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भाई हो तो ऐसा

 गहरी और घनी रात के सन्नाटे में जब दरवाजे की कुंडी खटखटाई गई, तो माधव का दिल जोर से धड़क उठा। इस समय कौन हो सकता है? उसने दीवार घड़ी पर नज़र डाली—रात के दो बज रहे थे। अपनी पुरानी शॉल कंधों पर डालते हुए, वह बुझी हुई आँखों और भारी कदमों के साथ मुख्य द्वार की ओर बढ़ा। जैसे ही उसने भारी लकड़ी का दरवाजा खोला, सामने खड़ी आकृति को देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

वह समीर था। उसका छोटा भाई।

लेकिन यह वह समीर नहीं था जो दस साल पहले इस घर की दहलीज लांघकर शहर गया था। वह समीर, जिसकी आंखों में महत्वाकांक्षा की आग थी, जिसकी चाल में चीते जैसी फुर्ती थी और जिसकी आवाज़ में पूरी दुनिया को जीत लेने का आत्मविश्वास गूंजता था—वह कहीं खो गया था।

सामने जो शख्स खड़ा था, उसके कंधे झुके हुए थे। उसके कपड़े, जो कभी ब्रांडेड हुआ करते थे, अब मैले और बेतरतीब थे। उसके हाथ में कोई बड़ा सूटकेस नहीं था, बस एक छोटा सा कपड़े का थैला था, जिसकी ज़िप भी शायद टूटी हुई थी। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे, मानो उसने हफ़्तों से नींद का स्वाद न चखा हो।

"भैया..." समीर की आवाज़ किसी सूखे हुए कुएं से आती हुई प्रतीत हुई। वह इतनी धीमी और टूटी हुई थी कि माधव को लगा शायद उसे भ्रम हुआ है।

माधव ने बिना एक शब्द कहे उसे गले लगा लिया। समीर का शरीर कांप रहा था, ठीक वैसे ही जैसे बचपन में बादलों की गड़गड़ाहट सुनकर कांपता था। उस रात, माधव को यह अहसास नहीं था कि आने वाले दिन उसकी ज़िंदगी को किस तरह बदलने वाले थे।

पिछले डेढ़ महीने से, समीर माधव के साथ इस पुराने पुश्तैनी घर में रह रहा है। वह लड़का, जो कभी महफ़िलों की जान हुआ करता था, अब एक परछाई बनकर रह गया है। शहर की चकाचौंध, कॉर्पोरेट दुनिया का दबाव और एक असफल विवाह ने उसे अंदर से खोखला कर दिया था। वह दिवालिया होकर लौटा था—सिर्फ पैसों से नहीं, बल्कि आत्मा से भी।

माधव, जो उम्र में समीर से पंद्रह साल बड़ा था और जिसने पिता की मृत्यु के बाद पिता का ही धर्म निभाया था, अब अपने छोटे भाई को एक नए रूप में देख रहा था।

समीर की दिनचर्या अब अजीब हो गई थी। वह सुबह देर से उठता था, और फिर घंटों आंगन में पड़ी उस पुरानी आरामकुर्सी पर बैठा रहता था। उसकी नज़रें शून्य में टिकी रहती थीं। कभी-कभी वह बगीचे के उस अमरुद के पेड़ को देखता रहता, जिस पर चढ़कर उसने कभी अपना हाथ तोड़ा था। ऐसा लगता था जैसे वह उन डालियों से बातें कर रहा हो, अपनी विफलता की कहानियां सुना रहा हो।

माधव छुपकर उसे देखता रहता। समीर अब चाय का कप उठाता, तो उसके हाथ कांपते थे—बुढ़ापे से नहीं, बल्कि उस घबराहट (Anxiety) से जो उसके नसों में घर कर गई थी। वह अक्सर चाय को ठंडा कर देता, पीना भूल जाता, और फिर ठंडी चाय को एक ही घूंट में पी जाता, जैसे कोई कड़वी दवा पी रहा हो।

एक दिन माधव ने देखा कि समीर घर के पुराने रेडियो को ठीक करने की कोशिश कर रहा था। यह वही रेडियो था जिस पर वे बचपन में क्रिकेट कमेंट्री सुना करते थे। समीर की उंगलियां, जो कभी गिटार के तारों पर जादू बिखेरती थीं, अब पेचकस पकड़ने में भी संघर्ष कर रही थीं। जब उससे तार नहीं जुड़े, तो उसने झुंझलाहट में रेडियो को ज़मीन पर पटक दिया और घुटनों में सिर देकर रोने लगा।

माधव दौड़कर उसके पास गया। उसने कुछ नहीं कहा, बस रेडियो के टूटे टुकड़े समेटे और समीर के सिर पर हाथ रखा।

