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सितंबर, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बिखरे पन्नों की अनकही इबारत

"हे भगवान! कभी तो कोई चीज़ अपनी जगह पर छोड़ दिया करो! क्या कसम खा रखी है कि घर को कबाड़खाना ही बनाकर रखना है?" मालती जी की आवाज़ बैठक से लेकर बालकनी तक गूँज रही थी। हाथ में झाड़न लिए वे कभी मेज पर बिखरी चाय की सूखी पत्तियां साफ करतीं, तो कभी सोफे पर बेतरतीब फेंकी गई अधखुली फाइलों को करीने से लगातीं। सामने आरामकुर्सी पर बैठे प्रोफेसर विश्वनाथ जी चश्मे के ऊपर से उन्हें देखकर बस एक धीमी सी मुस्कान बिखेर देते। उनकी इस शांत मुस्कान को देखकर मालती जी का पारा और चढ़ जाता, "हँस क्या रहे हो? अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं क्या? बाहर पूरी दुनिया के सामने तो बड़े विद्वान प्रोफेसर बनते हो और घर में आते ही बिल्कुल लापरवाह! कभी भीगी छतरी कालीन पर पटक देते हो, तो कभी चश्मे का डिब्बा फ्रिज में रखकर भूल जाते हो। मेरी तो किस्मत ही फूट गई, सारा दिन नौकरों की तरह तुम्हारे बिखेरे कचरे को समेटती फिरूँ!" विश्वनाथ जी ने अखबार का पन्ना पलटते हुए केवल इतना कहा, "अरे छोड़ो भी मालती, अब इस उम्र में आदतें कहाँ बदलती हैं।" मालती जी बड़बड़ाते हुए रसोई की ओर बढ़ गईं, जहाँ कुकर की सीटी बज रही थ...

अंगारों पर खिले फूल

  मिट्टी के कच्चे बरामदे में रखी अपनी माँ की सफेद चादर से ढकी देह को देख उन्नीस साल की तारा की आँखें पथरा चुकी थीं। रोते-रोते उसके आँसू सूख चुके थे और कंठ से केवल धीमी सिसकियाँ निकल रही थीं। पिता तो बचपन में ही छोड़ गए थे, और अब माँ की बीमारी ने उनसे जीवन की अंतिम सांस भी छीन ली थी। उस भरे मोहल्ले में तारा पूरी तरह अकेली पड़ गई थी। माँ के जाते ही बस्ती के कई पुरुषों की आँखों की चमक और उनके हमदर्दी जताने के तौर-तरीके बदल गए थे। हर कोई सांत्वना देने के बहाने उसके कंधे पर हाथ रखने या करीब आने की कोशिश कर रहा था। तारा उस उम्र में भी उनकी भूखी नज़रों को भांप रही थी और भय से कांप उठती थी। इन्हीं चेहरों के बीच एक चेहरा था रंजीत का। रंजीत कस्बे के पास स्थित एक गोदाम में लोडिंग टेम्पो चलाता था। उम्र लगभग अट्ठाईस-तीस वर्ष, देखने में सीधा और बातों में बेहद मीठा। जिस अनाज मंडी के गोदाम में तारा की माँ मजदूरी करती थी, रंजीत वहीं माल पहुँचाने आता था। उसने कई बार तारा को अपनी बातों में उलझाने की कोशिश की थी। माँ जब जीवित थीं, तो उन्होंने तारा को डांटकर समझाया था कि राह चलते मीठे बोल बोलने वाले हर...

बुढ़ापे का सच्चा सहारा

  गंगाराम जी जब भी मोहल्ले के चबूतरे पर बैठते, अपनी मूँछों पर ताव देकर गर्व से यही दोहराते, "अरे भाई, जीवन में एक बेटा होना ही सबसे बड़ा पुण्य है। बेटा ही तो बुढ़ापे की असली लाठी होता है, वही अंतिम समय में सहारा बनता है।" उनके इकलौते बेटे निशांत ने शहर की एक बड़ी कंपनी में अच्छी नौकरी पा ली थी। गाँव से उठकर शहर के एक पॉश इलाके में शानदार फ्लैट ले लिया गया था। गंगाराम जी और उनकी धर्मपत्नी यशोदा देवी के चेहरे पर बुढ़ापे का सुकून था। समाज की नजरों में निशांत एक आदर्श बेटा था जो अपने बूढ़े माता-पिता को अपने साथ शहर ले आया था। समय बीता और निशांत का विवाह एक संस्कारी और सुलझे विचारों वाली लड़की, पल्लवी से हो गया। शादी के शुरुआती कुछ महीनों में सब कुछ सामान्य रहा। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, घर के भीतर की ज़िम्मेदारियों का ढाँचा पूरी तरह बदल गया। निशांत का सुबह से लेकर देर रात तक का समय केवल ऑफिस, लैपटॉप, कॉल्स और प्रेजेंटेशन के इर्द-गिर्द सिमट गया। वह सुबह सात बजे टाई बाँधकर निकलता और रात को दस बजे थका-हारा लौटता। घर आते ही उसके पास केवल तीन घिसे-पिटे सवाल होते—"बाबूजी, खाना...

