बनारस के घाटों की सीढ़ियों पर बैठी काव्या अक्सर गंगा की लहरों को एकटक देखा करती थी। लहरों का वह अनवरत प्रवाह उसकी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं जैसा था, जो कभी ठहरना नहीं चाहता था। काव्या मध्यम वर्गीय परिवार की एक होनहार लड़की थी, जिसके सपने बनारस की संकरी गलियों से कहीं बड़े थे। उसे लगता था कि उसकी प्रतिभा इस छोटे शहर में घुटकर रह जाएगी। उसे फैशन डिजाइनिंग की दुनिया में अपना नाम बनाना था, और इसके लिए मुंबई की चमक-धमक उसे चुंबक की तरह खींच रही थी। उसके पिता, दीनानाथ जी, एक सेवानिवृत्त अध्यापक थे, जो सिद्धांतों और अनुशासन के पक्के थे। उनका मानना था कि सफलता की नींव धैर्य और संस्कारों पर टिकी होती है, न कि जल्दबाजी और चकाचौंध पर। काव्या के जीवन में अनिकेत एक ठहराव की तरह था। वे दोनों बचपन से साथ पढ़े थे। अनिकेत स्वभाव से शांत, मृदुभाषी और जमीन से जुड़ा हुआ इंसान था। उसने बनारस में ही रहकर अपने पिता की छोटी सी टेक्सटाइल की दुकान को संभालने का फैसला किया था। वह काव्या की हर बात समझता था, उसकी उड़ानों को जानता था, लेकिन वह यह भी जानता था कि काव्या की मासूमियत उसका सबसे बड़ा शत्रु बन सकती है।...