मुंबई के पॉश इलाके में 25वीं मंजिल पर बने पेंटहाउस की बालकनी में खड़ा होकर अर्णव अपने शहर को देख रहा था। हाथ में सिंगल माल्ट व्हिस्की का गिलास था और दिमाग में अगले दिन की बोर्ड मीटिंग की प्रेजेंटेशन चल रही थी। अर्णव 'ज़ेनिथ ग्रुप' का सीईओ था। पैंतीस साल की उम्र में उसने वो सब हासिल कर लिया था, जिसके सपने लोग पूरी जिंदगी देखते हैं।
लिविंग रूम में सोफे पर उसके पिता, दीनानाथ जी बैठे थे। वे पिछले हफ्ते ही गाँव से आए थे। उनके सामने टीवी चल रहा था, लेकिन उनका ध्यान टीवी पर नहीं, बल्कि अर्णव के दस साल के बेटे, 'आरुष' पर था। आरुष अपने आईपैड में गेम खेल रहा था और घर की नौकरानी, विमला, उसे खाना खिलाने की कोशिश कर रही थी।
"अरे नहीं खाना मुझे! ले जाओ इसे, यू स्मेल बैड (तुमसे बदबू आती है)!" आरुष ने विमला के हाथ को झटक दिया। दाल का एक कतरा आरुष की महंगी टी-शर्ट पर गिर गया।
"इडियट! देख नहीं सकती?" आरुष चिल्लाया।
दीनानाथ जी सन्न रह गए। उन्होंने अर्णव की तरफ देखा, जो बालकनी से अंदर आ रहा था। उन्हें लगा अर्णव आरुष को डांटेगा।
लेकिन अर्णव ने विमला को ही डांट दिया। "विमला, तुम्हें कितनी बार कहा है कि आरुष जब गेम खेल रहा हो तो उसे डिस्टर्ब मत किया करो। और जाओ, दूसरी टी-शर्ट लेकर आओ।"
दीनानाथ जी से रहा नहीं गया। "अर्णव, यह क्या तरीका है? बच्चा बड़ों से बदतमीजी कर रहा है और तू नौकरानी को डांट रहा है?"
अर्णव ने सोफे पर बैठते हुए लापरवाही से कहा, "पापा, यह शहर है। यहाँ कॉन्फिडेंस (आत्मविश्वास) ऐसे ही आता है। मैं नहीं चाहता मेरा बेटा दब्बू बने। उसे पता होना चाहिए कि वह मालिक है। और वैसे भी, मैंने विमला को पैसे दिए हैं उसकी सर्विस के, मुफ्त में काम नहीं कर रही वो।"
दीनानाथ जी चुप हो गए। उन्होंने महसूस किया कि अर्णव के लिए हर रिश्ता, हर इंसान सिर्फ एक 'ट्रांजेक्शन' (लेन-देन) बन गया है।
अगले दिन रविवार था। अर्णव अपने लैपटॉप में व्यस्त था। तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर 'सुबोध चाचा' का नाम था। सुबोध, दीनानाथ जी के चचेरे भाई थे, जो गाँव में ही रहते थे और आर्थिक रूप से थोड़े कमज़ोर थे।
अर्णव ने फोन देखा और काट दिया।
फोन दोबारा बजा। अर्णव ने झुंझलाकर फोन उठाया।
"हाँ चाचा, बोलिए? मैं थोड़ा बिजी हूँ," अर्णव ने रूखेपन से कहा।
"अर्णव बेटा, नमस्ते। वो तेरी चाची की तबीयत थोड़ी खराब थी, ऑपरेशन होना है। डॉक्टर ने शहर के अस्पताल का बोला है। अगर तू थोड़ी मदद कर देता या वहां डॉक्टर से बात कर देता..." सुबोध चाचा की आवाज़ में संकोच था।
"चाचा, आपको पता है ना मेरा शेड्यूल कितना टाइट रहता है? और शहर के अस्पताल बहुत महंगे हैं। आप गाँव के सरकारी अस्पताल में क्यों नहीं दिखाते? मैं अभी मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ।" अर्णव ने फोन काट दिया और ब्लॉक लिस्ट में डाल दिया।
दीनानाथ जी ने यह सब सुन लिया।
"अर्णव, सुबोध ने तेरे बचपन में तुझे अपनी साइकिल पर बिठाकर पूरा गाँव घुमाया था। आज उसे ज़रूरत है तो तूने दो मिनट बात भी नहीं की?"
