वंदना, घर की बड़ी बहू, डाइनिंग टेबल पर बैठी थी। उसके सामने कुछ कागज़ात फैले हुए थे और पास ही एक छोटा सा मखमली ज्वेलरी बॉक्स रखा था। टेबल लैंप की धीमी रोशनी में उसका चेहरा बेहद तनावग्रस्त और पीला दिख रहा था। वह बार-बार कैलकुलेटर पर कुछ हिसाब लगाती, फिर माथा पकड़कर बैठ जाती। वंदना के पति, राघव, का कपड़े का कारोबार पिछले एक साल से मंदी की मार झेल रहा था। लेकिन बात सिर्फ़ मंदी तक होती तो वंदना संभाल लेती। असल मुसीबत यह थी कि राघव ने बाज़ार से भारी ब्याज पर कर्ज़ उठा लिया था और अब लेनदार घर तक आने लगे थे। कल शाम ही एक आदमी ने धमकी दी थी कि अगर दो दिन में 15 लाख रुपये नहीं मिले, तो वे घर खाली करवा लेंगे। राघव डिप्रेशन में था, ससुर जी को हार्ट की बीमारी थी, और सास, जानकी देवी, को इन सब बातों की भनक तक नहीं थी। ऐसे में, घर की इज़्ज़त बचाने का सारा भार वंदना ने अपने कंधों पर ले लिया था। उसने कांपते हाथों से ज्वेलरी बॉक्स खोला। उसमें उसकी शादी का भारी कुंदन का सेट था—वह आखिरी चीज़ जो उसके पास बची थी। बाकी छोटे-मोटे गहने वह पिछले कुछ महीनों में धीरे-धीरे बेच चुकी थी ताकि घर का राशन और ससुर जी ...