सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आत्मसम्मान

 उस कमरे में मेरे प्रवेश करते ही सन्नाटा पसर गया था। यह सन्नाटा मेरे लिए नया नहीं था। पिछले पच्चीस वर्षों से, जब से मैंने इस 'सुर-सदन' की बागडोर संभाली थी, मेरे कदमों की आहट ही काफी थी घर के माहौल को अनुशासित करने के लिए। कमरे के बीचोबीच रखा वह सिंथेसाइज़र (कीबोर्ड) मेरे लिए किसी अपशकुन से कम नहीं था।

"मैंने कितनी बार कहा है अनिकेत," मेरी आवाज़ में वह गूंज थी जो किसी दरबारी राग के आलाप में होती है, भारी और दवाबपूर्ण, "कि हमारे घराने की दीवारों के भीतर केवल तानपुरा और तबला गूंजेगा। यह प्लास्टिक का खिलौना और इससे निकलने वाली बेसुरी इलेक्ट्रॉनिक आवाज़ें हमारी साधना का अपमान हैं।"

अनिकेत ने सिर झुका लिया था। उसकी उंगलियां, जो अभी कुछ क्षण पहले तक उस कीबोर्ड पर थिरक रही थीं, अब डर के मारे कांप रही थीं।

"लेकिन बाबा, संगीत तो संगीत होता है," अनिकेत ने दबी जुबान में कहने की जुर्रत की, "इसमें भी सात सुर ही होते हैं। मैं राग यमन को नए तरीके से कंपोज़ कर रहा था..."

"खामोश!" मैं गुर्राया। "राग यमन की शुद्धता को तुम इन मशीनों से दूषित करोगे? तुम्हारे दादा जी, पंडित दीनानाथ मिश्र ने अपनी पूरी जिंदगी खपा दी सुरों की पवित्रता बचाने में, और तुम 'फ्यूजन' के नाम पर यह शोरगुल घर में लाओगे? जब तक मैं जिंदा हूं, इस घर की रीत नहीं टूटेगी। यह 'मिश्र घराना' है, कोई आर्केस्ट्रा पार्टी नहीं।"

मैंने आगे बढ़कर उस कीबोर्ड का तार सॉकेट से खींच दिया। अनिकेत की आंखों में आंसू थे, लेकिन मेरे लिए वे आंसू कमजोरी की निशानी थे, कलाकार की संवेदनशीलता नहीं। वह चुपचाप उठकर बाहर चला गया।

मैं अपनी विजय पर आश्वस्त होकर अपनी आरामकुर्सी पर बैठ गया। यह पहली बार नहीं था जब मैंने 'परंपरा' की ढाल बनाकर किसी नई सोच का गला घोंटा था। मुझे लगता था कि मैं एक रक्षक हूं, जो अपनी विरासत को प्रदूषित होने से बचा रहा है। लेकिन आज हवा में कुछ अलग ही भारीपन था।

रसोई से चाय लेकर आती हुई मेरी पत्नी, सुमित्रा, ने प्याला मेज पर ऐसे रखा जैसे कोई बहुत भारी बोझ उतार रही हो।

"क्या जरूरत थी बच्चे को इतना डांटने की?" उसने बिना मेरी तरफ देखे कहा।

मैं चौंका। सुमित्रा? वह सुमित्रा जो पिछले बीस सालों से मेरी छाया बनकर रही थी, जिसकी अपनी कोई आवाज़ नहीं थी, आज वह सवाल कर रही थी?

