कमरा नंबर 102 में एसी की धीमी घड़घड़ाहट और वेंटिलेटर की 'बीप-बीप' के अलावा एक भारी सन्नाटा पसरा हुआ था। उस आलीशान कमरे की हर चीज़ कीमती थी—दीवारों पर लगी पेटिंग्स, मखमली सोफे और वो बिस्तर जिस पर सावित्री देवी लेटी हुई थीं। लेकिन उस बिस्तर पर लेटे हुए इंसान की कीमत अब शायद उस कमरे में रखे डस्टबिन से भी कम रह गई थी।
सावित्री देवी का शरीर अब हड्डियों का ढांचा भर रह गया था। कभी जिन आँखों के इशारे पर पूरी हवेली थर्राती थी, आज वो आँखें छत के पंखे को ताकती रहती थीं, पूरी तरह से भावहीन। लकवा (पैरालिसिस) ने उनके शरीर के दाहिने हिस्से को बेकार कर दिया था और जुबान को भी लगभग छीन लिया था।
तभी कमरे का दरवाजा खुला। हाथों में दलिया का कटोरा और दवाइयाँ लिए वंदना ने प्रवेश किया। वंदना को देखते ही सावित्री देवी की आँखों में एक अजीब सी चमक आई—वो चमक गुस्से की थी, शर्मिंदगी की थी या लाचारी की, यह तय कर पाना मुश्किल था।
वंदना ने चुपचाप कटोरा मेज पर रखा और सावित्री देवी के सिरहाने बैठकर उन्हें सहारा देकर उठाने लगी।
"उठिए माजी, दवाई का वक्त हो गया है," वंदना की आवाज़ में न तो मिठास थी, न कड़वाहट। बस एक सपाट सा फर्ज था।
सावित्री देवी ने अपने सही वाले हाथ से वंदना का हाथ झटकने की कोशिश की। उनके गले से एक अजीब सी 'घुर्र-घुर्र' की आवाज़ निकली। वो शायद कहना चाहती थीं—"मुझे मत छू! दूर रह मुझसे।"
वंदना ने एक गहरी सांस ली। उसने जबरदस्ती नहीं की, बस वहीं कुर्सी पर बैठ गई।
"माजी, नखरे मत कीजिये। डॉक्टर ने कहा है कि अगर आप खाएंगी नहीं, तो शरीर में जो बचे-खुचे प्राण हैं, वो और तड़पेंगे। और आप जानती हैं न..." वंदना ने उनकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "...इतनी आसानी से आपको मुक्ति नहीं मिलने वाली।"
सावित्री देवी की आँखों से आंसू की एक बूंद लुढ़क कर उनके झुर्रीदार गालों पर आ गिरी। अतीत की परछाइयाँ कमरे में नाचने लगीं।
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बीस साल पहले, यही सावित्री देवी शहर की जानी-मानी हस्ती थीं। पति के बड़े बिजनेस को संभालने वाली एक सख्त महिला। उनका बेटा, राघव, उनकी दुनिया था, लेकिन वो दुनिया उनकी शर्तों पर चलती थी। जब राघव ने एक साधारण स्कूल टीचर की बेटी, वंदना, से शादी करने की जिद की, तो सावित्री देवी का अहंकार फन फैलाकर खड़ा हो गया था।
शादी तो हो गई, लेकिन वंदना के लिए वो घर ससुराल नहीं, एक जेल बन गया।
"अरे ओ महारानी! ये क्या पहनकर नीचे आ गई? हमारे घर की बहुएं ऐसे सूती कपड़े नहीं पहनतीं," पहले ही दिन नाश्ते की मेज पर सावित्री देवी ने वंदना को जलील किया था।
वंदना ने अपनी तरफ से हर कोशिश की। वो सुबह पांच बजे उठती, पूरे घर का काम करती, सावित्री देवी के पैरों में तेल लगाती, उनकी हर कड़वी बात को सिर झुकाकर सुन लेती। उसे लगा था कि शायद उसका प्यार और समर्पण एक दिन सास का दिल जीत लेगा। लेकिन सावित्री देवी का दिल पत्थर का नहीं, बर्फ का था—जो कभी पिघला ही नहीं, बस जमा रहा।
हद तो तब हो गई जब वंदना गर्भवती हुई। डॉक्टर ने उसे आराम करने को कहा था, लेकिन सावित्री देवी ने घर के नौकरों को छुट्टी दे दी।
"कामचोर कहीं की! हम भी माँ बने हैं, खेतों में काम करते-करते बच्चे पैदा किये हैं। ये आजकल की लड़कियों के चोंचले हैं सब," सावित्री देवी ने ताना मारा था।
