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सुबह के दस बज रहे थे, लेकिन 'गुप्ता हार्डवेयर एंड सैनिटरी' की दुकान का शटर अभी आधा ही उठा था। दुकान के गल्ले पर बैठे पैंतीस वर्षीय राघव के माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। वह सुबह सात बजे से गोदाम में माल चेक कर रहा था। ग्राहकों की भीड़ लगनी शुरू हो गई थी, लेकिन काउंटर संभालने वाला दूसरा व्यक्ति नदारद था।

"भैया, ये नल की टोंटी दिखा देना जरा," एक ग्राहक ने आवाज़ लगाई।

"जी, अभी देता हूँ," राघव ने मुड़ते हुए कहा और खुद ही सीढ़ी लगाकर ऊपर के रैक से सामान उतारने लगा।

ठीक ग्यारह बजे, एक चमचमाती बुलेट दुकान के सामने आकर रुकी। उस पर से राघव का छोटा भाई, समीर उतरा। आँखों पर काला चश्मा, बालों में जेल और कानों में एयरपॉड्स। वह शान से दुकान में दाखिल हुआ।

"और भैया, क्या हाल है? बहुत गर्मी है यार आज," समीर ने एसी के सामने खड़े होकर हवा खाते हुए कहा।

राघव ने सीढ़ी से उतरते हुए संयम बनाए रखा। "समीर, तीन बड़े ऑर्डर पेंडिंग हैं। शर्मा जी का माल भिजवाना था, मैंने तुझे कल रात कहा था कि सुबह जल्दी आकर टेम्पो लोड करवा देना। अभी तक कुछ नहीं हुआ।"

समीर ने लापरवाही से हाथ हिलाया। "अरे भैया, रिलैक्स। हो जाएगा। अभी तो दिन शुरू हुआ है। मैं रात को पार्टी में लेट हो गया था, नींद नहीं खुली। और वैसे भी, मुनीम जी हैं तो सही, वो देख लेंगे।"

यह समीर की रोज़ की कहानी थी। पिता दीनानाथ जी ने यह दुकान अपनी मेहनत से खड़ी की थी। राघव ने पढ़ाई पूरी करते ही पिता का हाथ बंटाना शुरू कर दिया था और पिछले दस सालों में व्यापार को दोगुना कर दिया था। लेकिन समीर, जो राघव से पांच साल छोटा था, उसे ज़िम्मेदारी का क ख ग भी नहीं पता था।

दोपहर को खाने के समय, जब पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर बैठा, तो राघव की पत्नी, अंजलि से रहा नहीं गया।

"बाबूजी," अंजलि ने रोटी परोसते हुए कहा, "राघव की तबीयत ठीक नहीं चल रही है। डॉक्टर ने उन्हें आराम और कम तनाव की सलाह दी है। लेकिन दुकान का पूरा भार उन्हीं पर है। समीर भैया तो लंच टाइम पर दुकान पहुँचते हैं और शाम को दोस्तों के साथ निकल जाते हैं। ऐसे कैसे चलेगा?"

दीनानाथ जी ने खाने से नज़र हटाई और अंजलि को देखा। "बहू, समीर अभी बच्चा है। उसे दुनियादारी की इतनी समझ नहीं है। और राघव तो है ही समझदार, उसे काम करने की आदत है। समीर को मैंने ही कहा था कि तू अपनी जवानी जी ले, बाद में तो काम ही करना है।"

"बाबूजी, वो पच्चीस साल का 'बच्चा' है," राघव ने कड़वाहट से कहा। "मैं जब बीस का था, तब से गल्ले पर बैठ रहा हूँ। आज महीने की पंद्रह तारीख है, सप्लायर्स को पेमेंट करनी है, जीएसटी का हिसाब देखना है। समीर को गल्ले से पैसे निकालने के अलावा और कुछ नहीं आता। कल उसने गल्ले से पांच हज़ार निकाले, मैंने पूछा तो बोला दोस्तों को पार्टी देनी थी। हिसाब कौन रखेगा?"

दीनानाथ जी का चेहरा लाल हो गया। "तो क्या हुआ? अपनी दुकान से पैसे नहीं लेगा तो क्या भीख मांगेगा? तू बड़े भाई होकर ऐसी बातें करता है? वो तेरा छोटा भाई है। अगर वो थोड़ा मौज-मस्ती कर रहा है, तो तुझे खुश होना चाहिए। सारा काम तू ही तो संभालता है, दुकान तेरे नाम ही तो होगी बाद में। उसे तो बस साथ में लगा रखा है।"

"बाबूजी, दुकान नाम होने की बात नहीं है," अंजलि ने बीच में कहा। "बात ज़िम्मेदारी की है। राघव जी अकेले खटते हैं। कल को अगर ये बीमार पड़ गए या हमें कहीं बाहर जाना पड़ा, तो क्या समीर भैया दुकान संभाल पाएंगे? उन्हें तो रेट लिस्ट तक नहीं पता।"

