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अप्रैल, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ये देवरानी नहीं… घर की रीढ़ निकली!

    वंदना, घर की बड़ी बहू, डाइनिंग टेबल पर बैठी थी। उसके सामने कुछ कागज़ात फैले हुए थे और पास ही एक छोटा सा मखमली ज्वेलरी बॉक्स रखा था। टेबल लैंप की धीमी रोशनी में उसका चेहरा बेहद तनावग्रस्त और पीला दिख रहा था। वह बार-बार कैलकुलेटर पर कुछ हिसाब लगाती, फिर माथा पकड़कर बैठ जाती। वंदना के पति, राघव, का कपड़े का कारोबार पिछले एक साल से मंदी की मार झेल रहा था। लेकिन बात सिर्फ़ मंदी तक होती तो वंदना संभाल लेती। असल मुसीबत यह थी कि राघव ने बाज़ार से भारी ब्याज पर कर्ज़ उठा लिया था और अब लेनदार घर तक आने लगे थे। कल शाम ही एक आदमी ने धमकी दी थी कि अगर दो दिन में 15 लाख रुपये नहीं मिले, तो वे घर खाली करवा लेंगे। राघव डिप्रेशन में था, ससुर जी को हार्ट की बीमारी थी, और सास, जानकी देवी, को इन सब बातों की भनक तक नहीं थी। ऐसे में, घर की इज़्ज़त बचाने का सारा भार वंदना ने अपने कंधों पर ले लिया था। उसने कांपते हाथों से ज्वेलरी बॉक्स खोला। उसमें उसकी शादी का भारी कुंदन का सेट था—वह आखिरी चीज़ जो उसके पास बची थी। बाकी छोटे-मोटे गहने वह पिछले कुछ महीनों में धीरे-धीरे बेच चुकी थी ताकि घर का राशन और ससुर जी ...

भाई इस घर पर मेरा भी हक़ है

  हाथ में वसीयत के वे चंद पन्ने थे, और केशव की उंगलियां ऐसे कांप रही थीं जैसे कोई छोटा बच्चा पहली बार स्कूल का रिपोर्ट कार्ड अपने पिता को दिखाने जा रहा हो। 52 साल का केशव आज अचानक खुद को बहुत 'बड़ा' महसूस कर रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—जीत की नहीं, बल्कि अस्तित्व के प्रमाण की। तीन भाइयों में केशव सबसे छोटा था। उससे बड़े विमल भैया थे और मंझले थे सुधीर भैया। 'छोटा' होना एक ऐसा विशेषण था जो केशव के नाम के साथ फेविकोल की तरह चिपका हुआ था। बचपन से लेकर पचपन तक, उसने इस शब्द का बोझ ढोया था। घर में जब भी आम आते, तो सबसे रसीला और बड़ा आम विमल भैया की थाली में जाता। माँ कहतीं, "अरे, वो बड़े हैं, पढ़ाई का बोझ है उन पर, दिमाग तेज़ चाहिए।" सुधीर भैया को उससे थोड़ा छोटा, लेकिन ठीक-ठाक आम मिल जाता। और केशव? केशव को अक्सर आम की गुठली चूसने को मिलती या वो हिस्सा जो थोड़ा दबा हुआ होता। जब वह मुँह बनाता, तो बाबूजी हंसकर कहते, "अरे केशव, तू तो घर की जान है, सबसे छोटा है, तुझे तो सबका प्यार मिलता है, आम क्या चीज़ है?" प्यार? केशव अक्सर सोचता था कि यह कैसा प्यार है ज...

