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पराए आँगन का अपनापन

गर्मियों की वह उमस भरी रात और ऊपर से घर में शादी की गहमागहमी। शादी की सारी रस्में पूरी हो चुकी थीं और बाहर पंडाल से धीरे-धीरे मेहमान अपने-अपने घरों को लौट रहे थे। अनुराग के भारी-भरकम शेरवानी वाले बदन से पसीने की बूंदें टपक रही थीं, पर उसके दिल पर जो बोझ था, वह उस भारी लिबास से भी कहीं ज्यादा वजनी था। घर के पिछले हिस्से में बना वह छोटा सा कमरा, जिसे बरसों से कबाड़घर और जरूरत पड़ने पर अनाज रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, आज अनुराग की सुहागरात का कमरा बनाया गया था। जब अनुराग ने उस कमरे की दहलीज पर कदम रखा, तो उसकी नजर चारों तरफ फैले सामान पर पड़ी। कमरे के कोनों में शादी के बचे हुए सामान के बड़े-बड़े बक्से रखे थे। एक तरफ हलवाई के छोड़े गए बड़े-बड़े पीतल के पतीले और कड़ाहियां रखी थीं, जिनमें से घी, रिफाइंड तेल और बेसन के जले हुए हलवे की भारी और दमघोंटू महक उठ रही थी। दूसरी तरफ पुराने गद्दों का ढेर लगा था और बीच में बिछी थी एक पुरानी लोहे की चारपाई। उस चारपाई पर एक नई, लेकिन सस्ती सी चादर बिछा दी गई थी और औपचारिकता पूरी करने के लिए कुछ गेंदे के फूल तोड़कर उस पर बिखेर दिए गए थे। कमरे का पुराना पंखा घरघराहट की आवाज के साथ इतनी धीमी गति से चल रहा था मानो वह भी इस घर की घुटन भरी हवा को हिलाने से इनकार कर रहा हो। उस चारपाई के एक कोने पर लाल जोड़े में सजी-धजी दुल्हन बैठी थी, जिसका लंबा घूंघट उसके चेहरे को पूरी तरह छुपाए हुए था। वह तन्वी थी, अनुराग की जीवनसंगिनी।


अनुराग वहीं चौखट के पास खड़ा रह गया। उसका गला सूख गया और आत्मग्लानि की एक तीव्र लहर उसके भीतर दौड़ गई। वह सोचने लगा कि जिस लड़की ने अपने मायके का भरा-पूरा, हवादार घर छोड़कर उस पर भरोसा किया था, आज उसके स्वागत के लिए वह क्या दे रहा था? एक कबाड़नुमा कमरा और हलवाई के बर्तनों की सड़ांध भरी गंध। अनुराग के माता-पिता का साया बहुत पहले ही उसके सिर से उठ चुका था। तब वह महज बारह वर्ष का था। उसके बड़े भाई विवेक और भाभी रागिनी ने ही उसे पाला-पोसा था। विवेक का शहर के बाजार में एक छोटा सा बिजली के सामान और मरम्मत का काम था। आमदनी इतनी नहीं थी कि बड़ा घर खरीदा जा सके। दो कमरों के उस छोटे से मकान में एक कमरा भैया और भाभी का था, जबकि दूसरा कमरा उनके दो बढ़ते हुए बच्चों, आरव और मिष्टी के लिए था। अनुराग हमेशा से ही दालान में एक कोने पर तख्त लगाकर सोता आया था। उसने कभी शिकायत नहीं की थी। कॉलेज के दिनों में वह पढ़ाई के साथ-साथ भैया की दुकान पर भी बैठता था, बिजली की वायरिंग ठीक करने जाता था और जो कुछ बन पड़ता, घर के खर्च में डाल देता था।


