"हरीश जी, आप ज़रा हटेंगे? मुझे पोछा लगाने दीजिये।" विमला देवी ने झुंझलाते हुए कहा।
हरीश बाबू अखबार को आँखों के सामने से हटाते हुए बोले, "अरे तो लगा लो न! मैं कहाँ मना कर रहा हूँ। बस यह कह रहा था कि तुम फिनाइल थोड़ा ज़्यादा डाला करो। आजकल कीटाणु बहुत हो गए हैं। और हाँ, उस कोने में ठीक से कपड़ा नहीं लगता तुम्हारा।"
विमला देवी ने एक गहरी सांस ली और बिना कुछ कहे बाल्टी खिसकाकर दूसरे कमरे में चली गईं।
हरीश बाबू का हाल ही में बैंक के मैनेजर पद से रिटायरमेंट हुआ था। चालीस साल तक उन्होंने बैंक की एक बड़ी शाखा को अपनी उंगलियों पर नचाया था। फाइलों का अंबार, कर्मचारियों की हड़तालें, और ग्राहकों की शिकायतों को चुटकियों में सुलझाना—उन्हें लगता था कि 'प्रबंधन' यानी मैनेजमेंट के वह बेताज बादशाह हैं। रिटायरमेंट के बाद उन्हें लगा कि अब घर को भी उसी 'एफिशिएंसी' (efficiency) या कुशलता से चलाने की ज़रूरत है, जैसे वह बैंक चलाते थे।
दिक्कत यह थी कि विमला देवी पिछले पैंतीस सालों से इस घर की अघोषित सी.ई.ओ. थीं। उनकी अपनी एक व्यवस्था थी, अपना एक तरीका था। लेकिन पिछले दो महीनों से, जब से हरीश बाबू घर पर बैठने लगे थे, विमला की सुव्यवस्थित दुनिया में भूचाल आ गया था।
"सब्ज़ी में नमक ज़्यादा है," कभी यह टिप्पणी आती।
"तुम कपड़े धोने वाली मशीन में साबुन बहुत बर्बाद करती हो," कभी यह निर्देश मिलता।
"बिजली का बिल देखो! दिन भर पंखे चलते रहते हैं," कभी यह शिकायत होती।
विमला देवी चुपचाप सुन लेतीं। वह जानती थीं कि हरीश बाबू की आदत है हर चीज़ पर नियंत्रण रखने की। उनकी कुर्सी छिन गई थी, तो अब वह घर को ही अपना दफ्तर बनाने की कोशिश कर रहे थे।
एक दिन शाम को विमला देवी के फ़ोन की घंटी बजी। फ़ोन उनकी छोटी बहन, सरिता का था, जो दूसरे शहर में रहती थी। बात करते-करते विमला के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।
फ़ोन रखने के बाद वह हरीश बाबू के पास आईं। "सुनिए, मुझे कल सुबह ही इंदौर जाना होगा। सरिता की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। जीजाजी अकेले परेशान हो रहे हैं। डॉक्टर ने ऑपरेशन बताया है, तो मुझे वहां एक हफ्ता रुकना पड़ सकता है।"
हरीश बाबू ने टीवी से नज़र हटाई। "एक हफ्ता? अरे, तो यहाँ मेरा क्या होगा?"
"खाना मैं बनाकर फ्रिज में रख दूंगी," विमला ने कहा। "सुबह बाई आती है, वह झाड़ू-पोछा और बर्तन कर देगी। कपड़े आप मशीन में डाल ही सकते हैं। और शाम की चाय... वो तो आप बना ही लेते हैं।"
हरीश बाबू ने एक बेफिक्र हंसी हंसी। "अरे भाग्यवान, तुम मेरी चिंता मत करो। मैंने चालीस लोगों का स्टाफ संभाला है। यह चार कमरों का घर क्या चीज़ है? तुम जाओ, अपनी बहन को देखो। यहाँ सब 'फर्स्ट क्लास' चलेगा। बल्कि मैं तुम्हें दिखाऊंगा कि घर को और बेहतर तरीके से कैसे चलाया जा सकता है।"
विमला देवी ने एक फीकी मुस्कान दी। उन्हें पता था कि 'मैनेजर साहब' का सामना हकीकत से होने वाला है।
अगली सुबह विमला टैक्सी से निकल गईं। हरीश बाबू ने बड़े उत्साह से दिन की शुरुआत की। उन्होंने सोचा, "आज मैं अपने हिसाब से घर चलाऊंगा। एकदम सिस्टमैटिक।"
सबसे पहले वह रसोई में गए। चाय बनानी थी। उन्होंने पतीला चढ़ाया। दूध डाला। तभी डोरबेल बजी। दूधवाला आया था। उससे दूध लेने में और हिसाब करने में पांच मिनट लग गए। जब वापस लौटे, तो रसोई में दूध का उफान आ चुका था और पूरा दूध गैस स्टोव पर फैलकर जल रहा था। जलने की बदबू से पूरी रसोई भर गई।
"उफ्फ! यह विमला भी न, कभी दूध वाले का टाइम फिक्स नहीं करती," उन्होंने अपनी गलती का ठीकरा पत्नी पर फोड़ा और कपड़े से स्लैब साफ़ करने लगे। दूध चिपक गया था। उसे साफ़ करने में पंद्रह मिनट लगे और हाथ काले हो गए सो अलग।
खैर, चाय बनी, लेकिन उसमें अदरक कूटना भूल गए। बिना अदरक की फीकी चाय पीकर उन्होंने अखबार उठाया।