"समीर, यह जुड़ जाएगा। सब जुड़ जाता है," माधव ने कहा।

समीर ने लाल आँखों से ऊपर देखा। "कुछ नहीं जुड़ता भैया। सब बिखर गया है। मैं... मैं ख़त्म हो गया हूँ।"

उस पल माधव को महसूस हुआ कि उसके सामने एक चालीस साल का आदमी नहीं, बल्कि एक पाँच साल का डरा हुआ बच्चा बैठा है। वह बच्चा, जिसे अंधेरे से डर लगता था। फर्क बस इतना था कि अब अंधेरा बाहर नहीं, उसके भीतर था।

माधव की दिनचर्या भी बदल गई थी। वह जो पहले अपनी खेती-बाड़ी और गाँव की पंचायत के कामों में व्यस्त रहता था, अब एक 'माँ' की भूमिका में आ गया था। वह समीर की पसंद की आलू की कचौड़ियां बनाता, भले ही डॉक्टर ने उसे तला-भुना खाने से मना किया हो। वह समीर के गंदे कपड़े धोता, उन्हें इस्त्री करके उसके बिस्तर पर रखता।

समीर अक्सर चीज़ें भूलने लगा था। वह नहाने जाता और नल खुला छोड़ आता। वह खाना खाते-खाते बीच में रुक जाता और चम्मच को ऐसे देखता जैसे उसे याद ही न हो कि इसका क्या करना है। माधव उसे टोकता नहीं था। वह चुपचाप नल बंद कर देता, या धीरे से समीर का हाथ पकड़कर उसे खाना खाने का इशारा करता।

एक शाम, बिजली चली गई थी। मूसलाधार बारिश हो रही थी। माधव लालटेन लेकर समीर के कमरे में गया। समीर खिड़की के पास खड़ा बाहर तूफ़ान को देख रहा था।

"तुम्हें याद है भैया?" समीर ने बिना मुड़े कहा। "जब मैं दसवीं में फेल हो गया था? मुझे लगा था कि बाबा मुझे घर से निकाल देंगे।"

माधव मुस्कुराया, "हाँ, याद है। और बाबा ने तुम्हें साइकिल दिलाई थी, यह कहकर कि 'गिरने वाला ही तो उठकर चलना सीखता है'।"

समीर की हँसी में एक कड़वाहट थी। "साइकिल चलाना आसान था भैया। ज़िन्दगी चलाना मुश्किल है। मैं शहर गया था बड़ा आदमी बनने। सोचा था इतना पैसा कमाऊंगा कि इस घर की ईंट-ईंट बदल दूंगा। लेकिन देखो, मैं खुद मलबे में बदलकर लौटा हूँ।"

माधव ने लालटेन मेज पर रखी और समीर के पास जाकर खड़ा हो गया। "ईंटें तो मकान बनाती हैं समीर, घर तो इंसानों से बनता है। तुम हो, तो यह खंड़हर भी महल है।"

समीर ने माधव की ओर देखा। उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी—कृतज्ञता की या शायद शर्मिंदगी की। "मैं आप पर बोझ बन गया हूँ न? न नौकरी है, न पैसा, न अकल। बस एक ज़िंदा लाश की तरह यहाँ पड़ा हूँ।"

माधव ने उसका कंधा कसकर पकड़ा। "बोझ? समीर, जब तुम छोटे थे और मैं तुम्हें अपने कंधों पर बैठाकर मेले ले जाता था, तब तुम बोझ नहीं लगते थे। आज जब तुम्हें मेरे सहारे की ज़रूरत है, तो तुम बोझ कैसे हो गए? तुम मेरे भाई हो, कोई बैंक का खाता नहीं जिसका हिसाब रखा जाए।"

उस रात के बाद, माधव ने समीर में एक सूक्ष्म बदलाव देखा। वह बदलाव बहुत धीमा था, जैसे सर्दियों के बाद वसंत की पहली कली फूटती है।

समीर ने अब रसोई में माधव की मदद करनी शुरू कर दी थी। वह सब्जियां काटता, हालांकि टेढ़ी-मेढ़ी। वह घर के आँगन को बुहारता। एक दिन माधव ने सुना कि समीर नहाते हुए गुनगुना रहा था। वह कोई पुराना गाना था—'आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ...'। माधव की आँखों में आंसू आ गए। यह वही गाना था जो माधव उसे बचपन में सुलाने के लिए गाता था।

लेकिन चुनौतियां अभी ख़त्म नहीं हुई थीं। समीर के अवसाद (Depression) के दौरे अभी भी पड़ते थे। कभी-कभी वह रातों को चीखकर उठता, पसीने से लथपथ। उसे सपने आते कि साहूकार उसे पकड़ रहे हैं या उसका परिवार उसे धक्के मारकर निकाल रहा है। ऐसे समय में माधव उसके बिस्तर के पास बैठता, उसका माथा सहलाता और तब तक उसके बाल संवारता जब तक वह दोबारा सो न जाए।

