चंदनपुर का वह पुराना बाजार अपनी उसी जानी-पहचानी रफ्तार से चल रहा था। इसी बाजार के नुक्कड़ पर एक पुरानी सी घड़ियों की दुकान थी—'समय चक्र'। दुकान के ठीक ऊपर एक छज्जे वाला मकान था, जहाँ से बाजार का पूरा नजारा दिखता था। इस मकान में रहने वाली रेवती की जिंदगी का समय जैसे उस दिन ठहर गया था, जिस दिन वह इस घर की दहलीज लांघ कर आई थी। रेवती की उम्र बमुश्किल पच्चीस साल रही होगी। उसकी रंगत ऐसी जैसे भोर की पहली किरण और नैन-नक्श ऐसे कि कोई मूर्तिकार भी देखकर रश्क कर जाए। लेकिन इसके ठीक उलट, उसका पति दीनानाथ पचपन साल का एक कमजोर, झुर्रियों से भरा और बीमार सा दिखने वाला इंसान था। दीनानाथ के सिर के बाल झड़ चुके थे, आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे थे और उसके खांसने की आवाज पूरे घर में गूंजती रहती थी। रेवती और दीनानाथ की जोड़ी को देखकर कोई भी कह सकता था कि यह किसी भी नजरिए से एक सामान्य पति-पत्नी का रिश्ता नहीं था। यह तो जैसे एक ताजे खिले हुए गुलाब को किसी सूखे और बंजर पेड़ की टहनी से बांध देने जैसा था। रेवती की हर सुबह उसी पुरानी खिड़की के पास खड़े होकर शुरू होती थी। वह घंटों बाजार की चहल-पहल को देखती र...