अनुराग की भाभी रागिनी का स्वभाव थोड़ा सख्त और दुनियादार माना जाता था। वह अक्सर घर के सीमित बजट और तंग जगह को लेकर ताने मारती रहती थीं। जब अनुराग की शादी की बात चली, तो उन्होंने कई बार स्पष्ट शब्दों में कहा था कि दो कमरों के इस मकान में एक और इंसान की जगह बनाना नामुमकिन है। अनुराग जानता था कि पिछले ही महीने उसकी एक प्रतिष्ठित मल्टीनेशनल कंपनी में जूनियर एकाउंटेंट के पद पर पक्की नौकरी लगी थी। कंपनी की नीति के अनुसार छह महीने का प्रोबेशन पीरियड पूरा होने के बाद उसे कंपनी की आवासीय कॉलोनी में एक सर्वसुविधायुक्त टू-बीएचके फ्लैट अलॉट होने वाला था। बस छह महीने की ही तो बात थी, पर ये छह महीने तन्वी कैसे काटेगी? शादी से दो दिन पहले जब विवेक भैया ने रागिनी भाभी से विनती की थी कि कम से कम शुरुआती कुछ दिनों के लिए वे अपना कमरा अनुराग और उसकी नई दुल्हन को दे दें, तो भाभी ने साफ मना कर दिया था। उनका कहना था कि उन्हें अपने कमरे से बाहर सोने की आदत नहीं है और नई बहू को पहले दिन से ही घर के असली हालात का अंदाजा होना चाहिए। अंततः इस पुराने कबाड़ वाले कमरे को साफ करके इसमें एक चारपाई डालने का निर्णय लिया गया था।


अनुराग ने भारी कदमों से कमरे का पुराना दरवाजा बंद किया। दरवाजे की कुंडी आधी टूटी हुई थी, जिसे उसने बड़ी मशक्कत से अटकाया। वह धीरे-धीरे चारपाई की ओर बढ़ा। तन्वी और अनुराग एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अजनबी नहीं थे। दोनों ने एक ही कॉलेज से कॉमर्स में मास्टर्स किया था। तीन साल की पहचान, नोट्स साझा करने से शुरू होकर धीरे-धीरे आत्मीयता में बदल गई थी। तन्वी अनुराग के स्वाभिमानी स्वभाव, उसकी मेहनत और उसकी पारिवारिक परिस्थितियों से अच्छी तरह वाकिफ थी। शादी के लिए दोनों ने बाजार जाकर एक-एक चीज अपनी पसंद से खरीदी थी। तन्वी हमेशा कहती थी कि उसे किसी ऐशो-आराम की ख्वाहिश नहीं है, उसे बस एक सच्चा और ईमानदार साथी चाहिए। लेकिन अनुराग एक पुरुष था, और आज जब अपनी पत्नी को पहली बार एक वैवाहिक रिश्ते के रूप में स्वीकार करने का पल आया था, तो उसकी लाचारी उसके सामने पहाड़ बनकर खड़ी हो गई थी। वह चारपाई पर तन्वी से कुछ फासला रखकर बैठ गया। कमरे के भीतर की हवा बेहद भारी थी। पसीने से अनुराग का माथा भीग चुका था।


"तन्वी..." अनुराग ने बेहद धीमी और कांपती हुई आवाज में पुकारा। उसकी आवाज में इतनी झिझक थी कि शब्द जैसे उसके हलक में ही अटक रहे थे। "मुझे माफ कर देना तन्वी। मैं जानता हूँ कि तुमने अपने जीवन की इस सबसे खास रात के लिए ऐसे कमरे का सपना कभी नहीं देखा होगा। मैं जानता हूँ कि यह जगह किसी दुल्हन के स्वागत के लायक नहीं है। लेकिन यकीन मानो, यह सिर्फ कुछ महीनों की बात है। जैसे ही मेरा प्रोबेशन खत्म होगा, कंपनी का फ्लैट मिल जाएगा। मैं तुम्हें वह हर खुशी दूंगा जो तुम डिज़र्व करती हो। बस तब तक... मुझे थोड़ा वक्त दे दो। मैं तुम्हें इस हाल में देखकर खुद अपनी ही नजरों में गिर रहा हूँ।" अनुराग की आँखें भर आईं। उसने कई फिल्मों और उपन्यासों में पढ़ा था कि शादी की पहली रात कितनी हसीन होती है, फूलों की सेज होती है, इत्र की खुशबू होती है, पर यहाँ तो अजीब सी मायूसी फैली थी। अनुराग ने कांपते हाथों से धीरे से दुल्हन का घूंघट पीछे हटाने के लिए हाथ बढ़ाया। उसका इरादा बस तन्वी के आंसू पोंछने और उसे यह विश्वास दिलाने का था कि वह उसके साथ हर हाल में खड़ा है।