"पापा, प्लीज़!" अर्णव ने लैपटॉप बंद करते हुए कहा। "वो लोग इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं। आज बात कर लूँगा तो कल पैसे मांगेंगे, परसों घर में रहने आ जाएंगे। मुझे अपनी लाइफ में यह 'रिश्तेदारों का ड्रामा' नहीं चाहिए। मेरे पास पैसा है, मैं अपनी प्रॉब्लम्स खुद सॉल्व कर सकता हूँ। मुझे किसी की ज़रूरत नहीं है।"
दीनानाथ जी समझ गए कि पानी अब सिर से ऊपर जा चुका है। अर्णव को दौलत का नशा चढ़ गया है और उसे लगता है कि पैसा ही भगवान है। उन्होंने तय कर लिया कि जाने से पहले अपने बेटे को एक आखिरी सबक सिखाकर जाएंगे, वरना कल को उसका अपना बेटा (आरुष) उसके साथ वही करेगा जो आज अर्णव बाकियों के साथ कर रहा है।
शाम को दीनानाथ जी ने अर्णव को अपने कमरे में बुलाया। वे अपना पुराना संदूक जमा रहे थे।
"बेटा, मैं कल सुबह गाँव वापस जा रहा हूँ," दीनानाथ जी ने कहा।
"अरे पापा, अभी तो आए थे। रुक जाते कुछ दिन," अर्णव ने औपचारिकता निभाई।
"नहीं, मेरा मन नहीं लग रहा। पर जाने से पहले तुझे कुछ देना चाहता हूँ।" दीनानाथ जी ने अपनी जेब से एक पुरानी, फटी हुई डायरी निकाली।
"यह क्या है?" अर्णव ने पूछा।
"यह मेरी 'पासबुक' है," दीनानाथ जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
अर्णव हंसा। "पापा, आपकी बैंक पासबुक तो अलमारी में है। इसमें क्या है?"
"इसमें वो कमाई है जो मैंने पूरी ज़िंदगी जोड़ी है। देख," दीनानाथ जी ने पन्ने पलटे। उसमें लोगों के नाम और फोन नंबर लिखे थे। हर नाम के आगे कुछ अजीब कोड लिखे थे—जैसे 'खून', 'वक्त', 'मदद'।
"यह उन लोगों के नाम हैं अर्णव, जिनके लिए मैंने कभी कुछ किया था, या जिन्होंने मेरे लिए कुछ किया। मैंने पैसा नहीं कमाया बेटा, मैंने 'लोग' कमाए हैं। मैं चाहता हूँ तू इसे रख ले। शायद कभी काम आ जाए।"
अर्णव ने बेमन से डायरी रख ली। "पापा, यह सब पुराने ज़माने की बातें हैं। आज के ज़माने में कॉन्टैक्ट लिस्ट मोबाइल में होती है, और काम 'पैसे' से होते हैं, 'पहचान' से नहीं।"
अगली सुबह दीनानाथ जी चले गए। अर्णव ने वो डायरी अपने स्टडी टेबल की दराज में पटक दी और भूल गया।
एक महीना बीत गया।
अर्णव की कंपनी पर अचानक मुसीबत आई। इनकम टैक्स की रेड और कुछ कानूनी पचड़ों की वजह से उसके सारे बैंक अकाउंट्स फ्रीज़ (सीज) हो गए। उसका क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड—सब ब्लॉक हो गए। यह एक अस्थायी (temporary) समस्या थी जो वकील दो-चार दिन में सुलझा लेते, लेकिन उस वक्त अर्णव की जेब में नकद (कैश) नहीं था।
उसी शाम, अर्णव आरुष को लेकर पार्क गया था। ड्राइवर छुट्टी पर था, तो अर्णव खुद कार चला रहा था। लौटते वक्त एक तेज रफ़्तार ट्रक ने उनकी कार को साइड से टक्कर मार दी।
