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रूह का रिश्ता: जब प्रेम ने बदल दी तकदीर की लकीरें

 काव्या ने खुद को एक कमरे में कैद कर लिया। वह नहीं चाहती थी कि देवांश उसके इस रूप को देखे। उसने कई बार देवांश को खुद से दूर जाने के लिए कहा। "मेरी ज़िंदगी अब एक अँधेरा है देवांश, तुम क्यों इस राख के ढेर में अपनी खुशियां ढूंढ रहे हो? मुझे भूल जाओ और किसी और से शादी कर लो," काव्या रोते हुए कहती। लेकिन देवांश चट्टान की तरह उसके साथ खड़ा रहा। उसने काव्या का हाथ पकड़कर कहा, "मैंने तुम्हारे चेहरे की चमड़ी से नहीं, तुम्हारी रूह और तुम्हारी इन आँखों से प्यार किया है। ये चेहरा बदल सकता है, लेकिन मेरा प्यार नहीं।"


शहर के सबसे प्रतिष्ठित कला केंद्र में अगर किसी दो नाम की सबसे ज्यादा चर्चा होती थी, तो वो थे काव्या और देवांश। काव्या एक बेहतरीन कत्थक नृत्यांगना थी, जिसकी आँखों की चमक और चेहरे का तेज दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता था। वहीं, देवांश एक होनहार बांसुरी वादक था, जिसकी धुनों में एक अलग ही जादू था। दोनों जब मंच पर एक साथ अपनी कला का प्रदर्शन करते, तो ऐसा लगता मानो वो एक-दूसरे के लिए ही बने हों। काव्या का स्वभाव जितना सरल और हंसमुख था, उतनी ही वह निडर भी थी। गलत बात बर्दाश्त करना उसकी फितरत में नहीं था। 


कला केंद्र में अक्सर कई तरह के लोग आते थे। उसी में से एक था विक्रम, जो एक अमीर और रसूखदार बाप का बिगड़ैल बेटा था। उसे लगता था कि पैसे के दम पर वह किसी को भी खरीद सकता है। काव्या की सुंदरता पर उसकी गंदी नज़र थी। एक दिन जब काव्या अपनी सहेलियों के साथ रिहर्सल के बाद बाहर निकल रही थी, तो विक्रम ने रास्ता रोककर उस पर भद्दी फब्तियां कसीं और उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की। काव्या कोई कमज़ोर लड़की नहीं थी। उसने बिना एक पल सोचे विक्रम के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। तमाचे की गूंज से वहां खड़ी भीड़ सन्न रह गई। विक्रम को भरी भीड़ में इतनी बुरी तरह बेइज्जत होना पड़ेगा, यह उसने सपने में भी नहीं सोचा था। अपने गाल पर हाथ रखे, बदले की आग में जलता हुआ वह वहां से चला गया।


इधर, काव्या और देवांश के बीच की दोस्ती धीरे-धीरे एक खूबसूरत प्रेम में बदल रही थी। देवांश काव्या के निडर स्वभाव और उसकी सादगी का दीवाना था, और काव्या को देवांश में एक ऐसा जीवनसाथी नज़र आता था जो उसकी हर उड़ान में उसके साथ खड़ा रहे। रिहर्सल के बाद अक्सर वे दोनों कला केंद्र की सीढ़ियों पर बैठकर भविष्य के सपने बुनते। देवांश हमेशा हंसते हुए कहता, "बस इस संगीत विद्यालय में मेरी पक्की नौकरी लग जाने दो, फिर अपनी माँ को भेजकर तुम्हें हमेशा के लिए अपने घर की रौनक बना लूंगा।" काव्या यह सुनकर शर्मा जाती और उसकी वो गहरी, भावपूर्ण आँखें खुशी से चमक उठतीं।


लेकिन तकदीर को शायद उनका यह हंसता-खेलता संसार मंजूर नहीं था। एक शाम जब हल्की-हल्की बारिश हो रही थी, काव्या और देवांश रिहर्सल के बाद एक ही छतरी के नीचे बातें करते हुए घर की तरफ लौट रहे थे। तभी सामने वाले अंधेरे मोड़ से एक बाइक तेज़ी से उनकी तरफ आई। उस पर विक्रम सवार था। विक्रम ने अपनी जैकेट से एक बोतल निकाली और इससे पहले कि देवांश कुछ समझ पाता, उसने वह ज्वलनशील रसायन (तेज़ाब) काव्या के चेहरे पर फेंक दिया और बाइक दौड़ाकर वहां से फरार हो गया। 


