हाथ में वसीयत के वे चंद पन्ने थे, और केशव की उंगलियां ऐसे कांप रही थीं जैसे कोई छोटा बच्चा पहली बार स्कूल का रिपोर्ट कार्ड अपने पिता को दिखाने जा रहा हो। 52 साल का केशव आज अचानक खुद को बहुत 'बड़ा' महसूस कर रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—जीत की नहीं, बल्कि अस्तित्व के प्रमाण की।
तीन भाइयों में केशव सबसे छोटा था। उससे बड़े विमल भैया थे और मंझले थे सुधीर भैया। 'छोटा' होना एक ऐसा विशेषण था जो केशव के नाम के साथ फेविकोल की तरह चिपका हुआ था। बचपन से लेकर पचपन तक, उसने इस शब्द का बोझ ढोया था।
घर में जब भी आम आते, तो सबसे रसीला और बड़ा आम विमल भैया की थाली में जाता। माँ कहतीं, "अरे, वो बड़े हैं, पढ़ाई का बोझ है उन पर, दिमाग तेज़ चाहिए।" सुधीर भैया को उससे थोड़ा छोटा, लेकिन ठीक-ठाक आम मिल जाता। और केशव? केशव को अक्सर आम की गुठली चूसने को मिलती या वो हिस्सा जो थोड़ा दबा हुआ होता। जब वह मुँह बनाता, तो बाबूजी हंसकर कहते, "अरे केशव, तू तो घर की जान है, सबसे छोटा है, तुझे तो सबका प्यार मिलता है, आम क्या चीज़ है?"
प्यार? केशव अक्सर सोचता था कि यह कैसा प्यार है जो हमेशा 'त्याग' की मांग करता है?
साइकिल आई, तो विमल भैया के लिए। सुधीर भैया को पुरानी वाली मिली। और केशव? उसे कहा गया, "तू कैंची चलाना सीख ले, अभी तेरे पैर पेडल तक पहुँचते ही कहाँ हैं।" जब पैर पहुँचने लगे, तब तक साइकिल कबाड़ हो चुकी थी।
हर फैसले में यही होता। दीवाली पर रंग कौन सा होगा? विमल भैया तय करेंगे। टीवी पर कौन सा चैनल चलेगा? सुधीर भैया के पास रिमोट होगा। केशव की राय... राय तो दूर की बात, उसकी मौजूदगी भी एक 'मूक दर्शक' की तरह थी। "तू चुप रह, बड़ों के बीच में नहीं बोलते," यह वाक्य उसने इतनी बार सुना था कि उसे लगने लगा था कि उसकी आवाज़ का कोई वज़न ही नहीं है।
आज बाबूजी को गुज़रे हुए एक साल हो चुका था। माँ अभी भी उस पुराने पुश्तैनी मकान में रहती थीं, जिसकी दीवारों का प्लास्टर अब उखड़ने लगा था। विमल भैया शहर के पॉश इलाके में शिफ्ट हो चुके थे, और सुधीर भैया की पोस्टिंग बैंगलोर में थी। केशव... केशव वहीं था। उसी पुराने घर के निचले हिस्से में, अपनी सरकारी क्लर्क की नौकरी और माँ की सेवा के साथ।
आज बाबूजी की बरसी थी। विमल और सुधीर अपने परिवारों के साथ आए हुए थे। घर के आंगन में हलचल थी।
हवन के बाद, ड्राइंग रूम में एक गंभीर बैठक चल रही थी। विषय था—इस पुराने मकान का क्या किया जाए?
विमल भैया ने सोफे पर पैर पसारते हुए कहा, "देखो, साफ़ बात है। इस इलाके के रेट बढ़ गए हैं। एक बिल्डर से मेरी बात चल रही है। वो इस ज़मीन के बदले हमें तीन फ्लैट और अच्छी खासी नकद रकम देने को तैयार है। माँ को हम अपने साथ रख लेंगे, बारी-बारी से।"
सुधीर ने तुरंत सहमति जताई, "हाँ भैया, आप सही कह रहे हैं। वैसे भी इस खंडहर को मेंटेन करना मुश्किल है। केशव की सैलरी में तो बिजली का बिल भरना भी भारी पड़ता होगा। क्यों केशव?"
केशव कोने में स्टूल पर बैठा था। उसने धीरे से सिर उठाया। "भैया, मेरा सोचना था कि अगर हम घर न बेचें तो... माँ को इस घर से बहुत लगाव है। बाबूजी की यादें हैं यहाँ। हम थोड़ा रिनोवेट करवा सकते हैं..."
