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बुढ़ापे का सच्चा सहारा

 गंगाराम जी जब भी मोहल्ले के चबूतरे पर बैठते, अपनी मूँछों पर ताव देकर गर्व से यही दोहराते, "अरे भाई, जीवन में एक बेटा होना ही सबसे बड़ा पुण्य है। बेटा ही तो बुढ़ापे की असली लाठी होता है, वही अंतिम समय में सहारा बनता है।" उनके इकलौते बेटे निशांत ने शहर की एक बड़ी कंपनी में अच्छी नौकरी पा ली थी। गाँव से उठकर शहर के एक पॉश इलाके में शानदार फ्लैट ले लिया गया था। गंगाराम जी और उनकी धर्मपत्नी यशोदा देवी के चेहरे पर बुढ़ापे का सुकून था। समाज की नजरों में निशांत एक आदर्श बेटा था जो अपने बूढ़े माता-पिता को अपने साथ शहर ले आया था।


समय बीता और निशांत का विवाह एक संस्कारी और सुलझे विचारों वाली लड़की, पल्लवी से हो गया। शादी के शुरुआती कुछ महीनों में सब कुछ सामान्य रहा। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, घर के भीतर की ज़िम्मेदारियों का ढाँचा पूरी तरह बदल गया। निशांत का सुबह से लेकर देर रात तक का समय केवल ऑफिस, लैपटॉप, कॉल्स और प्रेजेंटेशन के इर्द-गिर्द सिमट गया। वह सुबह सात बजे टाई बाँधकर निकलता और रात को दस बजे थका-हारा लौटता। घर आते ही उसके पास केवल तीन घिसे-पिटे सवाल होते—"बाबूजी, खाना खा लिया?", "माँ, दवाई ले ली थी?" और "सब ठीक है ना?" इन औपचारिक सवालों के जवाब में माता-पिता की हल्की सी 'हाँ' सुनते ही निशांत यह मान लेता कि एक बेटे के रूप में उसका फर्ज पूरा हो गया।


लेकिन उस चारदीवारी के भीतर असल ज़िंदगी तो पल्लवी चला रही थी। गंगाराम जी को सुबह ठीक छह बजे बिना चीनी वाली काली मिर्च की कड़क चाय चाहिए होती थी, जबकि यशोदा देवी को घुटनों के दर्द के कारण गुनगुने पानी के साथ मेथी का दाना लेना होता था। बाबूजी को दोपहर में बिना तेल का उबला खाना पसंद था, तो माँ जी के लिए नरम दलिया या पतली खिचड़ी बनानी पड़ती थी। कौन सी दवाई भोजन से पहले देनी है, कौन सी बाद में, शाम को चार बजे किस फल का रस निकालना है, और रात को नौ बजते ही किसका बिस्तर लगाना है—यह सब पल्लवी की उंगलियों पर दर्ज था। पल्लवी सुबह सूरज उगने से पहले जागती और रात को जब तक दोनों बुज़ुर्ग सो नहीं जाते, उसके पैर नहीं टिकते थे।


यशोदा देवी के जोड़ों का दर्द जब असहनीय हो जाता, तो पल्लवी घंटों बैठकर उनके पैरों में तिल के तेल की मालिश करती। कई बार जब यशोदा जी दर्द से कराह उठतीं, तो पल्लवी उन्हें अपने सीने से लगाकर एक अबोध बच्ची की तरह सहलाती। निशांत को तो यह भी ठीक से नहीं पता था कि रसोई में नमक का डिब्बा कहाँ रखा है या बाबूजी के चश्मे का नंबर कितना है। उसके लिए घर का मतलब सिर्फ एक होटल जैसा था जहाँ सब कुछ अपने-आप व्यवस्थित मिलता था। वह भूल चुका था कि माता-पिता की देखभाल केवल पैसे फेंकने से नहीं, बल्कि समय और समर्पण से होती है।


एक दिन अचानक पल्लवी के मायके से खबर आई कि उसकी छोटी बहन की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है और उसे तुरंत दो दिनों के लिए मायके जाना पड़ेगा। पल्लवी ने जाने से पहले निशांत को एक-एक बात समझाई, डायरी में दवाइयों का समय लिखा, और फ्रिज में खाना बनाकर रख दिया। निशांत ने लापरवाही से कहा, "अरे पल्लवी, तुम बेफिक्र होकर जाओ। दो दिन की ही तो बात है, मैं अपने माँ-बाबूजी का ध्यान नहीं रख सकता क्या? आखिर उनका अपना बेटा हूँ।"


पल्लवी के जाने के अगले ही दिन से घर की हकीकत बिखरने लगी। सुबह निशांत की आँख देर से खुली। जब वह हड़बड़ाहट में उठा, तो देखा कि बाबूजी आठ बजे तक चाय के इंतजार में सिर थामे बैठे थे। निशांत ने आनन-फानन में चाय बनाई, लेकिन उसमें चीनी ज्यादा डाल दी, जिसे पीते ही डायबिटीज़ के मरीज गंगाराम जी का मन खराब हो गया। निशांत को यह समझ ही नहीं आ रहा था कि माँ को कौन सी गोली कब देनी है। नाश्ते में क्या बनाना है, फ्रिज में रखी कौन सी सब्जी कैसे पकानी है, सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया। दोपहर तक निशांत चिड़चिड़ाने लगा। उसके ऑफिस के फोन लगातार बज रहे थे और इधर घर में बुजुर्गों की ज़रूरतें खत्म नहीं हो रही थीं।


शाम होते-होते यशोदा देवी का पेट अचानक खराब हो गया और वे बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थीं। वे दर्द से कराहते हुए बिस्तर पर ही गंदी हो गईं। निशांत कमरे में गया, लेकिन दुर्गंध और उस स्थिति को देखकर उसके पैर पीछे हट गए। वह चाहकर भी अपनी माँ की उस अवस्था को संभाल नहीं पा रहा था। वह घिन और बेबसी के मिले-जुले भाव से काँप उठा। गंगाराम जी लाचारी से कोने में खड़े होकर अपनी पत्नी को देख रहे थे और उनकी आँखों से बेबसी के आँसू बह रहे थे। निशांत ने घबराकर पल्लवी को फोन लगाया और रोते हुए बोला, "पल्लवी, मुझसे कुछ नहीं संभल रहा है। माँ बहुत बीमार हैं, मैं क्या करूँ?"


