शहर की सबसे ऊँची और आलीशान इमारत के चौंतीसवें माले पर स्थित अपने भव्य केबिन में बैठा निशांत आज भी फाइलों और लैपटॉप की स्क्रीन में उलझा हुआ था। उसे इस शहर में आए हुए सात साल हो चुके थे। इन सात सालों में उसने जो मुकाम हासिल किया था, वह किसी भी आम इंसान के लिए एक बहुत बड़ा सपना हो सकता था। लेकिन इस कामयाबी की कीमत उसने अपनी जड़ों से कटकर चुकाई थी। अपनी माँ, सुशीला देवी को वह उस छोटे से शहर में अकेला छोड़ आया था। हर महीने एक मोटी रकम उनके खाते में पहुँच जाती थी, घर में नौकर-चाकर लगा दिए गए थे, लेकिन निशांत के पास जो एक चीज़ नहीं थी, वह था—वक्त।
अक्सर जब सुशीला देवी का फोन आता, तो निशांत का एक ही रटा-रटाया जवाब होता, "माँ, अभी मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ।" और वह 'बाद' कभी नहीं आता था।
आज भी वह अपनी एक अहम विदेशी क्लाइंट के साथ मीटिंग की तैयारी कर रहा था कि तभी रिसेप्शन से इंटरकॉम पर आवाज़ आई, "सर, आपसे कोई मिलने आया है। उनका कहना है कि वो आपके शहर से आई हैं, नाम कावेरी बता रही हैं।"
निशांत ने माथा सिकोड़ा। कावेरी? उसे याद आया, कावेरी उसकी माँ के पड़ोस में रहने वाली एक लड़की थी जो अक्सर उनकी देखभाल किया करती थी। निशांत ने झिझकते हुए उसे अंदर भेजने को कहा।
कुछ ही पलों में केबिन का दरवाज़ा खुला। कावेरी अंदर दाखिल हुई। उसके चेहरे पर एक अजीब सी वीरानी और आँखों में एक गहरी उदासी थी। उसके हाथों में एक पुराना सूती झोला था। निशांत ने कुर्सी से उठते हुए पूछा, "कावेरी तुम? अचानक यहाँ कैसे? माँ कैसी हैं? सब ठीक तो है न?"
कावेरी कुछ पल तक खामोश रही। उसने उस आलीशान केबिन को देखा, निशांत के महंगे सूट को देखा और फिर एक ठंडी, कांपती हुई सांस ली।
"निशांत जी, मैंने तो आपको आज पहली बार इतने करीब से देखा है," कावेरी की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। "सुशीला ताई हमेशा आपका ज़िक्र किया करती थीं। उनके दिन की शुरुआत आपके नाम से होती थी और रात आपके इंतज़ार में कटती थी। पर पिछले पांच सालों से मैंने तो आपको ना किसी त्यौहार पर उस घर में देखा, ना ही उनके किसी खास मौके पर। ना कभी आप उनके घुटनों के दर्द में शामिल हुए, ना ही कभी उनके द्वारा की गई किसी पूजा या खुशी में शरीक हुए।"
निशांत को कावेरी की बातें चुभने लगीं। "देखो कावेरी, मैं यहाँ बहुत व्यस्त रहता हूँ। मैंने माँ के लिए पैसों की या सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं रखी है। तुम मुझे यहाँ ये ताने मारने आई हो?"
"ताने नहीं निशांत जी, हकीकत बता रही हूँ," कावेरी ने अपने झोले में हाथ डाला और एक हाथ से बुना हुआ नीले रंग का स्वेटर और एक पुरानी सी डायरी निकालकर निशांत की मेज़ पर रख दी। "ये अवसर तो नहीं है निशांत जी, पर फिर भी ये सौगात और ये डायरी मैं आपको दे रही हूँ। इसलिए कि, आप से फिर कभी मेरी मुलाकात हो भी या शायद कभी नहीं।"
निशांत की नज़र उस स्वेटर पर टिक गई। उसकी माँ की आँखों की रोशनी बहुत कमज़ोर हो चुकी थी, फिर भी वह स्वेटर बुना गया था।
कावेरी की आँखों से आंसू छलक पड़े। उसने भर्राए हुए गले से कहा, "ये तोहफा सुशीला ताई आपको अपने हाथों से देना चाहती थीं। कल आपका जन्मदिन था, याद है आपको? उन्होंने महीनों पहले से ये स्वेटर बुनना शुरू किया था। कह रही थीं कि शहर के बड़े दफ्तरों में बहुत एसी चलता है, मेरे निशांत को ठंड लग जाएगी। वो कल इसी शहर में आई थीं, आपके इसी ऑफिस की इमारत के नीचे खड़ी थीं। उन्होंने आपको अपनी बड़ी सी गाड़ी से उतरते भी देखा, पर आपके साथ कुछ विदेशी लोग थे। ताई ने सोचा कि उनका बेटा बड़े लोगों के साथ है, अगर वो अपने इन साधारण कपड़ों में आपके पास गईं, तो कहीं आपको शर्मिंदगी न हो। इसलिए वो बिना आपसे मिले, मुझे ये पैकेट थमाकर वापस स्टेशन की तरफ मुड़ गईं।"
निशांत की धड़कनें जैसे रुकने लगीं। "मुड़ गईं? मतलब? वो कहाँ हैं अभी?"