"तू फिर बीच में बोला?" विमल भैया की आवाज़ में वही बचपन वाली डांट थी। "तुझे दुनियादारी की समझ नहीं है केशव। रिनोवेशन में लाखों लगते हैं। लाएगा कहाँ से? बड़ों को फैसला लेने दे। तू बस साइन कर देना जहाँ हम कहें।"
केशव चुप हो गया। वही पुराना वाक्य। बड़ों को फैसला लेने दे। उसे लगा कि वह 52 साल का नहीं, वही 12 साल का 'छोटू' है जिसे कमरे से बाहर जाने को कहा जा रहा है ताकि बड़े बात कर सकें।
तभी माँ, जो अब तक चुपचाप कोने में बैठी माला जप रही थीं, अचानक उठीं। उनकी कमर झुकी हुई थी, लेकिन चाल में एक दृढ़ता थी। वे सीधे अपनी लोहे की भारी अलमारी के पास गईं। चाबी का गुच्छा उनकी साड़ी के पल्लू में बंधा था। खनखनाहट के साथ अलमारी खुली।
उन्होंने एक पुरानी फ़ाइल निकाली।
"विमल, सुधीर," माँ की आवाज़ कांप रही थी पर स्पष्ट थी। "तुम लोग घर बेचने की बात कर रहे हो?"
"हाँ माँ," विमल ने कहा। "आपके भले के लिए ही। केशव तो नासमझ है, वो जज़्बातों में सोचता है। हम प्रैक्टिकल बात कर रहे हैं।"
माँ ने वह फ़ाइल मेज पर पटक दी।
"यह वसीयत है तुम्हारे बाबूजी की," माँ ने कहा। "इसे पढ़ो।"
विमल और सुधीर के चेहरों पर चमक आ गई। उन्हें लगा शायद बाबूजी ने पहले ही बंटवारे का कुछ लिख दिया होगा। विमल ने लपककर फ़ाइल उठाई और पढ़ने लगा।
जैसे-जैसे वह पढ़ता गया, उसके चेहरे का रंग उड़ता गया। माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। उसने अविश्वास से माँ की ओर देखा। "यह... यह क्या है माँ? यह संभव नहीं है। बाबूजी ऐसा कैसे कर सकते हैं?"
"क्या हुआ भैया?" सुधीर ने घबराकर पूछा और फ़ाइल छीन ली। वह भी पढ़कर सन्न रह गया।
केशव चुपचाप बैठा था, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
माँ ने केशव को इशारा किया। "उठ केशव। और यह पढ़।"
केशव डरते-डरते आगे बढ़ा। उसने पन्ना अपने हाथ में लिया। वसीयत की आखिरी लाइनों में साफ़ लिखा था:
"...मेरी तमाम चल-अचल संपत्ति, यह पुश्तैनी मकान और बैंक में जमा राशि, मेरे सबसे छोटे बेटे, केशव के नाम करता हूँ। विमल और सुधीर अपनी-अपनी ज़िंदगी में स्थापित हैं और संपन्न हैं। लेकिन इस घर को, और हमें, जिस 'बड़े' दिल की ज़रूरत थी, वो सिर्फ़ केशव के पास है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा सन्नाटा कि दीवार घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े जैसी लग रही थी।
"यह... यह नाइंसाफी है!" विमल चिल्लाया। "मैं घर का बड़ा बेटा हूँ! कुलदीपक हूँ! हक़ मेरा बनता है। केशव? केशव तो कल का बच्चा है, उसे क्या अक्ल है जायदाद संभालने की?"
माँ ने पहली बार अपनी नज़रें उठाईं और विमल की आँखों में सीधे देखा।
"बड़ा कौन होता है विमल?" माँ ने पूछा। "वो जो उम्र में पहले पैदा हुआ? या वो जिसने ज़िम्मेदारियां उठाईं?"
