रसोई में कुकर की सीटी बजी और मीरा ने जल्दी से गैस बंद कर दी। सुबह के आठ बज रहे थे और 'शर्मा विला' में भागदौड़ का माहौल था। मीरा, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर थी, एक हाथ से टिफिन पैक कर रही थी और दूसरे हाथ से मोबाइल पर अपनी माँ, सुधा जी का हाल-चाल ले रही थी।
"माँ, आपकी आवाज़ बहुत भारी लग रही है। कल रात दवाई ली थी या नहीं?" मीरा ने चिंतित होकर पूछा।
उधर से सुधा जी की कमज़ोर आवाज़ आई, "हाँ बेटा, ली थी। पर शरीर टूट रहा है। वायरल बुखार है, शायद दो-चार दिन में ठीक हो जाएगा। तू चिंता मत कर, मैं पड़ोसन से कह दूंगी वो दलिया बना देगी।"
मीरा का दिल बैठ गया। उसके पिताजी के गुज़रने के बाद सुधा जी अकेले ही रहती थीं। शहर के दूसरे कोने में उनका छोटा सा फ्लैट था। मीरा जानती थी कि पड़ोसियों के भरोसे बीमारी नहीं कटती। उसे याद आया कि आज ऑफिस में उसकी बहुत ज़रूरी मीटिंग है, जिसे वह टाल नहीं सकती थी। अगर वह माँ के पास जाती, तो काम का नुक़सान होता, और अगर काम पर जाती, तो माँ भूखी-प्यासी पड़ी रहतीं।
मीरा ने एक गहरा निर्णय लिया। वह ड्राइंग रूम में आई जहाँ उसके पति, सुमित और सास, कमला देवी, चाय की चुस्कियां ले रहे थे।
"सुमित," मीरा ने संजीदगी से कहा, "माँ की तबीयत बहुत ख़राब है। उन्हें तेज़ बुखार है और चक्कर आ रहे हैं। वो अकेले अपना खयाल नहीं रख पाएंगी।"
सुमित ने अख़बार से नज़रें हटाए बिना कहा, "तो एक काम करो, आज ऑफिस से छुट्टी ले लो और हो आओ। शाम तक वापस आ जाना।"
"छुट्टी मुमकिन नहीं है सुमित, आज क्लाइंट विजिट है। और एक दिन जाने से वो ठीक नहीं हो जाएंगी," मीरा ने अपनी सास की ओर एक नज़र डालते हुए कहा, "मैं सोच रही थी कि मैं अभी जाकर माँ को यहाँ ले आती हूँ। हमारे घर में गेस्ट रूम खाली ही पड़ा है। यहाँ रहेंगी तो मैं ऑफिस के बाद उनकी देखभाल कर सकूँगी और दिन में आप लोग भी हैं ही।"
मीरा की बात ख़त्म होते ही कमरे में सन्नाटा छा गया। कमला देवी ने चाय का कप मेज़ पर ज़रा ज़ोर से रखा।
"क्या कहा तुमने? अपनी माँ को यहाँ लाओगी?" कमला देवी की त्योरियां चढ़ गईं। "मीरा, तुम्हें शायद याद नहीं कि यह बेटी का ससुराल है। हमारे समाज में बेटियाँ मायके जाती हैं, माँ-बाप को ससुराल नहीं लातीं। बेटी के घर का तो पानी पीना भी पाप माना जाता है, और तुम उन्हें यहाँ रखकर सेवा करवाना चाहती हो?"
मीरा ने संयम बनाए रखा। "माँजी, वो सब पुरानी बातें हैं। जब पानी पीना पाप था, तब बेटियाँ कमाती नहीं थीं, घर के खर्च में हिस्सा नहीं देती थीं। आज वक्त बदल गया है।"
"वक्त बदला होगा, संस्कार नहीं," कमला देवी ने कड़े स्वर में कहा। "पड़ोसी क्या कहेंगे? कि शर्मा जी के घर में समधन आकर डेरा जमाए बैठी हैं? सुमित के भी तो मान-सम्मान का सवाल है। अगर तुम्हें इतनी ही चिंता है, तो उन्हें किसी नर्सिंग होम में भर्ती करवा दो, पैसे हम दे देंगे। पर घर में... नहीं, यह मुझे मंज़ूर नहीं।"
मीरा ने सुमित की ओर देखा, उम्मीद थी कि वो कुछ बोलेगा। लेकिन सुमित चुपचाप अपनी माँ और पत्नी के बीच पिसता हुआ नज़र आ रहा था। उसने दबी आवाज़ में कहा, "मीरा, माँ सही तो कह रही हैं। थोड़ा अजीब लगेगा। तुम कोई मेड रख दो उनके लिए वहां।"
पति की बात सुनकर मीरा के सब्र का बांध टूट गया। उसे पैसे या मेड का मसला नहीं, बल्कि अपने ही घर में अपने अधिकारों का हनन दिखाई दे रहा था।
"सुमित, अजीब क्यों लगेगा?" मीरा की आवाज़ में अब दृढ़ता थी। "पिछले महीने जब आपकी बुआ जी का मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था, तब वो पंद्रह दिन यहीं रही थीं। तब तो किसी ने नहीं कहा कि बुआ जी को नर्सिंग होम भेज दो? मैंने अपनी छुट्टी लेकर उनकी सेवा की थी, उन्हें नहलाया था, खाना खिलाया था। तब तो 'संस्कार' आड़े नहीं आए?"
