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दो कमरों का महल

 शहर के पॉश इलाके का वह आलीशान बंगला अब पीछे छूट चुका था। ट्रकों में सामान लदकर शहर के दूसरे कोने में स्थित एक पुरानी सोसाइटी के छोटे से फ्लैट में उतारा जा रहा था। रघुनंदन बाबू अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे शून्य में ताक रहे थे। जीवन भर की जमा-पूंजी, अपनी ईमानदारी से खड़ा किया गया व्यापार, सब कुछ एक साझेदार के धोखे की भेंट चढ़ गया था। कर्ज चुकाने के लिए उन्हें अपना पुश्तैनी घर बेचना पड़ा।

आज जब वे इस 'दो कमरों के फ्लैट' में शिफ्ट हो रहे थे, तो कुछ रिश्तेदार और पुराने पड़ोसी भी 'सांत्वना' देने के बहाने तंज कसने आ धमके थे।

शर्मा जी, जो रघुनंदन बाबू के पड़ोसी हुआ करते थे, चारों तरफ नज़र घुमाते हुए बोले, "बड़ा बुरा हुआ रघुनंदन जी। कहाँ वो राजमहल जैसा घर और कहाँ यह कबूतरखाना। पूरी ज़िन्दगी मेहनत की और अंत में हाथ क्या आया? कुछ नहीं। बच्चों के लिए क्या छोड़कर जा रहे हो? सिवाय कर्ज़ और बदनामी के?"

रघुनंदन बाबू का सिर शर्म से झुक गया। उनकी पत्नी, सुमित्रा जी, रसोई में चाय बना रही थीं, उनकी आँखों से आंसू बह निकले। बेटा आर्यन और नई-नवेली बहू अन्या, जो अभी सामान जमा ही रहे थे, यह सब सुन रहे थे। आर्यन को गुस्सा आया, वह कुछ बोलने ही वाला था कि अन्या ने उसका हाथ पकड़कर रोक दिया।

अन्या पानी का ट्रे लेकर बाहर आई और शर्मा जी के सामने रख दिया।

शर्मा जी ने फिर कहा, "बहू, तुम भी क्या सोचती होगी? किस घर में ब्याही गई थी और अब क्या हाल हो गया। सोचा होगा अमीर ससुर है, रानी बनकर रहूँगी। अब तो यहाँ नौकरानी भी रखने की जगह नहीं है।"

रघुनंदन बाबू की आँखों से एक आंसू टपक कर उनके घुटने पर गिरा। उन्हें अपनी गरीबी से ज्यादा अपनी बहू के सामने हुई इस बेइज्जती का दुःख था।

तभी अन्या ने मुस्कुराते हुए शर्मा जी की आँखों में देखा और बड़े ही शांत स्वर में बोली, "अंकल जी, आप गलत कह रहे हैं। मेरे पापाजी ने हमें 'कुछ नहीं' दिया? अरे, ज़रा ध्यान से देखिये, इस कमरे में दुनिया की सबसे बेशकीमती दौलत बिखरी पड़ी है।"

शर्मा जी और वहां मौजूद बाकी लोग हैरान होकर अन्या को देखने लगे। रघुनंदन बाबू ने भी सिर उठाकर अपनी बहू को देखा।

अन्या ने रघुनंदन बाबू के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "अंकल, मेरे ससुर जी ने अपना घर बेच दिया, ताकि किसी का एक रुपया भी उन पर उधार न रहे। उन्होंने हमें 'ईमानदारी' की वो विरासत दी है, जो आज के ज़माने में करोड़ों खर्च करके भी नहीं मिलती। लोग दिवालिया होने पर भाग जाते हैं, पर मेरे पापाजी सीना तानकर खड़े हैं क्योंकि उनका ज़मीर साफ़ है। यह 'खुद्दारी' हमारी जायदाद है।"

अन्या ने फिर अपनी सास सुमित्रा जी की ओर इशारा किया, जो दरवाजे पर खड़ी थीं। "और देखिये मेरी माँ को। महलों की रानी थीं, पर आज इस छोटे से फ्लैट में भी मुस्कुरा रही हैं ताकि उनके पति का हौसला न टूटे। यह 'त्याग' और 'संस्कार' मिला है हमें।"

फिर उसने अपने पति आर्यन का हाथ थामा, "और यह मेरा जीवनसाथी, जिसने मुझसे कहा कि अन्या, घर छोटा हुआ है, दिल नहीं। हम फिर से सब खड़ा कर लेंगे। यह 'आत्मविश्वास' मिला है मुझे।"

अन्या की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई, "अंकल, ईंट-पत्थर के मकान तो फिर बन जाएंगे, लेकिन जब मुसीबत आई, तो यह परिवार बिखरा नहीं, बल्कि और मज़बूती से एक-दूसरे के साथ खड़ा हो गया। मुझे दहेज़ में या विरासत में हीरे-मोती नहीं चाहिए थे। मुझे एक ऐसा पिता चाहिए था जो अपनी उसूलों का पक्का हो, और एक ऐसा परिवार जो हर हाल में साथ निभाना जानता हो। आज इस दो कमरे के घर में मुझे वो सुकून मिल रहा है, जो शायद उस बड़े बंगले में भी नहीं मिलता। आज मैं गर्व से कह सकती हूँ कि मैं दुनिया के सबसे अमीर परिवार की बहू हूँ।"

शर्मा जी का चेहरा पीला पड़ गया। जिस खालीपन और गरीबी का मज़ाक उड़ाने वे आए थे, अन्या ने उसे अपने शब्दों से भर दिया था। कमरे में छाया सन्नाटा अब अपमान का नहीं, बल्कि सम्मान का था।

रघुनंदन बाबू खड़े हुए। उनकी आँखों में अब आंसू नहीं, बल्कि एक चमक थी। उन्होंने आगे बढ़कर अपनी बहू के सिर पर हाथ रखा। उन्हें लगा कि उन्होंने अपना मकान ज़रूर खोया है, लेकिन उन्होंने एक बेटी पाई है जिसने उनके घर को 'महल' बना दिया।

शर्मा जी और बाकी लोग बिना चाय पिए ही, नज़रे झुकाकर वहां से खिसक लिए। उस शाम, उस छोटे से फ्लैट में जब सबने मिलकर चाय पी, तो वहां हंसी के ठहाके गूंज रहे थे। दीवारों की दूरी कम थी, इसलिए दिलों की दूरी पूरी तरह मिट चुकी थी।


मित्रों, दौलत आने-जाने वाली चीज़ है, लेकिन परिवार का संस्कार और संकट में एक-दूसरे का साथ ही असली संपत्ति होती है।

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