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"सुमन, यह अपॉइंटमेंट लेटर अभी के अभी फाड़कर डस्टबिन में डाल दो। हमारे खानदान की बहुएं चंद पैसों के लिए बाहर धक्के नहीं खातीं। भगवान का दिया सब कुछ है घर में, फिर नौकरी करने का यह भूत क्यों सवार है?"

ननद कविता ने सोफे पर बैठते हुए बड़े रोब से अपनी भाभी सुमन को आदेश दिया। सुमन के हाथ में एक मल्टीनेशनल कंपनी का जॉइनिंग लेटर था, जिसके लिए उसने कड़ी मेहनत की थी।

"दीदी, यह पैसों की बात नहीं है। मैंने एमबीए किया है, मैं अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं। और फिर घर का काम निपटाकर ही तो जा रही हूं," सुमन ने दबी जुबान में अपना पक्ष रखा।

"अरे, तो क्या घर का काम करके तुम हम पर एहसान करोगी?" सासू मां विमला जी ने तुरंत अपनी बेटी कविता का पक्ष लिया। "कविता सही कह रही है। जिस घर की औरतें बाहर काम करती हैं, वहां सुख-शांति नहीं रहती। और फिर, कल को बच्चे होंगे तो उन्हें कौन संभालेगा? क्या आया के भरोसे छोड़ोगी? हमारे घर में यह सब नहीं चलेगा।"

सुमन ने उम्मीद भरी नज़रों से अपने पति, राघव की ओर देखा। राघव कुछ कहना चाहता था, "मां, सुमन होनहार है, अगर वो काम करना चाहती है तो..."

"राघव!" कविता ने भाई को बीच में ही टोक दिया। "भैया, आप भाभी की तरफदारी मत कीजिये। औरतों को सिर पर चढ़ाना ठीक नहीं होता। आज नौकरी मांगेगी, कल को कहेगी कि घर के फैसलों में भी बराबरी चाहिए। घर की लक्ष्मी घर में ही अच्छी लगती है, ऑफिस की फाइलों में नहीं। भाभी को समझा दीजिये कि इस घर की मर्यादा पैसों से बढ़कर है।"

आखिरकार, घर के 'संस्कारों' और 'मर्यादा' की दुहाई देकर सुमन का सपना कुचल दिया गया। सुमन ने चुपचाप वह लेटर अलमारी में बंद कर दिया और रसोई में जाकर रोटियां बेलने लगी। कविता और विमला जी की जीत हुई थी।

समय का पहिया घूमा। छह महीने बाद कविता की शादी एक बड़े घर में हो गई। लड़का सरकारी अफसर था और परिवार भी संभ्रांत। विमला जी ने बेटी को विदा करते समय खूब डींगे हांकी थीं कि उनकी बेटी राज करेगी।

शादी के करीब साल भर बाद कविता पहली बार रहने के लिए मायके आई। लेकिन वह चहकती हुई कविता नहीं थी, उसका चेहरा उतरा हुआ था और आंखों के नीचे काले घेरे थे।

शाम को चाय पर जब सब बैठे, तो कविता का दर्द छलक पड़ा।

"मां, मैं अब वहां वापस नहीं जाना चाहती," कविता रो पड़ी।

"क्या हुआ बेटा? दामाद जी ने कुछ कहा क्या?" विमला जी घबरा गईं।

"नहीं मां, वो तो कुछ नहीं कहते, पर मेरी सास और ननद ने जीना हराम कर रखा है। आपको पता है, पिछले महीने मुझे प्रमोशन मिला था, मेरी सैलरी बढ़ने वाली थी। लेकिन मेरी सास ने साफ़ मना कर दिया। कहती हैं कि बहू का ओहदा और सैलरी बेटे से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए, इससे बेटे की इज़्ज़त कम होती है। उन्होंने जबरदस्ती मेरा रेजिग्नेशन टाइप करवाया।"

