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दहलीज

 बनारस के घाटों की सीढ़ियों पर बैठी काव्या अक्सर गंगा की लहरों को एकटक देखा करती थी। लहरों का वह अनवरत प्रवाह उसकी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं जैसा था, जो कभी ठहरना नहीं चाहता था। काव्या मध्यम वर्गीय परिवार की एक होनहार लड़की थी, जिसके सपने बनारस की संकरी गलियों से कहीं बड़े थे। उसे लगता था कि उसकी प्रतिभा इस छोटे शहर में घुटकर रह जाएगी। उसे फैशन डिजाइनिंग की दुनिया में अपना नाम बनाना था, और इसके लिए मुंबई की चमक-धमक उसे चुंबक की तरह खींच रही थी। उसके पिता, दीनानाथ जी, एक सेवानिवृत्त अध्यापक थे, जो सिद्धांतों और अनुशासन के पक्के थे। उनका मानना था कि सफलता की नींव धैर्य और संस्कारों पर टिकी होती है, न कि जल्दबाजी और चकाचौंध पर।

काव्या के जीवन में अनिकेत एक ठहराव की तरह था। वे दोनों बचपन से साथ पढ़े थे। अनिकेत स्वभाव से शांत, मृदुभाषी और जमीन से जुड़ा हुआ इंसान था। उसने बनारस में ही रहकर अपने पिता की छोटी सी टेक्सटाइल की दुकान को संभालने का फैसला किया था। वह काव्या की हर बात समझता था, उसकी उड़ानों को जानता था, लेकिन वह यह भी जानता था कि काव्या की मासूमियत उसका सबसे बड़ा शत्रु बन सकती है। अनिकेत के मन में काव्या के लिए एक गहरा प्रेम था, जिसे उसने कभी शब्दों का जामा नहीं पहनाया था। उसे लगता था कि प्रेम बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति है—सामने वाले को खुश देखने की मुक्ति।

कहानी में मोड़ तब आया जब बनारस में एक फैशन प्रदर्शनी के दौरान काव्या की मुलाकात विक्रम से हुई। विक्रम मुंबई का एक जाना-माना फैशन फोटोग्राफर और टैलेंट हंटर होने का दावा करता था। उसकी बातें शक्कर में लिपटी हुई थीं। उसने काव्या के डिजाइनों की झूठी तारीफों के पुल बांध दिए। विक्रम ने उसे यकीन दिलाया कि वह उसे मुंबई में एक बड़े फैशन हाउस में लीड डिजाइनर की नौकरी दिलवा देगा और रातों-रात उसे स्टार बना देगा। विक्रम का व्यक्तित्व सम्मोहक था; वह सपनों का सौदागर था और काव्या उसके दिखाए सुनहरे सपनों में पूरी तरह खो गई।

अनिकेत ने जब विक्रम के बारे में सुना और थोड़ा पता लगाया, तो उसे कुछ खटका। उसने काव्या को समझाने की कोशिश की। "काव्या, हर चमकती चीज सोना नहीं होती। विक्रम की बातों में मुझे सच्चाई कम और फरेब ज्यादा नजर आता है। मुंबई जरूर जाओ, लेकिन अपनी मेहनत और सही रास्ते से। किसी के सहारे या एहसान लेकर नहीं।" अनिकेत की ये बातें काव्या को चुभ गईं। उसे लगा कि अनिकेत उसकी तरक्की से जल रहा है और उसे रोकना चाहता है।

घर पर भी जब दीनानाथ जी ने विक्रम के साथ जाने का विरोध किया, तो काव्या ने विद्रोह कर दिया। उसने कहा, "आप लोग मुझे कभी आगे बढ़ते हुए नहीं देख सकते। मैं जा रही हूं, और जब तक कुछ बन नहीं जाती, वापस नहीं आऊंगी।" वह दिन काव्या के घर के लिए एक काले अध्याय जैसा था। उसने माता-पिता की नम आँखों और अनिकेत की मौन पुकार को अनदेखा कर दिया और विक्रम के साथ मुंबई की ट्रेन पकड़ ली।

