कार की खिड़की से पीछे छूटते हुए गाँव के उन हरे-भरे खेतों को देखकर मेरे मन में एक अजीब सी शांति थी। अभी कुछ घंटे पहले ही तो मेरे अंदर का तूफ़ान शांत हुआ था। जब मेरे पति, रोहन, ने अपनी माँ (मेरी सासू माँ, सुमित्रा जी) से चलने की ज़िद की थी, तो मेरी धड़कनें रुक गई थीं। मुझे लगा था कि अब मेरी मुंबई की मॉडर्न लाइफस्टाइल खत्म। अब वही घूंघट, वही टोक-टाकी और वही सुबह जल्दी उठने का नाटक शुरू हो जाएगा।
लेकिन सुमित्रा जी ने बड़े ही प्यार से मना कर दिया था। उन्होंने कहा था, "रोहन बेटा, यहाँ गाँव में तेरे बाबूजी की यादें हैं, और पड़ोस में सब अपने ही तो हैं। मुझे यहाँ कोई दिक्कत नहीं होगी। तुम लोग जाओ, अपनी गृहस्थी संभालो।"
रोहन का चेहरा उतर गया था, पर मेरा चेहरा खिल उठा था। मैंने मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा किया था। हम वापस मुंबई लौट आए। रोहन थोड़े दिन उदास रहे, पर काम की भागदौड़ में सब सामान्य हो गया।
मैं अपनी जीत पर बहुत खुश थी। मुझे लगा था कि मैंने बड़ी समझदारी से अपनी 'प्राइवेसी' बचा ली है। मैं अपनी मर्जी की मालकिन थी। न कोई सुबह उठाने वाला, न खाने में नुस्खे निकालने वाला।
लेकिन कहते हैं न, इंसान अपनी किस्मत खुद लिख सकता है, पर समय के फैसले को नहीं बदल सकता। अभी मुझे सुकून की सांस लिए मुश्किल से दो महीने ही हुए थे कि एक रात फोन की घंटी ने हमारे घर की शांति भंग कर दी।
रात के 2 बज रहे थे। रोहन ने हड़बड़ा कर फोन उठाया। दूसरी तरफ गाँव के सरपंच जी थे।
"रोहन भैया, जल्दी आ जाओ। काकी (माँ) को दिल का दौरा पड़ा है। हमने उन्हें ज़िला अस्पताल में भर्ती कराया है, लेकिन हालत नाज़ुक है।"
रोहन के हाथ से फोन छूट गया। हम उसी वक्त गाड़ी उठाकर गाँव भागे। पूरे रास्ते रोहन रोते रहे। "मैंने माँ को कहा था साथ चलो, पर वो मानी नहीं। अगर वो हमारे साथ होतीं तो शायद यह नौबत नहीं आती," रोहन खुद को कोस रहे थे।
मैं चुप थी। मेरे मन में अपराधबोध तो नहीं, पर डर ज़रूर था। डर इस बात का कि अब तो माँजी को साथ लाना ही पड़ेगा। अब कोई बहाना नहीं चलेगा।
अस्पताल पहुँचकर पता चला कि माँजी खतरे से बाहर हैं, लेकिन डॉक्टर ने साफ कह दिया था, "अब यह अकेले नहीं रह सकतीं। इन्हें 24 घंटे देखभाल की ज़रूरत है।"
मजबूरी थी। डिस्चार्ज के बाद हम सुमित्रा जी को मुंबई ले आए।
मेरे सपनों के 2 BHK फ्लैट में अब एक तीसरा सदस्य आ गया था। मैंने गेस्ट रूम माँजी के लिए तैयार किया। लेकिन मेरे मन में वही पुराना डर बैठा था—अब मेरी आज़ादी गई।
शुरुआत के कुछ दिन तो ठीक रहे। माँजी अपने कमरे में ही रहती थीं। रोहन ऑफिस चले जाते और मैं अपने वर्क-फ्रॉम-होम में व्यस्त हो जाती। लेकिन धीरे-धीरे मुझे घर का माहौल भारी लगने लगा।
