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खामोश धड़कनें और सुन्न पड़ा तंत्र

  "गरिमा, हमारा कबीर अब लौटकर नहीं आएगा," विकास ने रुंधे गले से कहा, "लेकिन उसके अंग किसी और बच्चे को जिंदगी दे सकते हैं। उसकी आंखें किसी अंधेरे जीवन में रोशनी ला सकती हैं। उसका दिल किसी और के सीने में धड़क सकता है। क्या हम अपने कबीर का अंगदान कर दें?" गरिमा ने रोते हुए हामी भर दी। एक मां के लिए अपने कलेजे के टुकड़े को टुकड़ों में बांटने की इजाजत देना दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता है, लेकिन किसी और मां की गोद सूनी न रहे, इस सोच ने उन्हें यह ताकत दी।


माहौल में एक अजीब सी खुशी और सुकून तैर रहा था। सात साल के कबीर ने आज अपने स्कूल की चित्रकला प्रतियोगिता में पूरे जिले में पहला स्थान प्राप्त किया था। हाथ में चमकती हुई शील्ड पकड़े वह कार की पिछली सीट पर बैठा खुशी से चहक रहा था। ड्राइविंग सीट पर बैठे विकास के चेहरे पर एक संतुष्ट पिता का गर्व था, और उनके बगल में बैठी उनकी पत्नी गरिमा बार-बार पीछे मुड़कर अपने बेटे की मासूम बातों पर मुस्कुरा रही थीं। विकास एक कॉलेज में प्रोफेसर थे और गरिमा एक शिक्षिका। यह एक छोटा सा, लेकिन खुशियों से मुकम्मल परिवार था। कार के स्टीरियो पर कबीर का पसंदीदा गाना बज रहा था और तीनों एक सुर में उसे गुनगुना रहे थे। सब कुछ इतना परफ़ेक्ट था, जैसे किसी खूबसूरत फिल्म का कोई दृश्य।


लेकिन किस्मत को शायद यह मुकम्मल खुशी मंजूर नहीं थी। हाइवे के एक चौराहे पर जैसे ही विकास की कार ने टर्न लिया, सिग्नल तोड़ता हुआ एक बेकाबू डंपर सीधा उनकी कार के पिछले हिस्से से आ टकराया। टक्कर इतनी भयानक थी कि कार हवा में गोल घूमते हुए डिवाइडर से जा टकराई। कांच के टुकड़े, चीख-पुकार और फिर एक भयानक सन्नाटा। 


"कबीर!" विकास और गरिमा के मुंह से एक साथ यही चीख निकली थी। 


जब विकास को होश आया, तो वह अस्पताल के बिस्तर पर थे। उनके सिर पर पट्टियां बंधी थीं और एक हाथ फ्रैक्चर था। पास ही के बेड पर गरिमा लेटी थी, जिसे पसलियों में गहरी चोट आई थी, लेकिन वह होश में थी और पागलों की तरह रोते हुए सिर्फ अपने बेटे को पुकार रही थी। अस्पताल के कर्मचारियों ने उन्हें बताया कि दोनों को मामूली चोटें आई हैं, लेकिन उनके बेटे कबीर की हालत बेहद गंभीर है। उसे सीधा आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया था। 


दर्द से कराहते हुए विकास और गरिमा किसी तरह आईसीयू के शीशे के बाहर पहुंचे। अंदर उनका हंसता-खेलता कबीर अनगिनत नलियों और मशीनों के बीच बेजान पड़ा था। मॉनिटर पर चलती टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें ही उसके जिंदा होने का एकमात्र सबूत थीं। डॉक्टरों की एक टीम लगातार निगरानी कर रही थी। घंटों बाहर इंतजार करने के बाद, एक वरिष्ठ डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर छाई उदासी ने विकास के दिल की धड़कनें रोक दीं। 


"देखिए विकास जी," डॉक्टर ने भारी स्वर में कहा, "हमने अपनी पूरी कोशिश की। कबीर के सिर में बहुत गहरी अंदरूनी चोटें आई हैं। उसके दिमाग तक ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो गई थी। मेडिकली, आपका बेटा अब 'ब्रेन डेड' है। उसकी सांसें सिर्फ इन मशीनों की बदौलत चल रही हैं।"


यह शब्द सुनते ही गरिमा वहीं फर्श पर गिर पड़ी। विकास के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई। जिस बच्चे के भविष्य के उन्होंने इतने सपने बुने थे, वह अब कभी अपनी आंखें नहीं खोलेगा। पूरा दिन आंसुओं के समंदर में डूबने के बाद, रात के सन्नाटे में विकास और गरिमा ने एक-दूसरे का हाथ थामा। दोनों पढ़े-लिखे और समझदार इंसान थे। उन्होंने अपने दुखों के पहाड़ के बीच से एक ऐसी किरण ढूंढ़ने का फैसला किया, जो शायद कबीर को हमेशा के लिए जिंदा रख सके। 