नौ बजे कामवाली बाई, शांति आई।
"साहब, आज मेमसाब नहीं हैं क्या?" शांति ने पूछा।
"नहीं, वह बाहर गई हैं। तुम अपना काम करो। और सुनो, आज कोने-कोने में झाड़ू लगाना। सोफे के नीचे धूल रह जाती है।"
शांति, जो विमला देवी की मीठी बातों की आदी थी, हरीश बाबू का यह रौबदार लहज़ा बर्दाश्त नहीं कर पाई। उसने बेमन से झाड़ू लगाई और जब हरीश बाबू ने उसे बर्तन धोने के तरीके पर टोका—"अरे, इतना विम बार क्यों घिस रही हो?"—तो शांति ने बर्तन पटक दिए।
"साहब, मुझे नहीं करना काम। आप ही धो लो अपने तरीके से। मैं कल नहीं आऊंगी।" शांति पैर पटकती हुई चली गई।
हरीश बाबू हक्के-बक्के रह गए। "अरे... अरे सुनो तो!" लेकिन वह जा चुकी थी।
दोपहर होते-होते घर की हालत किसी युद्ध के मैदान जैसी हो गई थी। सिंक में गंदे बर्तन पड़े थे। फर्श पर धूल थी। हरीश बाबू ने फ्रिज खोला तो देखा कि विमला ने दाल और सब्ज़ी बनाकर रखी थी। उन्होंने उसे गर्म करने के लिए माइक्रोवेव में रखा, लेकिन प्लास्टिक का ढक्कन हटाना भूल गए। ढक्कन पिघल गया और खाना बर्बाद हो गया।
भूख से पेट में चूहे दौड़ रहे थे। उन्होंने ब्रेड और जैम खाकर काम चलाया।
शाम हुई। घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। यह वो समय था जब विमला और वो बालकनी में बैठते थे। विमला चाय लाती थी और दिन भर की बातें बताती थी—किस पड़ोसन के घर क्या हुआ, सब्ज़ी महंगी हो गई है, या पुराने ज़माने के किस्से। हरीश बाबू अक्सर उन बातों को "बकवास" कहकर अनसुना कर देते थे।
लेकिन आज, वह "बकवास" सुनने के लिए उनके कान तरस रहे थे। सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े जैसी लग रही थी। उन्होंने टीवी चलाया, लेकिन न्यूज़ एंकर की आवाज़ में वो अपनापन नहीं था।
तीसरे दिन तक हरीश बाबू का आत्मविश्वास चकनाचूर हो चुका था। उन्हें अपना बी.पी. (रक्तचाप) की गोली नहीं मिल रही थी। विमला हमेशा नाश्ते की टेबल पर डिब्बी रख देती थीं। आज उन्हें पूरा घर छानना पड़ा। तब जाकर याद आया कि विमला ने कहा था—"दवाइयां अलमारी के दूसरे रैक में हैं।"
उन्हें एहसास हुआ कि बैंक में फाइलें ढूंढना आसान था, क्योंकि वहां क्लर्क होते थे। यहाँ वह अकेले थे।
उस रात उन्हें नींद नहीं आई। वह करवटें बदलते रहे। उन्हें विमला की बहुत याद आ रही थी। खाने की नहीं, चाय की नहीं, बल्कि उनकी 'मौजूदगी' की। उन्हें समझ आया कि विमला सिर्फ घर का काम नहीं करती थीं, वह इस ईंट-पत्थर के मकान को अपनी ऊर्जा से 'घर' बनाकर रखती थीं। उनका वह टोकना, "नहाने के बाद तौलिया बिस्तर पर मत फेंका करो," जो उन्हें बुरा लगता था, आज उसी आवाज़ को सुनने के लिए वह बेचैन थे।
उन्होंने सोचा, "मैं कितना अहंकारी था। मुझे लगता था कि पैसे कमाना और दफ्तर चलाना ही असली काम है। घर संभालना तो बस... वक्त काटना है। लेकिन यह तो चौबीस घंटे की नौकरी है, बिना छुट्टी, बिना सैलरी और बिना प्रमोशन की।"
छठे दिन, हरीश बाबू ने पूरा दिन घर की सफाई में बिताया। वह नहीं चाहते थे कि विमला आए और घर को कबाड़खाना देखे। उन्होंने बर्तन धोए (भले ही ठीक से साफ़ नहीं हुए), चादर बदली, और बाज़ार से विमला के पसंदीदा गेंदे के फूल लाए और फूलदान में सजाए।
सातवें दिन सुबह विमला की टैक्सी गेट पर रुकी।
विमला अंदर आईं। वह थकी हुई लग रही थीं। उन्होंने सोचा था कि घर बिखरा पड़ा होगा, हरीश बाबू गुस्से में होंगे और शिकायतों का पिटारा खोल देंगे।
लेकिन जैसे ही वह ड्राइंग रूम में दाखिल हुईं, वह हैरान रह गईं। सब कुछ अपनी जगह पर था (कमोबेश)। टेबल पर ताज़े फूल थे।
हरीश बाबू रसोई से ट्रे लेकर निकले। "अरे, तुम आ गई? हाथ-मुंह धो लो, मैं चाय लेकर आता हूँ।"
विमला ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और अविश्वास से पूछा, "आपने चाय बनाई? शांति नहीं आई क्या?"