सबसे बड़ा तीर्थ

  मिट्टी की सौंधी खुशबू और नीम की ठंडी छांव में बसा रामपुर गाँव हर सुबह एक जानी-पहचानी खट-खट की आवाज से जागता था। यह आवाज थी कल्याणी दादी के पुराने मिट्टी के दीये बनाने वाले चाक की। सत्तर बसंत देख चुकीं कल्याणी का जीवन दुखों की गहरी आंधियों से होकर गुजरा था। पंद्रह साल पहले उनके पति चल बसे थे, और किस्मत का क्रूर प्रहार तब हुआ जब उनके दोनों जवान बेटे महामारी की चपेट में आकर हमेशा के लिए आँखें मूँद गए। भरा-पूरा परिवार ताश के पत्तों की तरह बिखर गया था। अब उस जर्जर खपरैल वाले कच्चे मकान में कल्याणी और उनके पुरखों का पुराना चाक ही बाकी बचे थे। कल्याणी के कमजोर हाथों में अब पहले जैसी ताकत नहीं रही थी। जब वह चाक की डंडी घुमातीं, तो उनकी बूढ़ी कलाइयां कांप उठती थीं और झुकी हुई पीठ में हल्का सा दर्द उभर आता था। लेकिन उनके स्वाभिमान में कभी कोई कमी नहीं आई। वह दिन भर चिकनी मिट्टी को गूंथतीं, दीये, कुल्हड़ और सुराही बनातीं। गाँव के लोग जब उनके बर्तन ले जाते, तो कोई बदले में कटोरी भर दाल दे देता, तो कोई सेर भर आटा या मक्के के दाने। कल्याणी कभी किसी से मोलभाव नहीं करती थीं। अपनी मेहनत से जो रूख...

ढलती शाम का नया सवेरा

सुबह की पहली धूप बालकनी के गमलों को छूती हुई ड्राइंग रूम के फर्श पर उतर आई थी। रसोई में कुकर की हल्की सीटी की आवाज़ के बीच, अनन्या ने अदरक वाली चाय के दो कप ट्रे में सजाए। एक कप अपने लिए और दूसरा ससुर जी, पंडित ओंकारनाथ जी के लिए। वह मुस्कुराते हुए उनके कमरे की ओर बढ़ी, पर कमरे का आधा खुला दरवाजा देखकर उसके कदम ठिठक गए। बिस्तर पर ओंकारनाथ जी दीवार की ओर करवट लिए लेटे थे। सिरहाने रखी किताब बंद थी और उनका दाहिना हाथ माथे पर टिका था। अनन्या ने ध्यान से देखा तो उनकी पलकों के कोरों पर नमी साफ चमक रही थी। हमेशा सुबह छह बजे टहलने निकल जाने वाले और घर में अखबार की खड़खड़ाहट के साथ दिन की शुरुआत करने वाले ससुर जी को इस तरह बिस्तर पर पड़ा देखकर अनन्या का मन किसी अनजाने डर से कांप गया। उसने आहिस्ता से कमरे में कदम रखा और टेबल पर चाय रखते हुए बड़े अपनेपन से पुकारा, "बाबूजी... चाय ठंडी हो रही है। क्या बात है, आज आपकी तबीयत तो ठीक है ना? आप तो कब के उठ जाते थे।" ओंकारनाथ जी हड़बड़ाकर उठ बैठे। उन्होंने अपनी आस्तीन से जल्दी से आंखें पोंछीं और एक फीकी सी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए चाय का कप था...