कार डिवाइडर से टकराकर पलट गई।
अर्णव को हल्की चोटें आईं, लेकिन आरुष... आरुष बुरी तरह घायल हो गया। उसका सिर डैशबोर्ड से टकराया था और खून बह रहा था।
अर्णव बदहवास होकर कार से निकला। उसका फोन टूटकर चकनाचूर हो चुका था। उसकी जेब में वॉलेट था, लेकिन उसमें रखे कार्ड्स किसी काम के नहीं थे क्योंकि मशीनें सड़क पर नहीं होतीं। और कैश? कैश उसके पास था ही नहीं।
भीड़ जमा हो गई, लेकिन कोई मदद को आगे नहीं आया। सब वीडियो बना रहे थे।
अर्णव चिल्लाया, "कोई एम्बुलेंस बुलाओ! मेरे बेटे को अस्पताल ले चलो! मैं मुंह मांगे पैसे दूंगा!"
"पैसे? साहब, पहले अस्पताल तो पहुँचो," भीड़ में से किसी ने कहा।
एक ऑटो वाला रुका। अर्णव ने आरुष को गोद में उठाया और ऑटो में बैठा। "सिटी हॉस्पिटल चलो, जल्दी!"
हस्पताल पहुँचकर डॉक्टर ने आरुष को इमरजेंसी में लिया।
"सर, बच्चे की हालत सीरियस है। बहुत खून बह गया है। हमें तुरंत 'ओ-नेगेटिव' (O-Negative) खून चाहिए। और सर्जरी के लिए आपको 5 लाख रुपये जमा करवाने होंगे। यह प्राइवेट हॉस्पिटल है, बिना डिपॉजिट के हम वेंटिलेटर शुरू नहीं करेंगे," रिसेप्शनिस्ट ने सपाट आवाज़ में कहा।
अर्णव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"मेरा अकाउंट फ्रीज़ है, मैं चेक दे सकता हूँ, या कल पैसे दे दूंगा। मैं अर्णव खन्ना हूँ, ज़ेनिथ ग्रुप का मालिक!" वह चिल्लाया।
"सॉरी सर, हमारे रूल्स सख्त हैं। कैश या कार्ड। और खून का इंतज़ाम आपको खुद करना होगा, ब्लड बैंक में ओ-नेगेटिव खत्म है," रिसेप्शनिस्ट ने नियम सुना दिया।
अर्णव पागलों की तरह अपने 'अमीर दोस्तों' को याद करने लगा। लेकिन उसका फोन टूट चुका था। उसे किसी का नंबर याद नहीं था। उसने रिसेप्शन से फोन मांगकर अपने पी.ए. (P.A.) को फोन किया। पी.ए. ने कहा, "सर, कंपनी के अकाउंट सीज होने की खबर फैल गई है, कोई भी पार्टनर अभी रिस्क नहीं लेना चाहता। मैं कोशिश कर रहा हूँ।"
अर्णव उस आलीशान अस्पताल के ठंडे फर्श पर बैठ गया। उसके पास अरबों की संपत्ति थी, लेकिन उसका बेटा इलाज के बिना मर रहा था क्योंकि उसके पास 'अभी' देने को कुछ नहीं था। उसे याद आया अपने पिता का कहा—*"पैसे से बिस्तर खरीद लोगे, पर जान नहीं।"*
खून का इंतज़ाम नहीं हो पा रहा था।
तभी उसे याद आया। पापा की वो पुरानी डायरी! वो उसके कोट की अंदरूनी जेब में ही पड़ी रह गई थी, क्योंकि उसने उस दिन के बाद कोट पहना ही नहीं था।
कांपते हाथों से उसने वो डायरी निकाली।
उसमें शहर के एक नंबर के आगे लिखा था—*'रघुवीर (हमेशा तैयार)'*।
अर्णव को नहीं पता था यह रघुवीर कौन है। उसने कांपते हाथों से अस्पताल के फोन से नंबर मिलाया।
