"हे भगवान! कभी तो कोई चीज़ अपनी जगह पर छोड़ दिया करो! क्या कसम खा रखी है कि घर को कबाड़खाना ही बनाकर रखना है?" मालती जी की आवाज़ बैठक से लेकर बालकनी तक गूँज रही थी। हाथ में झाड़न लिए वे कभी मेज पर बिखरी चाय की सूखी पत्तियां साफ करतीं, तो कभी सोफे पर बेतरतीब फेंकी गई अधखुली फाइलों को करीने से लगातीं।
सामने आरामकुर्सी पर बैठे प्रोफेसर विश्वनाथ जी चश्मे के ऊपर से उन्हें देखकर बस एक धीमी सी मुस्कान बिखेर देते। उनकी इस शांत मुस्कान को देखकर मालती जी का पारा और चढ़ जाता, "हँस क्या रहे हो? अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं क्या? बाहर पूरी दुनिया के सामने तो बड़े विद्वान प्रोफेसर बनते हो और घर में आते ही बिल्कुल लापरवाह! कभी भीगी छतरी कालीन पर पटक देते हो, तो कभी चश्मे का डिब्बा फ्रिज में रखकर भूल जाते हो। मेरी तो किस्मत ही फूट गई, सारा दिन नौकरों की तरह तुम्हारे बिखेरे कचरे को समेटती फिरूँ!"
विश्वनाथ जी ने अखबार का पन्ना पलटते हुए केवल इतना कहा, "अरे छोड़ो भी मालती, अब इस उम्र में आदतें कहाँ बदलती हैं।" मालती जी बड़बड़ाते हुए रसोई की ओर बढ़ गईं, जहाँ कुकर की सीटी बज रही थी।
मैं कमरे के बाहर खड़ा यह सब चुपचाप देख रहा था। मेरा नाम नमन है। छह महीने पहले ही मेरा तबादला लखनऊ के एक क्षेत्रीय कार्यालय में हुआ था। अजनबी शहर, अजनबी लोग और उस पर किराए के मकान का संकट। कई दलालों के चक्कर काटने के बाद भी या तो सीलन भरे सीपेज वाले मकान मिलते या फिर इतना किराया माँगा जाता कि मेरी पूरी पगार उसी में सिमट जाती।
उस मुश्किल दौर में विश्वनाथ सर मेरे लिए किसी देवदूत की तरह सामने आए। वे मेरे दफ्तर के सलाहकार थे। विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका रुतबा ऐसा था कि बड़े-बड़े अधिकारी उनके सामने अदब से सिर झुकाते थे। जब उन्हें मेरी परेशानी का पता चला, तो उन्होंने बिना किसी औपचारिकता के कहा, "हमारे मकान का ऊपरी हिस्सा खाली पड़ा है बेटा। जब तक तुम्हें अपनी पसंद का आशियाना न मिले, तुम वहीं रह जाओ।"
मेरे लिए यह किसी वरदान से कम नहीं था। शुरुआत में मैंने बाहर से खाना मँगवाने की सोची, लेकिन विश्वनाथ सर और मालती जी ने साफ़ कह दिया कि एक ही छत के नीचे रहते हुए कोई बाहर का खाना खाए, यह उन्हें बर्दाश्त नहीं। लिहाज़ा, मैं उनके साथ ही खाना खाने लगा।
लेकिन धीरे-धीरे मुझे एक बात बहुत अजीब लगने लगी। कॉलेज और सेमिनारों में विश्वनाथ सर की छवि एक अत्यंत व्यवस्थित, अनुशासनप्रिय और बारीक से बारीक नियम का पालन करने वाले व्यक्ति की थी। उनकी कलम, उनकी डायरी, उनका कोट—सब कुछ एकदम सलीके से रहता था। फिर वही इंसान घर आते ही इतना फूहड़ और लापरवाह कैसे बन जाता था? कभी वे दाल की कटोरी में रोटी के टुकड़े छोड़कर चले जाते, कभी रात को सोने से पहले ड्राइंग रूम की सारी लाइटें जलती छोड़ देते, तो कभी जूतों पर लगी मिट्टी को कालीन पर ही रगड़ देते।
एक दिन दफ्तर में जब सब लोग जा चुके थे और सर अपनी मेज पर रखे कागजों को बड़ी नफ़ासत से फाइल में नत्थी कर रहे थे, मुझसे रहा नहीं गया।
मैंने हिचकिचाते हुए पूछा, "सर, एक बात पूछूँ? बुरा न मानिएगा। दफ्तर में आपकी हर चीज़ इतनी तरतीब से होती है, एक कागज़ भी इधर से उधर नहीं हिलता। फिर घर पर आप आंटी जी को इतना तंग क्यों करते हैं? आप जानबूझकर सारा सामान बिखेर देते हैं और आंटी जी सारा दिन बड़बड़ाती रहती हैं।"
विश्वनाथ सर के हाथ वहीं थम गए। उन्होंने चश्मा उतारा और मेज पर रख दिया। उन्होंने एक बहुत गहरी और ठंडी सांस ली। उनकी आँखों में तैरती एक पुरानी, गहरी पीड़ा ने मुझे स्तब्ध कर दिया।
"बेटा नमन..." उनका गला भर्रा आया, "यह जो तुम देखते हो, यह मेरी लापरवाही नहीं, मेरी मजबूरी है। तीन साल पहले तक यह घर ऐसा नहीं था। हमारा एक बेटा था—शिखर। होनहार, हँसमुख और इंजीनियरिंग के आखिरी साल में।"
