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माँ तुम लौट आओ

 "पापा, बस दो घंटे और... मेरी ट्रेन स्टेशन पहुँचने वाली है। आप और माँ तैयार रहिएगा।"

फोन पर आदित्य की उस उत्साह से भरी आवाज़ ने केशव बाबू के हाथों से चाय का प्याला लगभग गिरा ही दिया था। प्याला तो बच गया, लेकिन केशव बाबू का पूरा वजूद कांप उठा था। सामने दीवार पर लगी घड़ी की टिकटिक किसी टाइम बम की तरह लग रही थी।

आदित्य आ रहा है। दो साल बाद। सियाचिन की बर्फीली चोटियों पर देश की रक्षा करने वाला उनका बेटा, मेजर आदित्य, घर लौट रहा था।

खुशी? नहीं, केशव बाबू के चेहरे पर खुशी का एक भी कण नहीं था। वहाँ सिर्फ घबराहट थी। एक ऐसी घबराहट जो किसी अपराधी को अपनी सज़ा के वक्त होती है। वे पिछले एक घंटे से ड्राइंग रूम में पागलों की तरह चक्कर काट रहे थे। कभी सोफे के कुशन ठीक करते, तो कभी मेज पर जमी धूल को अपने कुर्ते से पोंछने लगते।

घर एकदम वीरान था। वही घर, जो कभी 'सुधा' की हंसी और चूड़ियों की खनक से गूंजता था, आज एक खामोश मकबरे जैसा लग रहा था। केशव बाबू ने कांपते हाथों से कमरे में रूम फ्रेशर छिड़का—सुधा का पसंदीदा मोगरे वाला। वे कोशिश कर रहे थे कि घर की उस सीलन भरी बासी गंध को छिपा सकें जो पिछले छह महीनों में दीवारों में बस गई थी।

लेकिन क्या खुशबू से सच को छिपाया जा सकता है?

केशव बाबू बेडरूम में गए और अलमारी खोली। वहां सुधा की साड़ियां करीने से रखी थीं। उन्होंने एक नीली साड़ी निकाली—वही जिसे सुधा अक्सर पहनती थी—और उसे ड्राइंग रूम के दीवान पर ऐसे रख दिया, मानो अभी-अभी कोई उसे तह करके वहां रखकर गया हो। फिर उन्होंने सुधा का चश्मा उठाया और उसे सेंटर टेबल पर अखबार के ऊपर रख दिया।

यह सब करते हुए उनकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

छह महीने हो गए थे सुधा को गए हुए। कार्डियक अरेस्ट। सब कुछ इतना अचानक हुआ था कि केशव बाबू को संभलने का मौका ही नहीं मिला। उस वक्त आदित्य सियाचिन में एक बेहद नाजुक और खतरनाक मिशन पर था। कमांडिंग ऑफिसर ने केशव बाबू को सलाह दी थी—"सर, अगर अभी मेजर को यह खबर दी, तो उनका मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है। वहां एक गलती का मतलब है मौत। मिशन खत्म होने तक रुक जाइए।"

और केशव बाबू रुक गए थे। उन्होंने अपने बेटे की जान बचाने के लिए अपने जीवन के सबसे बड़े दुख को अकेले पिया था।

पिछले छह महीनों से केशव बाबू, सुधा बनकर आदित्य से फोन पर बात नहीं कर पाते थे, क्योंकि आवाज़ का धोखा नहीं दिया जा सकता था। वे बहाना बना देते थे—"माँ मंदिर गई है," "माँ सो रही है," "माँ के गले में इन्फेक्शन है।" लेकिन वे चिट्ठियाँ लिखते रहे। सुधा के नाम से। सुधा की ही तरह हर छोटी-छोटी बात की हिदायत देते हुए—"मोज़े पहनकर सोना," "खाना समय पर खाना।"

वे चिट्ठियाँ लिखते वक्त रोते थे, स्याही फैल जाती थी, फिर दोबारा लिखते थे। उन्होंने एक मृत पत्नी को अपने बेटे के लिए छह महीने तक कागज़ों पर ज़िंदा रखा था।

लेकिन आज? आज आदित्य साक्षात सामने खड़ा होगा। आज झूठ की यह दीवार कैसे टिकेगी? केशव बाबू का दिल बैठ रहा था। उन्हें लग रहा था कि वे अपने बेटे की नज़रों का सामना कैसे करेंगे? कैसे कहेंगे कि जिस माँ के हाथ का गाजर का हलवा खाने के लिए वह तड़प रहा है, वह अब राख बन चुकी है?