"हेलो?" एक भारी आवाज़ आई।
"मैं... मैं दीनानाथ जी का बेटा अर्णव बोल रहा हूँ। सिटी हॉस्पिटल में हूँ। मेरे बेटे को ओ-नेगेटिव खून चाहिए और... और कुछ पैसों की ज़रूरत है। पापा ने आपका नंबर..." अर्णव रो पड़ा। उसका अहंकार आंसुओं में बह गया।
"दीनानाथ जी का बेटा? बस 20 मिनट रुक बेटा। मैं आ रहा हूँ।"
फोन कट गया।
अर्णव को यकीन नहीं हुआ। जिसने उसे देखा नहीं, जाना नहीं, वो मदद करेगा?
ठीक 20 मिनट बाद, एक साधारण सा कुर्ता-पायजामा पहने एक बुजुर्ग आदमी और उनके साथ चार-पाँच लड़के अस्पताल में तूफ़ान की तरह घुसे।
"कौन है अर्णव?" बुजुर्ग ने पूछा।
अर्णव खड़ा हुआ।
बुजुर्ग ने तुरंत काउंटर पर 5 लाख कैश (जो वो शायद किसी ज़मीन के सौदे के लिए लाए थे) जमा किया। और साथ आए लड़कों ने कहा, "हमारा ब्लड ग्रुप ओ-नेगेटिव है। चलिए डॉक्टर साहब, कितना खून चाहिए?"
डॉक्टर तुरंत हरकत में आए। आरुष को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया।
अर्णव कोने में खड़ा कांप रहा था। वह बुजुर्ग (रघुवीर जी) उसके पास आए और उसके सिर पर हाथ रखा।
"घबरा मत बेटा। दीनानाथ जी ने 25 साल पहले मेरी बेटी की शादी में अपने कंगन गिरवी रखकर मदद की थी। आज तो बस ब्याज चुकाने आया हूँ। उनका पोता मेरा पोता है।"
दो घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए। "ऑपरेशन सफल रहा। बच्चा खतरे से बाहर है।"
अर्णव घुटनों के बल गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोया।
तभी उसे कॉरिडोर के दूसरे कोने पर एक और परिचित चेहरा दिखा। वो 'सुबोध चाचा' थे। वही चाचा जिनका फोन उसने काट दिया था।
रघुवीर जी ने उन्हें बुलाया था। सुबोध चाचा अपने साथ घर का बना खाना और थरमस में चाय लेकर आए थे।
"बेटा, रघुवीर भाई ने बताया एक्सीडेंट हो गया। तूने कुछ खाया नहीं होगा। ले, चाय पी ले," सुबोध चाचा ने अर्णव के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आँखों में कोई शिकायत नहीं थी, बस चिंता थी।
अर्णव ने सुबोध चाचा को देखा। वो वही आदमी था जिसे उसने 'इमोशनल ब्लैकमेलर' कहा था। आज जब उसके 'करोड़पति दोस्त' फोन नहीं उठा रहे थे, तब यह 'गरीब' चाचा 200 किलोमीटर दूर से बस पकड़कर उसके लिए खाना लेकर आया था।
अर्णव ने सुबोध चाचा के पैर पकड़ लिए। "चाचा, मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं बहुत घटिया इंसान हूँ।"
"अरे पगले, खून पानी नहीं होता। तू भूल सकता है, हम नहीं," चाचा ने उसे गले लगा लिया।
अगले दिन दीनानाथ जी भी आ गए।
अर्णव आरुष के बिस्तर के पास बैठा था। आरुष के सिर पर पट्टी थी।
अर्णव ने दीनानाथ जी को देखा और वो डायरी वापस उनकी तरफ बढ़ाई।
