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 रवि ने जैसे ही फ्लैट की घंटी बजाई, अंदर से आती बर्तनों के पटकने की आवाज़ ने उसे सचेत कर दिया। यह कोई नई बात नहीं थी। पिछले छह महीनों से, जब से उसकी माँ, गायत्री देवी, गाँव वाला पुश्तैनी मकान बेचकर उनके साथ शहर रहने आई थीं, घर का माहौल किसी कुरुक्षेत्र से कम नहीं था।

रवि ने थके हुए कदमों से दरवाज़ा खोला। सामने का नज़ारा वही था जिसका उसे डर था। सोफे पर उसकी पत्नी, सुमन, पैर पर पैर चढ़ाए बैठी थी, और उसकी आँखों में अंगारे दहक रहे थे। पास ही डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर गायत्री देवी सिर झुकाए बैठी थीं, उनकी आँखों से बहते आंसू उनकी झुर्रियों में समा रहे थे।

"मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती रवि!" सुमन ने रवि को देखते ही चीखना शुरू कर दिया। "फैसला आज ही होगा। या तो तुम्हारी माँ इस घर में रहेंगी या मैं। मुझे अपनी ज़िंदगी में दखलंदाज़ी पसंद नहीं है। मेरा अपना स्पेस है, मेरी अपनी आज़ादी है। हर वक़्त की खांसने की आवाज़, हर बात पर टोका-टाकी... उफ़! मेरा दम घुटने लगा है इस घर में।"

रवि ने अपना लैपटॉप बैग सोफे पर रखा और पानी की बोतल उठाई। उसने माँ की ओर देखा। गायत्री देवी ने नज़रे नहीं उठाईं। वे जानती थीं कि बेटा दिन भर ऑफिस में खटकर आया है, उसे और तनाव देना ठीक नहीं।

"सुमन, प्लीज़," रवि ने ठंडे स्वर में कहा। "माँ ने क्या किया है? वो तो अपने कमरे से बाहर भी नहीं निकलतीं। तुम क्यों छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाती हो?"

"बतंगड़?" सुमन तमतमा उठी। "तुम्हें तो सब छोटी बात ही लगती है। आज मेरी किटी पार्टी थी। मेरी सहेलियाँ आई थीं। और माताजी पुराने ज़माने की साड़ी पहनकर ड्राइंग रूम में आ गईं और सबको ज्ञान देने लगीं कि पैसे कैसे बचाने चाहिए। मेरी नाक कट गई रवि! मेरी सहेलियाँ हंस रही थीं कि सुमन, तू तो बड़ी मॉडर्न बनती थी, तेरा घर तो अस्सी के दशक का म्यूज़ियम है।"

"तो इसमें माँ की क्या गलती है? वो बुजुर्ग हैं, उन्हें हमारे तौर-तरीके समझ नहीं आते," रवि ने समझाने की कोशिश की।

"बस! मुझे कोई सफाई नहीं सुननी," सुमन ने अल्टीमेटम दे दिया। "मेरे पास एक ही रास्ता है। शहर के बाहर जो 'सुकून निकेतन' है, वहां इनकी बात करो। वहां इनकी उम्र के लोग मिलेंगे, भजन-कीर्तन करें, खुश रहें। यहाँ मेरे सिर पर तांडव न करें। अगले हफ़्ते तक इनका इंतज़ाम करो, वरना मैं अपने मायके चली जाऊंगी।"

सुमन पैर पटकते हुए बेडरूम में चली गई और दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर लिया। ड्राइंग रूम में एक भारी सन्नाटा पसर गया।

रवि घुटनों के बल माँ के पास बैठ गया। "माँ... तुम चिंता मत करो। सुमन गुस्से में है, शांत हो जाएगी।"

गायत्री देवी ने अपने कांपते हाथ बेटे के सिर पर रखे। "रवि, बेटा... बहु गलत नहीं कह रही। नए ज़माने के बच्चे हैं, उन्हें अपनी तरह से जीने का हक़ है। मैं शायद सच में 'फिट' नहीं हो पा रही हूँ। तू मेरे लिए अपनी गृहस्थी मत जला।"