सातवें महीने में, घर की सीढ़ियों पर भारी बाल्टी उठाते वक्त वंदना का पैर फिसल गया। वो दर्द से चीखती रही, लेकिन सावित्री देवी अपनी किटी पार्टी के लिए तैयार होकर निकल गईं, यह कहते हुए कि "नाटक कर रही है, अभी उठ जाएगी।"
जब तक राघव ऑफिस से आया और उसे अस्पताल ले गया, बहुत देर हो चुकी थी। वंदना ने अपना बच्चा खो दिया था। और उसके साथ ही उसने अपनी वो सहनशीलता भी खो दी थी जो उसे बांधे हुए थी।
उस दिन अस्पताल के बिस्तर पर वंदना ने राघव से सिर्फ एक वाक्य कहा था—"राघव, अब या तो मैं उस घर में रहूँगी या आपकी माँ। फैसला आपको करना है।"
राघव माँ का भक्त था, लेकिन उस दिन उसने अपनी पत्नी की सूनी कोख और आँखों का खालीपन देख लिया था। वो वंदना को लेकर अलग घर में शिफ्ट हो गया।
सावित्री देवी ने खूब हंगामा किया। "जा! तू मेरा बेटा नहीं। उस कुलच्छनी के पीछे तूने अपनी माँ को छोड़ दिया? देख लेना, एक दिन तू रोता हुआ मेरे पास आएगा। मेरी दौलत की एक फूटी कौड़ी तुम दोनों को नहीं मिलेगी।"
सावित्री देवी ने उन्हें अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया। राघव और वंदना ने शून्य से शुरुआत की। उन्होंने बहुत संघर्ष किया, लेकिन कभी पलटकर हवेली की तरफ नहीं देखा।
समय अपनी चाल चलता रहा। दस साल बीत गए। राघव और वंदना की जिंदगी पटरी पर आ गई थी। भगवान की दया से उनकी एक बेटी भी हुई—जिया।
उधर, हवेली में सावित्री देवी अकेली रह गई थीं। पति का देहांत पहले ही हो चुका था। बेटा जा चुका था। दौलत तो बहुत थी, लेकिन उस दौलत को भोगने वाला कोई अपना नहीं था। रिश्तेदार आते, खाते-पीते, उनकी झूठी तारीफें करते और चले जाते। नौकर-चाकर उन्हें लूट रहे थे, पर सावित्री देवी अपने अहंकार में यह देख नहीं पाईं।
फिर वो काली रात आई। सावित्री देवी बाथरूम में गिरीं और ब्रेन स्ट्रोक का शिकार हो गईं। तीन दिन तक वो उसी बाथरूम में पड़ी रहीं। नौकर पैसे और गहने लेकर भाग चुके थे। जब दूध वाले ने पुलिस को खबर दी, तब जाकर दरवाजा टूटा।
अस्पताल ने राघव को फोन किया। राघव का मन नहीं था जाने का, लेकिन वो वंदना ही थी जिसने कहा, "राघव, वो माँ हैं। चलिए।"
अस्पताल में जब सावित्री देवी को होश आया, तो उन्होंने देखा कि उनका शरीर हिल नहीं पा रहा। उनकी जुबान लड़खड़ा रही थी। डॉक्टर ने कहा कि अब उन्हें चौबीस घंटे सेवा की जरूरत है।
रिश्तेदारों ने मुँह फेर लिया। "अरे, अब इस बुढ़िया की गंदगी कौन साफ़ करेगा?" सबने बहाने बना लिए।
तब वंदना ने एक फैसला लिया। वो सावित्री देवी को अपने घर ले आई। उसी छोटे से फ्लैट में, जहाँ उसने और राघव ने अपनी दुनिया बसाई थी।
राघव ने मना किया, "वंदना, तुम भूल गई हो उन्होंने तुम्हारे साथ क्या किया था? हमारे पहले बच्चे का कातिल उनका अहंकार है।"
वंदना ने शांत स्वर में कहा, "मैं कुछ नहीं भूली राघव। लेकिन अगर मैं उन्हें उनके हाल पर छोड़ दूँ, तो मुझमें और उनमें क्या फर्क रह जाएगा? मेरा बदला मेरा 'कर्म' है, उनका 'तिरस्कार' नहीं।"
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आज छह महीने हो चुके थे।
वंदना ने चम्मच से दलिया सावित्री देवी के मुँह में डाला। सावित्री देवी की आँखों से लगातार पानी बह रहा था। वो निगलने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन खाना गले से नीचे उतरना मुश्किल हो रहा था।
"खाइये माजी," वंदना ने उनके मुँह के कोने को पोंछा। "अभी तो आपको बहुत जीना है।"
सावित्री देवी ने बड़ी मुश्किल से अपनी लड़खड़ाती जुबान से कुछ शब्द जोड़े।
"क... क्यूं...?"
