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बेमेल धागे

  चंदनपुर का वह पुराना बाजार अपनी उसी जानी-पहचानी रफ्तार से चल रहा था। इसी बाजार के नुक्कड़ पर एक पुरानी सी घड़ियों की दुकान थी—'समय चक्र'। दुकान के ठीक ऊपर एक छज्जे वाला मकान था, जहाँ से बाजार का पूरा नजारा दिखता था। इस मकान में रहने वाली रेवती की जिंदगी का समय जैसे उस दिन ठहर गया था, जिस दिन वह इस घर की दहलीज लांघ कर आई थी। रेवती की उम्र बमुश्किल पच्चीस साल रही होगी। उसकी रंगत ऐसी जैसे भोर की पहली किरण और नैन-नक्श ऐसे कि कोई मूर्तिकार भी देखकर रश्क कर जाए। लेकिन इसके ठीक उलट, उसका पति दीनानाथ पचपन साल का एक कमजोर, झुर्रियों से भरा और बीमार सा दिखने वाला इंसान था। दीनानाथ के सिर के बाल झड़ चुके थे, आँखों के नीचे गहरे काले गड्ढे थे और उसके खांसने की आवाज पूरे घर में गूंजती रहती थी। रेवती और दीनानाथ की जोड़ी को देखकर कोई भी कह सकता था कि यह किसी भी नजरिए से एक सामान्य पति-पत्नी का रिश्ता नहीं था। यह तो जैसे एक ताजे खिले हुए गुलाब को किसी सूखे और बंजर पेड़ की टहनी से बांध देने जैसा था। रेवती की हर सुबह उसी पुरानी खिड़की के पास खड़े होकर शुरू होती थी। वह घंटों बाजार की चहल-पहल को देखती र...

प्रेम... तो आत्मा की तरह शाश्वत है

  सुबह की पहली किरण खिड़की के कांच से छनकर कमरे में बिखर गई थी, लेकिन कर्नल दिग्विजय सिंह की आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। साठ साल की उम्र में यह पहली बार था जब उन्हें अपने ही घर का सन्नाटा शोर जैसा लग रहा था। उन्होंने करवट बदली और आदत के मुताबिक दाईं ओर देखा, जहाँ टीकवुड की छोटी मेज पर हमेशा पानी का जग रखा होता था। जग वहीं था, लेकिन उसके नीचे वह छोटा सा कागज का टुकड़ा नहीं था जिस पर रोज़ एक नया 'सुविचार' लिखा होता था। "पापा, उठिए! सात बज गए हैं, सूर्य नमस्कार का समय निकल जाएगा!" दिग्विजय जी के कानों में एक चहकती हुई आवाज़ गूंजी। वह हड़बड़ा कर उठ बैठे। उनकी नज़रें कमरे के दरवाजे की ओर गईं। वहां कोई नहीं था। सिर्फ़ हवा से हिलता हुआ परदा था। उन्होंने एक गहरी सांस ली और खुद को याद दिलाया—माही अब इस घर में नहीं है। कल विदाई के वक़्त जिस तरह वह उनके गले लगकर रोई थी, उस आंसुओं की नमी अभी भी उनके कुर्ते के कंधे पर महसूस हो रही थी। दिग्विजय जी ने रजाई हटाई और बिस्तर से नीचे पैर रखे। फ़र्श ठंडा था, बिल्कुल उनके मन की तरह। "अरे कर्नल साहब, आज कॉफी नहीं मिलेगी क्या?" उन्...