"तुम चुप रहो बहू," दीनानाथ जी ने डांट दिया। "भाइयों के बीच दरार डालने की कोशिश मत करो। मेरा समीर कोई नालायक नहीं है। वक़्त आने पर सब कर लेगा। तुम लोग बस उसे दबाने की कोशिश करते हो।"

राघव ने खाना बीच में ही छोड़ दिया और उठ गया। उसे समझ आ गया कि पिता के स्नेह ने समीर की आँखों पर पट्टी बांध रखी है और पैरों में बेड़ियाँ डाल दी हैं—आलस्य की बेड़ियाँ।

रात को राघव और अंजलि अपने कमरे में बहुत देर तक जागते रहे।

"अंजलि, बाबूजी नहीं मानेंगे। उन्हें लगता है मैं समीर से जलता हूँ," राघव ने हताशा में कहा।

"राघव, अगर आप ऐसे ही सब संभालते रहे, तो समीर भैया कभी नहीं सीखेंगे। जब तक इंसान को तैरना नहीं पड़ता, वो हाथ-पैर नहीं मारता। आपको उन्हें पानी में धक्का देना ही होगा," अंजलि ने सुझाया।

"मतलब? अलग हो जाऊं?"

"नहीं, अलग होने से घर टूट जाएगा और बाबूजी जीते-जी मर जाएंगे। हमें तरीका बदलना होगा। 'अनुपस्थिति' सबसे बड़ा सबक होती है," अंजलि की आँखों में एक योजना थी।

दो दिन बाद, राघव ने घर में घोषणा की। "बाबूजी, मुझे और अंजलि को पंद्रह दिनों के लिए तीर्थ यात्रा पर जाना है। बहुत समय से अंजलि के माता-पिता वैष्णो देवी जाने की कह रहे थे। हमने टिकट बुक करा ली हैं।"

दीनानाथ जी चौंक गए। "पंद्रह दिन? दुकान कौन देखेगा? मुनीम जी अकेले कैसे संभालेंगे?"

"समीर है न बाबूजी," राघव ने इत्मीनान से कहा। "आपने ही कहा था कि वक़्त आने पर वो सब संभाल लेगा। इससे अच्छा वक़्त क्या होगा? सीजन का समय है, गल्ला भी अच्छा होगा। समीर को मौका दीजिये, वो साबित कर देगा।"

समीर के हाथ से मोबाइल छूटते-छूटते बचा। "भैया, मैं? पंद्रह दिन? अकेले?"

"हाँ समीर," राघव ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "तुझे बस गल्ले पर बैठना है और ऑर्डर्स देखने हैं। बाबूजी का आशीर्वाद तेरे साथ है।"

दीनानाथ जी कुछ कह नहीं पाए। उन्होंने ही हमेशा समीर की तरफदारी की थी, अब अगर वो मना करते तो साबित हो जाता कि उन्हें भी समीर पर भरोसा नहीं है।

राघव और अंजलि के जाने के बाद पहले दो दिन तो समीर ने जैसे-तैसे काट लिए। वह दुकान पर गया, लेकिन एसी चलाकर मोबाइल में लगा रहा। मुनीम जी ने पुराना स्टॉक मैनेज कर लिया।

असली मुसीबत तीसरे दिन शुरू हुई। सीमेंट की एक बड़ी खेप आई जिसे उतारना था और पेमेंट कैश में करनी थी। समीर ने गल्ला खोला तो देखा कि कैश कम है। उसे याद ही नहीं था कि कल उसने दोस्तों के साथ लंच के लिए गल्ले से पैसे निकाले थे और उसका हिसाब नहीं लिखा था।

ट्रक ड्राइवर चिल्लाने लगा, "साहब, माल उतारना है, पेमेंट दो नहीं तो वापस ले जाऊंगा।"

समीर ने हड़बड़ाहट में मुनीम जी को देखा। मुनीम जी ने हाथ खड़े कर दिए, "छोटे मालिक, बड़े मालिक (राघव) होते तो बैंक से इंतजाम करके रखते। मुझे क्या पता?"

समीर को अपनी पॉकेट मनी से और क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करनी पड़ी। उसका पसीना छूट गया।

अगले दिन, एक पुराने ग्राहक आए, गुप्ता जी। "समीर बेटा, वो दस पेटी पेंट और पुट्टी भिजवा दो। रेट वही पुराना लगाना जो राघव लगाता था।"

समीर को पुराना रेट पता ही नहीं था। उसने अंदाज़े से रेट बताया जो मार्किट रेट से ज़्यादा था।

गुप्ता जी भड़क गए। "क्या बात करते हो? बीस साल से तुम्हारे यहाँ से माल ले रहे हैं और तुम हमें लूट रहे हो? नहीं चाहिए माल।"

गुप्ता जी चले गए। दीनानाथ जी घर पर बैठे-बैठे यह सब सुन रहे थे, क्योंकि मुनीम जी ने उन्हें फोन पर बता दिया था।

शाम को घर लौटने पर दीनानाथ जी ने समीर से पूछा, "आज गल्ला कितना हुआ?"

