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फर्ज की फेरे

शाम ढलते ही जब रामेश्वर जी ने घर की चौखट लांघी, तो उनके चेहरे की थकान एक चमकती मुस्कान के पीछे छुप गई थी। हाथ में थमी मिठाई की छोटी सी पोटली को मेज पर रखते हुए उन्होंने आवाज लगाई, "सुनती हो भाग्यश्री! अरे कहाँ रह गई, जरा इधर तो आओ।" रसोई से आंचल से हाथ पोंछती हुई उनकी धर्मपत्नी बाहर आईं और पानी का लोटा बढ़ाते हुए बोलीं, "इतने खुश तो आप बरसों पहले अपनी पहली पगार मिलने पर दिखे थे। आज कौन सी लॉटरी लग गई?" रामेश्वर जी ने पानी का एक घूंट भरा और भावुक स्वर में बोले, "लॉटरी ही समझो। हमारी काव्या के लिए जो रिश्ता देखा था न, उन लोगों ने आज हां कर दी है। लड़का मयंक एक प्रतिष्ठित कंपनी में सीनियर इंजीनियर है। परिवार इतना सुलझा हुआ और संस्कारी है कि देखते ही मन को भा जाए। उन्होंने साफ कहा है कि उन्हें सिर्फ हमारी संस्कारी बिटिया चाहिए।"


काव्या अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। घर छोटा था, ज़रूरतें सीमित थीं, लेकिन खुशियों का कोई अभाव नहीं था। काव्या बचपन से ही शांत, गंभीर और स्वाभिमानी स्वभाव की थी। पिता एक छोटे से सरकारी दफ्तर में साधारण क्लर्क थे, इसलिए काव्या ने कभी किसी गैर-जरूरी चीज़ की ज़िद नहीं की। उसने बारहवीं के बाद से ही छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर और अपनी चित्रकारी के हुनर से थोड़ा-बहुत कमाकर घर के खर्च में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। अब तो वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर काम कर रही थी। हर महीने जब उसकी पगार आती और वह पूरे आदर के साथ अपने पिता के हाथों में रख देती, तो रामेश्वर जी प्यार से उसका माथा चूमकर वो लिफाफा वापस उसकी हथेली पर रख देते। वे हमेशा एक ही बात कहते, "पगड़ी का मान और बेटी की कमाई कभी घर के चूल्हे में नहीं झोंकी जाती। यह तुम्हारी अपनी मेहनत है, इसे संजोकर रखो, तुम्हारे भविष्य में काम आएगी।"


घर में सब कुछ अच्छा था, बस एक बात थी जो अक्सर मां-बेटी के मन को बेचैन कर देती थी। रामेश्वर जी को कई सालों से बीड़ी पीने और गुटखा चबाने की बुरी लत थी। दफ्तर का तनाव हो या घर की कोई चिंता, वे दिनभर में कई बार इस ज़हर का सहारा लेते थे। कई बार घर में इस बात पर बहस भी होती, काव्या रूठ जाती, मां समझाती, लेकिन रामेश्वर जी हंसकर टाल देते और कहते, "अरे बस थोड़ी सी आदत है, पुरानी हो गई है, अब इस उम्र में कहां छूटेगी।" वे इसे एक मामूली बात समझते थे, पर काव्या जानती थी कि यह लत धीरे-धीरे उसके पिता के फेफड़ों और उनकी उम्र को लील रही थी।


रिश्ता तय होने के बाद दोनों परिवारों की सहमति से छह महीने बाद का शुभ मुहूर्त निकाला गया। दिन पंख लगाकर उड़ने लगे। शादी से ठीक दस दिन पहले, जब तैयारियों का शोर चरम पर था, रामेश्वर जी ने काव्या को अपने कमरे में बुलाया। उनके हाथ में बैंक की एक पासबुक और एक चेक था। उन्होंने काव्या के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "बेटा, मयंक के पिता जी से कल मेरी लंबी बात हुई। उन्होंने दो टूक कह दिया है कि उन्हें शादी में कोई तड़क-भड़क, गहने या दहेज नहीं चाहिए। वे अपनी बहू को एक बेटी की तरह अपने घर ले जाना चाहते हैं। लेकिन एक पिता होने के नाते मेरा भी तो कुछ फर्ज बनता है। मैंने अपनी पूरी नौकरी के दौरान पाई-पाई जोड़कर यह साढ़े तीन लाख रुपये जमा किए थे। यह चेक मैं तुम्हारे नाम कर रहा हूँ। इसे अपने खाते में डाल लेना, नए घर में किसी भी ज़रूरत के वक्त तुम्हारे काम आएगा।" काव्या की पलकें भीग गईं। उसने बिना कोई सवाल किए चेक थाम लिया और पिता के पैर छूकर कमरे से बाहर आ गई।


