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जिस बॉस को वह घमंडी समझती थी… वही माँ बनकर सामने आई”

 “जिस बॉस को वह घमंडी समझती थी… वही माँ बनकर सामने आई”

कॉन्फ्रेंस रूम के भारी शीशे वाले दरवाजे पर अपनी नजरें गड़ाए अनन्या बार-बार अपनी कलाई घड़ी देख रही थी. उसकी धड़कनें किसी तेज रफ्तार ट्रेन की तरह भाग रही थीं. आज वह दिन था जिसका इंतजार वह पिछले छह महीनों से कर रही थी, और जिससे वह सबसे ज्यादा डरती भी थी. ‘द इंकवेल्स’ पब्लिशिंग हाउस की सर्वेसर्वा, मालविका शेरगिल, आज ऑफिस आ रही थीं.

अनन्या ने घबराहट में अपनी फाइल को सीने से भींच लिया. उसने अपने साधारण सूती कुर्ते पर पड़ी एक अदृश्य सलवट को ठीक किया और खुद को संयमित करने की कोशिश की. उसने मालविका मैम के बारे में न जाने कितनी कहानियां सुन रखी थीं. हिंदी साहित्य जगत में उनका नाम एक वटवृक्ष की तरह था, जिसकी छांव में नए लेखकों को पनाह मिलती थी. अनन्या के मन में उनकी एक छवि बसी हुई थी—एक गंभीर, खादी की साड़ी पहनने वाली, चश्मे के पीछे से दुनिया को तजुरबे की नजर से देखने वाली विदुषी महिला. एक ऐसी गुरु जो साहित्य की बारीकियों पर घंटों चर्चा करती होंगी.

लेकिन जैसे ही लिफ्ट का दरवाजा खुला और स्टिलेटो हील्स की खट-खट आवाज संगमरमर के फर्श पर गूंजी, अनन्या की सारी कल्पनाएं कांच की तरह बिखर गईं.

सामने से जो महिला आ रही थी, वह किसी साहित्यकार से ज्यादा किसी फैशन पत्रिका की कवर मॉडल लग रही थी. छोटे कटे हुए बाल, कानों में बड़े डायमंड हूप्स, एक बेहद स्टाइलिश और महंगा जंपसूट, और आंखों पर चढ़ा हुआ ब्रांडेड चश्मा. मालविका शेरगिल के हाथ में एक महंगा मोबाइल था और वह किसी से अंग्रेजी में जोर-जोर से हंसते हुए बात कर रही थीं.

अनन्या जहां थी, वहीं जड़वत हो गई. क्या यही हैं वो विदुषी मालविका? वह महिला जिसने 'सांझी विरासत' जैसी गंभीर किताब लिखी है? अनन्या को लगा जैसे उसके साथ कोई भद्दा मजाक हुआ है. उसका आदर्श, उसका रोल मॉडल, एक पल में किसी सतही सोशलाइट में बदल गया था. वह आगे बढ़कर उनका स्वागत करना चाहती थी, उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहती थी जैसा कि उसने अपने छोटे शहर के संस्कारों में सीखा था, लेकिन उसके पैर उठ ही नहीं पाए.

"रोहन, डार्लिंग! यू लुक फैबुलस!" मालविका ने ऑफिस के सीनियर एडिटर रोहन को देखते ही हवा में हाथ लहराया और उसे गले लगा लिया.

अनन्या दूर खड़ी यह तमाशा देख रही थी. रोहन, जो हमेशा काम को लेकर संजीदा रहता था और अनन्या को अनुशासन का पाठ पढ़ाता था, इस वक्त किसी स्कूल के बच्चे की तरह मालविका के आगे-पीछे घूम रहा था.

"मैम, हमने आपके लिए केबिन रेडी रखा है. और ये नई इंटर्न्स की फाइल्स हैं," रोहन ने उत्साह से कहा.

"ओह कम ऑन रोहन! काम की बातें बाद में. पहले मुझे कॉफी चाहिए, ब्लैक और स्ट्रॉन्ग. और हां, एसी का टेम्परेचर थोड़ा कम करो," मालविका ने चश्मा उतारते हुए कहा. उनकी आंखों में वह गहराई नदारद थी जिसकी अनन्या ने उम्मीद की थी. वहां सिर्फ एक चमक थी, जो शायद उनके मेकअप का कमाल थी.