"नहीं माँ," रवि ने माँ के हाथ चूम लिए। "तुमने पिताजी के जाने के बाद अकेले खेतों में काम करके मुझे इंजीनियर बनाया है। अपने गहने बेचकर मेरी नौकरी की घूस दी थी। आज जब मेरे पास सब कुछ है, तो क्या मैं तुम्हें बेसहारा छोड़ दूँ? यह नहीं होगा।"

रवि ने उस रात सुमन को बहुत समझाया, लेकिन सुमन अपनी ज़िद पर अड़ी रही। रवि के लिए यह धर्मसंकट था। एक तरफ वो माँ जिसने उसे जीवन दिया, और दूसरी तरफ वो पत्नी जिसके साथ उसे जीवन बिताना था।

दो दिन बाद, रवि को कंपनी की तरफ से एक अर्जेंट प्रोजेक्ट के लिए पंद्रह दिनों के लिए सिंगापुर जाना पड़ा। जाने से पहले उसने सुमन को हिदायत दी थी, "सुमन, मैं वापस आकर कोई बीच का रास्ता निकालूँगा। तब तक प्लीज़ घर में शांति रखना। माँ को कुछ मत कहना।"

सुमन ने ऊपर मन से हाँ कह दी थी, लेकिन उसके दिमाग में योजना तैयार थी। यह पंद्रह दिन उसके लिए आज़ादी का परमिट थे।

रवि के फ्लाइट पकड़ते ही अगले दिन सुमन ने अपनी चाल चली। सुबह-सुबह उसने गायत्री देवी के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। उसके हाथ में चाय थी और चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान।

"माँजी, चाय," सुमन ने नरमी से कहा। गायत्री देवी हैरान रह गईं। सुमन ने कभी उन्हें सीधे मुंह चाय नहीं दी थी।

"माँजी, मैंने सोचा रवि सही कहते हैं। हम लड़कर क्यों रहें? अच्छा, एक बात बतानी थी। मेरी मौसी का एक बहुत बड़ा आश्रम है ऋषिकेश में। वहां आजकल बहुत बड़ा यज्ञ चल रहा है। आप हमेशा कहती हैं ना कि आपको गंगा किनारे जाने का मन है? तो क्यों न इन दस-बारह दिनों के लिए आप वहां घूम आएं? रवि के आने तक आप वापस आ जाइएगा। आपका मन भी बहल जाएगा।"

गायत्री देवी का चेहरा खिल उठा। "सच बहू? पर रवि को बताए बिना..."

"अरे, रवि को मैं सरप्राइज़ दूंगी। वो भी खुश होगा कि आप तीर्थ कर आईं। मैंने गाड़ी बुक कर दी है। आप बस अपना ज़रूरी सामान रख लीजिये। वहां सब सुविधाएं हैं।"

भोली गायत्री देवी, बहू के इस अचानक बदले व्यवहार को समझ नहीं पाईं। उन्हें लगा शायद बहू सच में सुधर गई है। उन्होंने जल्दी-जल्दी अपने थोड़े बहुत कपड़े और रामायण की किताब एक छोटे बैग में रख ली।

दोपहर में एक टैक्सी आई। सुमन ने ड्राइवर को कुछ पैसे और एक पर्ची थमाई। गायत्री देवी को बैठाते समय उसने कहा, "आराम से जाइयेगा माँजी।"

गाड़ी धूल उड़ाते हुए निकल गई। सुमन ने राहत की सांस ली। "बला टली," उसने बुदबुदाया। उसने ड्राइवर को ऋषिकेश नहीं, बल्कि शहर से साठ किलोमीटर दूर एक सरकारी और बेहद सस्ते वृद्धाश्रम 'अंतिम पड़ाव' का पता दिया था। उसने ड्राइवर को सख्त हिदायत दी थी कि बुढ़िया को गेट पर छोड़कर कहना कि बेटा कल आकर फॉर्म भरेगा, अभी इमरजेंसी है।

पंद्रह दिन बीत गए। रवि वापस लौटा। उसके हाथ में माँ के लिए सिंगापुर से लाई हुई एक इलेक्ट्रॉनिक मालिश मशीन थी, जिससे उनके घुटनों के दर्द में आराम मिल सके।

घर में घुसते ही उसे एक अजीब सी खालीपन का अहसास हुआ। वह सीधे माँ के कमरे की तरफ गया। कमरा खाली था। बिस्तर पर चादर करीने से बिछी थी, लेकिन माँ की दवाइयां, उनकी रामायण, और उनकी चप्पलें गायब थीं।

