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मई, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

माँ तुम लौट आओ

  "पापा, बस दो घंटे और... मेरी ट्रेन स्टेशन पहुँचने वाली है। आप और माँ तैयार रहिएगा।" फोन पर आदित्य की उस उत्साह से भरी आवाज़ ने केशव बाबू के हाथों से चाय का प्याला लगभग गिरा ही दिया था। प्याला तो बच गया, लेकिन केशव बाबू का पूरा वजूद कांप उठा था। सामने दीवार पर लगी घड़ी की टिकटिक किसी टाइम बम की तरह लग रही थी। आदित्य आ रहा है। दो साल बाद। सियाचिन की बर्फीली चोटियों पर देश की रक्षा करने वाला उनका बेटा, मेजर आदित्य, घर लौट रहा था। खुशी? नहीं, केशव बाबू के चेहरे पर खुशी का एक भी कण नहीं था। वहाँ सिर्फ घबराहट थी। एक ऐसी घबराहट जो किसी अपराधी को अपनी सज़ा के वक्त होती है। वे पिछले एक घंटे से ड्राइंग रूम में पागलों की तरह चक्कर काट रहे थे। कभी सोफे के कुशन ठीक करते, तो कभी मेज पर जमी धूल को अपने कुर्ते से पोंछने लगते। घर एकदम वीरान था। वही घर, जो कभी 'सुधा' की हंसी और चूड़ियों की खनक से गूंजता था, आज एक खामोश मकबरे जैसा लग रहा था। केशव बाबू ने कांपते हाथों से कमरे में रूम फ्रेशर छिड़का—सुधा का पसंदीदा मोगरे वाला। वे कोशिश कर रहे थे कि घर की उस सीलन भरी बासी गंध को छिपा सकें...

सस्ती सोच

  “जिस सफाईकर्मी को वह ‘नीचा’ समझता था… उसी ने उसकी जान बचाई” अपनी नई-नई खरीदी हुई चमचमाती घड़ी को बार-बार कलाई पर घुमाकर देखते हुए समर ने ऑफिस के रिसेप्शन पर खड़ी लड़की से कहा, “देखो, आज की मीटिंग में कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए। क्लाइंट को पानी भी ग्लास में नहीं, बोतल में चाहिए। और हाँ… बाहर जो सफाई वाले हैं न, उनको लाउंज के पास मत आने देना। बदबू आती है।” रिसेप्शन पर खड़ी अनन्या ने ‘जी सर’ कहकर सिर हिला दिया, पर उसके चेहरे पर हल्की सी असहजता उतर आई। समर ने नोटिस किया, फिर भी नजरअंदाज कर दिया। उसे अपनी छवि की फिक्र थी। आखिर नई पोस्ट मिली थी—ऑपरेशंस हेड। वह चाहता था कि लोग उसे “परफेक्ट” समझें—साफ-सुथरा, स्मार्ट, और “स्टैंडर्ड” वाला आदमी। दोपहर तक सब ठीक चला। क्लाइंट चला गया, समर की तारीफ भी हुई। वह खुश था। उसी खुशी में वह अपने केबिन से निकला तो गलियारे में एक बुजुर्ग सफाईकर्मी—हरिहर—मोप लगाते दिखा। पसीने से भीगा, सिर झुका, काम में डूबा। समर ने रास्ता बदलने के बजाय तेज कदमों से उसके पास से निकलते हुए कहा, “अरे देख कर चलो! मेरे जूते पर छींटा आ गया तो?” हरिहर ने तुरंत झुककर कहा, “माफ क...