माधव ने महसूस किया कि उसने एक बेटा पा लिया है जो चालीस साल का है। एक ऐसा बेटा जिसे दुनियादारी ने नहीं, बल्कि दुनिया की बेरुखी ने तोड़ा है। माधव को पहले डर लगता था कि क्या वह समीर को संभाल पाएगा? वह खुद साठ के पार हो चुका था। लेकिन अब, उसे सिर्फ़ शुक्रगुज़ारी महसूस होती थी।

शुक्रगुजार इस बात का कि उसे अपने भाई को फिर से जानने का मौका मिला। उन दस सालों की दूरी को पाटने का मौका मिला जो शहर की चकाचौंध ने पैदा कर दी थी। पहले वे सिर्फ भाई थे, अब वे एक-दूसरे की आत्मा के साथी बन गए थे।

एक दिन धूप खिली हुई थी। समीर बरामदे में बैठा अख़बार पढ़ रहा था। माधव खेत से लौटा तो देखा समीर ने मेज पर चाय और बिस्किट सजा रखे थे।

"भैया, चाय पी लो," समीर ने कहा। उसकी आवाज़ में वह कंपन नहीं था जो डेढ़ महीने पहले था।

माधव कुर्सी खींचकर बैठा। समीर ने झिझकते हुए अपनी जेब से कुछ निकाला। वह एक पुराना, मुड़ा-तुड़ा सौ रुपये का नोट था।

"भैया," समीर ने नज़रे झुकाकर कहा, "मैंने पुराने रद्दी अखबार और कबाड़ बेच दिए। यह सौ रुपये मिले हैं। आप... आप अपने लिए नई चप्पलें ले लीजियेगा। आपकी चप्पल टूट रही है।"

माधव ने उस सौ रुपये के नोट को देखा। उसकी कीमत बाज़ार में शायद कुछ नहीं थी, लेकिन माधव के लिए यह अनमोल था। यह समीर की पहली कमाई थी—उसकी वापसी की पहली कमाई। यह उस बात का सबूत था कि समीर अब सिर्फ़ अपनी खिड़की से बाहर नहीं देख रहा था, बल्कि उसने घर के अंदर भी देखना शुरू कर दिया था। उसने माधव की टूटी चप्पल देखी थी।

माधव ने वह नोट लिया और अपनी जेब में रख लिया, जैसे कोई मेडल हो। "आज शाम को इसी सौ रुपये से जलेबी खाएंगे," माधव ने हंसते हुए कहा।

समीर मुस्कुराया। एक पूरी, सच्ची मुस्कान।

माधव ने सोचा कि लोग कहते हैं, खून के रिश्ते भी समय के साथ फीके पड़ जाते हैं। लेकिन उन्हें शायद यह नहीं पता कि अगर जड़ों में प्यार हो, तो पतझड़ के बाद पेड़ फिर से हरा होता ही है।

समीर अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था। शायद वह कभी पूरी तरह वह "पुराना समीर" नहीं बन पाएगा। लेकिन वह अब एक "नया समीर" बन रहा था। एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी टूटन को स्वीकार कर चुका था और अब धीरे-धीरे अपने टुकड़े जोड़ रहा था।

और माधव? माधव ने सीख लिया था कि प्रेम का असली मतलब सिर्फ़ किसी की उड़ान में साथ देना नहीं होता, बल्कि जब पंख टूट जाएं, तो ज़मीन पर साथ बैठना भी होता है।

माधव ने चाय का घूंट भरा और समीर को देखा जो अब अख़बार में क्रॉसवर्ड पज़ल सुलझा रहा था। माधव ने मन ही मन कहा—"रुक जाओ समीर। यहीं रुक जाओ। अब दोबारा उस दौड़ में मत भागना। मेरे पास रहो। मुझे तुम्हारी ज़रूरत है, शायद तुमसे कहीं ज्यादा।"

बाहर अमरुद के पेड़ पर एक पक्षी आकर बैठा और चहचहाने लगा। घर अब खाली नहीं था। उसका सन्नाटा अब सुकून में बदल चुका था। क्योंकि घर का भटका हुआ मुसाफिर वापस आ गया था, सूटकेस में कपड़े कम और यादें ज्यादा लेकर, लेकिन वापस तो आया था।

और माधव के लिए, इतना ही काफी था। वह उसकी देखभाल करेगा, ठीक वैसे ही जैसे उसने माधव की टूटी चप्पल का ख्याल रखा था। यह एक बड़े भाई का फ़र्ज़ नहीं था, यह एक पिता का प्रेम था जो भाई के रूप में बह रहा था।

लेखिका : बीना शुक्ला


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