"हे भगवान! कभी तो कोई चीज़ अपनी जगह पर छोड़ दिया करो! क्या कसम खा रखी है कि घर को कबाड़खाना ही बनाकर रखना है?" मालती जी की आवाज़ बैठक से लेकर बालकनी तक गूँज रही थी। हाथ में झाड़न लिए वे कभी मेज पर बिखरी चाय की सूखी पत्तियां साफ करतीं, तो कभी सोफे पर बेतरतीब फेंकी गई अधखुली फाइलों को करीने से लगातीं। सामने आरामकुर्सी पर बैठे प्रोफेसर विश्वनाथ जी चश्मे के ऊपर से उन्हें देखकर बस एक धीमी सी मुस्कान बिखेर देते। उनकी इस शांत मुस्कान को देखकर मालती जी का पारा और चढ़ जाता, "हँस क्या रहे हो? अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं क्या? बाहर पूरी दुनिया के सामने तो बड़े विद्वान प्रोफेसर बनते हो और घर में आते ही बिल्कुल लापरवाह! कभी भीगी छतरी कालीन पर पटक देते हो, तो कभी चश्मे का डिब्बा फ्रिज में रखकर भूल जाते हो। मेरी तो किस्मत ही फूट गई, सारा दिन नौकरों की तरह तुम्हारे बिखेरे कचरे को समेटती फिरूँ!" विश्वनाथ जी ने अखबार का पन्ना पलटते हुए केवल इतना कहा, "अरे छोड़ो भी मालती, अब इस उम्र में आदतें कहाँ बदलती हैं।" मालती जी बड़बड़ाते हुए रसोई की ओर बढ़ गईं, जहाँ कुकर की सीटी बज रही थ...