सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

तीन पीढ़ियों का संगम

 अर्णव अपने नए घर की बालकनी में खड़ा नीचे की गली को देख रहा था। शहर छोटा था, मगर उसकी महत्वाकांक्षाएं बड़ी थीं। अपनी पत्नी विशाखा और दो जुड़वां बेटों, रचित और रोहित के साथ वह बेंगलुरु की भीड़भाड़ छोड़कर यहाँ आया था। यहाँ शांति थी, पर विशाखा के चेहरे पर वह शांति नहीं दिखती थी।

विशाखा एक आर्किटेक्ट थी, जिसका करियर शहर बदलते ही ठहर सा गया था। बेंगलुरु में उसके पास एक टीम थी, प्रोजेक्ट्स थे और घर संभालने के लिए एक अनुभवी नैनी थी। यहाँ आकर वह खाली हो गई थी। बच्चों का नया स्कूल, घर की अस्त-व्यस्त सेटिंग और ऊपर से एक नया डर—पिछले कुछ दिनों से एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति, जो फटे-पुराने मगर साफ कपड़ों में होता, उनके घर के सामने वाले पार्क की बेंच पर घंटों बैठा रहता था।

"अर्णव, मैंने तुम्हें कल भी कहा था, वह आदमी... वह कल भी वहीं था और आज भी है। उसकी नज़रें हमारे गेट पर ही टिकी रहती हैं। मुझे डर लगता है," विशाखा ने नाश्ते की मेज पर अपनी चिंता जाहिर की।

अर्णव ने खिड़की से बाहर झांका। वह व्यक्ति पेड़ के नीचे बैठा चुपचाप घर की ऊपरी मंजिल को निहार रहा था। अर्णव ने सुधीर (सिक्योरिटी गार्ड) को बुलाकर पूछा, "यह आदमी कौन है? रोज़ यहाँ क्यों बैठा रहता है?" सुधीर ने कंधे उचका दिए, "साहब, कुछ बोलता नहीं है। बस बैठा रहता है। कभी-कभी रोने भी लगता है।"

अगले दिन अर्णव ने हिम्मत जुटाई और उस व्यक्ति के पास गया। पास जाने पर उसने देखा कि उस व्यक्ति की आँखों में कोई आपराधिक चमक नहीं, बल्कि एक असीम शून्यता थी। अर्णव के टोकने पर उसने चौंक कर देखा। "क्या चाहिए आपको? आप रोज़ यहाँ क्यों बैठते हैं?"

उस व्यक्ति की आवाज़ भारी और कँपकँपाती हुई थी, "बेटा, मेरा नाम माधवराव है। यह घर... यह जो सफेद दीवारें और नीली रेलिंग वाला घर है, इसे मैंने अपने हाथों से सींचा था। यहाँ मेरे माता-पिता का साया था, मेरी पत्नी की खिलखिलाहट थी। मेरे बेटे ने मुझे बताया कि वह इसे रेनोवेट करा रहा है, पर उसने इसे बेच दिया और मुझे एक वृद्धाश्रम की वैन में बैठा दिया।"

अर्णव स्तब्ध रह गया। उसे याद आया कि जब उसने यह प्रॉपर्टी खरीदी थी, तो डील एक प्रॉपर्टी एजेंट के ज़रिए हुई थी। मालिक कोई युवा लड़का था जो जल्दबाज़ी में पैसे लेकर शहर छोड़ गया था।

"आज मेरी पत्नी की पुण्यतिथि है," माधवराव ने सुबकते हुए कहा, "घर के पिछवाड़े में जो हरसिंगार का पेड़ है, वह हमने मिलकर लगाया था। बस एक बार उस पेड़ के नीचे बैठकर दो मिनट प्रार्थना करना चाहता हूँ। फिर चला जाऊँगा।"

अर्णव का दिल पसीज गया। उसने माधवराव को अंदर बुलाया। विशाखा पहले तो झिझकी, पर जब उसे पूरी सच्चाई पता चली, तो उसकी आँखों में भी पानी आ गया। उसने देखा कि कैसे माधवराव घर के हर कोने को एक पवित्र मंदिर की तरह छू रहे थे। हरसिंगार के पेड़ के पास बैठकर उन्होंने अपनी पत्नी को याद किया और जाते समय अर्णव और विशाखा के सिर पर हाथ रखकर बहुत सारी दुआएं दीं।

माधवराव के जाने के बाद घर में एक अजीब सी खामोशी छा गई। विशाखा ने अर्णव से कहा, "सोचो अर्णव, हम यहाँ अजनबी हैं। हमारे बच्चे अकेले बड़े हो रहे हैं। तुम अक्सर टूर पर रहते हो, मैं अपनी जॉब फिर से शुरू करना चाहती हूँ पर भरोसेमंद हाथ नहीं मिलते। क्यों न हम माधवराव अंकल को यहीं रहने का प्रस्ताव दें?"

