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रिटायरमेंट 'अंत' नहीं है, बल्कि यह खुद से दोबारा मिलने का एक 'मौका' है।

 रसोई घर में इलायची और केसर की महक तैर रही थी। 58 वर्षीय सुधा ने बड़ी शिद्दत से खीर बनाई थी। आज रविवार था, और सालों से इस घर का नियम था कि रविवार को नाश्ता और दोपहर का खाना कुछ खास होगा।

सुधा ने काजू और बादाम के टुकड़े खीर के कटोरे में सजाए और डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ी। उसके चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान थी, वैसी मुस्कान जो आदतवश आ जाती है, खुशी से नहीं। उसने मेज़ पर तीन कटोरियां लगाईं, हालाँकि उसे पता था कि तीसरी कटोरी का अब कोई दावेदार नहीं है।

उसका बेटा, 'रवि', दो साल पहले नौकरी के सिलसिले में बैंगलोर शिफ्ट हो गया था। और उसका पति, 'विशाल', पिछले छह महीने से रिटायर होकर घर पर ही थे।

"विशाल, नाश्ता लग गया है," सुधा ने आवाज़ दी।

ड्राइंग रूम से टीवी की आवाज़ आ रही थी। विशाल समाचार देख रहे थे। "आता हूँ," एक बेरुखी सी आवाज़ आई।

सुधा कुर्सी पर बैठ गई। उसकी नज़रें उस खाली तीसरी कुर्सी पर टिक गईं जहाँ कभी रवि बैठकर चिल्लाता था, "माँ, खीर में किशमिश कम है!" तब सुधा उसे डांटती थी, विशाल हंसते थे, और घर में एक शोर रहता था। वो शोर, जो सुधा को कभी-कभी सिरदर्द लगता था, आज उसे वही शोर संगीत जैसा याद आ रहा था।

दस मिनट बीत गए। विशाल नहीं आए। सुधा उठी और ड्राइंग रूम में गई। विशाल सोफे पर लेटे हुए मोबाइल में व्हाट्सएप फॉरवर्ड पढ़ने में व्यस्त थे।

"खाना ठंडा हो रहा है," सुधा ने धीरे से कहा।

विशाल ने बिना नज़रें उठाए कहा, "अरे सुधा, तुम खा लो न। मुझे अभी भूख नहीं है। और वैसे भी डॉक्टर ने मीठा कम करने को कहा है। तुम हर संडे वही भारी खाना बना देती हो।"

सुधा के दिल में कुछ टूटा। यह वही विशाल थे जो कभी रविवार का इंतज़ार करते थे ताकि सुधा के हाथ की खीर खा सकें। आज उन्हें यह 'भारी' लग रही थी।

सुधा चुपचाप वापस डाइनिंग टेबल पर आ गई। उसने अपनी कटोरी उठाई, लेकिन गले के नीचे निवाला नहीं उतर रहा था। उसे अचानक महसूस हुआ कि जिस 'रिटायरमेंट' का इंतज़ार विशाल कर रहे थे, असल में रिटायर वो नहीं, बल्कि सुधा हुई है।

माँ की नौकरी से रिटायरमेंट, पत्नी की जिम्मेदारियों से आंशिक रिटायरमेंट।

उसने अपना फोन उठाया और रवि को वीडियो कॉल किया। शायद बेटे से बात करके मन हल्का हो जाए। घंटी बजती रही। कॉल कट गया। तुरंत एक मैसेज आया—"माँ, अभी बिज़ी हूँ। दोस्तों के साथ ब्रंच पर आया हूँ। शाम को करता हूँ।"

सुधा ने फोन मेज़ पर रख दिया। घर में सन्नाटा था। इतना गहरा सन्नाटा कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े जैसी लग रही थी।

वह उठी और बालकनी में आ गई। सामने गमले में लगे मोगरे के पौधे सूख रहे थे। उसने सोचा, "मैं भी तो इन पौधों जैसी हो गई हूँ। जब तक फूल दे रही थी, सबने पानी दिया, खाद दी। अब जब सूख रही हूँ, तो किसी को परवाह नहीं कि जड़ें ज़िंदा हैं या मर गईं।"

सुधा हमेशा सोचती थी कि जब विशाल रिटायर होंगे और रवि सेटल हो जाएगा, तो वो और विशाल दुनिया घूमेंगे, बातें करेंगे। लेकिन विशाल अपनी ही एक अलग दुनिया में व्यस्त हो गए थे—फोन, टीवी और शाम की दोस्तों के साथ सैर। सुधा उस दुनिया का हिस्सा नहीं थी। वह बस एक 'सुविधा' थी—जो समय पर चाय देती थी, कपड़े धोती थी और घर साफ़ रखती थी।

