"बेटा, अब आगे क्या सोचा है? अकेले कैसे रहेगी? अभी भी वक्त है, कह तो मैं बात करूं सुमित से..." मां की वही पुरानी हिदायत. "मां," अलका ने उन्हें बीच में ही रोका, आवाज़ में एक दृढ़ता थी. "सुमित से बात करने का वक्त बहुत पहले बीत चुका है. और रही बात अकेले रहने की, तो मां, मैं उस भरे-पूरे घर में ज्यादा अकेली थी. वहां मैं सबकी थी, पर मेरा कोई नहीं था. यहां मैं अकेली हूं, पर कम से कम मैं 'अपनी' तो हूं." खिड़की के शीशे पर बारिश की बूंदों की थपकी ने अलका की नींद तोड़ी. घड़ी की सुइयों पर नज़र गई—सुबह के आठ बज रहे थे. पिछले पच्चीस सालों में शायद यह पहली बार था जब सूरज के इतना ऊपर चढ़ आने के बाद भी वह बिस्तर पर थी. अमूमन, सुबह के छह बजते ही उसके भीतर की घड़ी उसे झकझोर कर उठा देती थी. टिफिन, नाश्ता, पति की शर्ट, सास की दवाइयां—जिम्मेदारियों की एक लंबी फेहरिस्त उसका इंतज़ार कर रही होती थी. लेकिन आज... आज वह फेहरिस्त कोरी थी. अलका ने करवट ली और खाली बिस्तर को देखा. बगल वाला तकिया साफ़ और बिना सिलवटों का था. आज उसे ठीक करने की ज़रूरत नहीं थी. कल ही तो विदा किया था...