"तुम नहीं समझोगी सुमित्रा," मैंने उपेक्षा से कहा, "संगीत रियाज़ मांगता है, प्रयोग नहीं। अगर मैंने आज उसे नहीं रोका, तो कल वह गिटार लेकर आएगा, परसों ड्रम। हमारे खानदान की नाक कट जाएगी समाज में।"

"नाक तो तब भी कट रही थी जब आपने मेरी चित्रकारी छुड़वा दी थी," सुमित्रा के स्वर में एक अजीब सी तड़प थी।

मैं सिहर गया। यह एक ऐसा अतीत था जिसे मैंने अपनी यादों के तहखाने में दफन कर दिया था। शादी के समय सुमित्रा अपने साथ कैनवस और रंगों का बक्सा लाई थी। वह बेहतरीन चित्रकार थी। लेकिन मैंने उसे पहले ही दिन समझा दिया था कि एक संगीतज्ञ के घर में रंगों की गंध अच्छी नहीं लगती। हमारी साधना में विघ्न पड़ता है। मैंने उसे कहा था कि एक औरत का धर्म घर को संभालना है, न कि तस्वीरों में रंग भरना।

"मेरे घर में पेंट की महक से मेरा गला खराब होता है," मैंने तब तर्क दिया था। कितना हास्यास्पद तर्क था वह! लेकिन सुमित्रा ने उस दिन के बाद कभी ब्रश नहीं उठाया। उसने अपने रंगों को आंसुओं में घोलकर पी लिया था। मुझे लगा था कि मैंने उसे 'गृहलक्ष्मी' बना दिया, लेकिन आज मुझे एहसास हुआ कि मैंने दरअसल एक कलाकार की हत्या की थी।

"वह पुरानी बातें मत उखाड़ो," मैंने बात काटनी चाही, "मैं जो कर रहा हूं, अनिकेत के भले के लिए कर रहा हूं। उसे शास्त्रीय संगीत का सम्राट बनना है, कोई सड़क छाप बैंड मास्टर नहीं।"

"वह सम्राट तभी बनेगा जब वह अपने दिल का राजा होगा," सुमित्रा ने मेरी आंखों में देखते हुए कहा, "आप उसे अपना क्लोन बनाना चाहते हैं, कलाकार नहीं। आप भूल रहे हैं कि नदी का पानी अगर एक जगह ठहर जाए तो सड़ जाता है। संगीत को भी बहना चाहिए।"

वह चली गई, लेकिन उसके शब्द मेरे कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूंजते रहे। मुझे हमेशा लगता था कि मैं सुमित्रा से ज्यादा समझदार हूं, ज्यादा ज्ञानी हूं। आखिर मैं एक प्रतिष्ठित कलाकार था, दुनिया मुझे सुनती थी। लेकिन आज, मेरे अपने घर में, मेरी श्रोता ने मुझे अनसुना कर दिया था।

अगले दो दिन घर में अघोषित कर्फ्यू सा माहौल रहा। अनिकेत अपने कमरे से बाहर नहीं निकला। न रियाज़ की आवाज़ आई, न कीबोर्ड की। मुझे लगा कि मेरा अनुशासन काम कर गया है। लोहा गर्म था, मैंने चोट मार दी थी, अब वह सही आकार ले लेगा।

तीसरे दिन शहर के प्रतिष्ठित 'कला-कुंभ' का आयोजन था। मुझे वहां मुख्य अतिथि और निर्णायक के रूप में आमंत्रित किया गया था। यह मेरे लिए गर्व का विषय था। मैंने अनिकेत को तैयार होने के लिए कहा, क्योंकि मैं चाहता था कि वह देखे कि असली संगीत का सम्मान कैसे होता है।

"अनिकेत घर पर नहीं है," सुमित्रा ने सपाट स्वर में सूचना दी।

"कहाँ गया है?" मेरा पारा चढ़ने लगा।

"वह अपनी मंजिल तलाशने गया है," सुमित्रा ने संक्षिप्त उत्तर दिया और अपने काम में लग गई।

गुस्से में पैर पटकता हुआ मैं अकेला ही कार्यक्रम में गया। वहां का माहौल भव्य था। शहर के गणमान्य लोग, संगीत प्रेमी और आलोचक सब मौजूद थे। मेरी कुर्सी सबसे आगे थी। कई शास्त्रीय प्रस्तुतियां हुईं। मैं हर प्रस्तुति में कमियां निकालता रहा—कहीं श्रुति का दोष, कहीं ताल की चूक। मेरे अंदर का आलोचक संतुष्ट था कि नई पीढ़ी में वह बात नहीं जो हमारे जमाने में थी।

तभी उद्घोषक ने घोषणा की, "और अब, आज की शाम की सबसे विशेष प्रस्तुति। एक ऐसा प्रयोग जो परंपरा और आधुनिकता के सेतु को दर्शाता है। जोरदार तालियों से स्वागत कीजिये—बैंड 'नवनिनाद' का!"