अनन्या का दिल भारी हो गया. वह अपनी मां को याद करने लगी. उसकी मां, जो एक स्कूल टीचर थीं, हमेशा कहती थीं—"सादगी में ही सच्चा ज्ञान बसता है, अनु." अनन्या को लगा कि वह गलत जगह आ गई है. इस चमक-दमक और अंग्रेजी के बनावटी लहजे के बीच उसकी हिंदी कहानियों का क्या मोल होगा? वह तो यहां साहित्य की साधना करने आई थी, लेकिन यह जगह तो किसी कॉरपोरेट पार्टी जैसी लग रही थी.

अनन्या अपनी डेस्क पर वापस बैठ गई. उसका काम था पुरानी पांडुलिपियों की प्रूफरीडिंग करना. लेकिन आज शब्दों पर उसका ध्यान नहीं लग रहा था. उसे रोहन पर भी गुस्सा आ रहा था. रोहन हमेशा मालविका की तारीफों के पुल बांधता था—"मैम को शब्दों की परख है," "मैम लेखकों को परिवार मानती हैं."

अनन्या ने मन ही मन सोचा, "परिवार? इन्हें तो अपनी लिपस्टिक के शेड से फुर्सत नहीं होगी, लेखकों का दर्द क्या समझेंगी?"

दोपहर हो गई थी. ऑफिस में अफरातफरी का माहौल था क्योंकि शाम को एक बड़ी बुक लॉन्चिंग थी. मालविका लगातार फोन पर व्यस्त थीं या फिर बड़े लेखकों के साथ हंसी-ठिठोली कर रही थीं. अनन्या ने सुबह से कुछ नहीं खाया था. वह रात भर जागकर अपनी कहानी 'अमलतास' को अंतिम रूप दे रही थी, यह सोचकर कि आज मालविका मैम को दिखाएगी. लेकिन अब उस फाइल को बैग में वापस रखते हुए उसने एक लंबी सांस ली. ऐसी मॉडर्न और हाई-फाई महिला को उसके गांव की मिट्टी से जुड़ी कहानी में क्या दिलचस्पी होगी?

तभी रोहन की आवाज आई, "अनन्या, ये कॉफी की ट्रे और कुछ जरूरी पेपर्स मालविका मैम के केबिन में ले जाओ. जल्दी!"

अनन्या का मन नहीं था, लेकिन नौकरी का सवाल था. उसने भारी मन से ट्रे उठाई. कमजोरी महसूस हो रही थी. शायद रात की थकान और खाली पेट होने का असर था. वह धीरे-धीरे केबिन की ओर बढ़ी.

अंदर मालविका सोफे पर पैर फैलाकर बैठी थीं और अपनी सैंडल उतारकर पैरों को सहला रही थीं. अनन्या को देखते ही वे बोलीं, "अरे, तुम वही नई लड़की हो न? रख दो वहां टेबल पर." उनकी आवाज में एक रूखापन था, या शायद अनन्या को ऐसा लगा.

अनन्या टेबल की ओर बढ़ी. "जी मैम," उसने धीमी आवाज में कहा.

"रोहन बता रहा था तुम अच्छा लिखती हो," मालविका ने बिना उसकी ओर देखे, अपनी फाइल पलटते हुए कहा. "बट यू नो, आजकल के नए लेखकों में वो बात नहीं रही. सब जल्दी में हैं. लिखना तपस्या है, कोई इंस्टाग्राम रील नहीं."

यह बात सुनते ही अनन्या को चुभन महसूस हुई. 'आप क्या जानें तपस्या क्या होती है,' उसने मन ही मन सोचा. 'आप तो एसी कमरों में बैठकर, फैंसी कपड़े पहनकर सिर्फ आदेश देना जानती हैं.'

अचानक अनन्या की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा. ट्रे उसके हाथों में कांपने लगी. उसने खुद को संभालने की कोशिश की, लेकिन शरीर ने जवाब दे दिया था. कमजोरी और तनाव के कारण उसके पैर लड़खड़ाए.

"संभलकर!" यह आखिरी शब्द था जो उसने सुना.

अगले ही पल, कॉफी का मग और पेपर्स का ढेर फर्श पर बिखर गया था. कॉफी के छींटे मालविका के बेशकीमती वाइट जंपसूट पर जा गिरे थे. अनन्या गिरते-गिरते बची, उसने टेबल का सहारा लिया, लेकिन उसका सिर बुरी तरह चकरा रहा था.

"हे भगवान! ये क्या किया!" मालविका अपनी जगह से उछल पड़ीं.

