सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पैसा फेल हो गया, संस्कार जीत गए – एक भाभी की कहानी

भाभी, एक बड़ी खुशखबरी है।”

शालिनी ने फोन पर चहकते हुए अपनी भाभी अंजलि से कहा। उसकी आवाज़ में एक ऐसी खनक थी जो अक्सर रईसी और आत्मविश्वास से आती है।

“ननद रानी, अगर मैं गलत नहीं हूँ तो तुम्हारे बेटे कबीर की शादी की तारीख पक्की हो गई है?”

अंजलि ने अपनी सिलाई मशीन का पहिया रोकते हुए, चेहरे पर एक फीकी मुस्कान लाकर कहा। वह जानती थी कि यह फोन आज नहीं तो कल आने ही वाला था।

“हाँ भाभी! बिल्कुल सही पहचाना आपने। कबीर की शादी अगले महीने की बीस तारीख को तय हुई है। आप तो मेरे बताने से पहले ही सब समझ जाती हैं। आखिर पुरानी जोहरी हैं आप।”

शालिनी हँसते हुए बोली, लेकिन उसकी हँसी में वह पुराना, कच्चा अपनापन नहीं था जो शादी से पहले हुआ करता था।

“शालिनी, मैं तो तुम्हें बचपन से जानती हूँ। जब मैं इस घर में ब्याह कर आई थी, तब तुम स्कूल में पढ़ती थीं। तुम्हारी हर धड़कन की खबर रहती थी मुझे।”

अंजलि ने पुरानी यादों को टटोलने की कोशिश की।

“भाभी, वो दिन भी क्या दिन थे। आपने कभी मुझे ननद समझा ही नहीं, हमेशा छोटी बहन की तरह लाड़ किया। माँ के जाने के बाद तो आप ही ने मुझे संभाला था।”

शालिनी की आवाज़ में एक पल के लिए नरमी आई, लेकिन अगले ही पल वह फिर अपने 'सोशलाइट' वाले अंदाज़ में लौट आई।

“सुनिए भाभी, कबीर की शादी में आप सबको ज़रूर आना है और हाँ, कम से कम दस दिन पहले आ जाना। आखिर मामी हो आप। और अपनी बेटी रिया से भी कह दीजिएगा, उसे भी छुट्टी लेनी होगी। कबीर की शादी में हल्दी और मेहंदी की रस्मों में जो पुरानी पारंपरिक चीज़ें होती हैं न, वो सब मैनेज करने के लिए मुझे आप दोनों की बहुत ज़रूरत पड़ेगी। यहाँ मेरे स्टाफ को वो सब रीति-रिवाज कहाँ पता हैं।”

अंजलि के हाथ में पकड़ा हुआ कपड़ा थोड़ा कस गया। यह निमंत्रण था या काम का आदेश, वह समझ नहीं पाई। फिर भी उसने संयम बनाए रखा।

“चिंता मत करो शालिनी, हम आ जाएंगे। घर की शादी है, पीछे थोड़ी रहेंगे।”

फोन कटते ही अंजलि गहरी सोच में डूब गई। उसके पति, राघव, जो पास ही बैठकर अखबार पढ़ रहे थे, ने चश्मा उतारते हुए पूछा, “क्या हुआ अंजलि? शालिनी का फोन था न? चेहरे पर हवाइयां क्यों उड़ रही हैं?”

अंजलि ने एक गहरी साँस ली। “हाँ, कबीर की शादी तय हो गई है। बुला रही थी। कह रही थी दस दिन पहले आ जाना, रस्में संभालनी हैं।”

राघव ने कड़वाहट से मुस्कुराते हुए कहा, “रस्में संभालनी हैं या काम संभालना है? पिछले दस सालों में जब से उसकी शादी उस बड़े उद्योगपति घराने में हुई है, हमारे और उसके बीच की खाई कितनी गहरी हो गई है, यह तुम भी जानती हो और मैं भी। हम एक छोटे से सरकारी क्वार्टर में रहने वाले लोग और वो शहर की सबसे पॉश कॉलोनी की मालकिन। मुझे डर है कि वहाँ हमारा स्वाभिमान कहीं उनके आलीशान कालीनों के नीचे न कुचल जाए।”