पर्दा उठा और रोशनी मंच पर बिखरी। मेरी सांसें गले में अटक गईं। मंच के केंद्र में, आंखें मूंदे, हाथ में वही 'प्लास्टिक का खिलौना' यानी कीबोर्ड लिए, मेरा बेटा अनिकेत बैठा था। उसके साथ एक तबला वादक था और एक गिटार वादक।

मेरा पहला आवेग था कि मंच पर चढ़ जाऊं और यह तांडव बंद करवा दूं। यह मेरा अपमान था! मेरा बेटा, घराने की नाक कटाने, मेरे ही सामने मंच पर चढ़ गया? मैं उठने ही वाला था कि अनिकेत ने कीबोर्ड पर अपनी उंगलियां रखीं।

और फिर... एक आवाज़ गूंजी।

वह कोई शोर नहीं था। उसने कीबोर्ड पर जो स्वर छेड़े, वे 'राग दरबारी' के थे। गंभीर, गहरे और रूह को छू लेने वाले। गिटार ने उसका साथ दिया, लेकिन वह हावी नहीं हुआ, बल्कि उसने राग की गंभीरता को एक नया आयाम दिया। अनिकेत गा नहीं रहा था, उसका साज़ गा रहा था।

उसने परंपरा को तोड़ा नहीं था, उसने उसे विस्तार दिया था। उसने वह किया था जो मैं तीस साल में नहीं कर पाया—उसने शास्त्रीय संगीत को उन युवाओं के लिए सुलभ बना दिया था जो रॉक और पॉप के दीवाने थे। हॉल में बैठा हर शख्स मंत्रमुग्ध था।

मैं देख रहा था कि मेरे बगल में बैठे कट्टर शास्त्रीय आलोचक भी अपनी उंगलियों से ताल दे रहे थे। मेरे कानों में सुमित्रा की बात गूंजी— "नदी का पानी ठहर जाए तो सड़ जाता है।"

मैं ठहरा हुआ पानी था। मैं एक तालाब बनकर रह गया था, जिसे अपनी सीमाओं पर घमंड था। और मेरा बेटा? वह उस बाढ़ की तरह आया था जिसने मेरे किनारों को तोड़ दिया था, लेकिन तबाही मचाने के लिए नहीं, बल्कि मुझे समुद्र तक ले जाने के लिए।

संगीत समाप्त हुआ। एक पल का सन्नाटा छाया, और फिर हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। लोग अपनी सीटों से खड़े हो गए थे। "वन्स मोर! वन्स मोर!" की आवाज़ें आ रही थीं।

मैं सुन्न बैठा था। मेरी आंखों के सामने से मेरे घमंड की परतें उतर रही थीं। मुझे याद आया अनिकेत का वह डरा हुआ चेहरा जब मैं उसे डांटता था। मुझे याद आया सुमित्रा का वह मुरझाया हुआ चेहरा जब मैंने उसके कैनवस फेंकवा दिए थे। मैंने 'परंपरा' के नाम पर अपने ही घर के दो कलाकारों का गला घोंटा था। मैं संरक्षक नहीं था, मैं जेलर था।

अनिकेत ने माइक संभाला। उसकी सांसें फूल रही थीं, लेकिन चेहरे पर एक चमक थी—आत्मविश्वास की चमक।