डोरबेल बजी।

केशव बाबू के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने आंसुओं को पोंछा, चेहरे पर एक झूठी मुस्कान चिपकाई और दरवाजा खोलने बढ़े।

सामने आदित्य खड़ा था। वर्दी में। चेहरे पर थकान थी, दाढ़ी थोड़ी बढ़ी हुई थी, लेकिन आंखों में घर लौटने की चमक थी।

"पापा!" आदित्य ने अपना बैग छोड़ा और पिता के गले लग गया।

केशव बाबू ने उसे भींचा, लेकिन उनका शरीर अकड़ा हुआ था।

"आ गया मेरा शेर," केशव बाबू की आवाज़ रूआंसी थी।

आदित्य अंदर आया। उसकी नज़रें चारों तरफ घूमीं। "माँ कहाँ है? किचन में है क्या? कितनी बार कहा है कि मेरे आने पर किचन में मत घुसी रहा करो।"

आदित्य सीधा रसोई की तरफ बढ़ा।

"रुक जा बेटा!" केशव बाबू ज़ोर से चिल्लाए। आदित्य ठिठक गया। "वो... वो सुधा घर पर नहीं है।"

"घर पर नहीं है?" आदित्य की भौंहें सिकुड़ गईं। "अभी तो आपने कहा था तैयार रहना। कहाँ गई है?"

"वो... तेरी मौसी की तबीयत बहुत खराब है। कानपुर। कल रात ही जाना पड़ा उसे। बहुत जिद कर रही थी कि रुक जाऊं, आदि आ रहा है, लेकिन मौसी की हालत सीरियस थी," केशव बाबू एक सांस में रटा-रटाया झूठ बोल गए। "उसने कहा है दो दिन में आ जाएगी।"

आदित्य ने पिता को घूरकर देखा। कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

"अच्छा," आदित्य ने धीमे स्वर में कहा। "कोई बात नहीं।"

वह सोफे पर बैठ गया। उसकी नज़र टेबल पर रखे चश्मे और दीवान पर रखी नीली साड़ी पर पड़ी। केशव बाबू की जान में जान आई। चलो, स्टेज सेट करने का फायदा हुआ।

"तू फ्रेश हो जा, मैं चाय बनाता हूँ," केशव बाबू जल्दी से किचन में भागना चाहते थे।

"रहने दीजिए पापा," आदित्य ने कहा। "बैठिए न थोड़ी देर। बात करते हैं।"

आदित्य का व्यवहार थोड़ा अजीब था। वह न तो माँ के न होने पर गुस्सा हुआ, न ही उसने फोन करने की जिद की। वह बस घर की हर चीज़ को बहुत गौर से देख रहा था। दीवारों पर जमी धूल, सूख चुके मनी प्लांट के पौधे, और वो सन्नाटा जो घर के हर कोने में पसरा था।

"घर बहुत बदल गया है पापा," आदित्य ने छत की ओर देखते हुए कहा। "कोने में जाले लगे हैं। माँ तो एक भी जाला बर्दाश्त नहीं करती थी।"

केशव बाबू का पसीना छूटने लगा। "हाँ वो... पिछले कुछ दिनों से उसे कमर में दर्द था न, तो सफाई ठीक से नहीं हो पाई। नौकरानी भी छुट्टी पर है।"

"और ये पौधे?" आदित्य ने सूखे गमले की मिट्टी छुई। "ये तो मर चुके हैं पापा। माँ तो इनसे बच्चों की तरह बात करती थी। क्या मौसी की बीमारी में वो अपने इन बच्चों को भूल गई?"