मुंबई पहुँचकर शुरू के कुछ दिन तो सपनों जैसे बीते। विक्रम ने उसे एक महंगा फ्लैट दिलाया (जिसका किराया विक्रम ने बाद में काव्या के वेतन से काटने को कहा) और उसे पार्टियों में ले जाने लगा। लेकिन धीरे-धीरे काव्या को असलियत का आभास होने लगा। जिस "लीड डिजाइनर" की नौकरी का वादा किया गया था, वह दरअसल एक सहायक की नौकरी थी जहाँ उससे दिन-रात गधों की तरह काम करवाया जाता था। विक्रम ने काव्या के बनाए सारे बेहतरीन डिजाइनों को अपने नाम से रजिस्टर करवा लिया। जब काव्या ने विरोध किया, तो विक्रम का असली चेहरा सामने आया।

"तुम हो कौन यहाँ? बनारस की एक साधारण लड़की। मेरे बिना तुम्हारा इस शहर में कोई वजूद नहीं है," विक्रम ने हँसते हुए कहा था। उसने काव्या को न केवल नौकरी से निकलवा दिया बल्कि इंडस्ट्री में बदनाम भी कर दिया कि उसने डिजाइन चोरी किए हैं। काव्या टूट गई। वह जिस स्वाभिमान के साथ घर से निकली थी, वह अब तार-तार हो चुका था।

महीने बीतते गए। काव्या के पास जो थोड़ी बहुत जमा-पूँजी थी, वह खत्म हो गई। फ्लैट का किराया न दे पाने के कारण उसे एक चाल (chawl) में एक छोटे से कमरे में शरण लेनी पड़ी। शर्म के मारे उसने घर पर फोन करना बंद कर दिया था। उसे लगता था कि जिस पिता को उसने ठुकराया, वह अब उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। भूख और तनाव ने उसके शरीर को तोड़ दिया था। वह अक्सर बीमार रहने लगी। मुंबई की तेज बारिश जो उसे कभी रोमान्टिक लगती थी, अब उसकी छत से टपकते पानी के रूप में डरावनी लगने लगी थी।

एक रात, जब बुखार से उसका शरीर तप रहा था और जेब में एक रुपये का भी आसरा नहीं था, उसकी निगाह अपने पुराने फोन पर पड़ी। उसमें अनिकेत का नंबर आज भी सबसे ऊपर था। कांपते हाथों से उसने नंबर मिलाया।

"हेलो, अनिकेत?" काव्या की आवाज इतनी कमजोर थी कि पहचानना मुश्किल था।

"काव्या? तुम हो? कैसी हो तुम? इतने महीने से कोई खबर नहीं..." अनिकेत की आवाज में चिंता और राहत दोनों थी।

अनिकेत की अपनेपन भरी आवाज सुनते ही काव्या का सब्र का बांध टूट गया। वह फूट-फूट कर रोने लगी। शब्दों की जरूरत नहीं थी; उसका रोना ही उसकी पूरी कहानी कह रहा था। अनिकेत ने बस इतना कहा, "शांत हो जाओ। मुझे अपना पता भेजो। मैं आ रहा हूँ।"

अगले ही दिन अनिकेत मुंबई पहुँच गया। जब उसने काव्या की हालत देखी, तो उसका दिल दहल गया। वह काव्या जो कभी खिलखिलाती धूप जैसी थी, अब मुरझाए हुए पत्ते जैसी हो गई थी। आँखों के नीचे काले गड्ढे, बिखरे बाल और चेहरे पर गहरी उदासी। वह उसे तुरंत एक अच्छे अस्पताल ले गया। डॉक्टरों ने बताया कि यह केवल शारीरिक कमजोरी नहीं है, बल्कि वह गहरे अवसाद (depression) और कुपोषण का शिकार है।

अनिकेत ने दिन-रात एक कर उसकी सेवा की। वह उसे अपने हाथों से खाना खिलाता, दवाइयाँ देता और घंटों उसके पास बैठकर उसे बचपन की बातें सुनाता ताकि उसका मन बहल सके। जब काव्या थोड़ी ठीक हुई, तो उसने अनिकेत का हाथ पकड़कर कहा, "अनिकेत, अगर तुम न होते तो शायद मैं इस शहर की भीड़ में कहीं गुम हो जाती या मर जाती। मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया।"