जैसे ही अनुराग की उंगलियों ने घूंघट के लाल गोटे वाले किनारे को छुआ और धीरे से ऊपर उठाया, उसी पल कमरे का कमजोर दरवाजा अचानक एक झटके के साथ पूरा खुल गया। तेज रोशनी और खिलखिलाहट की गूंज से कमरा भर गया। अनुराग बुरी तरह हड़बड़ा गया। उसने तेजी से हाथ पीछे खींचा और घबराकर दरवाजे की तरफ देखा। दरवाजे पर विवेक भैया, रागिनी भाभी और दोनों बच्चे आरव और मिष्टी खड़े थे। उनके पीछे पड़ोस की दो-तीन औरतें भी खड़ी थीं और सबके चेहरों पर एक शरारती, रहस्यमयी मुस्कान थी। अनुराग की समझ में कुछ नहीं आया कि यह कैसा मजाक है। वह अभी शर्मिंदगी से नजरें झुकाने ही वाला था कि उसने चारपाई पर बैठी दुल्हन की तरफ देखा, जिसका घूंघट अब हट चुका था। अनुराग की आँखें फटी की फटी रह गईं। चारपाई पर बैठी वह औरत तन्वी नहीं थी, बल्कि उनकी पड़ोस वाली चाची जी थीं, जिन्होंने दुल्हन का जोड़ा और भारी जेवर पहन रखे थे। चाची जी अपनी हंसी नहीं रोक पा रही थीं और अनुराग की शक्ल देखकर खिलखिलाकर हंस पड़ीं।


"अरे ओ देवर जी! तनिक अपनी नजरें तो इधर घुमाइए!" रागिनी भाभी की आवाज कमरे में गूंजी। अनुराग स्तब्ध खड़ा था। उसका दिमाग जैसे काम करना बंद कर चुका था। रागिनी भाभी आगे बढ़ीं और उन्होंने अनुराग के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आँखों में वही डांटने वाला भाव था, लेकिन इस बार उसमें बेपनाह ममता और प्यार झलक रहा था। भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा, "क्यों रे अनुराग, तू अपनी इस भाभी को इतना निर्दयी और पत्थर दिल समझता है क्या? तूने सोच भी कैसे लिया कि जिस देवर को मैंने अपने बेटे की तरह उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखा, उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी और सबसे खूबसूरत रात को मैं इस कबाड़खाने में बीतने दूंगी? क्या मैं इतनी पराई हो गई तेरे लिए?"


अनुराग की जुबान से कोई लफ्ज नहीं निकला। वह बस अवाक होकर भाभी का चेहरा देख रहा था। तभी पीछे से बड़े भैया विवेक आगे आए और उन्होंने अनुराग की पीठ पर एक प्यार भरी धौल जमाई। भैया बोले, "अरे पगले, यह सब तेरी भाभी का ही प्लान था। शादी की रस्मों के बीच जब तू मंडप में बैठा था, तभी इसने पड़ोस वाली भाभी के साथ मिलकर यह सारा नाटक रचा था। इसका कहना था कि अनुराग हमेशा अपने स्वाभिमान में इतना डूबा रहता है कि कभी खुलकर अपनी परेशानी नहीं बताता। इसलिए आज इसे थोड़ा परेशान किया जाए।"


"और चाचा जी, इस पूरे ड्रामे में तन्वी चाची भी मिली हुई थीं!" दस साल का आरव ताली बजाते हुए बोला। "चाची को तो मम्मी ने दोपहर में ही समझा दिया था और वो तो कब से आपका ऊपर वाले कमरे में इंतजार कर रही हैं!"