अनन्या की आंखों में आंसू आ गए. अब तो नौकरी गई. उसने मालविका शेरगिल की ड्रेस खराब कर दी थी, वह ड्रेस जिसकी कीमत शायद अनन्या की पूरे साल की सैलरी के बराबर होगी. वह माफी मांगने के लिए मुंह खोलने ही वाली थी कि उसे फिर से चक्कर आने लगा और वह फर्श पर बैठ गई.

अनन्या ने डर के मारे आंखें मींच लीं, उसे लगा अभी डांट पड़ेगी, अपमान होगा.

लेकिन तभी उसे अपने माथे पर एक ठंडा स्पर्श महसूस हुआ. उसने आंखें खोलीं तो हैरान रह गई.

मालविका शेरगिल, जो एक पल पहले किसी महारानी की तरह बैठी थीं, अब फर्श पर अनन्या के पास घुटनों के बल बैठी थीं. उन्होंने अपने महंगे जंपसूट की परवाह किए बिना अनन्या का सिर अपनी गोद में रख लिया था.

"बेटा, तुम ठीक हो?" मालविका की आवाज में वह खनकदार अधिकार गायब था. अब वहां सिर्फ चिंता थी. "पानी... रोहन! जल्दी पानी लाओ! और डॉक्टर को कॉल करो, क्विक!" वह चिल्लाईं.

"मैम... आपकी ड्रेस..." अनन्या ने बुदबुदाने की कोशिश की. "कॉफी गिर गई..."

"भाड़ में गई ड्रेस!" मालविका ने झटके से कहा. उन्होंने अपने बैग से एक रुमाल निकाला और अनन्या के पसीने से भीगे चेहरे को पोंछने लगीं. "तुम्हारी हालत देखो. हाथ ठंडे पड़ रहे हैं. कब से कुछ नहीं खाया तुमने?"

अनन्या कुछ बोल नहीं पाई, बस अवाक होकर उस चेहरे को देखती रही. नजदीक से देखने पर उसे मालविका के चेहरे पर फाउंडेशन के नीचे छुपी महीन लकीरें दिखाई दीं—वे लकीरें जो अनुभव और चिंता की गवाह थीं.

रोहन दौड़ता हुआ पानी और कुछ बिस्किट लेकर आया.

"इसने सुबह से कुछ नहीं खाया होगा, मैं जानती हूं इन नए बच्चों को," मालविका ने गिलास अनन्या के होंठों से लगाते हुए कहा. "काम के जुनून में अपनी सेहत भूल जाते हैं. पागल लड़की."

अनन्या को पानी का वह घूंट अमृत जैसा लगा. मालविका का एक हाथ लगातार अनन्या की पीठ सहला रहा था, बिल्कुल वैसे ही जैसे बुखार में उसकी मां सहलाया करती थीं.

"सॉरी मैम, मैंने सब गंदा कर दिया," अनन्या ने फिर से कहा, उसकी नजर फर्श पर फैली कॉफी और मालविका की खराब हुई ड्रेस पर थी.

"अरे, ये तो ड्राई क्लीन हो जाएगा. तुम अपनी फिक्र करो," मालविका ने मुस्कुराते हुए कहा. और उस मुस्कान में कोई बनावटीपन नहीं था. "तुम्हें पता है, जब मैं तुम्हारी उम्र की थी, तो मैं भी ऐसे ही बेहोश हुई थी. दिल्ली के वर्ल्ड बुक फेयर में. तब मेरे एडिटर ने मुझे डांटा नहीं था, बल्कि सैंडविच खिलाया था."

अनन्या को विश्वास नहीं हो रहा था. क्या यह वही महिला है जिसे वह अब तक एक घमंडी अमीरजादी समझ रही थी?

मालविका ने रोहन की तरफ देखा. "मीटिंग कैंसिल करो. और गाड़ी निकालो. मैं इसे खुद इसके हॉस्टल ड्रॉप करूंगी."

"लेकिन मैम, बुक लॉन्च..." रोहन ने याद दिलाना चाहा.

"वो मेरे बिना भी हो जाएगा. या फिर लेट शुरू करेंगे. अभी ये ज्यादा जरूरी है," मालविका ने दृढ़ता से कहा.

अनन्या को सोफे पर लेटा दिया गया. मालविका ने अपने बैग से एक छोटा सा डिब्बा निकाला, जिसमें घर के बने मखाने थे. "लो, थोड़ा-थोड़ा चबाओ. ब्लड शुगर लो हो गया है तुम्हारा."

अनन्या धीरे-धीरे मखाने खाने लगी. मालविका अब उसके पास कुर्सी खींचकर बैठ गई थीं. उन्होंने अपना चश्मा उतार दिया था और अपनी आंखों को मल रही थीं.