“ऐसा मत कहिए,” अंजलि ने उन्हें टोका, भले ही उसका दिल भी यही कह रहा था। “रिश्ते तो रिश्ते होते हैं। और उसने हक़ से बुलाया है। अगर हम नहीं गए, तो दुनिया क्या कहेगी? भाई-भाभी होकर भतीजे की शादी में नहीं आए।”

तैयारियाँ शुरू हुईं। अंजलि ने अपनी पुरानी साड़ियों में से सबसे अच्छी साड़ियाँ निकालीं। अपनी जमापूँजी में से कुछ पैसे निकालकर शालिनी और उसके ससुराल वालों के लिए उपहार खरीदे। रिया, जो कॉलेज में थी, थोड़ी ना-नुकुर कर रही थी। उसे अपनी बुआ का व्यवहार कभी पसंद नहीं आया था।

“माँ, बुआ हमें सिर्फ तब याद करती हैं जब उन्हें किसी ‘देसी’ काम की ज़रूरत होती है। देखना, वहाँ भी हमें मेहमानों की तरह नहीं, बल्कि इवेंट मैनेजर की तरह ट्रीट किया जाएगा,” रिया ने बैग पैक करते हुए कहा।

“चुप कर, बड़ों के बारे में ऐसा नहीं बोलते,” अंजलि ने डांटा, पर मन ही मन वह डरी हुई थी।

दस दिन बाद, अंजलि, राघव और रिया शालिनी के विशाल बंगले ‘स्वर्ण-विला’ के गेट पर खड़े थे। गार्ड ने उन्हें रोक लिया और पूछताछ करने लगा। जब शालिनी को इंटरकॉम किया गया, तब जाकर गेट खुला।

घर के अंदर का नज़ारा किसी फिल्म के सेट जैसा था। नौकर वर्दियों में घूम रहे थे। शालिनी सोफे पर बैठी डिज़ाइनर के साथ कपड़ों पर चर्चा कर रही थी। उन्हें देखते ही वह उठी, लेकिन गले मिलने के बजाय दूर से ही हाथ हिलाया।

“ओह, भैया-भाभी! आप लोग आ गए। बहुत अच्छा हुआ। सफर कैसा रहा?” शालिनी ने पूछा, लेकिन जवाब का इंतज़ार किए बिना नौकर को आवाज़ दी, “रामू, इनका सामान गेस्ट हाउस वाले कमरे में रखवा दो। और भाभी, आप फ्रेश होकर ज़रा नीचे आ जाना। हल्दी पीसने की रस्म के लिए औरतों को इकट्ठा करना है, मुझे समझ नहीं आ रहा कि गीत कौन गाएगा।”

राघव का चेहरा अपमान से लाल हो गया। उन्हें मुख्य घर के कमरों में नहीं, बल्कि बगीचे के पीछे बने गेस्ट हाउस में ठहराया गया था, जहाँ अक्सर दूर के रिश्तेदार या स्टाफ रुकते थे। अंजलि ने राघव का हाथ दबाया, उन्हें शांत रहने का इशारा किया और मुस्कुराते हुए बोली, “हाँ शालिनी, मैं बस अभी आती हूँ।”

अगले तीन दिन अंजलि और रिया के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं थे। घर में मेहमानों का तांता लगा था। शहर के बड़े-बड़े लोग आ रहे थे। शालिनी हर किसी से मिल रही थी, हँस रही थी, लेकिन जैसे ही अंजलि या राघव पास आते, वह असहज हो जाती। वह परिचय कराते वक्त कहती, “ये मेरे मायके से हैं,” कभी यह नहीं कहती कि “ये मेरे बड़े भाई और भाभी हैं।”

हल्दी की रस्म वाले दिन एक बड़ा हादसा हो गया। शालिनी ने एक मशहूर इवेंट कंपनी को ठेका दिया था, लेकिन आखिरी वक्त पर उनका मुख्य कलाकार, जिसे पारंपरिक ‘फुलवारी’ गहने और हल्दी का विशेष उबटन तैयार करना था, ट्रैफिक में फँस गया। महूरत का समय निकला जा रहा था। कबीर की होने वाली सास, जो बहुत ही पारंपरिक और कड़े मिजाज की महिला थीं, नाराज़ होने लगीं।