"सुमन!" रवि ने आवाज़ दी।

सुमन किचन से निकली, चेहरे पर वही आत्मविश्वास। "आ गए आप? फ्रेश हो जाइये, मैं कॉफ़ी बनाती हूँ।"

"माँ कहाँ हैं?" रवि ने बेचैनी से पूछा।

"ओह, माँजी?" सुमन ने बहुत ही सहजता से झूठ बोला। "वो... आपकी बुआ जी का फोन आया था गाँव से। उनके घर में कोई पूजा है। माँजी को बहुत ज़िद करके बुला लिया। कह रही थीं हफ़्ते-दस दिन में आ जाएंगी। बहुत खुश थीं, तो मैंने भी मना नहीं किया।"

रवि को थोड़ा अजीब लगा। बुआ जी से माँ की बात तो सालों से बंद थी। फिर अचानक पूजा?

"मैंने बुआ को फ़ोन लगाया था, उनका नंबर नहीं लग रहा," रवि ने फ़ोन चेक करते हुए कहा।

"हाँ, वो गाँव में नेटवर्क की दिक्कत रहती है ना," सुमन ने बात संभाली। "आप चिंता मत कीजिये, वो ठीक हैं। उन्होंने कहा था कि वहां पहुंचकर किसी के फ़ोन से बात करेंगी।"

रवि ने बात मान ली, लेकिन उसका मन नहीं माना। माँ बिना बताए, बिना उससे बात किए चली गईं? यह उनके स्वभाव के विपरीत था।

दिन बीतते गए। एक हफ़्ता हो गया। रवि की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। माँ का कोई फोन नहीं आया। जब भी वह सुमन से पूछता, सुमन कोई न कोई बहाना बना देती—"अभी बात हुई थी, आप सो रहे थे", "वो पड़ोस में गई हैं", "वहां फ़ोन ख़राब है"।

रवि को सुमन के व्यवहार में भी एक बदलाव नज़र आ रहा था। वह अब माँ के कमरे को 'स्टोर रूम' बनाने की तैयारी कर रही थी। उसने माँ का पलंग हटाकर वहां अपनी सिलाई मशीन और एक्स्ट्रा सामान रख दिया था।

"तुम माँ के कमरे का हुलिया क्यों बदल रही हो? वो वापस आएंगी तो क्या कहेंगी?" रवि ने टोका।

"अरे, आने तो दो। तब तक जगह का इस्तेमाल तो हो," सुमन ने लापरवाही से कहा।

एक शाम, रवि अपने ऑफिस की फाइलों में उलझा था। तभी लैंडलाइन फ़ोन बजा। आजकल मोबाइल के ज़माने में लैंडलाइन कम ही बजता था। रवि ने फ़ोन उठाया।

"हेलो? क्या मैं श्री रवि शर्मा से बात कर सकता हूँ?" उधर से एक गंभीर आवाज़ आई।

"जी, मैं रवि बोल रहा हूँ।"

"जी, मैं 'अंतिम पड़ाव' वृद्धाश्रम से अधीक्षक बोल रहा हूँ। आपकी माताजी, श्रीमती गायत्री देवी, हमारे यहाँ पिछले बीस दिनों से हैं।"

रवि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "क्या? वृद्धाश्रम? लेकिन वो तो बुआ के घर..."

"सर, वो यहाँ हैं। और आपको सूचित करना ज़रूरी था कि कल रात बाथरूम में गिरने की वजह से उन्हें गहरा आघात लगा है। उनकी हालत बहुत नाज़ुक है। वो बार-बार आपका नाम ले रही हैं। जिस टैक्सी ड्राइवर ने उन्हें छोड़ा था, उसने रजिस्टर में यह लैंडलाइन नंबर 'इमरजेंसी' के लिए लिखवाया था, जो हमें उनके बैग की तलाशी लेने पर एक पर्ची में मिला।"

रवि के हाथ से रिसीवर छूटते-छूटते बचा। उसका दिमाग सुन्न हो गया। आँखों के सामने सुमन का मुस्कुराता चेहरा और उसके झूठ घूमने लगे। बुआ का घर... पूजा... नेटवर्क नहीं है... सब झूठ! सफेद झूठ!