सुमन चाय के कप ट्रे में रख रही थी, उसके हाथ एक पल के लिए ठिठक गए।

कविता आगे बोलती रही, "और तो और भैया, वो लोग कहते हैं कि औरत की असली जगह रसोई है। मैंने इतना पढ़ा-लिखा क्या चूल्हा-चौका करने के लिए? मेरा दम घुटता है वहां। मुझे अपनी पहचान चाहिए, मैं सिर्फ किसी की बहू बनकर नहीं रह सकती।"

विमला जी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। "यह तो सरासर अन्याय है! मेरी बेटी इतनी काबिल है, वो लोग होते कौन हैं उसे रोकने वाले? मैं आज ही समधी जी से बात करूंगी। यह कोई तरीका है? आज के ज़माने में बहू-बेटियों को कैद करके रखना पिछड़ी सोच है।"

राघव, जो अब तक चुपचाप अखबार पढ़ रहा था, जोर से हंसा। उसकी हंसी में व्यंग्य था।

"अरे मां, आप क्यों गुस्सा हो रही हैं? कविता के ससुराल वाले तो बिल्कुल वही कर रहे हैं जो आपने और कविता ने एक साल पहले सुमन के साथ किया था," राघव ने शांत स्वर में कहा।

"भैया, आप यह क्या कह रहे हैं?" कविता ने आंसू पोंछते हुए कहा। "मेरी तुलना भाभी से मत कीजिये। मेरा करियर दांव पर लगा है।"

"क्यों न करूँ तुलना?" राघव ने कड़े स्वर में पूछा। "कविता, तुम्हें याद है तुमने सुमन से क्या कहा था? कि 'घर की लक्ष्मी घर में ही अच्छी लगती है'। आज जब तुम्हारे ससुराल वालों ने तुम्हें घर की लक्ष्मी मानकर घर में बैठा दिया, तो तुम्हें यह 'पिछड़ी सोच' क्यों लग रही है? सुमन ने भी एमबीए किया था, उसका भी सपना था। तब तुमने उसे 'मर्यादा' का नाम दिया था। आज जब वही मर्यादा तुम्हारे गले का फंदा बनी है, तो तुम्हें 'अन्याय' नज़र आ रहा है?"

कमरे में सन्नाटा छा गया। विमला जी की नज़रें झुक गईं।

राघव ने आगे कहा, "दूसरों के लिए नियम बनाना बहुत आसान होता है कविता। लेकिन जब वही नियम खुद पर लागू होते हैं, तब पता चलता है कि सपने टूटने का दर्द क्या होता है। सुमन ने तो उस दिन घर की शांति के लिए अपनी फाइल बंद कर दी थी, लेकिन आज तुम अपनी लड़ाई लड़ने के लिए मायके आ गई हो। सोचो, अगर सुमन भी उस दिन अपना बैग उठाकर चली जाती तो?"

कविता को काटो तो खून नहीं। उसे अपने बोले हुए एक-एक शब्द याद आ रहे थे जो उसने सुमन को कहे थे। आज नियति ने उसे उसी आईने के सामने खड़ा कर दिया था।

सुमन ने धीरे से राघव के कंधे पर हाथ रखा और आंखों से उसे शांत रहने का इशारा किया। फिर वह कविता के पास गई और उसके आंसू पोंछे।

"दीदी, आप चिंता मत कीजिये। हम सब आपके साथ हैं। राघव आपके ससुराल वालों से बात करेंगे। किसी के सपनों को मारना गलत है, चाहे वो आपकी भाभी के हों या आप के।"

सुमन के इन शब्दों ने कविता और विमला जी को शर्मिंदगी से भर दिया। उस दिन उस घर में एक नया नियम बना—सम्मान और सपने सबके बराबर होते हैं, चाहे वह बेटी हो या बहू। कविता को अपनी नौकरी वापस मिली या नहीं, यह तो बाद की बात थी, लेकिन उस दिन सुमन को उसका खोया हुआ आत्मसम्मान जरूर वापस मिल गया।


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