केशव बाबू को लगा कि अब वे पकड़े जाएंगे। आदित्य के सवाल किसी फौजी पूछताछ (interrogation) जैसे तीखे होते जा रहे थे।

"बेटा, तू थक गया है। आराम कर ले," केशव बाबू ने बात पलटने की कोशिश की।

"पापा, मुझे भूख लगी है," आदित्य ने अचानक कहा। "गाजर का हलवा बनाया होगा न माँ ने? जाने से पहले बना कर गई होगी? उसे पता है मुझे पसंद है।"

केशव बाबू की सांस अटक गई। उन्होंने हलवा बनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह जल गया था और उन्होंने उसे छिपा दिया था।

"वो... बेटा... जल्दी-जल्दी में वो बना नहीं पाई," केशव बाबू ने नज़रें झुका लीं।

आदित्य अपनी जगह से खड़ा हुआ। उसका चेहरा एकदम सख्त हो गया था। वह धीरे-धीरे चलकर उस शोकेस के पास गया जहाँ लैंडलाइन फोन रखा था।

"पापा, आपको पता है सियाचिन में सबसे मुश्किल चीज़ क्या होती है?" आदित्य ने फोन के रिसीवर को उठाया और उस पर जमी धूल की परत को अपनी उंगली से साफ किया। "ठंड नहीं... दुश्मन की गोली नहीं... सबसे मुश्किल होता है 'सन्नाटा'।"

केशव बाबू उसे अवाक देख रहे थे।

"सन्नाटा झूठ नहीं बोलता पापा," आदित्य ने मुड़कर पिता की आँखों में सीधे देखा। "और ये घर... ये घर चीख-चीख कर कह रहा है कि यहाँ कोई गृहणी नहीं रहती। कम से कम पिछले कई महीनों से तो नहीं।"

"ये तू क्या कह रहा है आदि?" केशव बाबू का गला सूख गया।

आदित्य ने अपनी जेब से एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ निकाला। वह एक चिट्ठी थी।

"ये आखिरी चिट्ठी जो आपने भेजी थी... 'सुधा' के नाम से," आदित्य की आवाज़ अब कांप रही थी। "पापा, माँ 'ह' कैसे लिखती थी, याद है आपको? वो 'ह' की पूंछ थोड़ी लंबी खींचती थी। और आप... आप 'ह' को थोड़ा गोल घुमाते हैं।"

केशव बाबू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

"और सबसे बड़ी बात," आदित्य ने वो चिट्ठी टेबल पर पटकी। "इस चिट्ठी में आपने लिखा था कि 'पड़ोस वाली मिसेज वर्मा की बेटी की शादी हो गई'। पापा, मिसेज वर्मा ने वो घर तीन साल पहले छोड़ दिया था। माँ ये बात जानती थी। वो कभी ये गलती नहीं करती। पर आप भूल गए थे।"

केशव बाबू सोफे पर गिर पड़े। उनका खेल खत्म हो चुका था।

"तुझे... तुझे पता था?" केशव बाबू फुसफुसाए।

आदित्य घुटनों के बल पिता के सामने बैठ गया। उसकी सख्त फौजी आँखों से अब आंसुओं का सैलाब बह निकला।

"चार महीने पहले... मुझे खबर मिल गई थी पापा," आदित्य ने सिसकते हुए कहा। "मेरा एक दोस्त जो हेडक्वार्टर में पोस्टेड है, उसने मुझे बता दिया था कि मेरे घर से... शोक संदेश आया था।"

"तो तूने... तूने बताया क्यों नहीं?" केशव बाबू ने अपने बेटे का चेहरा थाम लिया।

"क्योंकि मैं जानता था आप क्या कर रहे हैं," आदित्य ने पिता के हाथों को चूम लिया। "मैं बॉर्डर पर था पापा। अगर मैं फोन पर रो पड़ता, या मैं घर आने की जिद करता, तो आप यहाँ अकेले टूट जाते। आप मुझे बचाने के लिए माँ का नाटक कर रहे थे, और मैं... मैं आपको बचाने के लिए उस नाटक पर यकीन करने का नाटक कर रहा था।"

