शादी की अगली सुबह थी। घर में नई बहू के आने की चहल-पहल कम और अजीब सी खामोशी ज्यादा थी। मीरा अभी नहाकर तैयार ही हुई थी कि उसकी ननद, वंदना, कमरे में धड़धड़ाते हुए दाखिल हुई। वंदना के हाथ में गीले कपड़ों की एक बाल्टी थी।
उसने बाल्टी मीरा के पैरों के पास जोर से पटकी और मीरा का हाथ पकड़कर उसे खींचते हुए आंगन में ले आई। आंगन में मीरा की जेठानी, सुलोचना देवी, एक कुर्सी पर बड़े ही नाटकीय ढंग से कमर पर हाथ रखकर बैठी थीं। उनके चेहरे पर पीड़ा का भाव था, जो शायद असली कम और बनावटी ज्यादा लग रहा था।
वंदना ने अपनी आवाज़ को जानबूझकर इतना ऊँचा किया कि ऊपर वाले कमरे में बैठे उसके भाई (मीरा के पति, आकाश) और ससुर जी को भी सुनाई दे।
"भाभी, देख रही हो न जीजी की हालत?" वंदना ने सुलोचना की तरफ इशारा करते हुए मीरा पर आँखें तरेरीं। "इन्होंने इस घर के लिए अपनी जवानी खपा दी है। जब माँ गुज़री थीं, तो आकाश भैया और मैं बहुत छोटे थे। जीजी ने हमें अपनी कोख से नहीं जन्मा, पर माँ से बढ़कर पाला है। आज उनकी कमर में दर्द है, फिर भी देखो, रसोई में जाने की ज़िद कर रही हैं।"
मीरा सहम गई। वह तो अभी बस तैयार ही हुई थी, उसे तो कुछ पता भी नहीं था।
वंदना ने मीरा की कलाई जोर से पकड़ते हुए चेतावनी भरे स्वर में कहा, "सुन लो भाभी, तुम नई हो, पर यह बात गांठ बांध लो। इस घर में जीजी का दर्जा भगवान से भी ऊपर है। खबरदार जो कभी तुम्हारी वजह से जीजी की आँखों में एक भी आंसू आया। अगर जीजी दुखी हुईं, तो समझ लेना इस घर के दरवाज़े तुम्हारे लिए बंद हो जाएंगे।"
सुलोचना ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए, एक बहुत ही धीमी और 'त्यागी' आवाज़ में कहा, "अरे वंदना, छोड़ न। नई बहू है, अभी उसे घर के तौर-तरीके पता नहीं हैं। मैं कर लूँगी काम, बस थोड़ा बाम लगा दे कमर पे।"
यह सुनते ही वंदना और भड़क गई, "आप क्यों करेंगी? अब यह आ गई हैं न। अब यह करेंगी। आप बस राज करेंगी।"
मीरा ने घबराहट में पल्लू ठीक किया और तुरंत बोली, "जीजी, आप आराम कीजिये। मैं संभाल लूँगी सब।"
मीरा ने रसोई की ज़िम्मेदारी संभाल ली। पहले ही दिन से उसे यह एहसास दिला दिया गया कि वह इस घर में आकाश की पत्नी बनकर बाद में आई है, सुलोचना की 'सहायक' बनकर पहले।
आकाश अपनी भाभी, सुलोचना का अंधभक्त था। उसके लिए 'भाभी माँ' के शब्द ब्रह्मवाक्य थे। सुलोचना ने आकाश को पाल-पोसकर बड़ा किया था, यह बात आकाश दिन में दस बार दोहराता था। लेकिन मीरा, जो एक पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी, उसे धीरे-धीरे इस 'ममता' में कुछ खोट नज़र आने लगा था।
