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अंगारों पर खिले फूल

 मिट्टी के कच्चे बरामदे में रखी अपनी माँ की सफेद चादर से ढकी देह को देख उन्नीस साल की तारा की आँखें पथरा चुकी थीं। रोते-रोते उसके आँसू सूख चुके थे और कंठ से केवल धीमी सिसकियाँ निकल रही थीं। पिता तो बचपन में ही छोड़ गए थे, और अब माँ की बीमारी ने उनसे जीवन की अंतिम सांस भी छीन ली थी। उस भरे मोहल्ले में तारा पूरी तरह अकेली पड़ गई थी। माँ के जाते ही बस्ती के कई पुरुषों की आँखों की चमक और उनके हमदर्दी जताने के तौर-तरीके बदल गए थे। हर कोई सांत्वना देने के बहाने उसके कंधे पर हाथ रखने या करीब आने की कोशिश कर रहा था। तारा उस उम्र में भी उनकी भूखी नज़रों को भांप रही थी और भय से कांप उठती थी।

इन्हीं चेहरों के बीच एक चेहरा था रंजीत का। रंजीत कस्बे के पास स्थित एक गोदाम में लोडिंग टेम्पो चलाता था। उम्र लगभग अट्ठाईस-तीस वर्ष, देखने में सीधा और बातों में बेहद मीठा। जिस अनाज मंडी के गोदाम में तारा की माँ मजदूरी करती थी, रंजीत वहीं माल पहुँचाने आता था। उसने कई बार तारा को अपनी बातों में उलझाने की कोशिश की थी। माँ जब जीवित थीं, तो उन्होंने तारा को डांटकर समझाया था कि राह चलते मीठे बोल बोलने वाले हर इंसान के पीछे कोई न कोई स्वार्थ छुपा होता है, इसलिए हर किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए। लेकिन उस समय तारा को माँ की नसीहतें बंदिशें लगती थीं।


अब जब माँ नहीं रहीं, तो रंजीत ने मोहल्ले के लोगों के सामने खुद को तारा का सबसे बड़ा हितैषी साबित कर दिया। उसने अंतिम संस्कार की सारी व्यवस्था अपनी जेब से करवाई और खुलेआम घोषणा कर दी कि वह तारा से सच्चा प्रेम करता है और उससे विवाह करके उसे अपने घर की रानी बनाकर रखेगा। मोहल्ले के लोगों ने भी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए राहत की सांस ली और हामी भर दी। तारा के पास कोई दूसरा सहारा न था, इसलिए उसने रंजीत के साथ जाने का फैसला कर लिया।


रंजीत तारा को अपने टेम्पो में बिठाकर अपने गाँव ले जाने के बहाने शहर से दूर निकल पड़ा। रास्ते भर वह तारा को नए घर, सुनहरे भविष्य और सुखी गृहस्थी के हसीन सपने दिखाता रहा। तारा को लगा कि शायद भगवान ने उसकी सुन ली है और इस कठिन समय में उसे एक सच्चा जीवनसाथी दे दिया है।


आधी रात के करीब एक सुनसान हाईवे के ढाबे पर रंजीत ने गाड़ी रोकी। उसने बड़े प्यार से तारा से कहा कि वह हाथ-मुँह धोकर आ जाए, तब तक वह दोनों के लिए गर्म खाना लगवाता है। तारा ढाबे के पीछे बने नल की ओर चली गई। तारा के जाते ही रंजीत ने अपनी जेब से वह फोन निकाला जिसे उसने रास्ते भर बंद रखा था। उसने देखा कि उसकी पत्नी के कई फोन आए हुए थे। उसने तुरंत नंबर मिलाया। फोन उठते ही दूसरी तरफ से नाराजगी भरी आवाज आई तो रंजीत धीमे स्वर में फुसफुसाते हुए बोला, "अरे सुन, गुस्सा मत कर। बच्चों को सुला दिया क्या? बस कल दोपहर तक घर पहुँच रहा हूँ। इस बार हाथ बहुत कीमती शिकार लगा है। एक अनाथ और बेहद खूबसूरत लड़की को फंसा कर ला रहा हूँ। शहर के उस बड़े कोठे वाले दलाल से बात पक्की हो चुकी है। मोटी रकम मिलेगी। उस पैसे से हम अपने बच्चों का अच्छे स्कूल में दाखिला कराएंगे और तेरा सोने का हार भी बनवा देंगे। तू बस किसी को कानों-कान खबर मत होने देना।"