वंदना समझ गई। वो पूछ रही थीं—"तू मेरी सेवा क्यों कर रही है? मैंने तुझे नर्क दिया, तू मुझे स्वर्ग क्यों दे रही है?"
वंदना ने कटोरा नीचे रखा। उसने सावित्री देवी के बालों को ठीक किया। बीस साल पहले इन्ही हाथों ने वंदना के बाल खींचे थे, आज वही हाथ उन पर मरहम लगा रहे थे।
"माजी," वंदना ने कहा, "आप सोच रही हैं कि मैं कोई महान बनने का नाटक कर रही हूँ? नहीं। मुझे आज भी वो दिन याद है जब मेरा बच्चा मेरी कोख से चला गया था। मुझे आज भी याद है जब आपने मुझे 'कुलच्छनी' कहा था। दिल तो मेरा आज भी जलता है।"
सावित्री देवी की आँखें भय से फैल गईं।
"लेकिन..." वंदना ने आगे कहा, "मैं एक माँ हूँ। और एक माँ जानती है कि औलाद से ठुकराए जाने का दर्द क्या होता है। राघव आपको देखना भी नहीं चाहते थे। वो तो मेरे कहने पर आपको यहाँ लाए हैं। आप जानती हैं, यह आपकी सबसे बड़ी सजा है। यह लकवा आपकी सजा नहीं है माजी, आपकी सजा यह है कि आप उस बहू के टुकड़ों पर पल रही हैं जिसे आपने कभी इंसान नहीं समझा। आपकी सजा यह है कि आप बोल नहीं सकतीं, लेकिन आपको मेरी हर बात सुननी पड़ रही है। आप चाहकर भी मुझे धक्के देकर घर से नहीं निकाल सकतीं।"
सावित्री देवी का पूरा शरीर कांपने लगा। यह सच था। यह बहुत कड़वा सच था। वो हर पल मर रही थीं। जब वंदना उनके गंदे कपड़े बदलती, तो सावित्री देवी को अपनी दौलत पर थूकने का मन करता। वो करोड़ों के बंगले की मालकिन, आज अपनी बहू की दया की भिखारिन थी।
सावित्री देवी ने अचानक वंदना का हाथ कसकर पकड़ लिया। उनकी आँखों में एक याचना थी। वो कुछ कहना चाह रही थीं।
"म... मा... र... दो..."
वो मौत मांग रही थीं। वो कह रही थीं—"मुझे ज़हर दे दो, मुझे मार दो, अब यह बोझ नहीं सहा जाता।"
वंदना ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया, लेकिन इस बार उसने हाथ नहीं झटका। उसकी आँखों में नमी आ गई। उसने वही शब्द कहे जो उस रात सावित्री देवी के कानों में पिघले शीशे की तरह उतरे।
"माजी, **अपने कर्मों का फल जब तक मनुष्य भोग नहीं लेता उसे मौत भी नहीं आती... और फिर यदि मर भी गई ना, तो अगले जन्म में बचे हुए कर्मों का फल भोगना पड़ेगा... इसीलिए सोचती हूं इसी जन्म में सब निपट जाए।** मैं नहीं चाहती कि आप अपना यह कर्ज लेकर अगले जन्म में जाएं। जो बोया है, उसे यहीं काट लीजिये। ताकि जब आप जाएं, तो आपका खाता निल (Nil) हो।"
सावित्री देवी सन्न रह गईं। वंदना के शब्द किसी श्राप जैसे नहीं, बल्कि एक गहरे आध्यात्मिक सत्य जैसे लगे। उन्हें समझ आ गया कि उनका बिस्तर पर पड़े रहना कोई बीमारी नहीं, बल्कि उनकी 'तपस्या' है, उनका प्रायश्चित है।
उसी शाम, वंदना की बेटी जिया स्कूल से आई। वो बारह साल की थी। वो दौड़ती हुई दादी के पास आई।
"दादी! देखो मेरी ड्राइंग!" उसने उत्साह से चार्ट पेपर दिखाया।
सावित्री देवी ने कभी जिया को गोद में नहीं लिया था। कभी उसे प्यार नहीं किया था। लेकिन आज, उस बच्ची की मासूमियत ने उनके अंदर के जमे हुए अहंकार को पूरी तरह पिघला दिया।
जिया ने दादी के कांपते हुए हाथ को अपने सिर पर रखा। "मम्मी कहती हैं, बड़ों के आशीर्वाद से सब अच्छा होता है। आशीर्वाद दो ना दादी।"
सावित्री देवी फूट-फूट कर रो पड़ीं। उनके मुँह से बस एक आवाज़ निकली—"आ... आ..."