अनिकेत ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ रखा, "दोस्ती में हिसाब-किताब नहीं होता काव्या। और गलतियाँ इंसान से ही होती हैं। गिरने में बुराई नहीं है, गिरकर वहीं पड़े रहने में बुराई है।"

"पर मैं अब कहाँ जाऊँ? पिताजी मुझे कभी माफ नहीं करेंगे। मैंने उनकी इज्जत मिट्टी में मिला दी," काव्या ने सिसकते हुए कहा।

"तुम्हें ऐसा लगता है," अनिकेत ने दृढ़ता से कहा। "माता-पिता का गुस्सा रेत पर लिखी लकीर जैसा होता है, हवा का एक झोंका उसे मिटा देता है। वे तुमसे नाराज हो सकते हैं, लेकिन तुमसे नफरत नहीं कर सकते। वे हर दिन तुम्हारा इंतजार करते हैं। चलो घर चलते हैं।"

वापसी का सफर काव्या के लिए बहुत भारी था। ट्रेन जैसे-जैसे बनारस के करीब पहुँच रही थी, उसके दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। क्या वे उसे अपनाएंगे? क्या समाज के ताने उसे जीने देंगे?

घर के दरवाजे पर पहुँचकर काव्या के कदम ठिठक गए। अनिकेत ने हिम्मत बंधाते हुए घंटी बजाई। दरवाजा काव्या की माँ, सुमित्रा जी ने खोला। सामने अपनी बेटी को इतनी कमजोर हालत में देखकर वह एक पल के लिए स्तब्ध रह गईं। उनका गुस्सा, उनकी शिकायतें—सब कुछ ममता के सैलाब में बह गया। वे दौड़कर काव्या से लिपट गईं और रोने लगीं। "कहाँ चली गई थी तू? हमें छोड़कर... तुझे पता है हमने ये दिन कैसे काटे हैं?"

शोर सुनकर दीनानाथ जी भी बाहर आए। काव्या को देखकर उनका चेहरा कठोर हो गया। काव्या उनके पैरों में गिर पड़ी। "बाबूजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं भटक गई थी। मुझे अपनी गलती की बहुत बड़ी सजा मिली है। अब मैं कभी आपको निराश नहीं करूँगी।"

दीनानाथ जी ने अपनी पत्नी की तरफ देखा और फिर काव्या की ओर। उनका शरीर कांप रहा था। उन्होंने मुँह फेर लिया और बोले, "माफी? किस बात की माफी? जो तुमने समाज में हमारी नाक कटवाई है उसकी? या उस भरोसे की जो तुमने एक पल में तोड़ दिया? लोग बातें बना रहे हैं कि हमारी बेटी भाग गई थी। अब कौन सा मूंह लेकर हम समाज में बैठेंगे?"

माहौल तनावपूर्ण हो गया। काव्या का रोना और तेज हो गया। तभी अनिकेत ने आगे बढ़कर दीनानाथ जी के कंधे पर हाथ रखा। "काका, समाज का काम है बोलना। लेकिन क्या समाज के डर से हम अपनी बेटी को खो देंगे? काव्या ने गलती की, उसने एक धोखेबाज पर भरोसा किया, लेकिन उसने कोई अपराध नहीं किया है। वह एक पीड़िता है, मुजरिम नहीं। उसे इस वक्त आपके सहारे की जरूरत है, आपके धिक्कार की नहीं।"

दीनानाथ जी ने अनिकेत की आँखों में देखा। वहां उन्हें एक ऐसी सच्चाई और दृढ़ता दिखाई दी जो शायद उनमें खुद कम पड़ रही थी। अनिकेत ने आगे कहा, "और जहाँ तक बात काव्या के भविष्य और समाज की है... तो मैं काव्या से विवाह करना चाहता हूँ। मुझे दुनिया की परवाह नहीं है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि काव्या का दिल सोने जैसा साफ है। उसे बस एक सही जौहरी की पहचान नहीं हो पाई थी।"