"यह प्रस्तुति..." उसने भीड़ को संबोधित किया, "मैं अपने पिता, पंडित दीनदयाल जी को समर्पित करता हूं। उन्होंने मुझे सिखाया कि सुर ईश्वर हैं। मैंने बस उस ईश्वर को नई पोशाक पहनाई है।"

सबकी निगाहें मुझ पर टिक गईं। स्पॉटलाइट मेरे चेहरे पर थी। मुझे खड़ा होना पड़ा। मेरा शरीर कांप रहा था, गुस्से से नहीं, ग्लानि से।

अनिकेत मंच से नीचे उतरकर मेरे पास आया और मेरे पैर छुए। हमेशा की तरह मुझे उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देना चाहिए था, लेकिन आज मेरे हाथ नहीं उठे। मैंने उसे अपने गले लगा लिया।

मेरी आंखों से आंसू बह निकले। ये आंसू एक पिता के नहीं, एक पराजित अहंकारी के थे।

"मुझे माफ कर दो बेटा," मैंने उसके कान में फुसफुसाया, "मैं सुरों को पकड़ने की कोशिश कर रहा था, और तुम उन्हें पंख दे रहे थे।"

घर लौटते वक्त कार में सन्नाटा था, लेकिन यह वो डरावना सन्नाटा नहीं था जो अक्सर होता था। यह शांति थी।

घर पहुंचकर मैंने देखा सुमित्रा बैठक में ही बैठी हमारा इंतज़ार कर रही थी। उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं, शायद उसे डर था कि आज फिर कोई महाभारत होगा।

मैं सीधा उसके पास गया।

"सुमित्रा," मैंने कहा।

वह सहम गई।

"वह स्टोर रूम की चाबी कहाँ है?" मैंने पूछा।

"क्यों? क्या हुआ?" वह घबरा गई।

"मुझे वो पुराने कैनवस और रंग ढूंढने हैं। मुझे लगता है कि इस घर की दीवारों को अब सफेदी की नहीं, तुम्हारे रंगों की जरूरत है।"

सुमित्रा की आंखें फैल गईं। वह अविश्वास से मुझे देख रही थी। अनिकेत मुस्कुरा रहा था।

"और अनिकेत," मैंने पीछे मुड़कर कहा, "वह कीबोर्ड... उसे वापस अपने कमरे में लगा लो। कल सुबह हम एक जुगलबंदी करेंगे। मेरा तानपुरा और तुम्हारा कीबोर्ड। देखते हैं राग यमन में और क्या नया हो सकता है।"

उस रात, हमारे घर की खिड़कियां खुली थीं। बाहर बारिश हो रही थी, लेकिन अंदर का मौसम बदल चुका था। मेरे सिर पर तनी हुई 'घराने' की वह पुरानी, जर्जर छतरी मैंने उतार फेंकी थी। मैं भीग रहा था—नए विचारों में, नई धुनों में, और पहली बार मुझे ठंड नहीं लग रही थी। मुझे महसूस हो रहा था कि मैं जीवित हूं।

मेरे घर का अनुशासन टूट चुका था, लेकिन संगीत... संगीत आज पहली बार सही सुर में बज रहा था। सुमित्रा की दबी हुई हंसी और अनिकेत की उंगलियों की थिरकन ने मुझे बता दिया कि विरासत बचाने के लिए उसे तिजोरी में बंद करना जरूरी नहीं है, उसे खर्च करना, उसे बांटना और उसे समय के साथ बदलना ही असली संरक्षण है।

मैं, पंडित दीनदयाल, आज हार गया था। और मेरी हार में ही मेरे परिवार की, मेरे संगीत की और मेरे अस्तित्व की सबसे बड़ी जीत थी।

कागजों का वह पीला लिफाफा मीरा के हाथों में किसी जलते हुए अंगारे जैसा महसूस हो रहा था। कमरे में एसी चल रहा था, फिर भी उसके माथे से पसीने की बूंदें टपक कर उस रिपोर्ट पर गिर रही थीं, जिससे स्याही थोड़ी फैल गई थी।