"गरिमा, हमारा कबीर अब लौटकर नहीं आएगा," विकास ने रुंधे गले से कहा, "लेकिन उसके अंग किसी और बच्चे को जिंदगी दे सकते हैं। उसकी आंखें किसी अंधेरे जीवन में रोशनी ला सकती हैं। उसका दिल किसी और के सीने में धड़क सकता है। क्या हम अपने कबीर का अंगदान कर दें?" गरिमा ने रोते हुए हामी भर दी। एक मां के लिए अपने कलेजे के टुकड़े को टुकड़ों में बांटने की इजाजत देना दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता है, लेकिन किसी और मां की गोद सूनी न रहे, इस सोच ने उन्हें यह ताकत दी।


अगली सुबह उन्होंने डॉक्टरों को अपने इस दृढ़ निश्चय के बारे में बताया। अस्पताल का स्टाफ उनकी इस महान सोच के आगे नतमस्तक था। लेकिन असली संघर्ष अब शुरू होने वाला था। कबीर का एक्सीडेंट एक 'मेडीको-लीगल केस' था, इसलिए अंगदान से पहले पुलिस की एनओसी (NOC) और एक सरकारी मेडिकल बोर्ड द्वारा 'ब्रेन डेड' घोषित किए जाने का आधिकारिक प्रमाण पत्र अनिवार्य था। 


विकास अपने टूटे हुए हाथ के साथ फाइलों का बंडल लेकर पुलिस स्टेशन पहुंचे। वहां इंस्पेक्टर साहब छुट्टी पर थे और ड्यूटी पर मौजूद अधिकारी ने कहा कि वे बिना बड़े साहब की इजाजत के कुछ नहीं कर सकते। विकास ने हाथ जोड़े, मिन्नतें कीं, "सर, मेरे बच्चे के अंग खराब हो रहे हैं। समय बहुत कम है।" लेकिन तंत्र की सुन्नता के आगे एक पिता के आंसू बेमानी थे। किसी तरह शाम तक पुलिस की एनओसी मिली। 


अब बारी थी मेडिकल बोर्ड की। सरकारी नियम के अनुसार चार वरिष्ठ डॉक्टरों के पैनल को दो बार, छह घंटे के अंतराल पर जांच करके प्रमाण पत्र देना था। लेकिन पैनल का एक डॉक्टर किसी कॉन्फ्रेंस में शहर से बाहर था। उसकी जगह दूसरे डॉक्टर की नियुक्ति के लिए कागजी कार्रवाई में पूरा एक दिन और निकल गया। 


आईसीयू में कबीर की सांसें मशीनों पर चल रही थीं, लेकिन उसका शरीर अब जवाब दे रहा था। अंगों को सुरक्षित रखने के लिए समय तेजी से फिसल रहा था। विकास और गरिमा आईसीयू के बाहर बैठे बस उस एक कागज के टुकड़े का इंतजार कर रहे थे जो उनके बेटे को किसी और में जिंदा रहने की इजाजत दे सके। तीन दिन बीत चुके थे। सरकारी तंत्र की फाइलें एक मेज से दूसरी मेज तक रेंग रही थीं। 


चौथे दिन सुबह, जब आखिरकार मेडिकल बोर्ड का वह प्रमाण पत्र अस्पताल पहुंचा, तभी आईसीयू के अंदर से एक अलार्म बजने लगा। डॉक्टरों की टीम दौड़कर अंदर गई। गरिमा और विकास शीशे से चिपके खड़े थे। कबीर के मॉनिटर पर चलती वह अकेली लकीर अब बिल्कुल सीधी हो गई थी। मशीनों के सहारे चल रही उस छोटी सी जान को एक जोरदार कार्डियक अरेस्ट (दिल का दौरा) आया था। डॉक्टरों ने बहुत कोशिश की, लेकिन कबीर ने अपनी आखिरी सांस भी छोड़ दी। 


कुछ देर बाद डॉक्टर सिर झुकाए बाहर आए। "आई एम सॉरी विकास जी," डॉक्टर ने कहा, "हम कबीर को नहीं बचा सके। और... कार्डियक अरेस्ट के कारण अंगों तक रक्त का प्रवाह रुक गया। अब उसके अंग प्रत्यारोपण (ट्रांसप्लांट) के लायक नहीं बचे हैं।"


यह सुनते ही गरिमा चीख मारकर रो पड़ी। विकास वहीं दीवार के सहारे बैठ गए। उनकी आंखों के सामने से वो सारे चेहरे गुजरने लगे, जिन्हें कबीर के अंगों से नया जीवन मिल सकता था। पांच जिंदगियां बचाई जा सकती थीं, लेकिन नियमों की बेड़ियों, फाइलों के बोझ और संवेदनहीन अधिकारियों की सुस्ती ने उन पांच जिंदगियों को भी कबीर के साथ ही मार दिया था। 


विकास और गरिमा ने एक नेक और साहसिक कदम उठाया था, लेकिन सिस्टम की जटिलताओं ने उनके इस पवित्र इरादे की हत्या कर दी। आज सालों बीत जाने के बाद भी, जब विकास और गरिमा किसी बच्चे को देखते हैं, तो उनकी आंखें डबडबा जाती हैं। और उनके जहन में आज भी वही एक सवाल चीख-चीख कर गूंजता है कि उस दिन अस्पताल के उस बिस्तर पर असल में 'ब्रेन डेड' कौन था? उनका मासूम बेटा कबीर, या यह संवेदनहीन, अंधी और बहरी व्यवस्था, जिसका दिमाग और दिल दोनों काम करना बंद कर चुके हैं?

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