अनुराग के चेहरे का रंग उड़ चुका था, पर अब उस पर शर्मिंदगी की जगह एक असीम राहत और कृतज्ञता की चमक थी। भाभी ने उसका हाथ पकड़ा और बोलीं, "चल अब यहाँ खूंटे की तरह खड़ा मत रह। चल ऊपर।" पूरा परिवार अनुराग को लेकर घर के मुख्य हिस्से में गया। रागिनी भाभी उसे सीधे अपने मास्टर बेडरूम के दरवाजे तक ले गईं। जब अनुराग ने कमरे के अंदर कदम रखा, तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। वह कमरा, जो आमतौर पर एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार का सामान्य कमरा हुआ करता था, आज पहचान में ही नहीं आ रहा था। कमरे से सारा अतिरिक्त सामान हटा दिया गया था। पूरे कमरे में सफेद मोगरे और रजनीगंधा के ताजे फूलों की भीनी-भीनी, मादक खुशबू तैर रही थी। दीवारों पर हल्के पीले रंग की फेयरी लाइट्स की लड़ियां झिलमिला रही थीं, जिससे कमरे में एक जादुई और बेहद शांत रोशनी बिखरी हुई थी।


कमरे के बीचों-बीच रखे बड़े लकड़ी के पलंग को बड़ी ही नफासत और कलात्मकता से सजाया गया था। सफेद चादर पर गुलाब की लाल पंखुड़ियों से खूबसूरत आकृतियां बनी थीं। और उस सजे हुए पलंग के बीच में बैठी थी तन्वी। लाल जरीदार लहंगे में लिपटी, माथे पर मांगटीका और नथ पहने तन्वी वाकई किसी अप्सरा जैसी लग रही थी। जो तन्वी कॉलेज के दिनों में हमेशा सबसे आगे रहकर बहस करती थी, बेबाक बातें करती थी, आज वह अपनी पलकें झुकाए, दोनों हाथों की मेंहदी को निहारती हुई एक शांत, मर्यादित दुल्हन बनी बैठी थी। उसके होठों पर एक हल्की सी मुस्कान खेल रही थी, जो शायद अनुराग की इस हड़बड़ाहट और मासूमियत पर ही आई थी।


रागिनी भाभी ने अनुराग को कमरे के अंदर किया और मुड़कर बोलीं, "सुन अनुराग, जब तक तुझे तेरी कंपनी का बड़ा घर नहीं मिल जाता, तब तक यह कमरा तेरा और तन्वी का ही रहेगा। हमने बच्चों वाले कमरे में अपना बिस्तर लगा लिया है। परिवार का मतलब सिर्फ एक छत के नीचे रहना नहीं होता, परिवार का मतलब होता है एक-दूसरे के सुख-दुख को अपना समझना और वक्त आने पर एक-दूसरे के लिए थोड़ी सी जगह छोड़ देना। तूने बचपन से इस घर के लिए, अपने भैया के लिए बहुत त्याग किया है। तूने कभी कोई फरमाइश नहीं की, हमेशा दालान के तख्त पर सोकर अपनी पढ़ाई पूरी की। आज जब तेरे जीवन का नया अध्याय शुरू हो रहा है, तो क्या हम तेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते? अगर आज हम तेरे लिए खुशियों की जगह न बना पाते, तो हम तेरे बड़े होने का हक कैसे जताते?" भाभी की आँखों में हल्की सी नमी थी, पर चेहरे पर एक अपार संतोष था।


विवेक भैया ने कमरे का दरवाजा धीरे से सटाते हुए कहा, "चलो भई सब लोग, अब इन दोनों को अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करने दो।" बच्चों की हंसी और बड़ों के आशीर्वाद की गूंज के साथ दरवाजा बाहर से बंद हो गया।


अनुराग कमरे के बीच में खड़ा था। उसके कानों में भाभी के वे शब्द बार-बार गूंज रहे थे—'परिवार का मतलब होता है एक-दूसरे के लिए जगह बनाना।' उसने गहरी सांस ली। मोगरे की महक उसके रोम-रोम में बस गई थी। सारी थकान, सारा तनाव और सारा संकोच जैसे एक ही पल में काफूर हो गया था। वह धीरे-धीरे पलंग की ओर बढ़ा और तन्वी के सामने बैठ गया। तन्वी ने धीरे से अपनी पलकें उठाईं। उसकी कजरारी आँखों में अनुराग के लिए बेशुमार प्यार, सम्मान और भरोसा था। उसने अनुराग का हाथ अपने हाथों में ले लिया।