धोखा? नहीं, यह शब्द बहुत छोटा था। यह तो एक सोची-समझी साजिश थी। एक ऐसा षड्यंत्र जिसे पिछले तीन सालों से प्यार, परवाह और समर्पण के नाम पर बुना जा रहा था।

मीरा की नजरें बार-बार उस 'प्रोजेक्ट अप्रूवल' और उसके साथ नत्थी 'मेडिकल रिपोर्ट' पर जाकर अटक रही थीं। पिछले आधे घंटे में उसका पूरा अतीत किसी फिल्म की रील की तरह उसकी आंखों के सामने घूम गया था। वह जिस इंसान को अपना देवता मानती थी, वह दरअसल एक बेहतरीन अभिनेता निकला।

उसके पति, अनिकेत, ने उसे बताया था कि यह लिफाफा उसके बिजनेस के कुछ पुराने कागजात का है जिसे रद्दी में देना है। लेकिन मीरा ने जब सफाई करते वक्त इसे खोला, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

अनंत... उसका पति, अभी शहर के प्रतिष्ठित 'बिजनेस टाइकून' की बेटी की शादी में गया हुआ था। मीरा ने सिर दर्द का बहाना बनाकर जाने से मना कर दिया था। असल में, सुबह ही दोनों के बीच काफी बहस हुई थी। अनिकेत चाहता था कि मीरा उस पुराने पुश्तैनी घर को बेचने के कागजों पर साइन कर दे, जो मीरा के पिता ने उसके नाम किया था। मीरा ने मना कर दिया था क्योंकि वह घर उसकी यादों का आखिरी सहारा था। इस पर अनिकेत ने उसे 'पागल' और 'जुनूनी' कह दिया था और गुस्से में घर से निकल गया था।

अब, इस खाली घर में, मीरा के हाथ में वह सच था जो अनिकेत की हर जिद और हर 'प्यार' की व्याख्या कर रहा था।

वह रिपोर्ट किसी बीमारी की नहीं थी। वह एक 'साजिश' का दस्तावेज था। उसमें अनिकेत और एक मनोचिकित्सक (जो अनिकेत का खास दोस्त था) के बीच के ईमेल और एक फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट का ड्राफ्ट था।

उसमें साफ लिखा था: "पेशेंट मीरा शर्मा धीरे-धीरे मानसिक संतुलन खो रही हैं। वह अपने वित्तीय फैसले लेने में असमर्थ हैं। इसलिए उनकी सारी संपत्ति का 'पावर ऑफ अटॉर्नी' उनके पति अनिकेत को सौंपा जाना अनिवार्य है।"

मीरा का गला सूख गया। उसे याद आया कि कैसे पिछले छह महीनों से अनिकेत उसे यह एहसास दिलाने की कोशिश कर रहा था कि वह भूलने लगी है।

"मीरा, तुमने गैस खुली छोड़ दी थी।"

"मीरा, तुमने फिर से चाबियां खो दीं।"

"मीरा, तुम आजकल बहुत अजीब बर्ताव कर रही हो, तुम्हें डॉक्टर को दिखाना होगा।"

वह उसे 'मल्टीविटामिन' के नाम पर जो दवाइयां दे रहा था, उनकी लैब रिपोर्ट भी इसी फाइल में थी। वे हल्के 'सिडेटिव्स' (नशे और नींद की दवाएं) थे। यानी, वह जानबूझकर उसे सुस्त और भ्रमित कर रहा था ताकि कोर्ट में यह साबित कर सके कि मीरा पागल हो चुकी है।

मीरा दीवार के सहारे धीरे-धीरे नीचे बैठ गई। उसे वह दिन याद आया जब उसकी मुलाकात अनिकेत से हुई थी। वह एक आर्ट गैलरी में थी। अनिकेत ने उसकी पेंटिंग की तारीफ की थी। उसने वही बातें कही थीं जो मीरा सुनना चाहती थी। मीरा को लगा था कि उसे उसका 'सोलमेट' मिल गया।