मुझे लगता था कि माँजी मुझ पर नज़र रख रही हैं। अगर मैं सुबह देर से उठती, तो मुझे लगता कि वो मन ही मन मुझे कोस रही होंगी। अगर मैं ऑनलाइन खाना ऑर्डर करती, तो मुझे लगता कि वो सोच रही होंगी कि बहू को खाना बनाना नहीं आता। हालांकि, उन्होंने मुँह से कभी कुछ नहीं कहा।
वो बस खामोश रहती थीं। अपनी दवाइयां खातीं और खिड़की से बाहर आसमान को ताकती रहतीं।
मेरी चिड़चिड़ाहट बढ़ने लगी। एक दिन रविवार को मेरी किटी पार्टी की सहेलियाँ घर आने वाली थीं। मैंने रोहन से कह दिया, "रोहन, प्लीज माँजी से कह देना कि जब मेरी फ्रेंड्स आएं तो वो अपने कमरे में ही रहें। वो पुरानी साड़ी पहनकर, खांसते हुए बाहर आ जाएंगी तो सब अजीब फील करेंगे। मेरा इम्प्रेशन ख़राब होगा।"
रोहन ने मुझे घूरकर देखा, पर बिना कुछ बोले माँ के कमरे में चले गए।
शाम को जब मेरी सहेलियाँ आईं, तो घर में हंसी-ठहाके गूंज रहे थे। माँजी एक बार भी बाहर नहीं निकलीं। यहाँ तक कि पानी लेने के लिए भी नहीं। मुझे बड़ी तसल्ली हुई।
पार्टी खत्म होने के बाद, मैं किचन में गई तो देखा सिंक में एक भी गंदा बर्तन नहीं था। मुझे याद आया कि मैंने तो बर्तन सिंक में ही छोड़े थे।
तभी मेरी नज़र एक कोने में पड़ी। माँजी धीरे-धीरे, कांपते हाथों से अपनी प्लेट धो रही थीं। वो शायद पार्टी के दौरान चुपचाप किचन में आई थीं, अपना खाना खुद लिया और अब बर्तन धो रही थीं ताकि मुझे काम न करना पड़े।
"अरे माँजी! आप यह क्या कर रही हैं?" मैंने ज़रा तेज़ आवाज़ में कहा। "आप बीमार हैं, रोहन देखेंगे तो मुझे ही डांटेंगे कि मैं आपसे काम करवा रही हूँ।"
माँजी सहम गईं। "नहीं-नहीं बहू... वो मुझे लगा तुम अपनी सहेलियों के साथ व्यस्त हो, थक गई होगी। तो सोचा अपने बर्तन खुद धो लूँ।"
उनकी आवाज़ में एक अजीब सी लज्जा थी, जैसे वो इस घर में बोझ हों। पर मैंने उस दर्द को नहीं समझा। मैंने बस इतना कहा, "रहने दीजिये। आप जाकर आराम कीजिये।"
दिन बीतते गए। माँजी की सेहत में सुधार नहीं हो रहा था। वो और ज्यादा चुप रहने लगी थीं। खाना भी नाम मात्र का खाती थीं।
एक दिन रोहन ऑफिस के टूर पर गए हुए थे। घर में मैं और माँजी अकेले थे। मुझे अचानक ऑफिस के काम से बाहर जाना पड़ा। मैंने माँजी से कहा, "मैं खाना बना कर रख रही हूँ, आप खा लेना। मैं शाम तक लौटूंगी।"
शाम को जब मैं लौटी, तो घर का दरवाज़ा खुला हुआ था। मेरा दिल धक से रह गया। मैं अंदर दौड़ी। माँजी अपने कमरे में नहीं थीं। पूरा घर खाली था।
"माँजी! माँजी!" मैंने आवाज़ लगाई। कोई जवाब नहीं।
बाथरूम, बालकनी, हर जगह देख लिया। वो कहीं नहीं थीं। मेरा गला सूखने लगा। अगर उन्हें कुछ हो गया तो रोहन को क्या जवाब दूँगी?