अर्णव ने थोड़ा संकोच किया, "क्या वह मानेंगे? और क्या हम एक अजनबी पर इतना भरोसा कर सकते हैं?"

"वह अजनबी नहीं हैं, वह इस घर की आत्मा हैं," विशाखा ने दृढ़ता से कहा। "उन्हें छत मिलेगी और हमें एक बड़ा-बुजुर्ग। बच्चों को वह दादा का प्यार मिलेगा जो उन्हें कभी नहीं मिला।"

माधवराव वापस आ गए। उनके आने से घर का अनुशासन ही बदल गया। जहाँ पहले विशाखा को बच्चों को सुबह उठाने के लिए युद्ध करना पड़ता था, अब माधवराव की हल्की थपकी और 'सुप्रभात' से बच्चे खुशी-खुशी उठने लगे। माधवराव का अनुभव घर के प्रबंधन में जादू की तरह काम करने लगा। बगीचा जो सूख रहा था, अब महकने लगा। रचित और रोहित, जो पहले मोबाइल गेम्स में डूबे रहते थे, अब शाम को दादाजी के साथ बैठकर शतरंज खेलते या उनके बचपन के किस्से सुनते।

पहली बार विशाखा ने महसूस किया कि घर में एक बुजुर्ग का होना केवल 'देखभाल' नहीं, बल्कि 'संस्कारों का प्रवाह' है। माधवराव ने बच्चों को धैर्य, प्रकृति से प्रेम और बड़ों का आदर करना सिखाया। विशाखा ने भी निश्चिंत होकर एक नई फर्म ज्वाइन कर ली, क्योंकि उसे पता था कि पीछे से 'दादाजी' सब संभाल लेंगे।

छह महीने बाद, अर्णव के प्रमोशन की खुशी में एक छोटी सी पार्टी रखी गई। विशाखा ने माधवराव के लिए एक नया कुर्ता खरीदा था। माधवराव भावुक हो गए। उन्होंने अपनी पुरानी अलमारी से एक लकड़ी का छोटा बॉक्स निकाला, जिसे उन्होंने बड़ी हिफाजत से रखा था।

"बेटा, यह मेरे पास आख़िरी निशानी है," उन्होंने अर्णव को एक पुरानी मगर बेशकीमती हाथ की घड़ी दी। "यह मेरे पिता ने मुझे दी थी। आज तुम मेरा बेटा बनकर मेरा ख्याल रख रहे हो, तो इस पर हक तुम्हारा है।"

अर्णव ने घड़ी लेने से मना किया, पर माधवराव की ज़िद के आगे उसे झुकना पड़ा। उस घड़ी की टिक-टिक में अर्णव को समय की कीमत नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट महसूस हुई। विशाखा ने देखा कि माधवराव ने उस घर के मुख्य द्वार पर फिर से वही पुरानी लकड़ी की नेमप्लेट लगा दी थी, जिसे अर्णव ने स्टोर रूम में डाल दिया था—"माधव कुंज"।

आज उस घर में केवल चार लोग नहीं रहते थे, बल्कि तीन पीढ़ियों का संगम था। शालू और सुधीर की तरह अर्णव और विशाखा ने भी यह सीख लिया था कि एक घर ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि अपनों के आशीर्वाद और बड़ों की छत्रछाया से बनता है। माधवराव की उपस्थिति ने उस घर को एक 'मकान' से 'नीड़' बना दिया था।

समाज अक्सर बुजुर्गों को 'रिटायर्ड' या 'अनुपयोगी' मानकर किनारे कर देता है, पर अर्णव के परिवार ने समझा कि वे तो वह जड़ हैं जो पूरे पेड़ को तूफानों में भी स्थिर रखती हैं। घर में बड़ों की मौजूदगी वह सुरक्षा कवच है जिसे कोई बीमा कंपनी प्रदान नहीं कर सकती।

लेखिका : निभा मलिक 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...