उसने मुड़कर देखा। सुमन बेडरूम में टीवी देख रही थी और हंस रही थी। रवि को उस हंसी में एक क्रूरता नज़र आई। उसने कुछ नहीं कहा। इस वक़्त सवाल-जवाब का समय नहीं था। माँ की ज़िंदगी का सवाल था।

रवि ने गाड़ी की चाबी उठाई और आंधी की तरह घर से निकल गया। साठ किलोमीटर का रास्ता उसने कैसे तय किया, उसे खुद पता नहीं चला। उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे और दिल में एक ही प्रार्थना थी—"बस एक बार माँ मिल जाए।"

आश्रम पहुँचकर वह सीधे आईसीयू की तरफ भागा। वहां एक पुराने, जंग लगे पलंग पर गायत्री देवी लेटी थीं। उनके सिर पर पट्टी बंधी थी और हाथ में ड्रिप लगी थी। वे बेहद कमज़ोर लग रही थीं। आश्रम की दशा देखकर रवि का कलेजा फट गया। गंदे फर्श, सीलन भरी दीवारें... उसकी माँ, जो साफ़-सफाई की इतनी शौक़ीन थीं, यहाँ कैसे रहीं होंगी?

"माँ!" रवि उनकी खाट के पास घुटनों के बल गिर पड़ा।

गायत्री देवी ने धीरे से आँखें खोलीं। धुंधली नज़रों से बेटे को पहचाना। उनके सूखे होंठों पर एक फीकी मुस्कान आ गई।

"रवि... तू आ गया बेटा?" आवाज़ इतनी धीमी थी कि रवि को कान पास ले जाना पड़ा।

"माँ, मुझे माफ़ कर दो। मैं तुम्हें यहाँ छोड़कर नहीं गया था। मुझे पता ही नहीं था... सुमन ने कहा तुम बुआ के घर..." रवि बच्चों की तरह फफक पड़ा।

गायत्री देवी ने रवि का हाथ अपने हाथ में लिया। "मैं जानती हूँ बेटा... मैं जानती हूँ तू ऐसा नहीं कर सकता। बहू ने... बहू ने कहा था कि तू चाहता है मैं यहाँ रहूँ। उसने कहा कि तू मेरे कारण खुश नहीं है... तेरी गृहस्थी टूट रही है। इसलिए मैं चुप रही। मैंने आश्रम वालों को तुझे फ़ोन करने से मना कर दिया था... मैं नहीं चाहती थी कि तेरी और सुमन की लड़ाई हो।"

रवि सन्न रह गया। सुमन ने न सिर्फ़ उसे धोखा दिया था, बल्कि माँ के मन में यह ज़हर भी घोला था कि बेटा उन्हें नहीं चाहता। इतना बड़ा षड्यंत्र?

"माँ, अब मैं तुम्हें कहीं नहीं जाने दूंगा। चलो घर," रवि ने खड़े होकर डॉक्टर को बुलाया।

दो दिन बाद, रवि माँ को लेकर घर लौटा। गायत्री देवी की हालत अब खतरे से बाहर थी, लेकिन उन्हें व्हीलचेयर की ज़रूरत थी।

जब रवि ने डोरबेल बजाई, तो सुमन ने दरवाज़ा खोला। सामने व्हीलचेयर पर अपनी सास को और पीछे अंगारों जैसी आँखों वाले रवि को देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसके हाथ से मोबाइल गिर पड़ा।

"रवि... ये... माँजी..." सुमन हकलाने लगी। "ये तो बुआ के घर..."

रवि ने एक शब्द नहीं कहा। वह शांति से व्हीलचेयर को अंदर लाया। सुमन के बनाए हुए 'स्टोर रूम' से उसने सुमन का सारा सामान निकालकर बाहर लॉबी में फेंकना शुरू कर दिया। सिलाई मशीन, कपड़े, डब्बे—सब बाहर।

"रवि, आप क्या कर रहे हैं?" सुमन चिल्लाई।

रवि ने मुड़कर सुमन को देखा। उसकी आँखों में वह प्यार नहीं था जो सुमन अक्सर देखती थी। वहां सिर्फ़ एक ठंडा, डरावना खालीपन था।

"सुमन," रवि की आवाज़ बेहद शांत थी, जो उसके चिल्लाने से ज़्यादा खौफनाक थी। "मैंने तुमसे कहा था कि मैं बीच का रास्ता निकालूँगा। तुमने रास्ता चुना—झूठ और धोखे का। तुमने मेरी माँ को उस नर्क में भेजा और मुझसे कहा कि वो तीर्थ पर हैं? तुमने मेरी माँ को यह यकीन दिलाया कि मैंने उन्हें निकाला है?"