आखिरकार वह पावन दिन भी आ गया। विवाह का भव्य मंडप गेंदे के फूलों और सुगंधित धूप से महक रहा था। शहनाई की मधुर धुन गूंज रही थी और बारात दरवाजे पर आ चुकी थी। द्वारचार और जयमाला की रस्में बड़े ही आदर और उल्लास के साथ संपन्न हुईं। अब फेरों का समय था। मंडप के बीचों-बीच पवित्र अग्नि प्रज्वलित थी। पंडित जी के मंत्रोच्चार से वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया था। काव्या और मयंक गठबंधन के पवित्र धागे में बंधे हुए फेरे लेने के लिए खड़े हुए। तीन फेरे शांतिपूर्वक पूरे हो चुके थे। जैसे ही चौथे फेरे के लिए पंडित जी ने आगे बढ़ने का संकेत दिया, काव्या अचानक ठहर गई।


पूरे मंडप में फुसफुसाहट शुरू हो गई। रिश्तेदार हैरान रह गए कि अचानक यह क्या हुआ। तभी काव्या ने बहुत ही विनम्र लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा, "पंडित जी, क्षमा कीजिएगा, मुझे दो मिनट रुकना होगा। सात जन्मों के इस बंधन में बंधने से पहले मुझे इस भरे मंडप में अपने पिता से कुछ बात करनी है।"


काव्या मंडप से निकलकर रामेश्वर जी के सामने आकर खड़ी हो गई। रामेश्वर जी घबरा गए, "क्या हुआ बेटा? कोई तकलीफ है?" काव्या ने मुस्कुराते हुए अपने लहंगे के भीतर से एक लिफाफा निकाला। उसने लिफाफे में से दो चेक निकाले और अपने पिता के कांपते हाथों में रख दिए।


काव्या ने गंभीर स्वर में कहा, "पापा, आपने मुझे अपनी हैसियत से बढ़कर पाला, पढ़ाया-लिखाया और इस काबिल बनाया कि आज मैं अपने पैरों पर खड़ी हूँ। आपके दिए प्यार और संस्कारों का मोल तो मैं सात जन्मों में भी नहीं चुका सकती। यह पहला चेक उस साढ़े तीन लाख रुपये का है, जो आपने मुझे शादी के उपहार के रूप में दिया था। मुझे पता है पापा कि आपने इस शादी को अच्छे से निभाने के लिए कुछ परिचितों से कर्ज भी लिया है। मैं नहीं चाहती कि मेरी डोली उठने के बाद आप किसी की उधारी चुकाने की चिंता में रात भर जागें। यह पैसा आपका है और आप इसी से सारा कर्ज चुकाएंगे।"


मंडप में मौजूद हर व्यक्ति स्तब्ध था। काव्या ने आगे कहा, "और यह दूसरा चेक पांच लाख रुपये का है। यह मेरी पिछले चार सालों की नौकरी की कुल बचत है। आपने कभी मेरी कमाई का एक रुपया भी नहीं छुआ, लेकिन आज एक बेटी होने के नाते नहीं, बल्कि इस घर की संतान होने के नाते मैं यह आपको सौंप रही हूँ। अगले साल आपकी सरकारी सेवा पूरी हो रही है। आप जब रिटायर होंगे, तो आपको अपनी किसी भी ज़रूरत या दवाई के लिए कभी किसी के आगे हाथ फैलाने की नौबत नहीं आनी चाहिए। अगर आपका कोई बेटा होता, तो वह भी अपने माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बनता। तो फिर समाज बेटी को पराया धन मानकर यह हक क्यों छीन लेता है? मैंने अपने होने वाले पति मयंक और अपने ससुर जी से इस बारे में पहले ही बात कर ली है, और उन्हें मेरी इस बात पर गर्व है।"


रामेश्वर जी की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। उनका गला रुंध गया था। वे कुछ बोल पाते, उससे पहले ही काव्या ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। उसकी आंखों में एक गहरी विनती थी।


"पापा, अब मुझे आपसे दहेज में कुछ चाहिए। क्या अपनी बेटी को खाली हाथ विदा करेंगे?" काव्या की आवाज में एक अजीब सा दर्द था।


