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जून, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मैं अकेली नहीं हूँ

  "बेटा, अब आगे क्या सोचा है? अकेले कैसे रहेगी? अभी भी वक्त है, कह तो मैं बात करूं सुमित से..." मां की वही पुरानी हिदायत. "मां," अलका ने उन्हें बीच में ही रोका, आवाज़ में एक दृढ़ता थी. "सुमित से बात करने का वक्त बहुत पहले बीत चुका है. और रही बात अकेले रहने की, तो मां, मैं उस भरे-पूरे घर में ज्यादा अकेली थी. वहां मैं सबकी थी, पर मेरा कोई नहीं था. यहां मैं अकेली हूं, पर कम से कम मैं 'अपनी' तो हूं." खिड़की के शीशे पर बारिश की बूंदों की थपकी ने अलका की नींद तोड़ी. घड़ी की सुइयों पर नज़र गई—सुबह के आठ बज रहे थे. पिछले पच्चीस सालों में शायद यह पहली बार था जब सूरज के इतना ऊपर चढ़ आने के बाद भी वह बिस्तर पर थी. अमूमन, सुबह के छह बजते ही उसके भीतर की घड़ी उसे झकझोर कर उठा देती थी. टिफिन, नाश्ता, पति की शर्ट, सास की दवाइयां—जिम्मेदारियों की एक लंबी फेहरिस्त उसका इंतज़ार कर रही होती थी. लेकिन आज... आज वह फेहरिस्त कोरी थी. अलका ने करवट ली और खाली बिस्तर को देखा. बगल वाला तकिया साफ़ और बिना सिलवटों का था. आज उसे ठीक करने की ज़रूरत नहीं थी. कल ही तो विदा किया था...

सुख दुख के साथी

  गायत्री की आँखों से आंसू छलक पड़े. यह आंसू दुख के नहीं थे. यह उस बर्फ के पिघलने जैसे थे जो बरसों से उनके सीने में जमी थी. 30 साल की गृहस्थी में आज पहली बार उनके पति ने उन्हें अपने हाथ से निवाला खिलाया था. वह भी तब, जब रसोई में काम बाकी था. रसोई में एग्जॉस्ट फैन की घरघराहट के बावजूद जुलाई की उमस ने गायत्री देवी के पसीने छुड़ा दिए थे. तवे पर फुलका डालते ही भाप का एक भभका उनके चेहरे पर लगता, लेकिन उनकी उंगलियां मशीनी रफ़्तार से चल रही थीं. आज रविवार था, और मेनू में मटन कोरमा और गरम-गरम फुलके थे. घर में रविवार का मतलब ही होता था—त्योहार जैसा भोजन, और गायत्री के लिए इसका मतलब था—दोपहर के तीन बजे तक रसोई में खड़े रहना. बाहर डाइनिंग टेबल पर हंसी-मजाक की आवाज़ें आ रही थीं. उनके पति, दीनानाथ जी, और बेटा-बहू खाना खाने बैठ चुके थे. "माँ, और कितनी देर? भूख से पेट में चूहे दौड़ रहे हैं!" बेटे रोहन की आवाज़ आई. "बस बेटा, दो मिनट. गरम-गरम ही अच्छी लगेंगी," गायत्री ने पल्लू से माथे का पसीना पोंछते हुए आवाज़ लगाई. उन्होंने जल्दी से घी लगाया और चार रोटियों का कैसरोल लेकर बाहर निकली...