समीर झुंझलाया हुआ था। "पापा, क्या गल्ला? आज तो नुकसान हो गया। वो गुप्ता अंकल चिल्लाकर चले गए। ये लेबर वाले सिर पर चढ़े हैं। भैया कैसे करते हैं ये सब? मेरा तो दिमाग फट रहा है।"

"तो अब तुझे पता चला कि तेरा भाई एसी में हवा नहीं खाता, खून पसीना जलाता है?" दीनानाथ जी ने पहली बार कड़े स्वर में कहा।

अगले एक हफ्ते में समीर की हालत पतली हो गई। उसे सुबह 6 बजे उठना पड़ता क्योंकि माल आने वाला होता था। दोस्तों के फोन आने बंद हो गए क्योंकि समीर के पास अब पार्टी के लिए टाइम नहीं था। वह रात को 10 बजे घर घुसता, और बिना खाना खाए सो जाता।

दसवें दिन दुकान पर एक गड़बड़ हो गई। समीर ने ग़लत नाप का पाइप ऑर्डर कर दिया। क्लाइंट दुकान पर आकर हंगामा करने लगा। "मेरा पूरा प्रोजेक्ट रुक गया तुम्हारी वजह से। मुझे अभी हर्जाना चाहिए!"

समीर की आँखों में आंसू आ गए। उसे अपनी बेबसी महसूस हो रही थी। उसे याद आया कि कैसे राघव ऐसी स्थितियों को अपनी मीठी बोली और सूझबूझ से संभाल लेता था। उसने हाथ जोड़कर क्लाइंट से माफ़ी मांगी और अपनी जेब से नुकसान भरा।

उस रात समीर दीनानाथ जी के पास बैठा। वह रो रहा था।

"पापा, मुझे माफ़ कर दो। मैं नालायक हूँ। भैया सही कहते थे, मैं सिर्फ 'पैरासाइट' (परजीवी) बनकर जी रहा था। दुकान चलाना बच्चों का खेल नहीं है। मैंने भैया की मेहनत की कभी इज़्ज़त नहीं की।"

दीनानाथ जी ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा। "बेटा, गलती मेरी है। मैंने तेरे मोह में तुझे अपाहिज बना दिया था। राघव ने सही किया जो तुझे इस आग में तपने के लिए छोड़ गया। सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है।"

पंद्रह दिन बाद जब राघव और अंजलि वापस लौटे, तो उन्हें दुकान पर एक अलग ही नज़ारा दिखा।

समीर काउंटर पर खड़ा था, लेकिन उसके कान में एयरपॉड्स नहीं थे। वह एक ग्राहक को समझा रहा था और साथ-साथ डायरी में नोट कर रहा था। दुकान साफ़-सुथरी थी।

राघव को देखते ही समीर दौड़कर आया और उसके गले लग गया।

"भैया! आप आ गए। कसम से, अब मैं आपको कभी जाने नहीं दूंगा," समीर की आवाज़ भारी थी।

"क्यों? क्या हुआ? दुकान डुबो दी क्या?" राघव ने मज़ाक में पूछा।

"नहीं भैया," समीर ने डायरी आगे बढ़ाई। "ये रहा पंद्रह दिन का हिसाब। थोड़ा ऊंच-नीच हुआ है, गुप्ता जी नाराज़ हो गए थे पर मैंने बाद में घर जाकर उन्हें मना लिया। और हाँ, मैंने गल्ले से एक रुपया नहीं निकाला अपने खर्चे के लिए। मुनीम जी गवाह हैं।"

राघव ने डायरी देखी। हिसाब-किताब में गलतियाँ थीं, लेकिन कोशिश ईमानदार थी। उसने दीनानाथ जी की तरफ देखा। बाबूजी मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।

घर पहुँचकर समीर ने सबके सामने कहा, "भाभी, भैया, आज से मुझे पॉकेट मनी या गल्ले का एक्सेस नहीं चाहिए। मुनीम जी से कह दीजिये, मेरी भी तनख्वाह तय कर दें। मैं काम करूँगा, और जो कमाऊंगा उसी में खर्चा चलाऊंगा। मैं अब भैया का बोझ नहीं, उनका दाहिना हाथ बनना चाहता हूँ।"

राघव ने समीर को गले लगा लिया। "पगार तो मिलेगी, पर पहले ये बता, आज ऑर्डर किसका डिस्पैच करना है?"

"शर्मा जी का," समीर ने तपाक से जवाब दिया। "गाड़ी लोड हो चुकी है।"

उस दिन के बाद 'गुप्ता हार्डवेयर' में दो मालिक बैठते थे। एक जो अनुभव से काम करता था, और दूसरा जो नई ऊर्जा और सीखी हुई ठोकरों से काम करता था। अंजलि की एक छोटी सी योजना ने न सिर्फ़ एक भाई को ज़िम्मेदार बना दिया था, बल्कि एक पिता को भी यह समझा दिया था कि सच्चा प्यार सुरक्षा देने में नहीं, बल्कि सक्षम बनाने में है।


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