नल के पीछे खड़ी तारा के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह हाथ धोने के बाद वापस आ ही रही थी कि हवा के साथ उड़ते रंजीत के ये शब्द उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर गए। उसका पूरा शरीर सिहर उठा। उसे अपनी माँ की वे बातें याद आने लगीं जो उन्होंने मरते दम तक समझाई थीं। रंजीत कोई हमदर्द नहीं, बल्कि एक दरिंदा था जो उसकी बेबसी की कीमत वसूलने जा रहा था।


तारा ने एक पल भी नहीं गंवाया। रोने या चीखने के बजाय उसके भीतर का स्वाभिमान और जीने की ललक जाग उठी। वह दबे पाँव ढाबे के पीछे से निकलकर सड़क के दूसरी ओर भागी, जहाँ एक सरकारी बस धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। तारा ने बिना यह जाने कि बस कहाँ जा रही है, दौड़कर उसका पायदान पकड़ लिया और ऊपर चढ़ गई।


तड़के सुबह जब बस एक अनजान बड़े शहर के मुख्य बस अड्डे पर रुकी, तो तारा कांपते कदमों से बाहर निकली। जेब में एक फूटी कौड़ी नहीं थी और न ही कोई मंजिल। चौराहे पर चारों तरफ भिखारियों का जमघट था। दुनिया के डर से सहमी तारा एक खंभे की ओट में खड़ी होकर रोने लगी।


तभी उन भिखारियों के बीच से फटे-पुराने लेकिन साफ कपड़े पहने एक बुजुर्ग महिला लाठी टेकती हुई तारा के पास आई। उस वृद्धा की आँखों में कोई कपट नहीं, बल्कि एक माँ जैसी करुणा थी। उसने तारा के सिर पर झुर्रीदार हाथ रखा और पूछा, "क्या बात है बिटिया? इतनी सुबह यहाँ अकेले क्यों खड़ी रो रही हो?"


तारा उस ममतामयी स्पर्श को महसूस करते ही बिलख पड़ी। वृद्धा ने उसे अपने पास बिठाया और कहा, "घबरा मत, लोग मुझे यहाँ 'माई' कहते हैं। तू भी मुझे माई कह सकती है। जिंदगी से हारी हुई लगती है, पर डर मत, जब तक माई जिंदा है, तुझे कोई हाथ नहीं लगा सकता।"


माई ने तारा को खाना खिलाया और फिर पूरे बस अड्डे के लोगों से कह दिया कि यह उसकी दूर के रिश्ते की नतिन है जो उसके पास रहने आई है। माई ने तारा को भीख नहीं मांगने दी, बल्कि अपनी जमा-पूंजी से उसे पास के एक छोटे से महिला सिलाई केंद्र में दाखिला दिलवा दिया। तारा ने दिन-रात मेहनत करके सिलाई, कढ़ाई और कपड़ों की कटाई सीखी।


तारा की लगन और हुनर को देखकर सिलाई केंद्र की संचालिका ने उसे वहीं एक स्थायी प्रशिक्षक और टेलर के रूप में काम दे दिया। कुछ ही सालों में तारा अपने पैरों पर खड़ी हो गई। उसने माई को उस बस अड्डे की फुटपाथ से हटाकर एक किराए के पक्के मकान में अपने साथ रखा और उन्हें माँ जैसा मान-सम्मान दिया। तारा ने साबित कर दिया कि हालात चाहे कितने भी बदतर क्यों न हों, यदि इंसान सही समय पर हिम्मत और सूझबूझ से काम ले, तो वह अपने भाग्य का निर्माण खुद कर सकता है। वह मासूम लड़की अब एक आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी और सशक्त नारी बन चुकी थी।


पाठकों के लिए विचारणीय प्रश्न:

विपत्ति के समय जब अपने ही लोग रास्ता भटकाने लगें, तो इंसान को भावनाओं में बहने के बजाय अपने विवेक का सहारा कैसे लेना चाहिए? अगर आपको तारा के साहस और माई की इंसानियत ने प्रभावित किया हो, तो अपने अनमोल विचार नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।


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