“शालिनी जी, यह क्या मज़ाक है? शगुन की हल्दी का समय हो रहा है और अभी तक उबटन तैयार नहीं है? और वो फूलों के गहने कहाँ हैं जो रस्म के लिए ज़रूरी हैं? अगर अपशकुन हुआ तो मैं शादी के बारे में दोबारा सोचूँगी,” समधिन जी ने तल्ख लहजे में कहा।

शालिनी के पसीने छूट गए। उसका सारा आत्मविश्वास, उसका पैसा, उसका रूतबा—सब उस पल धरा रह गया। वह इवेंट मैनेजर पर चिल्ला रही थी, लेकिन उससे समस्या हल नहीं हो रही थी। हॉल में सन्नाटा छा गया था। मेहमान कानाफूसी करने लगे थे।

तभी भीड़ को चीरती हुई अंजलि आगे आई। उसने साधारण सी सूती साड़ी पहन रखी थी, लेकिन उसके चेहरे पर गज़ब की शांति थी।

“समधिन जी,” अंजलि ने दृढ़ आवाज़ में कहा। “अपशकुन नहीं होगा। शगुन की चीज़ें बाज़ार से नहीं, घर की बड़ी-बूढ़ियों के हाथों से बनती हैं। आप बस दस मिनट दीजिए।”

शालिनी ने घबराहट में अंजलि की ओर देखा। “भाभी, आप क्या...”

“चुप रहो शालिनी,” अंजलि ने पहली बार उसे डांटा। “रिया, दौड़कर रसोई से बेसन, मलाई, हल्दी और गुलाब जल ले आ। और बगीचे से गेंदे के ताज़े फूल तोड़ ला।”

अंजलि ने आँगन के बीचों-बीच बैठकर मोर्चा संभाल लिया। उसने इवेंट कंपनी के फैंसी कटोरे हटाए और पीतल की पुरानी परात मंगवाई। देखते ही देखते, उसने अपनी अनुभवी उंगलियों से ऐसा सुगंधित उबटन तैयार किया कि पूरा हॉल महक उठा। रिया फूल ले आई। अंजलि ने सुई-धागा लिया और इतनी तेज़ी से फूलों के गहने गूंथे कि सब देखते रह गए।

इतना ही नहीं, जब उबटन लगाते समय डीजे ने गाना बंद कर दिया, तो माहौल फिर सूना हो गया। अंजलि ने ढोलक उठाई और अपनी सुरीली आवाज़ में पारंपरिक ‘बन्ना-बन्नी’ गीत शुरू किया। उसकी आवाज़ में ऐसा दर्द और मिठास थी कि वहाँ मौजूद हर महिला का मन मोह लिया गया। धीरे-धीरे, समधिन जी भी मुस्कुराने लगीं और उन्होंने भी ताल देना शुरू कर दिया।

रस्म पूरी हुई। और बहुत शानदार तरीके से पूरी हुई।

शाम को जब मेहमान चले गए, तो शालिनी थकी-हारी सोफे पर बैठी थी। राघव और रिया कमरे में जाने की तैयारी कर रहे थे। अंजलि अभी भी सामान समेट रही थी।

“भाभी...” पीछे से एक धीमी आवाज़ आई।

अंजलि पलटी। शालिनी खड़ी थी, लेकिन अब उसकी आँखों में वह अहंकार नहीं था। उसकी आँखें झुकी हुई थीं।

“क्या हुआ शालिनी? कुछ और काम है?” अंजलि ने सहजता से पूछा।

शालिनी ने दौड़कर अंजलि को गले लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ़ कर दीजिए भाभी। मैं पैसे की चकाचौंध में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे हीरे और कांच का फर्क ही नज़र नहीं आया। मैंने आपको सिर्फ काम के लिए बुलाया, आपको वो सम्मान नहीं दिया जिसकी आप हकदार थीं। आज अगर आप नहीं होतीं, तो मेरी नाक कट जाती। मेरे लाखों रुपए, मेरे हाई-प्रोफाइल कॉन्टैक्ट्स—सब बेकार हो गए थे। आपने मेरे घर की इज़्ज़त बचा ली।”