ये रिश्ता क्या कहलाता है

  "माँ, अपना सूटकेस तैयार कर लो। परसों हम मसूरी जा रहे हैं।" रजत ने जब यह बात कही, तो सावित्री देवी के हाथ में पकड़ी हुई माला एक पल के लिए थम गई। उन्होंने चश्मा नाक पर ठीक करते हुए अपने बेटे की ओर ऐसे देखा जैसे उसने कोई अजीब पहेली बुझा दी हो। "मसूरी? इस उम्र में? और वो भी इतनी ठंड में? तेरा दिमाग तो ठिकाने पर है न रज्जू?" सावित्री देवी ने अविश्वास से पूछा। "बेटा, अब तो मेरे घुटने घर की सीढ़ियाँ चढ़ने में भी जवाब दे जाते हैं, तू मुझे पहाड़ चढ़ाना चाहता है? रहने दे, अब यह घूमने-फिरने की उम्र नहीं रही मेरी।" रजत उनके पास आया और घुटनों के बल बैठकर उनके हाथ थाम लिए। "माँ, हम पहाड़ चढ़ने नहीं जा रहे। हम वहां किसी से मिलने जा रहे हैं। याद है, पिछले महीने तुमने पुरानी संदूकची साफ करते समय एक फोटो दिखाई थी? तुम्हारी बचपन की सहेली... सुधा मौसी?" सावित्री देवी की आँखों में एक चमक कौंधी, लेकिन अगले ही पल वह बुझ गई। "सुधा... हाँ, चालीस साल हो गए उसे देखे। आखिरी बार तब मिली थी जब तुम्हारी बुआ की शादी थी। उसके बाद न कोई चिट्ठी, न कोई खबर। बस सुना था कि उसक...

अहंकार

  सावित्री देवी के घर की दीवारों पर टंगी अनगिनत शील्ड और मेडल इस बात की गवाही देते थे कि उनका परिवार 'साधारण' नहीं, बल्कि 'सर्वोत्तम' था। उनका बेटा मयंक शहर का सबसे बड़ा न्यूरोसर्जन था और बहू रितिका एक सफल आर्किटेक्ट। सावित्री जी को हमेशा अपनी परवरिश और अपने 'जीन्स' (Genes) पर घमंड रहा था। उनके लिए जीवन एक रेस थी और उनका परिवार हमेशा फर्स्ट आता था। जब रितिका गर्भवती हुई, तो सावित्री जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। यह सिर्फ एक बच्चे का आना नहीं था, यह उनके लिए 'सिंघानिया खानदान' के अगले 'जीनियस' का आगमन था। सावित्री जी ने रितिका की दिनचर्या पूरी तरह बदल दी। वे सुबह उसे बादाम और अखरोट भिगोकर देतीं, ताकि बच्चे का दिमाग तेज हो। रात को केसर वाला दूध पिलातीं, ताकि बच्चा गोरा और सुंदर हो। वे अक्सर रितिका के पेट पर हाथ रखकर कहतीं, "देखना रितिका, यह बच्चा मयंक से भी दो कदम आगे निकलेगा। मैं अभी से इसके लिए सबसे अच्छे इंटरनेशनल स्कूल की लिस्ट बना रही हूँ।" रितिका मुस्कुरा देती, पर कभी-कभी उसे डर लगता। "माँ जी, बच्चा स्वस्थ हो, बस इतना काफी है। ...

भाई हो तो ऐसा

  गहरी और घनी रात के सन्नाटे में जब दरवाजे की कुंडी खटखटाई गई, तो माधव का दिल जोर से धड़क उठा। इस समय कौन हो सकता है? उसने दीवार घड़ी पर नज़र डाली—रात के दो बज रहे थे। अपनी पुरानी शॉल कंधों पर डालते हुए, वह बुझी हुई आँखों और भारी कदमों के साथ मुख्य द्वार की ओर बढ़ा। जैसे ही उसने भारी लकड़ी का दरवाजा खोला, सामने खड़ी आकृति को देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह समीर था। उसका छोटा भाई। लेकिन यह वह समीर नहीं था जो दस साल पहले इस घर की दहलीज लांघकर शहर गया था। वह समीर, जिसकी आंखों में महत्वाकांक्षा की आग थी, जिसकी चाल में चीते जैसी फुर्ती थी और जिसकी आवाज़ में पूरी दुनिया को जीत लेने का आत्मविश्वास गूंजता था—वह कहीं खो गया था। सामने जो शख्स खड़ा था, उसके कंधे झुके हुए थे। उसके कपड़े, जो कभी ब्रांडेड हुआ करते थे, अब मैले और बेतरतीब थे। उसके हाथ में कोई बड़ा सूटकेस नहीं था, बस एक छोटा सा कपड़े का थैला था, जिसकी ज़िप भी शायद टूटी हुई थी। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे, मानो उसने हफ़्तों से नींद का स्वाद न चखा हो। "भैया..." समीर की आवाज़ किसी सूखे हुए कुएं से आती हुई प...