पराए आँगन का अपनापन

गर्मियों की वह उमस भरी रात और ऊपर से घर में शादी की गहमागहमी। शादी की सारी रस्में पूरी हो चुकी थीं और बाहर पंडाल से धीरे-धीरे मेहमान अपने-अपने घरों को लौट रहे थे। अनुराग के भारी-भरकम शेरवानी वाले बदन से पसीने की बूंदें टपक रही थीं, पर उसके दिल पर जो बोझ था, वह उस भारी लिबास से भी कहीं ज्यादा वजनी था। घर के पिछले हिस्से में बना वह छोटा सा कमरा, जिसे बरसों से कबाड़घर और जरूरत पड़ने पर अनाज रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, आज अनुराग की सुहागरात का कमरा बनाया गया था। जब अनुराग ने उस कमरे की दहलीज पर कदम रखा, तो उसकी नजर चारों तरफ फैले सामान पर पड़ी। कमरे के कोनों में शादी के बचे हुए सामान के बड़े-बड़े बक्से रखे थे। एक तरफ हलवाई के छोड़े गए बड़े-बड़े पीतल के पतीले और कड़ाहियां रखी थीं, जिनमें से घी, रिफाइंड तेल और बेसन के जले हुए हलवे की भारी और दमघोंटू महक उठ रही थी। दूसरी तरफ पुराने गद्दों का ढेर लगा था और बीच में बिछी थी एक पुरानी लोहे की चारपाई। उस चारपाई पर एक नई, लेकिन सस्ती सी चादर बिछा दी गई थी और औपचारिकता पूरी करने के लिए कुछ गेंदे के फूल तोड़कर उस पर बिखेर दिए गए थे। कमरे का पु...

सूनी देहरी पर जला प्रेम का दीप

शहर की भागदौड़ से थोड़ी दूर बसी 'आनंद कुंज' सोसाइटी बाहर से देखने में जितनी शांत और व्यवस्थित लगती थी, भीतर से उतनी ही खामोश और वीरान थी। कतार में बने सफेद मकानों में लगभग चालीस परिवार रहते थे। सुबह होते ही गाड़ियों के हॉर्न, स्कूल बसों के पहियों की गड़गड़ाहट और दफ्तर भागते बेटे-बहुओं की तेज कदमों की आवाजें गूंजतीं, लेकिन सुबह के नौ बजते ही पूरी बस्ती पर एक गहरा सन्नाटा पसर जाता। घरों के बड़े-बुजुर्ग बालकनी की ग्रिल पकड़कर सूनी सड़कों को निहारते रह जाते। दिन भर घड़ी की सुइयों को देखना, टीवी के चैनलों को बेमन से बदलना और अपने जोड़ों के दर्द के साथ पुरानी यादों को कुरेदना ही उनकी दिनचर्या बन चुका था। शाम ढलते ही पार्क की दो-चार बेंचों पर कुछ बुजुर्ग आकर बैठते, लेकिन उनके पास एक-दूसरे को सुनाने के लिए सिर्फ अपनी बीमारियों की फेहरिस्त, बच्चों की व्यस्तता और जीवन का खालीपन ही होता था। सबकी आँखों में एक जैसी उदासी और दिल में एक ही दर्द था—अकेलापन। ऋतुओं के इसी उदास क्रम के बीच, मकान नंबर 104 में एक नया परिवार रहने आया। परिवार के मुखिया थे सेवा-निवृत्त बैंक अधिकारी विद्याधर जी और उनकी...

फर्ज की फेरे

शाम ढलते ही जब रामेश्वर जी ने घर की चौखट लांघी, तो उनके चेहरे की थकान एक चमकती मुस्कान के पीछे छुप गई थी। हाथ में थमी मिठाई की छोटी सी पोटली को मेज पर रखते हुए उन्होंने आवाज लगाई, "सुनती हो भाग्यश्री! अरे कहाँ रह गई, जरा इधर तो आओ।" रसोई से आंचल से हाथ पोंछती हुई उनकी धर्मपत्नी बाहर आईं और पानी का लोटा बढ़ाते हुए बोलीं, "इतने खुश तो आप बरसों पहले अपनी पहली पगार मिलने पर दिखे थे। आज कौन सी लॉटरी लग गई?" रामेश्वर जी ने पानी का एक घूंट भरा और भावुक स्वर में बोले, "लॉटरी ही समझो। हमारी काव्या के लिए जो रिश्ता देखा था न, उन लोगों ने आज हां कर दी है। लड़का मयंक एक प्रतिष्ठित कंपनी में सीनियर इंजीनियर है। परिवार इतना सुलझा हुआ और संस्कारी है कि देखते ही मन को भा जाए। उन्होंने साफ कहा है कि उन्हें सिर्फ हमारी संस्कारी बिटिया चाहिए।" काव्या अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। घर छोटा था, ज़रूरतें सीमित थीं, लेकिन खुशियों का कोई अभाव नहीं था। काव्या बचपन से ही शांत, गंभीर और स्वाभिमानी स्वभाव की थी। पिता एक छोटे से सरकारी दफ्तर में साधारण क्लर्क थे, इसलिए काव्या ने क...