कुछ ही पलों में काव्या की दर्दनाक चीखें उस शांत सड़क पर गूंजने लगीं। तेज़ाब की जलन से वह सड़क पर तड़प रही थी। देवांश के तो जैसे प्राण ही सूख गए। उसने बिना अपनी परवाह किए, अपने हाथों से काव्या के चेहरे को दुपट्टे से ढका और उसे गोद में उठाकर पागलों की तरह अस्पताल की तरफ दौड़ा। काव्या का दर्द से बुरा हाल था, और देवांश के आँसू बारिश के पानी के साथ मिलकर बह रहे थे।


अस्पताल के वो दिन किसी भयानक बुरे सपने से कम नहीं थे। काव्या को इस दर्दनाक हादसे से बाहर निकालने और उसकी अनगिनत सर्जरियों में लगभग तीन साल का लंबा वक्त लग गया। जब पहली बार काव्या के चेहरे से पट्टियां हटीं, तो आईने में अपना अक्स देखकर वह चीख पड़ी। उसका वह निखरा हुआ रूप, वो दमकती त्वचा अब बुरी तरह झुलस कर सांवली और सिकुड़ चुकी थी। बस बची थीं तो उसकी वो दो खूबसूरत आँखें, जो अब आंसुओं के समंदर में डूबी रहती थीं। 


काव्या ने खुद को एक कमरे में कैद कर लिया। वह नहीं चाहती थी कि देवांश उसके इस रूप को देखे। उसने कई बार देवांश को खुद से दूर जाने के लिए कहा। "मेरी ज़िंदगी अब एक अँधेरा है देवांश, तुम क्यों इस राख के ढेर में अपनी खुशियां ढूंढ रहे हो? मुझे भूल जाओ और किसी और से शादी कर लो," काव्या रोते हुए कहती। लेकिन देवांश चट्टान की तरह उसके साथ खड़ा रहा। उसने काव्या का हाथ पकड़कर कहा, "मैंने तुम्हारे चेहरे की चमड़ी से नहीं, तुम्हारी रूह और तुम्हारी इन आँखों से प्यार किया है। ये चेहरा बदल सकता है, लेकिन मेरा प्यार नहीं।"


इन तीन सालों के कड़े संघर्ष के बीच, देवांश की उस संगीत विद्यालय में एक अच्छी नौकरी लग चुकी थी। अब वह आर्थिक रूप से भी पूरी तरह सक्षम था। एक दिन देवांश अपनी माँ को लेकर सीधा काव्या के घर पहुँच गया। देवांश ने अपनी माँ को पहले ही सारी हकीकत बता दी थी। शुरुआत में एक माँ होने के नाते उनके मन में भी समाज को लेकर कई तरह की दुविधाएं थीं, लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनके बेटे की असली खुशी और उसकी जान सिर्फ काव्या में बसती है, तो एक माँ की ममता के आगे समाज की सारी दीवारें ढह गईं। उन्होंने खुशी-खुशी काव्या को अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया।


काव्या के माता-पिता की आँखों से तो जैसे आंसुओं की झड़ी लग गई। जिस बेटी के भविष्य को लेकर वे दिन-रात घुट रहे थे, आज देवांश के रूप में ईश्वर ने उनके घर एक फरिश्ता भेज दिया था। बहुत ही सादे लेकिन पवित्र समारोह में दोनों विवाह के बंधन में बंध गए। 


सुहागरात के दिन, कमरे को फूलों से सजाया गया था। काव्या आज भी अपने रूप को लेकर अंदर ही अंदर थोड़ी डरी और सहमी हुई थी। देवांश कमरे में आया और धीरे से काव्या के पास बैठ गया। उसने काव्या के कांपते हुए हाथों को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उसने काव्या के घूंघट को बहुत ही कोमलता से पीछे किया और उसके झुलसे हुए चेहरे को देखकर एक प्यारी सी मुस्कान के साथ पूछा, "तो मैडम... मेरी जीवनसंगिनी बनकर आप खुश तो हैं ना?"


काव्या के होंठों पर सालों बाद एक सच्ची और लजीली मुस्कान तैर गई। उसने अपनी वो खूबसूरत आँखें झुका लीं और देवांश के कंधे पर अपना सिर रख दिया। आज उस कमरे में ना तो कोई दर्द था, ना कोई बदसूरती... था तो बस एक ऐसा निस्वार्थ प्रेम, जिसने नफरत के हर निशान को हमेशा के लिए मिटा दिया था।


दोस्तों, आपको क्या लगता है, क्या आज के इस दिखावे वाले दौर में देवांश जैसा सच्चा और निस्वार्थ प्रेम करने वाला जीवनसाथी मिलना संभव है? अपने विचार कमेंट करके ज़रूर बताएं।


धन्यवाद।


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