सुबह की हल्की-हल्की ठंड के बीच बालकनी में बैठी सुजाता के हाथों में चाय का प्याला था। घर के अंदर से कुकर की सीटी की आवाज़ आ रही थी। पति रमेश अखबार के पन्नों में उलझे थे और बेटा ऑफिस जाने की जल्दी में अपनी फाइलें ढूंढ रहा था। बाहर से देखने पर सुजाता की जिंदगी एक मुकम्मल और खूबसूरत तस्वीर जैसी थी। एक आदर्श पत्नी, एक जिम्मेदार माँ और एक संस्कारी बहू। सुजाता ने पिछले पच्चीस सालों में अपनी हर जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ निभाया था। लेकिन जैसे ही सब अपने-अपने काम पर चले गए और घर में सन्नाटा पसरा, सुजाता ने अपना मोबाइल उठाया।
फेसबुक स्क्रॉल करते हुए एक पुरानी ग़ज़ल की दो पंक्तियाँ उसकी स्क्रीन पर उभरीं—"जो उम्र भर ना मिले, उसे उम्र भर खामोशी से चाहना भी तो इबादत है।"
ये पंक्तियाँ पढ़ते ही सुजाता का दिल जोर से धड़क उठा। उसे लगा जैसे ये लफ्ज़ किसी ने सिर्फ उसी की रूह को पढ़ने के बाद लिखे हों। सुजाता ने धीरे से आँखें मूंद लीं। बंद आँखों के अंधेरे में एक चेहरा आज भी उतना ही रोशन था, जितना पच्चीस साल पहले हुआ करता था—शशांक।
शशांक, जो सुजाता की जिंदगी की वो पहली बारिश था, जिसने उसके मन की सूखी ज़मीन को पहली बार भिगोया था। कॉलेज के वो दिन आज भी सुजाता को किसी खूबसूरत फिल्म की तरह याद आते थे। लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर घंटों बैठकर साहित्य और कविताओं पर चर्चा करना, एक-दूसरे की आँखों में देखकर बिना कुछ कहे सब कुछ समझ जाना। शशांक की वो पहली नज़र सुजाता को ऐसे सम्मोहित कर गई थी कि दोनों ने मन ही मन एक-दूसरे को अपना जीवनसाथी मान लिया था।
लेकिन असल जिंदगी किसी उपन्यास की तरह नहीं होती। वक्त और हालात की एक ऐसी आंधी आई जिसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। सुजाता के पिता को दिल का दौरा पड़ा और उनकी आखिरी इच्छा अपनी बेटी को अपने एक दोस्त के बेटे, यानी रमेश के साथ ब्याहते हुए देखने की थी। सुजाता और शशांक दोनों ही संस्कारों की डोर से बंधे थे। उन्होंने बगावत नहीं की। दोनों ने एक-दूसरे को आंसुओं के साथ विदा किया। सुजाता ने रमेश का हाथ थाम लिया और शशांक भी अपने परिवार की खातिर एक नई हमसफ़र के साथ आगे बढ़ गया।
पच्चीस साल बीत गए। दोनों ने अपनी-अपनी गृहस्थी की गाड़ी को बहुत सलीके से खींचा। सुजाता ने रमेश को एक पति के रूप में पूरा सम्मान दिया, अपने घर को संवारा। लेकिन मन के किसी बहुत गहरे कोने में शशांक की वो मीठी याद एक ऐसी खुशबू की तरह बसी रही, जिसे समय की धूल भी नहीं मिटा सकी। सुजाता को लगता था कि अब जिंदगी बस यूं ही जिम्मेदारियों के नाम होकर खत्म हो जाएगी।
लेकिन कहते हैं न कि वक्त का पहिया गोल होता है, और नियति के अपने कुछ अलग ही खेल होते हैं। इंसान जहां से चलना शुरू करता है, कभी-कभी मुड़कर उसी मोड़ पर आ खड़ा होता है। कुछ महीने पहले, कॉलेज के एक एलुमनी व्हाट्सएप ग्रुप में सुजाता को शशांक का नंबर दिखा। कई दिनों की कशमकश के बाद, एक दिन सुजाता के फोन की स्क्रीन पर शशांक का मैसेज फ्लैश हुआ— "कैसी हो सुजाता?"
वो सिर्फ तीन शब्द नहीं थे, बल्कि पच्चीस सालों के सूखे रेगिस्तान में गिरी बारिश की पहली बूंद थे। सुजाता के हाथ कांप गए थे। उसने बस "ठीक हूँ" लिखा था। लेकिन उस एक छोटी सी बातचीत ने दोनों के बीच जमे हुए बर्फ के पहाड़ को पिघला दिया। वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि दोनों एक बार फिर एक-दूसरे के आमने-सामने (भले ही वर्चुअली) खड़े थे।
आज आलम यह है कि सुजाता और शशांक कभी-कभार बात कर लेते हैं। इन बातों में कोई शिकायत नहीं होती, कोई वासना नहीं होती, और ना ही अपनी-अपनी गृहस्थी को तोड़ने की कोई बगावत होती है। दोनों बस एक-दूसरे का हाल-चाल पूछ लेते हैं, अपनी बढ़ती उम्र की बीमारियों का ज़िक्र कर लेते हैं, या बच्चों की सेटलमेंट की बातें कर लेते हैं। लेकिन इस साधारण सी बातचीत में एक ऐसा सुकून छिपा है, जो सुजाता को पूरे दिन की थकान से लड़ने की ताकत दे देता है।
ऐसा लगता है जैसे पतझड़ के लंबे मौसम के बाद जिंदगी रूपी पौधे पर नई कोंपलें खिल गई हों। जब शशांक की आवाज़ फोन के उस पार से आती है, तो सुजाता के मन का वो अधूरापन, वो खालीपन जो पच्चीस सालों से उसे अंदर ही अंदर खा रहा था, पल भर में भर जाता है।
यह कोई ऐसा रिश्ता नहीं है जिसे समाज की नज़रों में 'अफेयर' या 'धोखा' कहा जाए। यह तो उन दोनों की आत्माओं का वो मिलन है जो जिस्मानी हदों से बहुत परे है। उन्होंने अपनी-अपनी हदों को पार किए बिना, अपनी जिम्मेदारियों को दांव पर लगाए बिना, एक-दूसरे में अपना वो सुकून ढूंढ लिया है, जो इस भागदौड़ भरी दुनिया में कहीं खो गया था।
सुजाता जानती है कि दुनिया इस रिश्ते को कभी नहीं समझेगी। दुनिया हर चीज को सही और गलत के तराजू में तौलती है। लेकिन कुछ रिश्ते इन सब से बहुत ऊपर होते हैं। ये वो रिश्ते हैं जिनका कोई नाम नहीं होता, लेकिन ये जीने की सबसे बड़ी वजह बन जाते हैं। इन अनाम और गुमनाम रिश्तों का बिना किसी नाम के, खामोशी से चलते रहना ही सबके लिए बेहतर होता है। सुजाता आज खुश है, अपनी गृहस्थी में भी और अपने मन के उस छोटे से सीक्रेट कमरे में भी, जहाँ सिर्फ शशांक की यादों की मीठी धूप आती है।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि जिंदगी में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें दुनिया का कोई नाम नहीं दिया जा सकता, लेकिन वो हमारी आत्मा को सबसे ज्यादा सुकून देते हैं? क्या कभी आपके मन के किसी कोने में भी ऐसा कोई अनाम रिश्ता छुपा है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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