हरीश बाबू ने ट्रे मेज़ पर रखी और विमला के पास सोफे पर बैठ गए।
"शांति तो पहले दिन ही 'इस्तीफा' देकर चली गई थी," हरीश बाबू ने लजाते हुए कहा। "यह चाय मैंने बनाई है। अदरक वाली। और हाँ... इसमें चीनी थोड़ी कम है, जैसे तुम्हें पसंद है।"
विमला ने चाय का घूंट भरा। चाय थोड़ी ज़्यादा उबल गई थी, थोड़ी कड़वी थी। लेकिन विमला को वह दुनिया की सबसे मीठी चाय लगी।
"सब ठीक तो रहा न?" विमला ने पूछा।
हरीश बाबू ने विमला का हाथ अपने हाथों में लिया। उनकी आँखों में अब वह 'मैनेजर' वाला अहंकार नहीं था, बल्कि एक साथी वाला सम्मान था।
"विमला," हरीश बाबू का गला थोड़ा भर आया। "मैंने चालीस साल बैंक में बैलेंस शीट मिलाई, लेकिन ज़िन्दगी की बैलेंस शीट में मैं बहुत घाटे में रहा। मुझे लगता था कि मैं घर का 'इंजन' हूँ और तुम बस 'डिब्बा' हो। लेकिन पिछले सात दिनों में मुझे समझ आ गया कि तुम इंजन हो, और मैं तो बस मज़े से सफ़र कर रहा था।"
विमला की आँखों में नमी आ गई। पैंतीस सालों में पहली बार हरीश बाबू ने उनके काम को, उनके अस्तित्व को इस तरह सराहा था।
"इतनी बड़ी-बड़ी बातें मत कीजिये," विमला ने मुस्कुराते हुए अपनी आँखें पोंछीं। "घर हम दोनों से है। आप बाहर की धूप रोकते थे, तभी तो मैं अंदर छांव रख पाती थी।"
"नहीं," हरीश बाबू ने सिर हिलाया। "अब से मैं सिर्फ़ धूप नहीं रोकूंगा। अब से हम दोनों मिलकर छांव बनाएंगे। कल से सब्ज़ी काटने में मैं तुम्हारी मदद करूँगा। और हाँ, उस शांति को मैं मना कर लाऊंगा, मेरी वजह से ही भागी है बेचारी।"
विमला हंस पड़ीं। उस हंसी से घर का सन्नाटा टूट गया। दीवारों पर लगी तस्वीरें भी जैसे मुस्कुरा उठीं।
उस शाम, बालकनी में बैठकर दोनों चाय पी रहे थे। हरीश बाबू ने टोका नहीं कि "चाय में इलायची कम है" या "सड़क पर शोर ज़्यादा है।" वह बस चुपचाप विमला की बातें सुन रहे थे—कि इंदौर में सरिता कैसी है, अस्पताल में क्या हुआ, और रास्ते में टैक्सी वाले ने क्या कहा।
रिटायरमेंट के बाद हरीश बाबू को एक नई नौकरी मिल गई थी—एक 'पति' होने की नौकरी, जिसमें कोई रिटायरमेंट नहीं था, लेकिन जिसमें 'बोनस' के रूप में ढेर सारा प्यार और सुकून मिलता था।
जीवन की सांझ में ही सही, उन्हें समझ आ गया था कि साथ रहने का मतलब सिर्फ़ एक छत के नीचे रहना नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे के श्रम और समर्पण को महसूस करना होता है। और कभी-कभी, किसी की अहमियत समझने के लिए उसकी थोड़ी सी अनुपस्थिति किसी भी मैनेजमेंट की डिग्री से बड़ी गुरु साबित होती है।
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