"हमारी पसंद कितनी मिलती है, मीरा," अनिकेत अक्सर कहता था।

आज उस फाइल के आखिरी पन्ने पर अनिकेत की डायरी का एक नोट मिला। उस पर तारीख उनकी पहली मुलाकात से दो महीने पहले की थी।

उसमें लिखा था: "टार्गेट: मीरा अवस्थी। संपत्ति: 50 करोड़ का 'अवनि विला'। कमजोरी: अकेलापन और आर्ट। प्लान: संयोग से मुलाकात और छह महीने के अंदर शादी।"

मीरा को उबकाई आने लगी। तो वह प्यार नहीं था? वह आर्ट गैलरी की मुलाकात संयोग नहीं थी? वह सब एक 'असाइनमेंट' था? अनिकेत ने उसके बारे में सब कुछ पहले से रिसर्च कर रखा था। उसे क्या पसंद है, वह किस बात पर भावुक होती है, उसके पिता की मृत्यु के बाद वह कितनी अकेली है—अनिकेत ने हर जानकारी का इस्तेमाल एक हथियार की तरह किया था।

उसने मीरा के खालीपन को भरा नहीं था, बल्कि उस खालीपन का सौदा किया था।

मीरा की नजर सामने दीवार पर टंगी उनकी शादी की तस्वीर पर पड़ी। अनिकेत की वह मुस्कान, जो उसे दुनिया की सबसे मासूम मुस्कान लगती थी, अब किसी भेड़िये की हंसी जैसी लग रही थी।

"मैं कितनी मूर्ख थी," मीरा बुदबुदाई। "मैं सोचती थी कि ससुराल वाले मुझे अपना नहीं पा रहे क्योंकि मैं शायद उनके तौर-तरीकों में फिट नहीं बैठती। लेकिन सच तो यह है कि मुझे कभी 'बहू' समझा ही नहीं गया। मैं तो बस एक 'चाबी' थी उस तिजोरी की, जिसे अवनि विला कहते हैं।"

अनिकेत के परिवार वालों का व्यवहार... उसकी सास का वह मीठा जहर। "अरे बेटा, तुम आराम करो, ये कागज-पत्तर के काम अनिकेत देख लेगा। तुम क्यों दिमाग खपाती हो?"

वे सब मिले हुए थे। पूरा परिवार इस नाटक का हिस्सा था।

अचानक बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई। अनिकेत आ गया था। शायद वह अपना फोन या वॉलेट भूल गया होगा, या फिर मीरा को चेक करने आया होगा कि दवा का असर हुआ या नहीं।

मीरा का दिल जोर से धड़का। उसका पहला मन हुआ कि रोए, चिल्लाए और अनिकेत से सवाल करे। लेकिन फिर उसकी नजर उस मेडिकल रिपोर्ट पर पड़ी। अगर उसने अभी हंगामा किया, तो अनिकेत उसे 'हिस्टीरिया' का दौरा बताकर साबित कर देगा कि वह पागल है। वह डॉक्टर को बुला लेगा और उसे इंजेक्शन लगवा देगा।

नहीं। अब वह पुरानी, भावुक मीरा नहीं रह सकती थी।

उसने जल्दी से वह फाइल बंद की। उसे वापस उसी दराज में सबसे नीचे छिपा दिया जहां से उसे मिली थी। उसने अपने आंसू पोंछे, बिखरे बालों को ठीक किया और चेहरे पर वही भोलापन ओढ़ने की कोशिश की जो अनिकेत देखना चाहता था।

दरवाजा खुला। अनिकेत अंदर आया। वह शेरवानी में बहुत ही आकर्षक लग रहा था—बिलकुल उस राजकुमार जैसा जिसका सपना मीरा ने देखा था, लेकिन जिसके अंदर एक राक्षस छिपा था।

"तुम अभी तक जगी हो?" अनिकेत ने हैरानी से पूछा। उसकी नजरें मीरा के चेहरे को टटोल रही थीं। "सिरदर्द ठीक हुआ?"