"वो तो घर की बेटी थीं," कमला देवी ने तर्क दिया।
"और मैं क्या हूँ माँजी?" मीरा ने सीधे उनकी आँखों में देखा। "मैं इस घर की बहू बाद में हूँ, पहले एक इंसान हूँ। और सुमित, आप भूल रहे हैं कि जिस घर में हम खड़े हैं, उसकी ईएमआई (EMI) हम दोनों मिलकर भरते हैं। जब घर की रजिस्ट्री में मेरा नाम आपके बराबर है, जब बैंक लोन में मेरी सैलरी आपके बराबर लग रही है, तो इस घर पर मेरे अधिकार आधे क्यों? मेरी माँ के लिए यह घर 'बेगाना' क्यों?"
कमला देवी हक्की-बक्की रह गईं। मीरा ने आज तक कभी पैसों या बराबरी की बात नहीं की थी। वह हमेशा एक आदर्श बहू बनकर रही थी।
मीरा आगे बढ़ी और सुमित के सामने खड़ी हो गई। "सुमित, अगर आज आपकी माँ बीमार होतीं और मैं कहती कि उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आइये या मेड के भरोसे छोड़ दीजिये क्योंकि मुझे अजीब लग रहा है, तो क्या आप बर्दाश्त करते? नहीं ना? तो फिर मेरी माँ के लिए दोहरे मापदंड क्यों? बेटा और बेटी का फ़र्ज़ अलग-अलग क्यों?"
सुमित के पास कोई जवाब नहीं था। उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था। वह समझ रहा था कि मीरा की मांग जायज़ है। मीरा तर्कों से नहीं, भावनाओं और अधिकारों की हकीकत से बात कर रही थी।
"मीरा सही कह रही है माँ," सुमित ने आख़िरकार चुप्पी तोड़ी। उसने अपनी माँ की ओर देखा। "जब हम मीरा की सैलरी से घर का सोफा ला सकते हैं, गाड़ी ला सकते हैं, तो उसी मीरा की माँ को इस घर में पनाह क्यों नहीं दे सकते? क्या मीरा का योगदान सिर्फ़ आर्थिक है, भावनात्मक नहीं?"
कमला देवी कुछ बोलने ही वाली थीं कि मीरा ने हाथ जोड़कर कहा, "माँजी, मैंने हमेशा आपको अपनी माँ माना है। आपकी शुगर की दवा से लेकर आपके घुटनों के दर्द तक, मैंने कभी यह नहीं सोचा कि आप मेरी सगी माँ नहीं हैं। तो आज जब मेरी जननी तक़लीफ़ में है, तो आप उन्हें पराया कैसे कर सकती हैं? क्या एक औरत दूसरी औरत की मजबूरी और ममता को नहीं समझेगी?"
मीरा की आँखों में आंसू थे, लेकिन वे कमजोरी के नहीं, स्वाभिमान के थे। कमला देवी ने मीरा के चेहरे को देखा, फिर अपने बेटे के झुके हुए सिर को। उन्हें अचानक अपने पुराने दिन याद आ गए जब वे बीमार थीं और उनकी माँ को उनके भाई ने आने नहीं दिया था। उस वक्त उन्हें कितना अकेलापन महसूस हुआ था। पुरानी रूढ़ियों ने उन्हें भी चोट पहुँचाई थी, और आज अनजाने में वे वही चोट अपनी बहू को दे रही थीं।
कमला देवी का गुस्सा पिघलने लगा। उन्होंने गहरी सांस ली और अपनी कुर्सी से उठीं।
"सुमित," उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, "गाड़ी निकाल। मीरा को देर हो रही है। हम जाकर समधन जी को ले आते हैं।"
मीरा और सुमित दोनों चौंक गए।
"माँ, आप..." मीरा कुछ कह न सकी।
"बहू, तूने आज मेरी आँखें खोल दीं," कमला देवी ने मीरा के सिर पर हाथ रखा। "मैं समाज के डर से एक माँ का दर्द भूल गई थी। तूने सही कहा, यह घर जितना सुमित का है, उतना तेरा भी है। और अगर बुआ इस घर में रह सकती है, तो नानी क्यों नहीं? आखिर रिश्ते खून से नहीं, अहसास से बनते हैं।"
सुमित ने मुस्कुराते हुए कार की चाबी उठाई। "चलो मीरा, तुम तैयार हो जाओ। मैं और माँ जाकर माँजी को ले आते हैं। तुम ऑफिस जाओ, उनकी चिंता मत करो।"
मीरा ने कृतज्ञता से अपनी सास और पति को देखा। उसने महसूस किया कि लड़ाई सिर्फ़ जीत और हार की नहीं होती, कभी-कभी लड़ाई नज़रिया बदलने की भी होती है।
उस शाम जब मीरा ऑफिस से लौटी, तो उसने देखा कि उसकी माँ गेस्ट रूम में आराम से सो रही थीं और कमला देवी उनके पास बैठकर उनके माथे पर पट्टियाँ रख रही थीं। उस दृश्य ने मीरा की सारी थकान मिटा दी। उसने समझ लिया कि परिवार वही है जहाँ सुख और दुख दोनों में सबका साझा हक़ हो।
निष्कर्ष:
समाज के बनाए नियम पत्थर की लकीर नहीं होते। जब एक लड़की अपने मायके से विदा होकर ससुराल आती है, तो वह सिर्फ़ कर्तव्य लेकर नहीं आती, वह अपने साथ अपने अधिकार और अपने पुराने रिश्तों की डोर भी लाती है। मीरा ने साबित कर दिया कि एक बेटी होना और एक बहू होना दो अलग-अलग भूमिकाएं नहीं, बल्कि एक ही व्यक्तित्व के दो पहलू हैं। सच्चा घर वही है जहाँ 'तेरा' और 'मेरा' नहीं, बल्कि 'हमारा' बसता हो।
मूल लेखिका : बिंदु खन्ना
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