एक पत्नी अपने लाचार पति के साथ इतना पत्थर दिल कैसे हो सकती है

    मीरा अभी एक महीना पहले ही इस घर की बहू बनकर आई थी। उसके पति, अर्णव, शहर के जाने-माने आर्किटेक्ट थे और सास-ससुर, यानी गायत्री देवी और विश्वनाथ जी, शहर के प्रतिष्ठित लोग माने जाते थे। मीरा ने आते ही महसूस कर लिया था कि यह घर बाहर से जितना भव्य और रसूखदार दिखता है, अंदर से उतना ही ठंडा और बेजान है। गायत्री देवी एक बेहद अनुशासित महिला थीं। सुबह पांच बजे उठना, स्नान करना, पूजा करना और फिर घर की व्यवस्था देखना। उनके चेहरे पर हमेशा एक सौम्य मुस्कान रहती थी, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक कभी नहीं पहुँचती थी। दूसरी ओर, विश्वनाथ जी पिछले पांच सालों से लकवे (paralysis) के कारण व्हीलचेयर पर थे। उनका शरीर आधा काम नहीं करता था, और वे बोलने में भी असमर्थ थे, बस टूटी-फूटी आवाज़ें और इशारे ही कर पाते थे। मीरा ने एक अजीब बात नोटिस की थी। गायत्री देवी अपने पति की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ती थीं। वे उन्हें समय पर नहलातीं, कपड़े बदलतीं, दलिया खिलातीं और दवाइयाँ देतीं। सब कुछ घड़ी की सुई के हिसाब से होता था। लेकिन, इस पूरी प्रक्रिया में एक भी शब्द नहीं बोला जाता था। गायत्री देवी विश्वनाथ जी क...

बदनसीब पिता

  "मैं ही वो बदनसीब पिता हूँ, जिसने अपनी 'सावित्री' को खो दिया था," दीनानाथ जी रो पड़े। "मैं ही तुम्हारा नाना हूँ बेटा।" वाणी के हाथ से तानपूरा छूटने ही वाला था कि शंभू काका ने संभाल लिया। "नानाजी?" वाणी की आँखों में भी आंसू आ गए। "माँ... माँ हमेशा आपकी तस्वीर छिपाकर देखती थीं।" दीनानाथ जी ने वाणी को गले लगा लिया। बरसों का जमा हुआ बर्फ का पहाड़ पिघल चुका था। उस खाली हवेली में आज फिर से रिश्तों की शहनाई गूंज उठी थी। "मुझे माफ़ कर दो बेटा," दीनानाथ जी सिसक रहे थे। "मैं अपने अहंकार में अंधा हो गया था। मैंने अपनी बेटी को, अपनी विरासत को खुद से दूर कर दिया। बीस साल... बीस साल मैंने कैसे काटे हैं, मैं ही जानता हूँ।" थोड़ी देर बाद, जब माहौल शांत हुआ, तो दीनानाथ जी ने अपने आंसू पोंछे। अब पूरी कहानी आगे पढ़ें  बनारस के पुराने मोहल्ले में स्थित 'संगीत साधना केंद्र' की इमारत आज भी अपनी पुरानी शानो-शौकत की गवाही दे रही थी। लेकिन पिछले कुछ सालों से इसकी दीवारों पर उदासी की सीलन चढ़ गई थी। पंडित दीनानाथ मिश्र, जो कभी शास्त्रीय सं...

रिटायरमेंट 'अंत' नहीं है, बल्कि यह खुद से दोबारा मिलने का एक 'मौका' है।

  रसोई घर में इलायची और केसर की महक तैर रही थी। 58 वर्षीय सुधा ने बड़ी शिद्दत से खीर बनाई थी। आज रविवार था, और सालों से इस घर का नियम था कि रविवार को नाश्ता और दोपहर का खाना कुछ खास होगा। सुधा ने काजू और बादाम के टुकड़े खीर के कटोरे में सजाए और डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ी। उसके चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान थी, वैसी मुस्कान जो आदतवश आ जाती है, खुशी से नहीं। उसने मेज़ पर तीन कटोरियां लगाईं, हालाँकि उसे पता था कि तीसरी कटोरी का अब कोई दावेदार नहीं है। उसका बेटा, 'रवि', दो साल पहले नौकरी के सिलसिले में बैंगलोर शिफ्ट हो गया था। और उसका पति, 'विशाल', पिछले छह महीने से रिटायर होकर घर पर ही थे। "विशाल, नाश्ता लग गया है," सुधा ने आवाज़ दी। ड्राइंग रूम से टीवी की आवाज़ आ रही थी। विशाल समाचार देख रहे थे। "आता हूँ," एक बेरुखी सी आवाज़ आई। सुधा कुर्सी पर बैठ गई। उसकी नज़रें उस खाली तीसरी कुर्सी पर टिक गईं जहाँ कभी रवि बैठकर चिल्लाता था, "माँ, खीर में किशमिश कम है!" तब सुधा उसे डांटती थी, विशाल हंसते थे, और घर में एक शोर रहता था। वो शोर, जो सुधा को कभी-कभी सिरदर्द लग...