मीरा ने एक गहरी सांस ली। उसे लगा कि वह सांस नहीं, जहर पी रही है। उसने मुस्कुराने की कोशिश की। "हां अनिकेत, मैंने वो दवाई ले ली थी जो तुमने दी थी। अब बेहतर लग रहा है।"

अनिकेत के चेहरे पर राहत दिखाई दी। "गुड। तुम्हें अपना ख्याल रखना चाहिए मीरा। तुम जानती हो न, मैं तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं हूं।"

मीरा के अंदर घृणा का एक ज्वालामुखी फट रहा था, लेकिन उसकी आवाज शांत थी। "हां, जानती हूं। अनिकेत, मैं सोच रही थी... सुबह जो बात हुई..."

अनिकेत सतर्क हो गया। "हां? क्या?"

"मुझे लगता है तुम सही कह रहे थे," मीरा ने अपनी अंगूठी के साथ खेलते हुए कहा, जैसे वह बहुत नर्वस हो। "मैं शायद ज्यादा ही भावुक हो रही हूं। वह पुराना घर खंडर ही तो है। अगर उसे बेचकर तुम्हारे बिजनेस में मदद मिलती है, तो मुझे क्या एतराज हो सकता है?"

अनिकेत की आंखों में चमक आ गई। वह चमक, जो जीत की थी। "सच में मीरा? तुम... तुम तैयार हो साइन करने के लिए?"

"हां," मीरा ने उसकी आंखों में सीधे देखते हुए झूठ बोला। "लेकिन आज नहीं। आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है और मेरा हाथ भी कांप रहा है। कल... कल सुबह हम वकील के पास चलेंगे। मैं पावर ऑफ अटॉर्नी तुम्हारे नाम कर दूंगी।"

अनिकेत ने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया। "थैंक यू, मीरा! तुम नहीं जानती तुमने मेरी कितनी बड़ी मुश्किल हल कर दी। तुम दुनिया की सबसे अच्छी पत्नी हो।"

अनिकेत की बांहों में कैद मीरा की आंखें खुली थीं और पथरा गई थीं। उसे उस आलिंगन में अब गर्माहट नहीं, बल्कि एक अजगर की जकड़न महसूस हो रही थी।

"जाओ, तुम कपड़े बदल लो," मीरा ने खुद को छुड़ाते हुए कहा। "मैं तुम्हारे लिए कॉफी बनाती हूं।"

अनिकेत सीटी बजाते हुए बेडरूम में चला गया। उसे लगा कि उसका 'प्रोजेक्ट' सफल हो गया है। शिकार जाल में पूरी तरह फंस चुका है।

मीरा रसोई में गई। उसने कॉफी का पानी चढ़ाया। लेकिन उसके दिमाग में कॉफी नहीं, कुछ और ही चल रहा था।

उसने अपनी जेब से अपना फोन निकाला और बाथरूम में जाकर दरवाजा बंद कर लिया। उसने अपने पिता के पुराने वकील, मिस्टर खन्ना का नंबर मिलाया।

"हेलो, अंकल? मैं मीरा बोल रही हूं। नहीं... सब ठीक नहीं है। मुझे आपकी मदद चाहिए। अभी, इसी वक्त।"

मीरा ने सिसकते हुए नहीं, बल्कि एक सधी हुई आवाज में बात की। "मुझे अपनी वसीयत बदलनी है। और मुझे अनिकेत के खिलाफ फ्रॉड और मेंटल हैरेसमेंट का केस फाइल करना है। मेरे पास सबूत हैं। उसकी डायरी, वो फर्जी मेडिकल रिपोर्ट्स की कॉपी, सब मैंने अपने फोन में स्कैन कर लिया है।"

उधर से मिस्टर खन्ना की हैरान आवाज आई, "बेटा, तुम ोर हो? यह बहुत बड़ा कदम है।"