वो रो रही थीं, अपने खोए हुए वक्त के लिए, अपने खोए हुए रिश्तों के लिए।
वंदना दरवाजे पर खड़ी यह सब देख रही थी। राघव भी ऑफिस से आ गया था और पीछे खड़ा था।
"तुम सही थी वंदना," राघव ने धीमे स्वर में कहा। "अगर हम उन्हें हवेली में छोड़ देते, तो वो घमंड में ही मरतीं। लेकिन यहाँ... यहाँ उनका घमंड मर गया है, और शायद... शायद मेरी माँ वापस जिंदा हो रही है।"
अगले दो महीने सावित्री देवी बहुत बदली हुई नजर आईं। वो अब चिड़चिड़ाती नहीं थीं। वंदना जब खाना खिलाती, तो वो कृतज्ञता से उसकी ओर देखतीं। एक दिन, जब वंदना उनके पैर दबा रही थी, सावित्री देवी ने पूरी ताकत बटोरकर, बहुत साफ़ आवाज़ में कहा—
"ब... बहू... म... माफ़... क... कर दे।"
वंदना के हाथ रुक गए। बीस साल। बीस साल लग गए इन शब्दों को बाहर आने में।
वंदना ने सिर उठाकर देखा। सावित्री देवी की आँखों में अब वो चुभन नहीं थी, एक शांति थी। जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो।
"मैंने माफ़ किया माजी," वंदना ने मुस्कुराते हुए कहा। "मैंने उसी दिन माफ़ कर दिया था जिस दिन आप इस घर में आई थीं।"
उस रात, सावित्री देवी बहुत सुकून से सोईं। ऐसी नींद उन्हें शायद जवानी में भी नहीं आई थी।
सुबह जब वंदना चाय लेकर कमरे में गई, तो सावित्री देवी के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी, लेकिन सांसें थम चुकी थीं।
मखमली बिस्तरों पर करवटें बदलने वाली सावित्री देवी को सुकून की मौत तब मिली, जब उन्होंने कांटों की चुभन को स्वीकार किया और अपने कर्मों का हिसाब चुकता किया।
अंतिम संस्कार के बाद, राघव और वंदना घर लौटे। घर खाली लग रहा था।
"तुम्हें लगता है उन्हें मुक्ति मिली होगी?" राघव ने पूछा।
वंदना ने आसमान की तरफ देखा। "हाँ राघव। क्योंकि अंत समय में उनके पास दौलत नहीं, 'पश्चाताप' था। और ईश्वर को पश्चाताप के आंसू सबसे प्रिय होते हैं।"
**निष्कर्ष:**
जीवन एक गूंज की तरह है। हम जो देते हैं, वही लौटकर आता है। सावित्री देवी ने नफरत दी थी, तो उन्हें बुढ़ापे में अकेलापन मिला। लेकिन वंदना ने उस नफरत के बदले सेवा दी, जिसने अंततः उस चक्र को तोड़ दिया। कर्मों का फल अटल है, लेकिन माफ़ी और सेवा उस फल की कड़वाहट को कम कर सकती है।
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**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या वंदना का सावित्री देवी को अपने घर लाना सही था? या उसे "जैसे को तैसा" वाला व्यवहार करना चाहिए था? अगर आप वंदना की जगह होते, तो क्या करते? अपने विचार कमेंट में जरूर साझा करें।
**“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। कर्मों के इस चक्र को समझने के लिए और ऐसी ही मार्मिक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए इस पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**
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