अनिकेत की यह बात सुनकर कमरे में सन्नाटा छा गया। काव्या ने आश्चर्य से अनिकेत की ओर देखा। वह जानती थी कि अनिकेत उसे पसंद करता है, लेकिन इस तरह सबके सामने, उसके सबसे बुरे दौर में उसे अपनाना—यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। यह सच्चा प्रेम था, जो बिना किसी शर्त के खड़ा था।

दीनानाथ जी की आँखों से भी आँसू छलक आए। उनका कठोर आवरण पिघल गया। उन्होंने झुककर काव्या को उठाया और गले लगा लिया। "तू वापस आ गई, मेरे लिए यही बहुत है। अनिकेत ठीक कहता है, दुनिया जाए भाड़ में। तू मेरी बेटी है और हमेशा रहेगी।" उन्होंने अनिकेत के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा, "बेटा, आज तुमने साबित कर दिया कि असली रिश्ता खून का नहीं, एहसास का होता है। तुमने न सिर्फ मेरी बेटी को बचाया, बल्कि मेरे घर की खुशियाँ भी लौटा दीं।"

धीरे-धीरे समय बीतता गया। काव्या ने खुद को फिर से समेटा। अनिकेत की मदद से उसने बनारस में ही अपना एक छोटा सा बुटीक खोला। इस बार उसकी नींव झूठ पर नहीं, बल्कि मेहनत और परिवार के आशीर्वाद पर टिकी थी। अनिकेत ने अपने कपड़े के व्यापार को काव्या के डिजाइनिंग कौशल के साथ जोड़ दिया। दोनों ने मिलकर एक नया ब्रांड शुरू किया—'उम्मीद'।

विक्रम की झूठी दुनिया काव्या के लिए एक बुरा सपना बनकर रह गई थी, जिससे वह जाग चुकी थी। काव्या के काम की चर्चा धीरे-धीरे शहर में होने लगी। उसकी मेहनत रंग लाई और उसे स्थानीय स्तर पर बहुत सम्मान मिलने लगा। जिन लोगों ने उसके भागने पर ताने मारे थे, अब वे ही उसकी सफलता की मिसाल देने लगे थे।

एक शुभ दिन, दोनों परिवारों की रजामंदी से काव्या और अनिकेत का विवाह संपन्न हुआ। मंडप में बैठी काव्या ने जब अनिकेत की ओर देखा, तो उसे महसूस हुआ कि असली हीरो वह नहीं होता जो बड़े-बड़े वादे करता है या जिसके पास चमक-धमक होती है। असली हीरो वह होता है जो तब आपके साथ खड़ा रहता है जब आपकी अपनी परछाई भी साथ छोड़ देती है।

विदाई के समय काव्या ने अपने पिता से कहा, "बाबूजी, मैं बनारस छोड़कर कहीं नहीं जा रही। मेरी दुनिया यहीं है, आप लोगों के पास।" दीनानाथ जी ने गर्व से अपनी बेटी और दामाद को आशीर्वाद दिया। काव्या ने अनिकेत का हाथ थाम लिया, एक ऐसे सफर के लिए जहाँ रास्ता चाहे कैसा भी हो, हमसफर भरोसेमंद था। उसने सीखा कि जीवन में एक बार रास्ता भटकने का मतलब यह नहीं कि यात्रा समाप्त हो गई; बस सही मार्गदर्शक की जरूरत होती है जो आपको वापस घर ला सके। और काव्या के लिए वह मार्गदर्शक, वह प्रेमी, वह मित्र—सब कुछ अनिकेत ही था।

इस तरह, एक गलती ने काव्या को जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया और उसे उस प्रेम से मिलवाया जो शायद सामान्य परिस्थितियों में उसे कभी दिखाई ही नहीं देता। घर की दहलीज लांघकर गई काव्या जब लौटी, तो वह एक बेटी के साथ-साथ एक परिपक्व महिला भी बन चुकी थी, जिसने खोकर पाने का असली मतलब समझ लिया था।