रामेश्वर जी ने सिसकते हुए कहा, "बोल मेरी बच्ची... आज तू जो मांग ले, मैं अपनी जान भी दे दूंगा।"


काव्या ने आगे बढ़कर अपने पिता के दोनों हाथ पकड़ लिए और कहा, "पापा, अगर आप सच में मुझे खुश देखना चाहते हैं, तो मुझे इस पवित्र अग्नि के सामने वचन दीजिए कि आज के बाद आप कभी बीड़ी, तंबाकू या गुटखे को हाथ नहीं लगाएंगे। आपने जो जहर अपने फेफड़ों में भर रखा है, वह धीरे-धीरे आपकी उम्र कम कर रहा है। मुझे आपका पैसा नहीं चाहिए, मुझे आपका स्वस्थ जीवन चाहिए ताकि जब भी मैं मायके आऊं, मुझे आपका सिर पर रखा आशीर्वाद भरा हाथ हमेशा मिले। बस, विदाई में मुझे आपकी लंबी उम्र का यह वचन चाहिए।"


पूरे विवाह स्थल पर गहरा सन्नाटा छा गया था। कन्या पक्ष तो रो ही रहा था, लेकिन वर पक्ष के लोगों की आंखें भी आंसुओं से नम हो चुकी थीं। रामेश्वर जी ने तुरंत अपनी जेब में रखा तंबाकू का पैकेट निकाला और उसे वहीं जमीन पर फेंकते हुए अपनी बेटी को गले से लगा लिया। रोते हुए उनके मुंह से केवल इतना निकला, "मैं वचन देता हूँ बेटा... आज इसी वक्त से इस लत का अंत। आज तूने मुझे सिर्फ कर्ज से ही नहीं, बल्कि उस नरक से भी मुक्त कर दिया।"


मयंक के पिता आगे बढ़े और उन्होंने रामेश्वर जी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "समधी जी, सचमुच आप धन्य हैं। आज इस बेटी ने समाज को दिखा दिया कि संतान बेटा हो या बेटी, फर्क सिर्फ संस्कारों से पड़ता है। हमें गर्व है कि हमारे घर में ऐसी साक्षात लक्ष्मी बहू बनकर आ रही है।" मंडप तालियों की गड़गड़ाहट और भावुक आंसुओं से गूंज उठा। काव्या ने जब बचे हुए फेरे पूरे किए, तो उसके चेहरे पर एक अलौकिक तेज था—एक ऐसी बेटी का तेज, जिसने विदाई से पहले अपने माता-पिता के पूरे जीवन को सुरक्षित और खुशहाल बना दिया था।


क्या आपको भी लगता है कि बेटियां सिर्फ विदा होने के लिए नहीं, बल्कि माता-पिता के बुढ़ापे का सबसे मजबूत सहारा बनने का भी पूरा हक रखती हैं? इस पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट करके जरूर बताएं।


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कहानी का सारांश:


यह कहानी रामेश्वर जी और उनकी स्वाभिमानी पुत्री काव्या के अटूट प्रेम और संस्कारों पर आधारित है। रामेश्वर जी एक साधारण क्लर्क थे, जिन्होंने अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन वे खुद तंबाकू और बीड़ी की बुरी लत के शिकार थे। काव्या का विवाह एक अच्छे और संस्कारी परिवार में मयंक के साथ तय हुआ, जिन्होंने बिना किसी दहेज के शादी स्वीकार की। विवाह से पूर्व पिता ने जीवन भर की जमापूंजी बेटी के सुखद भविष्य के लिए चेक के रूप में सौंप दी। विवाह के फेरों के दौरान काव्या ने अचानक रस्म रुकवा दी। उसने अपने पिता का दिया चेक उन्हें वापस करते हुए शादी के कर्ज को चुकाने का आग्रह किया, साथ ही अपनी कई वर्षों की बचत का पांच लाख का चेक उनके रिटायरमेंट और बुढ़ापे की सुरक्षा के लिए भेंट कर दिया। इसके बाद काव्या ने दहेज के रूप में पिता से जीवन भर के लिए तंबाकू और धूम्रपान छोड़ने का वचन मांगा। बेटी के इस गहरे समर्पण और चिंता ने पिता की आंखें खोल दीं और उन्होंने भरे मंडप में व्यसन छोड़ने की प्रतिज्ञा ली। दोनों पक्षों ने गर्व से इस निर्णय का स्वागत किया। यह कहानी दर्शाती है कि बेटियां बेटों से बढ़कर सहारा बन सकती हैं।


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