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स्वाभिमान का स्वाद: मठरी वाली दादी

 "माँ, अगले महीने से मैं तुम्हें जेब खर्च के लिए वो दो हज़ार रुपये नहीं दे पाऊँगा। ईएमआई बढ़ गई है और बच्चों की स्कूल फीस भी। तुम्हें वैसे भी क्या खर्चा है? घर में सब कुछ तो मिलता ही है। खाना, कपड़ा, छत... और क्या चाहिए इस उम्र में?"


विकास ने ऑफिस जाने से पहले जूते पहनते हुए बड़ी बेरुखी से अपनी माँ, सावित्री देवी से कहा। पास ही खड़ी उसकी पत्नी, रश्मि, ने भी सुर में सुर मिलाया, "हाँ माँ जी, फालतू में पैसे जमा करके क्या करेंगी? आखिर जाना तो सब यहीं छोड़कर है। दवाई-पानी तो हम ला ही देते हैं।"


सावित्री देवी के हाथ में चाय का कप कांप गया। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस फीकी सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया। विकास और रश्मि चले गए। घर में सन्नाटा पसर गया, लेकिन सावित्री देवी के अंदर एक शोर मचा हुआ था।


बात उन दो हज़ार रुपयों की नहीं थी। बात उस 'हक़' की थी, जो धीरे-धीरे 'भीख' में बदलता जा रहा था। सावित्री देवी के पति एक सरकारी क्लर्क थे। उनकी मौत के बाद जो पी.एफ. और ग्रेच्युटी का पैसा मिला था, वह सब उन्होंने विकास के नए फ्लैट की डाउन-पेमेंट में दे दिया था। सोचा था बेटा है, बुढ़ापे की लाठी है। लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस लाठी के सहारे वो चलने की सोच रही हैं, वही लाठी उन्हें बोझ समझने लगेगी।


सावित्री देवी अपने कमरे में गईं और अपनी पुरानी अलमारी खोली। एक छोटी सी पोटली में कुछ चिल्लर और पुराने नोट पड़े थे—कुल मिलाकर तीन सौ रुपये। उनका चश्मा पिछले हफ्ते टूट गया था। एक डंडी टूटी थी जिसे उन्होंने धागे से बांध रखा था। विकास से कहा था, तो उसने कहा था, "अभी काम चला लो, अगले महीने देखेंगे।"


"काम चला लो..." सावित्री देवी ने आईने में अपनी परछाई से कहा। "पूरी ज़िंदगी तो काम ही चलाया है। पहले पति की कम तनख्वाह में, और अब बेटे की ऊंची तनख्वाह में भी।"


दोपहर को जब वह पार्क में बैठी थीं, तो उन्होंने देखा कि पार्क के बाहर एक बूढ़ा आदमी, जो शायद उनकी ही उम्र का होगा, चने और मूंगफली बेच रहा था। वह पसीने में तर-बतर था, कपड़े मैले थे, लेकिन जब उसने एक बच्चे को चने देकर उससे दस रुपये का नोट लिया, तो उसके चेहरे पर जो संतोष था, वह किसी राजा से कम नहीं था। वह उस नोट को माथे से लगाकर अपनी जेब में रख रहा था।


सावित्री देवी को एक झटका सा लगा। "वह आदमी गरीब है, पर लाचार नहीं। उसके पास अपना कमाया हुआ दस रुपया है जिस पर उसका पूरा अधिकार है। और मैं? मैं इस आलीशान फ्लैट में रहकर भी कंगाल हूँ क्योंकि मेरे पास अपना स्वाभिमान नहीं है।"


उस रात सावित्री देवी को नींद नहीं आई। उन्होंने एक फैसला लिया। एक ऐसा फैसला जो उनकी उम्र और समाज के हिसाब से 'बागी' था।


सावित्री देवी के हाथों में एक जादू था। वह 'मैदे की मठरी' और 'गुड़ के लड्डू' बहुत ही स्वादिष्ट बनाती थीं। विकास के बचपन में पूरा मोहल्ला उनकी मठरी का दीवाना था।


अगले दिन, जब विकास और रश्मि ऑफिस चले गए और बच्चे स्कूल, तो सावित्री देवी ने अपनी बची-खुची जमा पूंजी (वो तीन सौ रुपये) उठाई और बाज़ार गईं। वह थोड़ा मैदा, घी, गुड़ और मसाले ले आईं।


दोपहर भर उन्होंने अपनी पुरानी रसोई में (जिसे रश्मि ने मॉड्यूलर बना दिया था और सास को वहां कम ही जाने देती थी) मठरियां और लड्डू बनाए। उनकी कमर दुख रही थी, लेकिन मन में एक अजीब सा उत्साह था। शाम होने से पहले उन्होंने सब कुछ छोटे-छोटे पैकेटों में पैक कर लिया।


शाम को वह पार्क के पास उसी जगह गईं जहाँ वह बूढ़ा आदमी बैठता था। उन्होंने संकोच करते हुए पास की एक छोटी सी किराने की दुकान वाले से बात की, जिसे वह बरसों से जानती थीं।