बनारस के घाटों की सीढ़ियों पर बैठी काव्या अक्सर गंगा की लहरों को एकटक देखा करती थी। लहरों का वह अनवरत प्रवाह उसकी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं जैसा था, जो कभी ठहरना नहीं चाहता था। काव्या मध्यम वर्गीय परिवार की एक होनहार लड़की थी, जिसके सपने बनारस की संकरी गलियों से कहीं बड़े थे। उसे लगता था कि उसकी प्रतिभा इस छोटे शहर में घुटकर रह जाएगी। उसे फैशन डिजाइनिंग की दुनिया में अपना नाम बनाना था, और इसके लिए मुंबई की चमक-धमक उसे चुंबक की तरह खींच रही थी। उसके पिता, दीनानाथ जी, एक सेवानिवृत्त अध्यापक थे, जो सिद्धांतों और अनुशासन के पक्के थे। उनका मानना था कि सफलता की नींव धैर्य और संस्कारों पर टिकी होती है, न कि जल्दबाजी और चकाचौंध पर।

काव्या के जीवन में अनिकेत एक ठहराव की तरह था। वे दोनों बचपन से साथ पढ़े थे। अनिकेत स्वभाव से शांत, मृदुभाषी और जमीन से जुड़ा हुआ इंसान था। उसने बनारस में ही रहकर अपने पिता की छोटी सी टेक्सटाइल की दुकान को संभालने का फैसला किया था। वह काव्या की हर बात समझता था, उसकी उड़ानों को जानता था, लेकिन वह यह भी जानता था कि काव्या की मासूमियत उसका सबसे बड़ा शत्रु बन सकती है। अनिकेत के मन में काव्या के लिए एक गहरा प्रेम था, जिसे उसने कभी शब्दों का जामा नहीं पहनाया था। उसे लगता था कि प्रेम बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति है—सामने वाले को खुश देखने की मुक्ति।

कहानी में मोड़ तब आया जब बनारस में एक फैशन प्रदर्शनी के दौरान काव्या की मुलाकात विक्रम से हुई। विक्रम मुंबई का एक जाना-माना फैशन फोटोग्राफर और टैलेंट हंटर होने का दावा करता था। उसकी बातें शक्कर में लिपटी हुई थीं। उसने काव्या के डिजाइनों की झूठी तारीफों के पुल बांध दिए। विक्रम ने उसे यकीन दिलाया कि वह उसे मुंबई में एक बड़े फैशन हाउस में लीड डिजाइनर की नौकरी दिलवा देगा और रातों-रात उसे स्टार बना देगा। विक्रम का व्यक्तित्व सम्मोहक था; वह सपनों का सौदागर था और काव्या उसके दिखाए सुनहरे सपनों में पूरी तरह खो गई।

अनिकेत ने जब विक्रम के बारे में सुना और थोड़ा पता लगाया, तो उसे कुछ खटका। उसने काव्या को समझाने की कोशिश की। "काव्या, हर चमकती चीज सोना नहीं होती। विक्रम की बातों में मुझे सच्चाई कम और फरेब ज्यादा नजर आता है। मुंबई जरूर जाओ, लेकिन अपनी मेहनत और सही रास्ते से। किसी के सहारे या एहसान लेकर नहीं।" अनिकेत की ये बातें काव्या को चुभ गईं। उसे लगा कि अनिकेत उसकी तरक्की से जल रहा है और उसे रोकना चाहता है।

घर पर भी जब दीनानाथ जी ने विक्रम के साथ जाने का विरोध किया, तो काव्या ने विद्रोह कर दिया। उसने कहा, "आप लोग मुझे कभी आगे बढ़ते हुए नहीं देख सकते। मैं जा रही हूं, और जब तक कुछ बन नहीं जाती, वापस नहीं आऊंगी।" वह दिन काव्या के घर के लिए एक काले अध्याय जैसा था। उसने माता-पिता की नम आँखों और अनिकेत की मौन पुकार को अनदेखा कर दिया और विक्रम के साथ मुंबई की ट्रेन पकड़ ली।