"तुम मुझे बहुत अक्खड़ समझती हो न?" मालविका ने अचानक पूछा, लेकिन उनकी आवाज में नरमी थी.

अनन्या हड़बड़ा गई. "नहीं मैम, वो तो..."

"रहने दो, मैं जानती हूं," मालविका हंसीं, लेकिन इस बार हंसी में एक उदासी थी. "मेरी लिपस्टिक, मेरे कपड़े, मेरी इंग्लिश... लोग बस यही देखते हैं. उन्हें लगता है कि जो औरत अपने लुक पर ध्यान देती है, वो साहित्य को लेकर गंभीर नहीं हो सकती. यह एक पूर्वाग्रह है, अनन्या. लेकिन सच यह है कि यह सब एक कवच है. इस इंडस्ट्री में एक औरत को अपनी जगह बनाने के लिए बहुत सख्त दिखना पड़ता है, वरना लोग उसे कुचलकर आगे बढ़ जाते हैं."

अनन्या चुपचाप सुनती रही. उसका एक-एक शब्द अनन्या के मन में बैठी गलतफहमियों की परतों को उतार रहा था.

"मेरी भी एक बेटी है, तुमसे थोड़ी छोटी. हॉस्टल में रहती है," मालविका ने आगे कहा. "जब तुम्हें गिरते हुए देखा, तो लगा जैसे वही तकलीफ में है. मां हूं न, भले ही एडिटर की कुर्सी पर बैठी हूं, लेकिन दिल तो मां का ही धड़कता है अंदर."

अनन्या की आंखों से आंसू बह निकले. इस बार शर्मिंदगी के नहीं, बल्कि एक अजीब से अपनापे के. जिस महिला को वह 'विदेशी गुड़िया' समझ रही थी, वह असल में नारियल की तरह थी—बाहर से सख्त और आधुनिक, लेकिन अंदर से बेहद कोमल और ममतामयी.

"मैम, मैंने एक कहानी लिखी है... 'अमलतास'," अनन्या ने हिम्मत करके कहा.

मालविका की आंखें चमक उठीं. "अमलतास? सुंदर नाम है. पीला रंग, उम्मीद का रंग." उन्होंने अनन्या के हाथ को अपने हाथों में ले लिया. "पहले ठीक हो जाओ, फिर हम दोनों साथ बैठकर उसे पढ़ेंगे. और हां, उसमें जहां-जहां कमियां होंगी, मैं बेरहमी से काटूंगी, याद रखना. मैं काम में रियायत नहीं बरतती."

अनन्या मुस्कुरा दी. "जी मैम, मुझे मंजूर है."

"गुड," मालविका उठीं और अपने खराब हुए जंपसूट को झाड़ा. "चलो अब, उठने की हिम्मत है? या मैं गोद में उठाऊं?"

"नहीं मैम, मैं चल सकती हूं," अनन्या हंस पड़ी.

मालविका ने उसे सहारा देकर उठाया. उनके परफ्यूम की खुशबू अब अनन्या को चुभ नहीं रही थी, बल्कि उसमें एक सुरक्षा का अहसास था. बाहर निकलते वक्त ऑफिस के बाकी कर्मचारी हैरान होकर देख रहे थे कि सख्त मिजाज मालविका शेरगिल, अपनी खराब ड्रेस की परवाह किए बिना, एक मामूली इंटर्न को अपने कंधे का सहारा देकर ले जा रही थीं.

गाड़ी में बैठते वक्त अनन्या ने देखा कि मालविका ने अपना स्टाइलिश चश्मा फिर से लगा लिया था और फोन पर किसी को डांट रही थीं. लेकिन अब अनन्या जानती थी कि उस चश्मे और उस तेज आवाज के पीछे एक ऐसा दिल है जो अपने लोगों की फिक्र करना जानता है.

अनन्या ने सीट पर सिर टिका लिया. उसका डर खत्म हो चुका था. उसने महसूस किया कि उसे सिर्फ एक बॉस नहीं, बल्कि एक सच्चा मेंटर मिल गया है. उसने मन ही मन अपनी मां की बात को संशोधित किया—कभी-कभी ज्ञान सादगी में नहीं, बल्कि उसे धारण करने वाले के चरित्र में बसता है, चाहे उसका लिबास कैसा भी हो. गाड़ी मुंबई की भागती सड़कों पर दौड़ रही थी, लेकिन अनन्या के मन में अब एक ठहराव था.

लेखक : अनुज मिश्रा


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