विमल चुप हो गया।
माँ ने बोलना जारी रखा, "जब तुम्हारे बाबूजी को पहला हार्ट अटैक आया था, तब तुम अमेरिका में अपनी प्रोजेक्ट मीटिंग में थे। तुमने फोन पर कहा था—'केशव है ना, वो देख लेगा'। जब सुधीर की शादी में पैसों की कमी पड़ी, तो इसी केशव ने अपने पीएफ का पैसा निकालकर दिया था, और तुम सबने सोचा कि बाबूजी ने दिया है। पिछले पांच सालों से, जब तुम दोनों त्योहारों पर भी 'बिजी' होने का बहाना बनाते थे, यह केशव मेरी और तुम्हारे बाबूजी की लाठी बना रहा।"
सुधीर ने नज़रें झुका लीं।
"बचपन से तुम लोग कहते आए हो कि केशव छोटा है, उसे समझ नहीं है," माँ का गला भर आया। "लेकिन सच तो यह है कि जब तुम लोग अपनी-अपनी 'बड़ी' दुनिया बनाने में व्यस्त थे, तब यह 'छोटा' बेटा इस घर की नींव थामे खड़ा था। बड़ों के कपड़े पहन लेने से कोई बड़ा नहीं हो जाता। बड़ा वो होता है जो परिवार को बिखरने न दे।"
माँ ने केशव के हाथ पर अपना हाथ रखा। "आज से, इस घर के सारे फैसले केशव लेगा। बेचना है, रखना है, या तोड़ना है—यह उसका हक़ है। क्योंकि आज से इस घर का 'बड़ा' वही है।"
केशव के हाथ में वो पन्ने कांप रहे थे। यह वसीयत नहीं, उसका सम्मान पत्र था। बरसों की वो तड़प—कि कोई उसे गंभीरता से ले, कोई उसे महत्व दे—आज पूरी हो रही थी। लेकिन अजीब बात थी, उसे विमल भैया या सुधीर भैया पर गुस्सा नहीं आ रहा था। उसे जीत की खुशी भी नहीं हो रही थी।
उसे बस एक भारीपन महसूस हो रहा था। 'बड़ा' होने का भारीपन।
विमल और सुधीर कुछ नहीं बोल पाए। वे जानते थे कि कानूनी तौर पर और नैतिक तौर पर, वे हार चुके हैं। वे जिस 'छोटू' को हमेशा दबाते आए थे, आज उनका पिता अपनी कलम से उसका कद उनसे बहुत ऊंचा कर गए थे।
थोड़ी देर बाद, विमल और सुधीर उठकर बाहर चले गए। शायद उन्हें अपनी गलती का अहसास था, या शायद शर्मिंदगी थी।
कमरे में सिर्फ माँ और केशव रह गए।
केशव घुटनों के बल माँ के पास बैठ गया और रो पड़ा। "माँ... मुझे यह सब नहीं चाहिए। मुझे घर नहीं चाहिए। मुझे तो बस..."
"तुझे बस इज़्ज़त चाहिए थी न?" माँ ने उसके आंसू पोंछे। "जानता है केशव, तेरे बाबूजी हमेशा कहते थे कि हमारे तीन बेटे नहीं हैं। हमारे दो बेटे हैं और एक 'श्रवण कुमार' है। वो तुझे कभी छोटा नहीं मानते थे। वो डरते थे कि अगर तुझे अभी सर पर चढ़ाया, तो तेरे भैया तुझे जीने नहीं देंगे। इसलिए उन्होंने खामोशी से तुझे वो सब दिया जो असली 'वारिस' को मिलना चाहिए।"
केशव ने उस वसीयत को सीने से लगा लिया।
शाम हो चुकी थी। विमल और सुधीर वापस जाने की तैयारी कर रहे थे। उनका व्यवहार अब बदल चुका था। जिस केशव को वे सुबह 'नासमझ' कह रहे थे, अब उससे पूछ रहे थे, "केशव, अगर तुझे ठीक लगे तो हम दीवाली पर आ जाएं? या तुझे कोई परेशानी होगी?"
केशव मुस्कुराया। यह मुस्कान व्यंग्य की नहीं थी, बड़प्पन की थी।
"भैया, यह घर बाबूजी का है और हमेशा आप सबका रहेगा," केशव ने सहजता से कहा। "आप जब चाहें आएं। बस... अगली बार आम आएं, तो गुठली मुझे मत दीजिएगा।"
सब हंस पड़े। माहौल हल्का हो गया।
उस रात, जब केशव अपने बिस्तर पर लेटा, तो उसे नींद नहीं आ रही थी। वह बार-बार खुद को शीशे में देख रहा था। चेहरा वही था, बाल वही थे, लेकिन आँखों में वो सहमा हुआ 'छोटू' गायब था। उसकी जगह एक परिपक्व, जिम्मेदार आदमी खड़ा था।
उसे समझ आ गया था कि 'बड़ा' होना कोई पदवी नहीं है जिसे छीना जा सके, यह एक एहसास है जिसे कमाना पड़ता है। प्रमाण-पत्र सरकार देती है, वसीयत वकील बनाते हैं, लेकिन असली 'बड़प्पन' का प्रमाण-पत्र उसे आज अपनी माँ की आँखों में और बाबूजी के शब्दों में मिल गया था।
बाहर हवा चल रही थी और पुराना नीम का पेड़ खड़खड़ा रहा था। केशव उठा और उसने खिड़की बंद कर दी। अब उसे इस घर की रक्षा करनी थी। क्योंकि अब वह सिर्फ़ केशव नहीं था, वह इस घर का 'मुखिया' था।
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