मुंबई पहुँचकर शुरू के कुछ दिन तो सपनों जैसे बीते। विक्रम ने उसे एक महंगा फ्लैट दिलाया (जिसका किराया विक्रम ने बाद में काव्या के वेतन से काटने को कहा) और उसे पार्टियों में ले जाने लगा। लेकिन धीरे-धीरे काव्या को असलियत का आभास होने लगा। जिस "लीड डिजाइनर" की नौकरी का वादा किया गया था, वह दरअसल एक सहायक की नौकरी थी जहाँ उससे दिन-रात गधों की तरह काम करवाया जाता था। विक्रम ने काव्या के बनाए सारे बेहतरीन डिजाइनों को अपने नाम से रजिस्टर करवा लिया। जब काव्या ने विरोध किया, तो विक्रम का असली चेहरा सामने आया।

"तुम हो कौन यहाँ? बनारस की एक साधारण लड़की। मेरे बिना तुम्हारा इस शहर में कोई वजूद नहीं है," विक्रम ने हँसते हुए कहा था। उसने काव्या को न केवल नौकरी से निकलवा दिया बल्कि इंडस्ट्री में बदनाम भी कर दिया कि उसने डिजाइन चोरी किए हैं। काव्या टूट गई। वह जिस स्वाभिमान के साथ घर से निकली थी, वह अब तार-तार हो चुका था।

महीने बीतते गए। काव्या के पास जो थोड़ी बहुत जमा-पूँजी थी, वह खत्म हो गई। फ्लैट का किराया न दे पाने के कारण उसे एक चाल (chawl) में एक छोटे से कमरे में शरण लेनी पड़ी। शर्म के मारे उसने घर पर फोन करना बंद कर दिया था। उसे लगता था कि जिस पिता को उसने ठुकराया, वह अब उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। भूख और तनाव ने उसके शरीर को तोड़ दिया था। वह अक्सर बीमार रहने लगी। मुंबई की तेज बारिश जो उसे कभी रोमान्टिक लगती थी, अब उसकी छत से टपकते पानी के रूप में डरावनी लगने लगी थी।

एक रात, जब बुखार से उसका शरीर तप रहा था और जेब में एक रुपये का भी आसरा नहीं था, उसकी निगाह अपने पुराने फोन पर पड़ी। उसमें अनिकेत का नंबर आज भी सबसे ऊपर था। कांपते हाथों से उसने नंबर मिलाया।

"हेलो, अनिकेत?" काव्या की आवाज इतनी कमजोर थी कि पहचानना मुश्किल था।

"काव्या? तुम हो? कैसी हो तुम? इतने महीने से कोई खबर नहीं..." अनिकेत की आवाज में चिंता और राहत दोनों थी।

अनिकेत की अपनेपन भरी आवाज सुनते ही काव्या का सब्र का बांध टूट गया। वह फूट-फूट कर रोने लगी। शब्दों की जरूरत नहीं थी; उसका रोना ही उसकी पूरी कहानी कह रहा था। अनिकेत ने बस इतना कहा, "शांत हो जाओ। मुझे अपना पता भेजो। मैं आ रहा हूँ।"

अगले ही दिन अनिकेत मुंबई पहुँच गया। जब उसने काव्या की हालत देखी, तो उसका दिल दहल गया। वह काव्या जो कभी खिलखिलाती धूप जैसी थी, अब मुरझाए हुए पत्ते जैसी हो गई थी। आँखों के नीचे काले गड्ढे, बिखरे बाल और चेहरे पर गहरी उदासी। वह उसे तुरंत एक अच्छे अस्पताल ले गया। डॉक्टरों ने बताया कि यह केवल शारीरिक कमजोरी नहीं है, बल्कि वह गहरे अवसाद (depression) और कुपोषण का शिकार है।

अनिकेत ने दिन-रात एक कर उसकी सेवा की। वह उसे अपने हाथों से खाना खिलाता, दवाइयाँ देता और घंटों उसके पास बैठकर उसे बचपन की बातें सुनाता ताकि उसका मन बहल सके। जब काव्या थोड़ी ठीक हुई, तो उसने अनिकेत का हाथ पकड़कर कहा, "अनिकेत, अगर तुम न होते तो शायद मैं इस शहर की भीड़ में कहीं गुम हो जाती या मर जाती। मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया।"