अंजलि ने शालिनी के सिर पर हाथ फेरा। “पागली, इज़्ज़त पैसों से नहीं, संस्कारों से बचती है। और रही बात माफ़ी की, तो अपनों से माफ़ी नहीं मांगी जाती। बस, यह याद रखना कि पेड़ चाहे कितना भी ऊँचा हो जाए, अगर जड़ों से कट गया तो वह सूख जाएगा।”

शालिनी ने राघव के पैर छुए। “भैया, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने आपको गेस्ट हाउस में ठहराया, आपको नज़रअंदाज़ किया। मैं भूल गई थी कि जब पापा नहीं रहे थे, तो आपने ही अपनी पढ़ाई छोड़कर मुझे पढ़ाया था ताकि मैं आज इस मुकाम पर पहुँच सकूँ।”

राघव की आँखों में भी नमी आ गई। उन्होंने शालिनी को उठाया। “देर आए दुरुस्त आए, गुड़िया।”

अगले दिन शादी का मुख्य समारोह था। लेकिन नज़ारा बदल चुका था।

स्टेज पर जब वरमाला का समय आया, तो शालिनी ने माइक थाम लिया।

“देवियों और सज्जनों,” शालिनी ने भारी आवाज़ में कहा। “आप सब जानते हैं कि मैं इस शहर की सफल बिजनेसवुमन हूँ। लेकिन आज मैं आपको अपनी असली ताकत से मिलवाना चाहती हूँ। वो ताकत, जिसकी वजह से मैं आज यहाँ खड़ी हूँ।”

उसने अंजलि और राघव को स्टेज पर बुलाया।

“ये मेरे बड़े भैया और भाभी हैं। कल जब मेरा सारा पैसा और इंतज़ाम फेल हो गया, तब मेरी भाभी ने मेरे बेटे की शादी बचाई। यह शादी मेरे बेटे की है, लेकिन इस घर की असली मुखिया मेरी भाभी अंजलि हैं। आज से इस शादी की हर रस्म में सबसे पहला हक़ इनका होगा।”

पूरी महफिल तालियों से गूँज उठी। अंजलि, जो हमेशा पर्दे के पीछे रहती थी, आज सबकी नज़रों में सम्मान की पात्र थी। रिया ने अपनी माँ को देखा और गर्व से उसका सीना चौड़ा हो गया। उसने महसूस किया कि स्वाभिमान माँगा नहीं जाता, कमाया जाता है—अपने व्यवहार से, अपनी ममता से और अपनी जड़ों से जुड़े रहकर।

उस रात जब विदाई हुई, तो शालिनी ने अंजलि को वो कीमती कंगन पहनाए जो वह अपनी समधिन को देने के लिए लाई थी।

“यह क्या कर रही हो शालिनी?” अंजलि ने मना करना चाहा।

“रख लीजिए भाभी,” शालिनी ने नम आँखों से कहा। “यह कंगन सोने के हैं, लेकिन आपका दिल कुंदन का है। यह उसकी बराबरी तो नहीं कर सकते, पर यह मेरी तरफ से एक छोटी सी भेंट है—ननाद की तरफ से नहीं, आपकी छोटी बहन की तरफ से।”

कार में वापस लौटते समय, राघव ने अंजलि की ओर देखा और मुस्कुराए। “क्या हुआ? अब भी लग रहा है कि हम हार गए?”

अंजलि ने खिड़की से बाहर चमकते चाँद को देखा और मुस्कुराई। “नहीं, आज हम जीत गए। हमने अपना परिवार वापस पा लिया।”

गाड़ी हाईवे पर दौड़ रही थी, पीछे छूट गया था वो आलीशान बंगला, लेकिन साथ आ गया था वो खोया हुआ रिश्ता, जो अब कभी नहीं टूटने वाला था।

“आपके हिसाब से असली इज़्ज़त

पैसे से मिलती है

या संस्कारों से?

कमेंट में अपनी राय ज़रूर लिखिए।”

लेखिका : गरिमा चौधरी


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...