पल्लवी अपनी बहन को एक रिश्तेदार के भरोसे छोड़कर उसी रात की ट्रेन पकड़कर अगली सुबह घर पहुँच गई। घर की चौखट लाँघते ही उसने जो मंज़र देखा, उसका दिल दहल गया। घर में अव्यवस्था फैली थी, बर्तन सिंक में पड़े थे, बाबूजी भूखे-प्यासे उदास बैठे थे और निशांत सिर पकड़कर सोफे पर बेबस बैठा था।


पल्लवी ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने अपना बैग एक तरफ फेंका और सीधे माँ जी के कमरे में दौड़ी। बिना किसी झिझक, बिना किसी शिकन या घिन के, पल्लवी ने यशोदा जी के गंदे कपड़े बदले, उन्हें नहलाया, साफ चादर बिछाई और प्यार से उनका माथा चूमकर बोली, "माँ जी, आप चिंता मत करो, आपकी बेटी आ गई है।" इसके बाद उसने बाबूजी के लिए तुरंत सादा काढ़ा और दलिया बनाया, डॉक्टर को बुलाकर माँ जी को ड्रिप लगवाई और पूरा दिन बिना कुछ खाए दोनों बुज़ुर्गों की सेवा में जुटी रही। शाम तक जब यशोदा जी की साँसें सामान्य हुईं और चेहरे पर राहत आई, तब जाकर पल्लवी ने चैन की साँस ली।


यह पूरा दृश्य निशांत कोने में खड़ा होकर देख रहा था। उसके भीतर का पुरुषार्थ, उसका यह अहंकार कि 'बेटा ही बुढ़ापे की लाठी होता है', चकनाचूर हो चुका था। उसने देखा कि जिस गंदगी को छूने में उसका सगा बेटा होकर भी जी मिचला रहा था, उसी गंदगी को उस पराई बेटी ने अपने हाथों से साफ कर दिया, जैसे कोई माँ अपने छोटे बच्चे की सेवा करती है।


रात को जब दोनों बुज़ुर्ग सुकून से सो गए, तो गंगाराम जी बाहर आए। उन्होंने निशांत को बुलाया और भारी आवाज़ में कहा, "निशांत, ज़िंदगी भर मैं यही ढिंढोरा पीटता रहा कि बेटा ही बुढ़ापे की लाठी होता है। लेकिन आज मेरी आँखें खुल गईं। बेटा तो सिर्फ वंश का नाम चलाता है, पर उस लाठी को सहारा देने वाला हाथ और आत्मा तो बहू होती है। अगर आज पल्लवी न होती, तो हम दोनों लाचार बुज़ुर्ग तड़प-तड़प कर दम तोड़ देते।"


निशांत की आँखें शर्म से झुक गईं। वह सीधे पल्लवी के पास गया और उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उसने कहा, "पल्लवी, मुझे माफ कर दो। मैं हमेशा यही सोचता रहा कि पैसे कमाकर और हाल-चाल पूछकर मैंने अपना फर्ज निभा दिया। आज मुझे समझ आया कि इस घर की असली रीढ़, इस परिवार की असली लाठी मैं नहीं, तुम हो। तुमने जो त्याग और सेवा मेरे माँ-बाप को दी है, वह शायद मैं उनका सगा बेटा होकर भी कभी नहीं दे पाता।"


पल्लवी ने आगे बढ़कर निशांत के हाथ थाम लिए और मुस्कुराते हुए कहा, "यह सिर्फ आपके माता-पिता नहीं हैं, यह मेरे भी माँ-बाबूजी हैं। सेवा कभी अहसान नहीं होती, यह तो अपनों के प्रति समर्पण है। बस कभी-कभी इस समर्पण को समझने और सम्मान देने की ज़रूरत होती है।"


उस दिन के बाद से घर का माहौल हमेशा के लिए बदल गया। निशांत ने अब सिर्फ सवाल पूछना छोड़ दिया था; वह खुद रसोई में आकर पल्लवी का हाथ बँटाने लगा, माँ-बाबूजी की दवाइयों का हिसाब रखने लगा और सबसे बढ़कर, उसने अपनी पत्नी को केवल 'बहू' नहीं, बल्कि उस घर की सबसे अनमोल शक्ति और माता-पिता की पहली संतान का दर्जा दिया। गंगाराम जी अब चबूतरे पर जाकर गर्व से कहते हैं, "बुढ़ापे की लाठी बेटा नहीं, बल्कि वह बहू होती है जो पराया घर छोड़कर हमारे बुढ़ापे को अपने आँचल में समेट लेती है।"


आपके विचार हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं:

क्या आपके अनुसार भी किसी परिवार में बुढ़ापे की असली लाठी बेटा नहीं बल्कि सेवाभावी बहू ही होती है? या आज के समाज में बेटे और बहू दोनों को बराबर ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए? आपकी इस विषय पर क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।


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