अनिकेत ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ रखा, "दोस्ती में हिसाब-किताब नहीं होता काव्या। और गलतियाँ इंसान से ही होती हैं। गिरने में बुराई नहीं है, गिरकर वहीं पड़े रहने में बुराई है।"

"पर मैं अब कहाँ जाऊँ? पिताजी मुझे कभी माफ नहीं करेंगे। मैंने उनकी इज्जत मिट्टी में मिला दी," काव्या ने सिसकते हुए कहा।

"तुम्हें ऐसा लगता है," अनिकेत ने दृढ़ता से कहा। "माता-पिता का गुस्सा रेत पर लिखी लकीर जैसा होता है, हवा का एक झोंका उसे मिटा देता है। वे तुमसे नाराज हो सकते हैं, लेकिन तुमसे नफरत नहीं कर सकते। वे हर दिन तुम्हारा इंतजार करते हैं। चलो घर चलते हैं।"

वापसी का सफर काव्या के लिए बहुत भारी था। ट्रेन जैसे-जैसे बनारस के करीब पहुँच रही थी, उसके दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। क्या वे उसे अपनाएंगे? क्या समाज के ताने उसे जीने देंगे?

घर के दरवाजे पर पहुँचकर काव्या के कदम ठिठक गए। अनिकेत ने हिम्मत बंधाते हुए घंटी बजाई। दरवाजा काव्या की माँ, सुमित्रा जी ने खोला। सामने अपनी बेटी को इतनी कमजोर हालत में देखकर वह एक पल के लिए स्तब्ध रह गईं। उनका गुस्सा, उनकी शिकायतें—सब कुछ ममता के सैलाब में बह गया। वे दौड़कर काव्या से लिपट गईं और रोने लगीं। "कहाँ चली गई थी तू? हमें छोड़कर... तुझे पता है हमने ये दिन कैसे काटे हैं?"

शोर सुनकर दीनानाथ जी भी बाहर आए। काव्या को देखकर उनका चेहरा कठोर हो गया। काव्या उनके पैरों में गिर पड़ी। "बाबूजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं भटक गई थी। मुझे अपनी गलती की बहुत बड़ी सजा मिली है। अब मैं कभी आपको निराश नहीं करूँगी।"

दीनानाथ जी ने अपनी पत्नी की तरफ देखा और फिर काव्या की ओर। उनका शरीर कांप रहा था। उन्होंने मुँह फेर लिया और बोले, "माफी? किस बात की माफी? जो तुमने समाज में हमारी नाक कटवाई है उसकी? या उस भरोसे की जो तुमने एक पल में तोड़ दिया? लोग बातें बना रहे हैं कि हमारी बेटी भाग गई थी। अब कौन सा मूंह लेकर हम समाज में बैठेंगे?"

माहौल तनावपूर्ण हो गया। काव्या का रोना और तेज हो गया। तभी अनिकेत ने आगे बढ़कर दीनानाथ जी के कंधे पर हाथ रखा। "काका, समाज का काम है बोलना। लेकिन क्या समाज के डर से हम अपनी बेटी को खो देंगे? काव्या ने गलती की, उसने एक धोखेबाज पर भरोसा किया, लेकिन उसने कोई अपराध नहीं किया है। वह एक पीड़िता है, मुजरिम नहीं। उसे इस वक्त आपके सहारे की जरूरत है, आपके धिक्कार की नहीं।"

दीनानाथ जी ने अनिकेत की आँखों में देखा। वहां उन्हें एक ऐसी सच्चाई और दृढ़ता दिखाई दी जो शायद उनमें खुद कम पड़ रही थी। अनिकेत ने आगे कहा, "और जहाँ तक बात काव्या के भविष्य और समाज की है... तो मैं काव्या से विवाह करना चाहता हूँ। मुझे दुनिया की परवाह नहीं है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि काव्या का दिल सोने जैसा साफ है। उसे बस एक सही जौहरी की पहचान नहीं हो पाई थी।"