सुलोचना का तरीका बड़ा अजीब था। वह कभी मीरा को सीधे मुँह कुछ नहीं कहती थीं। वह हमेशा वंदना या आकाश के ज़रिये बात करती थीं।
जैसे अगर सब्जी में नमक कम होता, तो सुलोचना खाना छोड़कर उठ जातीं और अपनी कमर पकड़कर कराहने लगतीं। फिर वंदना शुरू हो जाती, "देखा? जीजी ने आज खाना नहीं खाया। भाभी, आपसे इतना भी नहीं होता? जीजी बीमार रहती हैं, उन्हें स्वाद का खाना चाहिए।"
आकाश भी मीरा को ही डांटता, "मीरा, भाभी माँ का ख्याल रखा करो। डॉक्टर ने उन्हें तनाव लेने से मना किया है।"
मीरा चुपचाप सब सहती रही। उसे लगा शायद समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। लेकिन पानी सिर से ऊपर तब जाने लगा जब आकाश की सैलरी का मामला आया।
शादी के पहले महीने की पहली तारीख को आकाश ने अपनी पूरी तनख्वाह लाकर सुलोचना के हाथ में रख दी।
"भाभी माँ, यह रही इस महीने की कमाई। घर का खर्च आप ही देखेंगी, जैसे हमेशा देखती आई हैं," आकाश ने श्रद्धा से कहा।
सुलोचना ने बनावटी संकोच के साथ पैसे ले लिए। "अरे लल्ला, अब तो तेरी शादी हो गई है। मीरा को बुरा तो नहीं लगेगा?"
आकाश ने तुरंत कहा, "मीरा को क्यों बुरा लगेगा? इस घर की लक्ष्मी आप हैं।"
मीरा कमरे के दरवाज़े पर खड़ी यह सब देख रही थी। उसे पैसों का लालच नहीं था, लेकिन उसे अपना वजूद मिटता हुआ दिख रहा था। उसे अपनी निजी ज़रूरतों के लिए भी सुलोचना के आगे हाथ फैलाना पड़ता था। और जब भी वह पैसे मांगती, सुलोचना दस सवाल पूछतीं और फिर कहतीं, "मीरा, आकाश बड़ी मेहनत से कमाता है, ज़रा हाथ रोक कर खर्च किया करो।" जबकि सुलोचना खुद अपने मायके वालों पर दिल खोलकर खर्च करती थीं।
वंदना की शादी तय हो गई थी। सुलोचना ने आकाश से कहा, "लल्ला, वंदना हमारी इकलौती ननद है। उसकी शादी में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। हमें कम से कम 20 लाख का दहेज और गहने देने होंगे। लड़के वाले बड़े घर के हैं।"
आकाश परेशान हो गया। "भाभी माँ, मेरी सेविंग्स तो इतनी नहीं हैं। और अभी घर की मरम्मत भी करवाई थी।"
सुलोचना ने आँखों में आंसू भर लिए। "तो क्या मेरी वंदना कुंवारी रहेगी? मैंने सोचा था कि मेरे जो गहने हैं, और मीरा के जो चढ़ावे के गहने हैं, उन्हें गिरवी रखकर या तुड़वाकर कुछ इंतज़ाम कर लेंगे। परिवार की इज़्ज़त का सवाल है।"
आकाश ने मीरा की तरफ देखा। मीरा का दिल बैठ गया। उसके गहने? जो उसके पिता ने पाई-पाई जोड़कर दिए थे?
रात को मीरा ने आकाश को समझाने की कोशिश की। "आकाश, वंदना की शादी ज़रूरी है, पर मेरे गहने क्यों? जीजी के पास भी तो पुराने गहने हैं, और आपके बड़े भैया (सुलोचना के पति, जो विदेश में रहते थे और पैसे भेजते थे) भी तो पैसे भेजते हैं। उन पैसों का क्या हुआ?"