"बेटा, क्या तुम मेरी ये मठरियां अपनी दुकान पर रख लोगे? अगर बिकें तो पैसे दे देना, न बिकें तो मैं वापस ले जाउंगी।"


दुकानदार ने पहले तो मना किया, "माता जी, आजकल लोग पैकेट बंद ब्रांडेड चीज़ें खाते हैं।"

"एक बार चख कर तो देख बेटा," सावित्री देवी ने एक मठरी उसे दी।


दुकानदार ने जैसे ही मठरी खाई, उसे अपनी नानी याद आ गई। "अरे माता जी! इसमें तो शुद्ध देशी स्वाद है। लाइए, रख दीजिये। मैं कोशिश करूँगा।"


सावित्री देवी घर आ गईं। दिल धड़क रहा था। अगर विकास को पता चला तो? "नाक कट जाएगी"—यही कहेगा ना?


दो दिन बाद, वह किराने वाला दौड़ता हुआ सावित्री देवी के पास पार्क में आया (जहाँ वह अक्सर बैठती थीं)।

"माता जी! गज़ब हो गया। वो सारी मठरियां और लड्डू एक ही दिन में बिक गए। लोग और मांग रहे हैं। ये लीजिये आपके पैसे।"


उसने सावित्री देवी के हाथ में पाँच सौ रुपये रख दिए। तीन सौ की लागत और दो सौ का मुनाफा।

सावित्री देवी ने उन पाँच सौ रुपयों को मुट्ठी में भींचा। उन दो नोटों में जो गरमाहट थी, वह विकास के दिए हज़ारों रुपयों में कभी नहीं थी। यह उनकी 'मेहनत' की कमाई थी। यह उनकी 'आज़ादी' थी।


अब यह सिलसिला रोज़ का हो गया। विकास और रश्मि को लगता कि माँ पार्क में दोस्तों के साथ गप्पें लड़ाने जाती हैं, लेकिन सावित्री देवी उस समय अपनी छोटी सी 'सप्लाई चेन' चला रही थीं। उन्होंने आस-पास की तीन-चार दुकानों पर अपना सामान देना शुरू कर दिया। सुबह जल्दी उठकर, जब सब सो रहे होते, वह मसाला तैयार कर लेतीं। दोपहर में जब घर खाली होता, वह बनातीं।


एक महीने के अंदर सावित्री देवी ने पांच हज़ार रुपये कमा लिए।

सबसे पहले वह चश्मे की दुकान पर गईं। उन्होंने अपनी पसंद का एक अच्छा फ्रेम चुना और अपने पैसों से बिल चुकाया। जब उन्होंने नया चश्मा पहनकर दुनिया को देखा, तो सब कुछ बहुत साफ़ और उज्जवल नज़र आया—सिर्फ आँखों के लिए नहीं, बल्कि उनके आत्मविश्वास के लिए भी।


फिर उन्होंने अपने पोते, आरव, के लिए एक रिमोट वाली कार खरीदी, जिसके लिए वह कई दिनों से ज़िद कर रहा था और विकास मना कर रहा था।


शाम को घर पर।

सावित्री देवी ने वह खिलौना आरव को दिया। आरव खुशी से उछल पड़ा। "थैंक यू दादी! यू आर द बेस्ट!"

विकास ने देखा तो हैरान रह गया। "माँ? यह कार तो दो हज़ार की थी। आपके पास पैसे कहाँ से आए? मैंने तो पिछले महीने पैसे नहीं दिए थे।"


रश्मि भी शक की नज़र से देखने लगी। "कहीं आपने अपनी कोई पुरानी जेवर तो नहीं बेच दी माँ जी?"


सावित्री देवी ने शांति से चाय की चुस्की ली। "नहीं बहू, जेवर नहीं बेचा। हुनर बेचा है।"


"हुनर? क्या मतलब?" विकास ने पूछा।


तभी विकास के मोबाइल पर उसके एक दोस्त का फोन आया।

"अरे विकास, यार तेरी माँ के हाथ में तो जादू है! वो जो मठरी आज तूने शर्मा जी की दुकान से खरीदकर खिलाई न ऑफिस में... कमाल थी भाई! मुझे दो किलो और चाहिए घर के लिए।"


विकास सन्न रह गया। वह आज ही शर्मा जी की दुकान से कुछ स्नैक्स लाया था, यह जाने बिना कि वह उसकी माँ ने बनाए हैं।

"शर्मा जी की दुकान? मठरी?" विकास ने फोन काटा और माँ की तरफ घूमा। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था।


"माँ! यह क्या सुन रहा हूँ मैं? आप... आप दूकानों पर मठरी बेच रही हैं? हमारी इज़्ज़त का कुछ खयाल है आपको? मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर हूँ और मेरी माँ हलवाई का काम कर रही है? लोग क्या कहेंगे कि बेटा माँ को भूखा मार रहा है इसलिए बुढ़िया को काम करना पड़ रहा है?"