पैसा फेल हो गया, संस्कार जीत गए – एक भाभी की कहानी

भाभी, एक बड़ी खुशखबरी है।” शालिनी ने फोन पर चहकते हुए अपनी भाभी अंजलि से कहा। उसकी आवाज़ में एक ऐसी खनक थी जो अक्सर रईसी और आत्मविश्वास से आती है। “ननद रानी, अगर मैं गलत नहीं हूँ तो तुम्हारे बेटे कबीर की शादी की तारीख पक्की हो गई है?” अंजलि ने अपनी सिलाई मशीन का पहिया रोकते हुए, चेहरे पर एक फीकी मुस्कान लाकर कहा। वह जानती थी कि यह फोन आज नहीं तो कल आने ही वाला था। “हाँ भाभी! बिल्कुल सही पहचाना आपने। कबीर की शादी अगले महीने की बीस तारीख को तय हुई है। आप तो मेरे बताने से पहले ही सब समझ जाती हैं। आखिर पुरानी जोहरी हैं आप।” शालिनी हँसते हुए बोली, लेकिन उसकी हँसी में वह पुराना, कच्चा अपनापन नहीं था जो शादी से पहले हुआ करता था। “शालिनी, मैं तो तुम्हें बचपन से जानती हूँ। जब मैं इस घर में ब्याह कर आई थी, तब तुम स्कूल में पढ़ती थीं। तुम्हारी हर धड़कन की खबर रहती थी मुझे।” अंजलि ने पुरानी यादों को टटोलने की कोशिश की। “भाभी, वो दिन भी क्या दिन थे। आपने कभी मुझे ननद समझा ही नहीं, हमेशा छोटी बहन की तरह लाड़ किया। माँ के जाने के बाद तो आप ही ने मुझे संभाला था।” शालिनी की आवाज़ में एक पल के लिए नरमी ...

जिस बहू को घर से निकालने वाले थे… उसी ने मंच पर सच्चाई साबित कर दी”

बनारस के अस्सी घाट की सीढ़ियों से टकराती गंगा की लहरों का शोर भी आज वाणी के मन में चल रहे तूफ़ान को शांत नहीं कर पा रहा था. हवेली के भीतर का सन्नाटा बाहर के शोर से कहीं ज्यादा डरावना था. 'स्वर-साधना' हवेली, जो पिछले सौ सालों से शास्त्रीय संगीत का गढ़ मानी जाती थी, आज एक अजीब से तनाव के साये में जी रही थी. वाणी ने अपनी हथेलियों को आपस में रगड़ा, जो डर और ठंड से पसीज रही थीं. उसने एक बार फिर उस बंद दरवाजे की तरफ देखा जिसके पीछे उसके ससुर, विख्यात शास्त्रीय गायक पंडित दीनानाथ मिश्र, रियाज कर रहे थे. तानपूरे की गूंज बाहर तक आ रही थी, लेकिन उस गूंज में आज वह सुकून नहीं था जो हमेशा होता था. आज उसमें एक कठोरता थी, एक अस्वीकार की ध्वनि थी. यह सब शुरू हुआ था तीन दिन पहले. वाणी, जो खुद एक साधारण परिवार से थी लेकिन जिसके कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था, का विवाह इस प्रतिष्ठित घराने के वारिस, सात्विक से हुआ था. विवाह को अभी छह महीने ही हुए थे. वाणी के पिता एक स्कूल शिक्षक थे और उन्होंने अपनी हैसियत से बढ़कर इस विवाह में खर्च किया था, यह सोचकर कि उनकी बेटी को एक ऐसा घर मिल रहा है जहाँ संग...

जिस बॉस को वह घमंडी समझती थी… वही माँ बनकर सामने आई”

  “जिस बॉस को वह घमंडी समझती थी… वही माँ बनकर सामने आई” कॉन्फ्रेंस रूम के भारी शीशे वाले दरवाजे पर अपनी नजरें गड़ाए अनन्या बार-बार अपनी कलाई घड़ी देख रही थी. उसकी धड़कनें किसी तेज रफ्तार ट्रेन की तरह भाग रही थीं. आज वह दिन था जिसका इंतजार वह पिछले छह महीनों से कर रही थी, और जिससे वह सबसे ज्यादा डरती भी थी. ‘द इंकवेल्स’ पब्लिशिंग हाउस की सर्वेसर्वा, मालविका शेरगिल, आज ऑफिस आ रही थीं. अनन्या ने घबराहट में अपनी फाइल को सीने से भींच लिया. उसने अपने साधारण सूती कुर्ते पर पड़ी एक अदृश्य सलवट को ठीक किया और खुद को संयमित करने की कोशिश की. उसने मालविका मैम के बारे में न जाने कितनी कहानियां सुन रखी थीं. हिंदी साहित्य जगत में उनका नाम एक वटवृक्ष की तरह था, जिसकी छांव में नए लेखकों को पनाह मिलती थी. अनन्या के मन में उनकी एक छवि बसी हुई थी—एक गंभीर, खादी की साड़ी पहनने वाली, चश्मे के पीछे से दुनिया को तजुरबे की नजर से देखने वाली विदुषी महिला. एक ऐसी गुरु जो साहित्य की बारीकियों पर घंटों चर्चा करती होंगी. लेकिन जैसे ही लिफ्ट का दरवाजा खुला और स्टिलेटो हील्स की खट-खट आवाज संगमरमर के फर्श पर गूंज...