"रवि, मेरी बात सुनिये, मैं बस हमारी आज़ादी..."

"आज़ादी?" रवि ने कड़वी हंसी हंसी। "तुम्हें प्राइवेसी चाहिए थी ना? तुम्हें स्पेस चाहिए था? ठीक है। आज से यह पूरा घर तुम्हारा स्पेस है। सिवाय इस कमरे के। यह माँ का कमरा है। और मैं अब से माँ के साथ इस कमरे में रहूँगा उनकी सेवा करने के लिए। तुम बाकी के घर में अपनी 'आज़ादी' का जश्न मनाओ।"

"मतलब?" सुमन घबरा गई।

"मतलब यह कि तुम इस घर में रह सकती हो, क्योंकि तुम मेरी पत्नी हो। लेकिन मेरे लिए तुम आज से अदृश्य हो। न हम साथ खाना खाएंगे, न बात करेंगे, न साथ रहेंगे। मैं अपनी तनख्वाह का आधा हिस्सा घर के खर्च के लिए तुम्हारे अकाउंट में डाल दूंगा। बाकी आधा माँ के इलाज और मेरी ज़रूरतों के लिए। तुम अपनी किटी पार्टी करो, सहेलियों को बुलाओ, जो करना है करो। बस मेरे और माँ के रास्ते में मत आना।"

"रवि, आप मुझे सज़ा दे रहे हैं?" सुमन रो पड़ी। "एक बुढ़िया के लिए आप अपनी पत्नी को छोड़ देंगे?"

"वह 'बुढ़िया' मेरी माँ है सुमन," रवि ने माँ के पैरों पर कंबल ओढ़ाते हुए कहा। "और रही बात छोड़ने की, तो छोड़ा तो तुमने था—इंसानियत को, भरोसे को और रिश्तों को। जिस दिन तुमने एक बीमार, लाचार बुजुर्ग को धोखे से घर से निकाला, उसी दिन तुमने इस घर से अपना हक़ खो दिया था। अब तुम यहाँ सिर्फ़ एक मकान मालकिन की तरह रह सकती हो, पत्नी की तरह नहीं।"

रवि ने बेडरूम का दरवाज़ा सुमन के मुंह पर बंद कर लिया।

उस रात, आलीशान फ्लैट के एक कमरे में रवि अपनी माँ को अपने हाथों से खिचड़ी खिला रहा था, और बाकी के पूरे आलीशान, सजे-धजे घर में सुमन अकेली सोफे पर बैठी थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े जैसी लग रही थी। उसे अपनी 'आज़ादी' मिल गई थी, उसे अपना 'स्पेस' मिल गया था, लेकिन उस स्पेस में अब वह नितांत अकेली थी। उसे समझ आ गया था कि घर ईंट-पत्थरों से नहीं, बुजुर्गों के आशीर्वाद और विश्वास से बनता है। उसने घर का 'कचरा' साफ़ करने की कोशिश में घर की 'नींव' ही हिला दी थी।

गायत्री देवी ने रवि का हाथ पकड़ा। "बेटा, उसे माफ़ कर दे।"

रवि ने माँ के माथे को चूमा। "माँ, माफ़ करना भगवान का काम है। मेरा काम है अपनी गलती सुधारना। मैंने आँखें मूंदकर उस पर भरोसा किया, यह मेरी गलती थी। अब और नहीं।"

बाहर ड्राइंग रूम में बैठी सुमन को अब वह घर काटने को दौड़ रहा था। उसे एहसास हो चुका था कि जिस वृद्धाश्रम में उसने सास को भेजा था, असल में उसने अपने लिए उसी घर को एक आलीशान वृद्धाश्रम बना लिया था—जहाँ सुविधाएँ तो थीं, पर अपना कोई नहीं था।


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