कमरे में सिर्फ दो पुरुषों के रोने की आवाज़ थी। पिता और पुत्र। दोनों ने एक-दूसरे को बचाने के लिए झूठ का एक भारी पत्थर अपने सीने पर रखा हुआ था।

"मैंने सोचा था मैं संभाल लूँगा," केशव बाबू रोते हुए बोले। "पर मैं हार गया बेटा। मैं तुझे माँ का प्यार नहीं दे पाया। देख, हलवा भी जल गया मुझसे। घर भी गंदा है। मैं तेरी माँ के बिना अधूरा हूँ आदि... बिल्कुल अधूरा।"

आदित्य ने पिता को अपने सीने से लगा लिया। वह बेटा जो अभी-अभी मेजर बनकर लौटा था, इस वक्त एक पिता की भूमिका निभा रहा था।

"आप हारे नहीं हैं पापा। आपने तो वो किया जो दुनिया का कोई बाप नहीं कर सकता," आदित्य ने कहा। "आपने अपनी जीवनसंगिनी को खो दिया, फिर भी मेरे लिए रोज सुबह उठकर उनकी यादों को कुरेदा, ताकि मुझे दर्द न हो। यह हार नहीं, यह दुनिया की सबसे बड़ी जीत है।"

आदित्य ने वह नीली साड़ी उठाई जो केशव बाबू ने दीवान पर सजाई थी। उसने उसे अपनी छाती से लगा लिया और गहरी सांस ली।

"इसमें अभी भी माँ की खुशबू है पापा," आदित्य मुस्कुराया, आंसुओं के बीच। "वो गई नहीं है। वो हम दोनों के प्यार में ज़िंदा है। आपके उस जले हुए हलवे की कोशिश में ज़िंदा है।"

केशव बाबू ने बेटे को देखा। उन्हें लगा जैसे आज उनका बेटा वास्तव में बड़ा हो गया है। सियाचिन की बर्फ ने उसे सख्त नहीं, बल्कि और भी संवेदनशील बना दिया था।

रात घिर आई थी। घर की बत्तियाँ बुझी हुई थीं, सिर्फ ड्राइंग रूम में एक छोटा सा लैंप जल रहा था।

किचन में गैस पर एक पतीला चढ़ा था। आदित्य और केशव बाबू, दोनों मिलकर खिचड़ी बना रहे थे। वही खिचड़ी जो सुधा अक्सर तब बनाती थी जब किसी का पेट खराब होता था या मन भारी होता था।

"नमक कम डालना, माँ कहती थी रात को नमक कम खाना चाहिए," आदित्य ने धीरे से कहा।

"हाँ," केशव बाबू ने सहमति में सिर हिलाया।

दोनों डाइनिंग टेबल पर बैठे। दो थालियां लगी थीं। एक कुर्सी खाली थी—सुधा की कुर्सी। आदित्य ने खिचड़ी का पहला निवाला लिया। वह बेस्वाद थी, शायद थोड़ी गीली भी। लेकिन उसने खा लिया।

केशव बाबू उसे देख रहे थे।

"कैसी है?"

"बिल्कुल वैसी, जैसी घर की होनी चाहिए," आदित्य ने कहा।

उसके बाद कोई कुछ नहीं बोला। उस कमरे में शब्द खत्म हो चुके थे। अब वहां झूठ की कोई जगह नहीं थी। वहां सिर्फ एक पवित्र सन्नाटा था—वह सन्नाटा जो दो टूटे हुए दिलों को जोड़ने के लिए ज़रूरी होता है। उस सन्नाटे में, केशव बाबू ने महसूस किया कि उनका घर अब वीरान नहीं है। उनका बेटा लौट आया था, और उसके साथ लौट आई थी एक समझदारी, जिसने उस मकान को फिर से 'घर' बना दिया था।

बाहर रात के अंधेरे में एक झींगुर की आवाज़ गूंज रही थी, और अंदर दो लोग खामोशी से खिचड़ी खा रहे थे, अपने-अपने हिस्से के दुख को साझा करते हुए।

लेखक : शैलेश वर्मा


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