आकाश भड़क गया। "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई भाभी माँ का हिसाब मांगने की? उन्होंने अपनी जवानी जला दी हमारे लिए। भैया तो बाहर रहते हैं, भाभी ने ही अकेले सब संभाला। अगर आज वो तुम्हारे गहने मांग रही हैं, तो परिवार के लिए मांग रही हैं। इतना स्वार्थ ठीक नहीं मीरा।"
मीरा समझ गई कि आकाश की आँखों पर पट्टी बंधी है। उसे अब अपने तरीके से सच सामने लाना होगा।
मीरा ने अपने गहने देने से मना नहीं किया, लेकिन उसने एक शर्त रख दी। "मैं गहने दे दूँगी, लेकिन मैं खुद सुनार के पास चलूँगी। मुझे देखना है कि उनका वज़न कितना है और बदले में क्या मिल रहा है।"
सुलोचना थोड़ा हिचकिचाईं, पर मना नहीं कर सकीं।
सुनार की दुकान पर एक बड़ा खुलासा हुआ। सुलोचना ने मीरा के गहने निकाले और सुनार को दिए। सुनार, जो परिवार का पुराना परिचित था, ने गहने तौले और कहा, "भाभी जी, ये वाले कंगन तो ठीक हैं, लेकिन वो जो पुराना वाला सेट आपने पिछले महीने तुड़वाकर नए डिज़ाइन का बनवाया था, उसके पैसे अभी तक आपके खाते में एडजस्ट नहीं हुए हैं। क्या इस बार भी पेमेंट आपके भाई के अकाउंट में डालना है?"
सुलोचना का चेहरा फक पड़ गया। उसने जल्दी से बात बदलने की कोशिश की। "अरे, वो सब बाद में बात करेंगे।"
लेकिन मीरा ने सुनार को रोक दिया। "कौन सा सेट भैया? और पेमेंट किसके भाई के अकाउंट में?"
सुनार ने मासूमियत से कहा, "अरे बहू जी, पिछले महीने भाभी जी ने घर के 10 तोले पुराने सोने के जेवर बेचकर पैसे अपने भाई के बेटे की इंजीनियरिंग की फीस के लिए ट्रांसफर करवाए थे। मुझे लगा आपको पता होगा।"
मीरा ने सुलोचना की तरफ देखा। सुलोचना पसीने से तर-बतर हो रही थी।
घर आकर मीरा ने कोई तांडव नहीं किया। उसने शांति से इंतज़ार किया। शाम को जब आकाश और वंदना घर पर थे, मीरा ने सबके सामने बात छेड़ी।
"आकाश, वंदना की शादी के लिए पैसों की कमी नहीं पड़ेगी," मीरा ने चाय का कप मेज पर रखते हुए कहा।
आकाश खुश हो गया। "मैं जानता था तुम मान जाओगी। भाभी माँ, मीरा गहने ले आई है।"
मीरा ने मुस्कुराते हुए अपना बैग खोला। लेकिन उसमें गहने नहीं, बैंक की पासबुक और सुनार की रसीदें थीं (जो उसने चालाकी से सुनार से मांग ली थीं)।
"गहने बेचने की ज़रूरत नहीं है आकाश," मीरा ने कहा। "जीजी के भाई साहब के अकाउंट में जो 10 लाख रुपये पिछले महीने ट्रांसफर हुए हैं, और उससे पहले जो 5 लाख गए थे... अगर वो वापस आ जाएं, तो वंदना की शादी धूमधाम से हो जाएगी।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। वंदना हैरान होकर मीरा को देखने लगी। "क्या बकवास कर रही हो भाभी?"