सबसे बड़ी दौलत

  “प्रिया, अपनी जुबान को लगाम दो। तुम जानती भी हो तुम किसके बारे में बात कर रही हो? वो मेरे उस्ताद हैं, मेरे पिता समान हैं। उन्होंने मुझे कचरे के ढेर से उठाकर संगीत का वो मुकाम दिया है जहाँ आज दुनिया मुझे समीर खान के नाम से जानती है। और तुम कह रही हो कि हम उन्हें छोड़कर अलग हो जाएँ?” समीर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था। उसके हाथ में थमी बांसुरी काँप रही थी। यह बहस पिछले एक महीने से उनके बेडरूम की दीवारों के बीच गूँज रही थी, लेकिन आज यह ड्राइंग रूम तक आ पहुँची थी। प्रिया ने अपनी बाहें सिकोड़ लीं और समीर की आँखों में आँखें डालकर बोली, “समीर, भावनाओं में बहना बंद करो। मैं तुम्हारे उस्ताद जी की इज़्ज़त करती हूँ, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। तुम एक कलाकार हो, कोई साधु नहीं। तुम्हारी प्रतिभा इस पुराने, सीलन भरे ‘सुर-साधना’ केंद्र में घुटकर रह गई है। तुम्हें पता है, कल ‘ज़ेनिथ म्यूजिक’ से फिर फोन आया था। वे तुम्हें तीन साल का कॉन्ट्रैक्ट देना चाहते हैं—करोड़ों का। लेकिन शर्त वही है, तुम्हें मुंबई शिफ्ट होना होगा और चौबीसों घंटे उनके स्टूडियो के लिए उपलब्ध रहना होगा। और उस्ताद जी?...

शुरुआत एक नए रिश्ते की

  टैक्सी की खिड़की से बाहर दौड़ते हुए पेड़-पौधों को देखते हुए मीरा के हाथ ठंडे पड़ रहे थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, बिल्कुल वैसी ही उथल-पुथल उसके मन के भीतर भी मची थी। उसने अपनी गीली हथेलियों को साड़ी के पल्लू से पोंछा और एक नज़र अपने बगल में बैठे राघव पर डाली। राघव की आँखें बंद थीं, शायद वह थकान मिटाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसके माथे पर पड़ी लकीरें बता रही थीं कि चिंता उसे भी कम नहीं थी। “राघव...” मीरा की आवाज़ बमुश्किल गले से बाहर आई। राघव ने आँखें खोलीं और मीरा का ठंडा हाथ अपने हाथ में ले लिया। “क्या हुआ मीरा? तुम काँप रही हो।” “मुझे बहुत अजीब लग रहा है। हम शहर से इतना दूर आ गए हैं। तुम्हारे वो ऊँचे रसूख वाले खानदान की कहानियाँ जो मैंने सुनी हैं, वे मुझे डरा रही हैं। मैं एक साधारण स्कूल मास्टर की बेटी और तुम ‘रघुवंशी सदन’ के इकलौते वारिस। क्या यह बेमेल संगम तुम्हारे घर की देहरी लांघ पाएगा? मुझे डर है कि कहीं मेरे कारण तुम्हें अपने परिवार से दूर न होना पड़े।” राघव ने गहरी साँस ली और मीरा की आँखों में झाँका। “मीरा, रिश्ते हैसियत से नहीं, दिल से बनते हैं। और रही बात मेरे ...

दिल की धड़कन

  “पापा, माँ… मुझे आप लोगों से कुछ बेहद ज़रूरी बात करनी है।” रमन ने ड्राइंग रूम के दरवाजे पर खड़े होकर, अपनी उंगलियों को आपस में उलझाते हुए कहा। उसके माथे पर पसीने की महीन बूंदें थीं, जो एसी की ठंडक में भी सूख नहीं रही थीं। सोफे पर बैठकर अखबार पढ़ रहे दीनानाथ जी ने चश्मा नाक पर थोड़ा नीचे खिसकाया और बेटे की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। पास ही बैठी सुमित्रा जी, जो मटर छील रही थीं, उन्होंने भी हाथ रोक लिया। “क्या हुआ बेटा? सब ठीक तो है? ऑफिस में कोई परेशानी?” सुमित्रा जी ने चिंतित स्वर में पूछा। “नहीं माँ, ऑफिस की बात नहीं है। बात… मेरी ज़िंदगी की है,” रमन ने गहरी सांस ली और अंदर आकर सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। “मैं किसी को पसंद करता हूँ और उससे शादी करना चाहता हूँ।” कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। दीनानाथ जी ने अखबार तह करके मेज पर रख दिया। उनके चेहरे पर एक गंभीर मुस्कान उभरी। “तो इसमें इतना घबराने वाली क्या बात है? यह तो खुशी की खबर है। कौन है लड़की? तुम्हारे साथ काम करती है?” “जी नहीं, वह मेरे ऑफिस में नहीं है। उसका नाम काव्या है। वह… वह एक शास्त्रीय गायिका है और बच्चों क...