अनिकेत की यह बात सुनकर कमरे में सन्नाटा छा गया। काव्या ने आश्चर्य से अनिकेत की ओर देखा। वह जानती थी कि अनिकेत उसे पसंद करता है, लेकिन इस तरह सबके सामने, उसके सबसे बुरे दौर में उसे अपनाना—यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। यह सच्चा प्रेम था, जो बिना किसी शर्त के खड़ा था।

दीनानाथ जी की आँखों से भी आँसू छलक आए। उनका कठोर आवरण पिघल गया। उन्होंने झुककर काव्या को उठाया और गले लगा लिया। "तू वापस आ गई, मेरे लिए यही बहुत है। अनिकेत ठीक कहता है, दुनिया जाए भाड़ में। तू मेरी बेटी है और हमेशा रहेगी।" उन्होंने अनिकेत के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा, "बेटा, आज तुमने साबित कर दिया कि असली रिश्ता खून का नहीं, एहसास का होता है। तुमने न सिर्फ मेरी बेटी को बचाया, बल्कि मेरे घर की खुशियाँ भी लौटा दीं।"

धीरे-धीरे समय बीतता गया। काव्या ने खुद को फिर से समेटा। अनिकेत की मदद से उसने बनारस में ही अपना एक छोटा सा बुटीक खोला। इस बार उसकी नींव झूठ पर नहीं, बल्कि मेहनत और परिवार के आशीर्वाद पर टिकी थी। अनिकेत ने अपने कपड़े के व्यापार को काव्या के डिजाइनिंग कौशल के साथ जोड़ दिया। दोनों ने मिलकर एक नया ब्रांड शुरू किया—'उम्मीद'।

विक्रम की झूठी दुनिया काव्या के लिए एक बुरा सपना बनकर रह गई थी, जिससे वह जाग चुकी थी। काव्या के काम की चर्चा धीरे-धीरे शहर में होने लगी। उसकी मेहनत रंग लाई और उसे स्थानीय स्तर पर बहुत सम्मान मिलने लगा। जिन लोगों ने उसके भागने पर ताने मारे थे, अब वे ही उसकी सफलता की मिसाल देने लगे थे।

एक शुभ दिन, दोनों परिवारों की रजामंदी से काव्या और अनिकेत का विवाह संपन्न हुआ। मंडप में बैठी काव्या ने जब अनिकेत की ओर देखा, तो उसे महसूस हुआ कि असली हीरो वह नहीं होता जो बड़े-बड़े वादे करता है या जिसके पास चमक-धमक होती है। असली हीरो वह होता है जो तब आपके साथ खड़ा रहता है जब आपकी अपनी परछाई भी साथ छोड़ देती है।

विदाई के समय काव्या ने अपने पिता से कहा, "बाबूजी, मैं बनारस छोड़कर कहीं नहीं जा रही। मेरी दुनिया यहीं है, आप लोगों के पास।" दीनानाथ जी ने गर्व से अपनी बेटी और दामाद को आशीर्वाद दिया। काव्या ने अनिकेत का हाथ थाम लिया, एक ऐसे सफर के लिए जहाँ रास्ता चाहे कैसा भी हो, हमसफर भरोसेमंद था। उसने सीखा कि जीवन में एक बार रास्ता भटकने का मतलब यह नहीं कि यात्रा समाप्त हो गई; बस सही मार्गदर्शक की जरूरत होती है जो आपको वापस घर ला सके। और काव्या के लिए वह मार्गदर्शक, वह प्रेमी, वह मित्र—सब कुछ अनिकेत ही था।

इस तरह, एक गलती ने काव्या को जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया और उसे उस प्रेम से मिलवाया जो शायद सामान्य परिस्थितियों में उसे कभी दिखाई ही नहीं देता। घर की दहलीज लांघकर गई काव्या जब लौटी, तो वह एक बेटी के साथ-साथ एक परिपक्व महिला भी बन चुकी थी, जिसने खोकर पाने का असली मतलब समझ लिया था।


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  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...