"पापा, आपकी पासबुक में बहुत बैलेंस है। मेरा बैलेंस जीरो है," अर्णव ने भीगी आँखों से कहा। "मेरे पास पैसा बहुत था, पर जब मौत सामने खड़ी थी, तो मेरा क्रेडिट कार्ड नहीं चला, आपकी यह फटी हुई डायरी चली। मुझे समझ आ गया पापा, कि मर्सिडीज में बैठकर रोना आसान नहीं होता, अगर आंसू पोंछने वाला कोई अपना पास न हो।"
दीनानाथ जी ने मुस्कुराते हुए डायरी वापस अर्णव की जेब में रख दी।
"इसे तू ही रख। मैंने अपनी ज़िंदगी जी ली। अब तुझे अपनी 'पासबुक' भरनी है। और याद रखना बेटा, वक़्त रहते बच्चों को रिश्तों की एहमियत नहीं समझाई, तो बुढ़ापे में वो तुम्हें 'ओल्ड ऐज होम' का रास्ता दिखाने में देर नहीं लगाएंगे, क्योंकि तुमने ही उन्हें सिखाया होगा कि 'जो काम का नहीं, वो घर में नहीं'।"
अर्णव ने आरुष का हाथ अपने हाथ में लिया। आरुष ने धीरे से आँखें खोलीं।
"डैड... वो अंकल कौन थे जिन्होंने खून दिया?" आरुष ने पूछा।
"वो... वो हमारे असली 'फैमिली' हैं बेटा," अर्णव ने कहा। "और अब से हम हर संडे विमला दीदी के बच्चों को पढ़ाएंगे। ठीक है?"
आरुष मुस्कुराया। "ठीक है डैड।"
अर्णव ने उस दिन एक नया नियम बनाया। उसने अपने फोन से 'ब्लॉक लिस्ट' खाली कर दी और अपने बिजी शेड्यूल में से हर हफ्ते 'रिश्तों' के लिए एक दिन फिक्स कर दिया। उसे समझ आ गया था कि पैसा तो फिर कमाया जा सकता है, लेकिन अगर अपने छूट गए, तो वो किसी बाज़ार में नहीं मिलते।
उस रात अर्णव ने अपनी डायरी में लिखा:
**"जीवन की सबसे महंगी चीज़ 'मदद' है, और मज़े की बात यह है कि इसे पैसे से नहीं, व्यवहार से खरीदा जाता है।"**
**कहानी का सार:**
हम अक्सर अपने बच्चों को 'सफल' बनाने की दौड़ में इतना आगे निकल जाते हैं कि उन्हें 'इंसान' बनाना भूल जाते हैं। पैसा ज़रूरी है, पर वह ऑक्सीजन है, ज़िंदगी नहीं। ज़िंदगी वो लोग हैं जो तब आपके साथ खड़े होते हैं जब आपकी जेब खाली हो और किस्मत खराब।
**अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या आप भी अपनी व्यस्तता के कारण अपनों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं? अगर आज आपके पास अर्णव जैसी मुसीबत आए, तो कितने लोग आपके लिए खड़े होंगे? सोचिएगा ज़रूर।
**“अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया और आपको रिश्तों की कद्र करना सिखाया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। ताकि यह संदेश हर माता-पिता और बेटे-बेटी तक पहुंचे। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो ऐसी ही दिल को छू लेने वाली पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**
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