मीरा ने रसीदें वंदना के हाथ में थमा दीं। "यह देखो वंदना। यह सुलोचना जीजी के हस्ताक्षर हैं। आकाश जो पैसे हर महीने घर खर्च के लिए देता है, उसमें से आधा पैसा और घर का पुराना पुश्तैनी सोना, सब धीरे-धीरे जीजी के मायके जा रहा है। जिस 'त्याग' का ढोल तुम रोज पीटती हो, उस त्याग की कीमत यह घर चुका रहा है।"
आकाश ने रसीदें देखीं। उसके हाथ कांपने लगे। वह सुलोचना की तरफ मुड़ा। "भाभी माँ? यह क्या है? भैया तो विदेश से पैसे भेजते हैं, मेरा भी पूरा वेतन आपके पास आता है। फिर आपको घर का सोना बेचने की ज़रूरत क्यों पड़ी? और वो भी अपने भाई के लिए? आपने तो कहा था कि सोना लॉकर में सुरक्षित है।"
सुलोचना रोने लगी, लेकिन इस बार उसके आंसुओं में वो 'पवित्रता' नहीं थी। "लल्ला, मैं तो बस मदद कर रही थी... मेरा भाई मुसीबत में था..."
"और मेरी बहन?" आकाश चिल्लाया। "आज मेरी बहन की शादी के लिए मुझे अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखने पड़ रहे हैं, और आप हमारे पैसों से अपने भाई का घर भर रही हैं? क्या यही वो ममता थी जिसका वास्ता देकर आपने मुझे कभी मेरे पैसों का हिसाब नहीं रखने दिया?"
वंदना, जो हमेशा भाभी की ढाल बनी रहती थी, आज टूट गई। उसे अपनी शादी की नहीं, उस विश्वास के टूटने का दुख था जो उसने अपनी भाभी पर किया था।
वंदना रोते हुए सुलोचना के पास गई। "जीजी, मैंने आपको माँ माना था। मैंने आपकी खातिर मीरा भाभी को कितना बुरा-भला कहा। उन्हें नौकरानी समझा। और आप... आप हमें लूट रही थीं?"
मीरा ने आगे बढ़कर वंदना को संभाला।
"आकाश," मीरा ने शांत स्वर में कहा, "रिश्ते विश्वास पर चलते हैं, अंधभक्ति पर नहीं। भाभी जी का सम्मान करना हमारा फर्ज़ है, लेकिन अपनी आँखों पर पट्टी बांध लेना मूर्खता है। आपने मुझे पराया समझा और इन्हें अपना, जबकि यह अपने मायके को अपना समझती रहीं और इस घर को सिर्फ एक 'बैंक'।"
उस रात घर का माहौल बदल गया।
आकाश ने घर की आर्थिक कमान अपने हाथ में ले ली। सुलोचना के पास अब न तो चाभियाँ थीं और न ही वो झूठा रुतबा। वह अब कोने में बैठकर वाकई में कमर दर्द का बहाना बना रही थी, लेकिन अब कोई उसे बाम लगाने के लिए दौड़ा नहीं।
वंदना ने मीरा से माफ़ी मांगी। "भाभी, मुझे माफ़ कर दो। मैंने कानों से सुना, आँखों से नहीं देखा।"
मीरा ने वंदना को गले लगा लिया। "देर आए दुरुस्त आए वंदना। पर याद रखना, किसी का आदर करना अच्छी बात है, लेकिन किसी इंसान को भगवान बना दोगे, तो वो राक्षस बनने में देर नहीं लगाएगा।"
कहानी का सार:
अक्सर संयुक्त परिवारों में 'त्याग' और 'ममता' के नाम पर भावनात्मक शोषण का खेल खेला जाता है। नई बहू को बाहरी समझकर दबाया जाता है, जबकि घर के पुराने सदस्य उसी अपनेपन की आड़ में घर की जड़ें खोखली कर रहे होते हैं। सम्मान ज़रूरी है, लेकिन हिसाब-किताब भी उतना ही ज़रूरी है।
अंत में एक सवाल:
क्या आपके आस-पास भी कोई ऐसी 'त्याग की मूर्ति' है जिसके चेहरे के पीछे की सच्चाई कुछ और है? क्या आकाश का अपनी भाभी पर इतना अंधा विश्वास सही था? अपने विचार कमेंट में ज़रूर लिखें।
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