"मुझे पता था कि आप बहुत परेशान हो रहे थे," तन्वी ने बहुत धीमी, मधुर आवाज में कहा। "लेकिन भाभी सच में बहुत अच्छी हैं। उन्होंने मुझे पहले ही कह दिया था कि इस घर में मुझे कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने देंगी। अनुराग, मुझे किसी महल की चाहत नहीं है। जहाँ इतना प्यार करने वाला परिवार हो और आप जैसा जीवनसाथी, वह घर अपने आप में स्वर्ग बन जाता है।"


अनुराग ने तन्वी के हाथों को अपने होंठों से छू लिया। उसके दिल से एक अनकहा बोझ पूरी तरह उतर चुका था। उसे समझ आ गया था कि जिंदगी की असली दौलत ईंट-पत्थर के बड़े मकानों में नहीं, बल्कि उन अपनों के दिलों में होती है जो वक्त पड़ने पर अपनी खुशियां भी आपके नाम कर देते हैं। त्याग और समझदारी ही किसी भी परिवार की सबसे मजबूत नींव होती है। अगर रिश्तों में विश्वास और थोड़ा सा त्याग करने का जज्बा हो, तो तंग कमरों में भी जिंदगी बेहद सुकून और गरिमा के साथ बसर हो सकती है। अनुराग का वैवाहिक जीवन आज एक ऐसे मोड़ पर शुरू हो रहा था जहाँ प्यार, सम्मान और पारिवारिक एकजुटता का अटूट संबल उसके साथ था।


परिवार कभी दीवारों और कमरों की गिनती से बड़ा नहीं होता, वह बड़ा होता है अपनों के बड़े दिल और एक-दूसरे के प्रति किए गए त्याग से। आज के दौर में जहाँ जरा-सी जगह और संपत्ति के लिए सगे भाई अलग हो जाते हैं, वहीं जब कोई परिवार अपने बच्चों की खुशियों के लिए खुद को समेटकर जगह बनाता है, तो वह घर सचमुच एक मंदिर बन जाता है। क्या आपने भी अपने जीवन में कभी अपनों का ऐसा निस्वार्थ प्रेम और त्याग महसूस किया है? आपकी नजर में एक मजबूत परिवार की सबसे बड़ी ताकत क्या होती है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ जरूर साझा करें।


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कहानी का सारांश:

माता-पिता के देहांत के बाद अनुराग का लालन-पालन उसके बड़े भाई विवेक और भाभी रागिनी ने एक छोटे से दो कमरों के मकान में किया। आमदनी सीमित होने के कारण अनुराग दालान में तख्त पर सोकर ही बड़ा हुआ और उसने अपनी पढ़ाई पूरी की। जब अनुराग की शादी उसकी पुरानी सहपाठी तन्वी से तय हुई, तब तक उसकी एक अच्छी कंपनी में नौकरी लग चुकी थी, लेकिन कंपनी का क्वार्टर मिलने में छह महीने का समय बाकी था। जगह की तंगी और भाभी के कथित कड़े मिजाज को देखते हुए शादी की पहली रात के लिए घर के पुराने कबाड़ वाले कमरे में ही व्यवस्था की गई। अनुराग अपनी नई दुल्हन के स्वागत की यह बदहाली देखकर अत्यंत लज्जित और दुखी था। लेकिन जब उसने कमरे में घूंघट उठाया, तो पता चला कि यह सब परिवार द्वारा रचा गया एक प्रेम भरा प्रहसन था। भाभी और भैया ने अपना मुख्य कमरा ताजे फूलों से सजाकर अनुराग और तन्वी के लिए तैयार कर रखा था और स्वयं बच्चों के कमरे में सोने का फैसला किया था। भाभी के इस निस्वार्थ त्याग और आत्मीयता ने अनुराग को भावुक कर दिया। कहानी यह मार्मिक संदेश देती है कि मकान छोटे हो सकते हैं, पर अगर दिल में अपनों के लिए प्यार और त्याग हो, तो रिश्तों की खुशबू पूरे घर को स्वर्ग बना देती है।


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