी है या काम की टेंशन बतानी है, तो प्लीज, कल पूजा के बाद। अभी मुझे फोकस करने दो।" वंदना ने एक बार फिर कुछ कहने के लिए मुंह खोला, उसके होंठ कांप रहे थे। वह कहना चाहती थी कि उसे 103 डिग्री बुखार है, उसका बदन टूट रहा है और उसे चक्कर आ रहे हैं। लेकि...