"मैं इतनी श्योर कभी नहीं थी अंकल," मीरा ने कहा। "और हां, एक बात और। अवनि विला को 'हेरिटेज ट्रस्ट' में दान करने के पेपर्स भी तैयार रखिएगा। अगर वह घर मेरा नहीं हो सकता, तो वह अनिकेत के बिजनेस का 'पार्किंग लॉट' भी नहीं बनेगा।"

फोन रखकर मीरा ने आईने में खुद को देखा। उसकी आंखों के नीचे काले घेरे थे, चेहरा पीला था, लेकिन उसकी आंखों में एक नई आग थी। वह आग, जो सब कुछ जलाकर खाक कर सकती थी।

उसने अनिकेत के लिए कॉफी बनाई। उसमें उसने वही 'सिडेटिव' (नींद की गोली) पीसकर मिला दी जो अनिकेत उसे रोज देता था।

जब वह कमरे में कॉफी लेकर पहुंची, तो अनिकेत बिस्तर पर लेटा फोन देख रहा था।

"लो कॉफी," मीरा ने प्यार से कप बढ़ाया।

"थैंक्स डार्लिंग," अनिकेत ने एक घूंट भरा। "कल का दिन हमारे लिए बहुत बड़ा है। एक नई शुरुआत।"

"बिल्कुल," मीरा मन ही मन मुस्कुराई। "एक नई शुरुआत। लेकिन वैसी नहीं जैसी तुम सोच रहे हो।"

आधे घंटे बाद, अनिकेत गहरी नींद में सो चुका था। मीरा उठी। उसने अपनी अलमारी से एक छोटा सूटकेस निकाला। उसमें उसने अपने जरूरी कागजात, गहने (जो उसके पिता ने दिए थे), और अपना लैपटॉप रखा। उसने अनिकेत की वह फाइल भी साथ रख ली—सबूत के तौर पर।

जाते-जाते वह अनिकेत के सिरहाने रुकी। वह कितनी शांति से सो रहा था, अपनी जीत के नशे में। मीरा ने अपनी शादी की अंगूठी उतारी और उसे नाइट-लैंप के नीचे उस फर्जी मेडिकल रिपोर्ट के ऊपर रख दिया।

उसने वहां एक छोटा सा नोट लिखा:

"मेरे 'पागलपन' का इलाज मुझे मिल गया है अनिकेत। उसका नाम है—सच। अवनि विला अब एक सरकारी अनाथालय बनेगा। और रही बात पावर ऑफ अटॉर्नी की, तो मेरे वकील तुम्हें कोर्ट में मिलेंगे। गुड बाय, मिस्टर एक्टर।"

मीरा ने घर का दरवाजा धीरे से बंद किया। बाहर रात थी, लेकिन उसे अंधेरा नहीं लग रहा था। सड़क पर ठंडी हवा चल रही थी। उसने एक टैक्सी रोकी।

"कहां जाना है मैडम?" ड्राइवर ने पूछा।

"स्टेशन," मीरा ने कहा। और फिर खिड़की से बाहर देखते हुए उसने महसूस किया कि वह भाग नहीं रही है। वह तो अब जाकर अपनी असली जिंदगी की तरफ कदम बढ़ा रही है। वह अब किसी की लिखी हुई स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं थी। वह अपनी कहानी खुद लिखने जा रही थी।

पीछे, उस आलीशान अपार्टमेंट में अनिकेत सो रहा था, इस बात से बेखबर कि सुबह जब उसकी आंख खुलेगी, तो उसके पास न पत्नी होगी, न घर, और न ही वह दौलत जिसके लिए उसने अपनी आत्मा बेच दी थी। मीरा ने उसे वही दिया था जो उसने मीरा को दिया था—एक खूबसूरत धोखा। फर्क बस इतना था कि अनिकेत का धोखा लालच के लिए था, और मीरा का धोखा आत्मसम्मान के लिए।

गाड़ी ने रफ्तार पकड़ी और मीरा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...