रश्मि भी बोली, "हे भगवान! अब तो हम मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। किटी पार्टी में पता चला तो औरतें थू-थू करेंगी।"


कमरे में तनाव भर गया। सावित्री देवी ने धीरे से अपना कप रखा। वह उठीं और अपनी अलमारी से एक लिफाफा निकालकर लाईं। उन्होंने वह लिफाफा विकास के हाथ में रख दिया।


"यह क्या है?" विकास ने झल्लाते हुए पूछा।


"गिन ले। इसमें दस हज़ार रुपये हैं," सावित्री देवी की आवाज़ में एक ऐसी खनक थी जो पहले कभी नहीं थी। "यह मेरी पिछले महीने की कमाई है। और सुन विकास, इज़्ज़त काम करने से नहीं जाती, इज़्ज़त लाचार होने से जाती है।"


विकास चुप हो गया। सावित्री देवी ने बोलना जारी रखा।

"तूने कहा था न कि मुझे खर्चे की क्या ज़रूरत? मुझे ज़रूरत है बेटा। मुझे ज़रूरत है इस बात की कि जब मेरा मन करे मैं अपने पोते को खिलौना दिला सकूँ और उसके लिए मुझे तेरे आगे हाथ न फैलाना पड़े। मुझे ज़रूरत है कि जब मेरा चश्मा टूटे, तो मुझे अगले महीने का इंतज़ार न करना पड़े। तूने मुझे रोटी दी, छत दी, मैं मना नहीं करती। लेकिन उस रोटी के साथ जो ताने मिले, उन्होंने मेरा पेट तो भरा पर आत्मा को भूखा मार दिया।"


सावित्री देवी की आँखों में आंसू थे, पर आवाज़ नहीं लड़खड़ाई।

"बेटा, जब मैं तुम्हारी कमाई की रोटी खाती थी, तो वो गले से नीचे उतरने में बहुत भारी लगती थी। उसमें 'एहसान' का स्वाद आता था। लेकिन पिछले एक महीने से जब मैं अपनी कमाई की रोटी खा रही हूँ न... तो सूखी रोटी भी मलाई जैसी लगती है। इसे कहते हैं **'दो वक्त की सम्मानजनक रोटी'**। मुझे यह काम करने में कोई शर्म नहीं है। शर्म तो मुझे तब आनी चाहिए थी जब हाथ-पैर सलामत होते हुए भी मैं तुम लोगों पर बोझ बनी बैठी थी।"


विकास के हाथ से लिफाफा छूटकर गिर गया। उसे याद आया कि कैसे वह अपनी माँ को 'खर्चे' का ताना देता था। उसे उस बूढ़े चने वाले की याद तो नहीं थी, लेकिन आज उसे अपनी माँ के चेहरे पर वही तेज दिखाई दे रहा था—आत्मनिर्भरता का तेज।


विकास ने माँ के पैर पकड़ लिए। "माँ, मुझे माफ़ कर दो। मैं अपनी झूठी शान में इतना अंधा हो गया था कि आपका स्वाभिमान देख ही नहीं पाया। आप सही कह रही हैं। आप काम कीजिये, मठरी बनाइये... लेकिन दुकानों के लिए नहीं।"


सावित्री देवी ने हैरानी से देखा। "क्या मतलब?"


विकास ने आंसू पोंछते हुए मुस्कुराया। "मैं कल ही एक वेबसाइट बनवाऊंगा—**'दादी माँ की रसोई'**। अब मेरी माँ का हुनर पूरी दुनिया देखेगी, पर शान से, छुपकर नहीं। आप बिज़नेस वुमन बनेंगी।"


सावित्री देवी ने बेटे को गले लगा लिया। उस दिन घर की हवा बदल गई। अब वहां सिर्फ एसी की ठंडक नहीं थी, बल्कि रिश्तों की गर्माहट और सम्मान की धूप भी थी।


सावित्री देवी ने साबित कर दिया था कि उम्र चाहे ६० हो या ६५, जब तक सांस है, तब तक इंसान को अपनी पहचान और अपनी रोटी खुद कमाने का हक़ है। क्योंकि मांगी हुई दौलत से कमाई हुई चवन्नी ज्यादा कीमती होती है।

**लेखक का संदेश:**

बुढ़ापा किसी को लाचार बनाने के लिए नहीं आता। हमारे बुजुर्गों के पास तजुर्बे का वो खजाना है जिसे अगर सही दिशा मिले, तो वो चमत्कार कर सकते हैं। अपने माता-पिता को सिर्फ 'आराम' नहीं, 'सम्मान' और 'मकसद' दीजिये। निर्भरता इंसान को मार देती है, और आत्मनिर्भरता उसे दोबारा ज़िंदा कर देती है।


**अंत में आपसे एक सवाल:**

क्या सावित्री देवी का छुपकर काम करना सही था? क्या हर बुजुर्ग को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की कोशिश करनी चाहिए, चाहे बच्चे कितने भी अमीर क्यों न हों? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।


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