कावेरी फफक कर रो पड़ी। "लौटते वक्त बस स्टैंड के पास उनका एक्सीडेंट हो गया निशांत जी। कल रात अस्पताल में उन्होंने मेरी गोद में आखिरी सांस ली। उनकी सांसों की लड़ी टूट गई... और जाते-जाते भी उनकी जुबान पर सिर्फ आपका ही नाम था।"
निशांत के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे लगा जैसे केबिन की दीवारें उस पर गिर रही हैं। उसने कांपते हाथों से उस डायरी को उठाया। डायरी का पहला ही पन्ना खुला, जहाँ उसकी माँ की कांपती हुई लिखावट में दर्ज था:
"आज निशांत का फोन आया था। बस पंद्रह सेकंड बात हुई। बोला बहुत बिजी है। कोई बात नहीं, मेरा बच्चा मेरे लिए ही तो इतनी मेहनत कर रहा है। भगवान उसे हर कामयाबी दे।"
पन्ने पलटते गए और हर पन्ने पर सिर्फ एक माँ का इंतज़ार लिखा था। आखिरी पन्ने पर कल की ही तारीख थी:
"आज मेरे बेटे का जन्मदिन है। मैं उसे दूर से ही देखकर लौट आई। वो कोट-पैंट में बहुत बड़ा अफसर लग रहा था। मुझे उस पर बहुत गर्व है। ये डायरी और स्वेटर कावेरी के हाथ भिजवा दूंगी। मेरा बेटा ऊंचाइयों को छुए, बस यही प्रार्थना है। काश एक बार उसे सीने से लगा पाती।"
निशांत धम्म से ज़मीन पर बैठ गया। वह फूट-फूट कर रोने लगा। वो दौलत, वो शोहरत, वो आलीशान ऑफिस—सब उसे इस पल मिट्टी के समान लग रहे थे। उसने उस नीले स्वेटर को अपने सीने से लगा लिया, जिसमें अब भी उसकी माँ के हाथों की और उनके प्यार की खुशबू बसी थी।
उसे याद आया कि कैसे बचपन में माँ खुद फटे हुए कपड़े पहनती थी लेकिन निशांत के लिए हमेशा नए कपड़े लाती थी। और उसने क्या किया? उसने अपनी माँ की ममता को चंद पैसों और बैंक बैलेंस से तौल दिया। उसने अपनी व्यस्तता का ऐसा महल खड़ा किया, जिसकी नींव में उसकी माँ का अकेलापन घुट-घुट कर मर गया।
निशांत को आज एहसास हो रहा था कि पैसा सिर्फ ज़रूरतें पूरी कर सकता है, मौजूदगी नहीं। रिश्तों की अहमियत तब तक समझ नहीं आती, जब तक वो हमेशा के लिए हमसे छिन नहीं जाते। निशांत रोता रहा, चीखता रहा, लेकिन अब उस आलीशान केबिन में उसके आंसुओं को पोंछने वाला, उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरने वाला कोई नहीं था। उसकी कामयाबी की कीमत उसकी माँ की आखिरी सांसों ने चुकाई थी।
क्या आपके जीवन में भी ऐसे कोई अपने हैं जो आपकी एक आवाज़, आपके थोड़े से वक्त के लिए तरस रहे हैं? याद रखिए, वक्त लौट कर नहीं आता। आज ही उन्हें फोन करें, उनसे मिलें। अपनों की कद्र उनके रहते करें, जाने के बाद तो सिर्फ पछतावा ही हिस्से में आता है।
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