सर की आँखें शून्य में ताकने लगीं, "छुट्टियों में वह अपने दोस्तों के साथ उत्तराखंड घूमने गया था। अचानक आई भूस्खलन की एक भयानक लहर में उनकी गाड़ी खाई में समा गई। जब यह खबर घर पहुँची, तो मालती के प्राण जैसे उसी पल निकल गए थे। उसने रोना, चीखना, यहाँ तक कि बात करना भी बंद कर दिया था। वह बस पूरे दिन शून्य में ताकती रहती। न खाना, न पीना, न किसी से मिलना। डॉक्टरों ने कहा कि यह गहरा अवसाद है, अगर इसने खुद को किसी चीज़ में व्यस्त नहीं किया या अपनी भावनाएं बाहर नहीं निकालीं, तो इसका दिमाग काम करना बंद कर देगा।"
सर ने अपनी नम आँखें पोंछीं और आगे बोले, "मैं अंदर से टूट चुका था बेटा। पर अगर मैं भी टूट जाता, तो मालती को कौन बचाता? मैंने देखा कि जब घर में सब कुछ शांत और व्यवस्थित रहता, तो वह सिर्फ़ शिखर की तस्वीर को देखकर आँसू बहाती और डिप्रेशन के अंधेरे में डूबती जाती। फिर एक दिन गलती से मेरे हाथ से चाय का कप गिर गया और कालीन गंदा हो गया। उस दिन कई महीनों बाद मालती चिल्लाई, उसने मुझ पर गुस्सा किया। उस गुस्से में मुझे उसके जिंदा होने की आहट सुनाई दी। बस, उसी दिन से मैंने यह नाटक शुरू कर दिया।"
सर के चेहरे पर एक दर्दनाक मुस्कान तैर गई, "मैं जानबूझकर चीज़ें बिखेरता हूँ, गलतियाँ करता हूँ ताकि उसका दिमाग उन कामों में, मुझे डांटने में और घर को समेटने में उलझा रहे। जब वह मुझ पर गुस्सा करती है, तो कम से कम वह उस असहनीय सन्नाटे से बाहर रहती है। उसके गुस्से के पीछे की जो थकान है, वही रात को उसे बिना नींद की गोलियों के सुला देती है। मैं जानता हूँ कि वह मुझे लापरवाह समझती है, पर उसकी ज़िंदगी की सांसें बचाए रखने के लिए मैं यह इल्ज़ाम उम्र भर हँसते-हँसते सहने को तैयार हूँ।"
यह सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। जिस इंसान को मैं लापरवाह समझ रहा था, वह तो अपनी पत्नी के टूटे हुए वजूद को बचाने के लिए हर रोज़ अपने आत्मसम्मान की आहुति दे रहा था। प्रेम का ऐसा मौन और त्यागमयी रूप मैंने ज़िंदगी में कभी नहीं देखा था।
उस दिन के बाद से घर का वह दृश्य मेरे लिए पूरी तरह बदल गया। अब जब भी मालती जी सर पर चिल्लातीं, मुझे उन डांटों के पीछे एक पति का असीम, अनकहा प्यार नज़र आता।
कुछ महीने और बीते। एक दिन जब मैं दफ्तर से लौटा, तो देखा कि बैठक में कोई आवाज़ नहीं थी। मुझे घबराहट हुई। मैं आहिस्ता से अंदर गया। बालकनी में विश्वनाथ सर और मालती जी एक साथ बैठे थे। उनके बीच एक छोटी सी मेज पर शिखर की तस्वीर रखी थी, जिसके आगे ताजे फूलों का एक सुंदर गुलदस्ता सजा था।
मालती जी ने सर का हाथ अपने हाथों में थाम रखा था। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन उस चेहरे पर बरसों बाद एक अलौकिक सुकून और समझदारी की चमक थी।
मालती जी ने रुंधे गले से कहा, "सुनिए... कल रात जब आप सो रहे थे, तो मैंने आपकी वह पुरानी डायरी पढ़ ली जो आप अलमारी के पीछे छुपा कर रखते थे। मुझे माफ कर दीजिए। मैं इतनी अंधी हो गई थी कि अपने दर्द के आगे आपका पहाड़ जैसा समर्पण देख ही नहीं पाई। आप मेरे लिए हर रोज़ इतना बड़ा बोझ ढोते रहे? खुद को गिराकर मुझे संभालते रहे?"
विश्वनाथ जी ने कांपते हाथों से अपनी पत्नी के आँसू पोंछे।
मालती जी ने शिखर की तस्वीर की ओर देखते हुए कहा, "हमारा शिखर जहाँ भी होगा, वह अपने पिता को इस तरह परेशान देखकर कभी खुश नहीं होगा। अब आपको यह नाटक करने की ज़रूरत नहीं है। मैं जीना सीखूँगी... आपके लिए, शिखर की यादों के लिए और उन बच्चों के लिए जिन्हें हमारी ज़रूरत है। कल से हम दोनों पास के अनाथालय चलेंगे और वहाँ के बच्चों को पढ़ाएंगे।"
उस शाम उस घर का बरसों पुराना सन्नाटा और दर्द हमेशा के लिए धुल गया था। अब वहाँ जानबूझकर किया गया बिखराव नहीं, बल्कि एक-दूसरे के दर्द को बाँटकर आगे बढ़ने की नई रोशनी थी।
जीवन में कभी-कभी अपनों का रूखापन या अजीब व्यवहार किसी नफ़रत की वजह से नहीं, बल्कि हमें किसी गहरे घाव से बचाने की एक मौन कोशिश होती है। क्या आपने भी कभी अपने परिवार में किसी अपने को ऐसा खामोश त्याग करते देखा है? अपनी भावनाएं और विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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