उसकी नज़र बालकनी के कोने में पड़े एक पुराने, धूल जमे हुए बॉक्स पर पड़ी। यह बॉक्स तब का था जब वे इस घर में शिफ्ट हुए थे। सुधा ने अनायास ही उसे खोला।

अंदर पुराने कैनवास, सूखे हुए पेंट के डिब्बे और कुछ ब्रश पड़े थे।

सुधा की आँखों में एक चमक आई, जो आंसुओं के पीछे छिपी थी। शादी से पहले वह पेंटिंग करती थी। उसे रंगों से प्यार था। लेकिन फिर शादी, विशाल की नौकरी, रवि की पढ़ाई, घर की ईएमआई... इन सबमें रंग कहीं फीके पड़ गए और ब्रश सूख गए। उसने अपनी कला को यह सोचकर छोड़ दिया था कि "बाद में समय मिलेगा"।

"बाद में..." सुधा ने बुदबुदाया। "वो 'बाद' तो अब आ गया है। पर अब देखने वाला कोई नहीं है।"

उसने एक ब्रश उठाया। वह कड़ा हो चुका था। लेकिन सुधा को लगा जैसे वह ब्रश उससे कुछ कह रहा हो—'सुधा, तुम दूसरों के कैनवास पर रंग भरने में इतनी व्यस्त हो गई कि अपनी तस्वीर को कोरा ही छोड़ दिया।'

उसने एक गहरा फैसला लिया।

वह रसोई में गई, लेकिन बर्तन धोने नहीं। उसने एक गिलास पानी लिया, ब्रश को भिगोया। फिर वह स्टोर रूम से एक नया कैनवास (जो रवि के स्कूल प्रोजेक्ट से बचा था) निकाल लाई।

उसने बालकनी में ही अपना सेटअप जमाया। विशाल अभी भी टीवी देख रहे थे। उन्हें खबर भी नहीं थी कि उनकी पत्नी के अंदर एक तूफ़ान शांत हो रहा है और एक नई शुरुआत हो रही है।

सुधा ने पेंटिंग शुरू की। पहले हाथ कांपा, लेकिन फिर धीरे-धीरे ब्रश चलने लगा। उसने वो नहीं बनाया जो उसे दिखता था, उसने वो बनाया जो वह महसूस करती थी—एक अकेला पेड़, लेकिन जिसकी जड़ें गहरी थीं और जिस पर नए, हरे पत्ते फूट रहे थे।

दो घंटे बीत गए। पसीने में तरबतर, चेहरे पर रंग के धब्बे लिए सुधा जब रुकी, तो उसके चेहरे पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान थी जो विशाल ने सालों से नहीं देखी थी।

तभी विशाल बालकनी में आए। "सुधा, चाय नहीं मिली आज? शाम हो गई है।"

उनकी नज़र सामने रखे कैनवास और सुधा पर पड़ी। वे ठिठक गए। सुधा, जो हमेशा थकी और बुझी हुई लगती थी, आज एक अलग ही आत्मविश्वास से दमक रही थी।

"चाय बन जाएगी विशाल," सुधा ने ब्रश को पानी में धोते हुए कहा। उसकी आवाज़ में अब शिकायत नहीं, बल्कि एक ठहराव था। "लेकिन आज चाय आप बना लीजिये। मैं अभी अपनी पेंटिंग पूरी कर रही हूँ। और हाँ, उसमें अदरक थोड़ी ज़्यादा डालिएगा, मुझे अपने लिए कड़क चाय चाहिए।"

विशाल हैरान होकर उसे देखते रहे। उन्होंने देखा कि सुधा अब उनकी प्रतीक्षा नहीं कर रही थी। उसने अपनी खुशियों की चाबी, जो उसने परिवार की जेब में डाल रखी थी, वापस अपनी मुट्ठी में ले ली थी।

सुधा ने आसमान की तरफ देखा। उसे समझ आ गया था कि जीवन का रिटायरमेंट 'अंत' नहीं है, बल्कि यह खुद से दोबारा मिलने का एक 'मौका' है। बच्चे उड़ गए, पति अपनी दुनिया में मस्त है, तो क्या हुआ? उसकी अपनी उड़ान अभी बाकी थी।

उस शाम सुधा ने चाय नहीं बनाई, लेकिन उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे बेहतरीन घूंट पिया—आत्मसम्मान और नवनिर्माण का घूंट। उसे अब अकेलेपन से डर नहीं लग रहा था, क्योंकि अब उसके साथ उसके रंग थे।

मूल लेखिका : के कामेश्वरी


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