तभी मेरी नज़र डाइनिंग टेबल पर रखे एक लिफाफे पर पड़ी। उसके साथ एक पुरानी, डायरी भी थी।
मैंने कांपते हाथों से वह चिट्ठी उठाई। उसमें टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में लिखा था:
"बहू, मैं जा रही हूँ। वापस अपने गाँव। चिंता मत करना, मैं बस से चली जाऊंगी। मुझे पता है कि इस शहर के छोटे से घर में मेरे लिए जगह बनाना तुम्हारे लिए मुश्किल हो रहा है। मैं बूढ़ी हूँ, पर नासमझ नहीं। मैं तुम्हारी आँखों में वो बेरुखी देख सकती हूँ। मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण तुम्हारे और रोहन के बीच कोई झगड़ा हो। तुम अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जियो। मैं अपनी बची हुई सांसें गाँव की हवा में ही पूरी कर लूँगी। रोहन को मत बताना कि मैं क्यों गई, कह देना मेरा मन नहीं लग रहा था।"
मेरी आँखों से आंसू टपक कर उस कागज़ पर गिर गए। मैंने पास रखी वह पुरानी डायरी उठाई। यह शायद बाबूजी की डायरी थी, जिसे माँजी हमेशा अपने पास रखती थीं। लेकिन उसके आखिरी पन्नों पर माँजी ने कुछ लिखा था।
मैं पढ़ने लगी। वह तारीख उस दिन की थी जब हम गाँव गए थे और माँजी ने आने से मना किया था।
"आज रोहन और बहू आए थे। रोहन चाहता था मैं साथ चलूँ। मेरा मन तो बहुत था कि अपने बेटे के पास रहूँ, बुढ़ापे में पोते-पोतियों का सुख देखूँ। लेकिन मैंने बहू का चेहरा देख लिया। उसके चेहरे पर साफ़ लिखा था कि वह मुझे नहीं चाहती। अगर मैं चली जाती, तो उसका घर, घर नहीं पिंजरा बन जाता। मैं माँ हूँ, अपने बेटे की गृहस्थी में आग नहीं लगा सकती। इसलिए मैंने झूठ बोल दिया कि मुझे गाँव में रहना है। मेरा दिल रो रहा था, पर मेरे बच्चों की खुशी के लिए मेरा दूर रहना ही सही है।"
डायरी पढ़कर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
जिस दिन मैं अपनी 'जीत' का जश्न मना रही थी, उस दिन असल में एक माँ ने अपनी ममता का गला घोंटा था। उन्होंने सिर्फ इसलिए आने से मना किया था ताकि मैं खुश रह सकूं। और जब वो मजबूरी में यहाँ आईं, तो मैंने क्या किया? उन्हें एक अछूत की तरह कमरे में बंद रखा? उन्हें अपनी सहेलियों से छुपाया?
मुझे अपनी आत्मा पर घिन आने लगी। मैं जिसे 'अनपढ़' और 'पुराने ख्यालात' की औरत समझती थी, उनकी सोच मुझसे कितनी ऊँची थी। उन्होंने मेरे सुख के लिए अपना अकेलापन चुना था, और मैंने उनके बुढ़ापे को बोझ समझा।
मैं बदहवास होकर नीचे दौड़ी। वो अभी ज़्यादा दूर नहीं गई होंगी। सोसाइटी के गेट पर वॉचमैन ने बताया, "जी, वो माताजी अभी-अभी ऑटो लेकर बस स्टैंड की तरफ गई हैं।"
मैंने अपनी कार निकाली। मेरा हाथ स्टीयरिंग पर कांप रहा था। "भगवान, आज नहीं। आज अगर वो चली गईं, तो मैं ज़िंदगी भर खुद को माफ़ नहीं कर पाऊंगी।"
बस स्टैंड पर भारी भीड़ थी। मैं पागलों की तरह इधर-उधर भाग रही थी। हर बूढ़ी औरत में मुझे माँजी दिख रही थीं। तभी, एक बेंच पर कोने में, अपनी छोटी सी पोटली सीने से लगाए, सुमित्रा जी बैठी दिखीं। उनकी आँखें बंद थीं और गालों पर आंसू सूखे हुए थे।
मैं दौड़कर उनके पास गई और उनके पैरों में गिर पड़ी।
"माँजी!"
वो हड़बड़ा कर उठीं। "बहू? तुम? यहाँ क्यों आई? जाओ घर जाओ, मैंने कहा न मैं चली जाऊंगी।"
"नहीं माँजी, आप कहीं नहीं जाएंगी," मैं फूट-फूट कर रोने लगी। आस-पास के लोग देखने लगे, पर मुझे कोई परवाह नहीं थी। "मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं बहुत बुरी हूँ। मैं अंधी हो गई थी अपनी झूठी आज़ादी में। मैंने आपको कभी समझा ही नहीं। आपने मेरे लिए इतना बड़ा त्याग किया, और मैंने आपको दुत्कार दिया?"
माँजी ने झुककर मुझे उठाया और गले लगा लिया। "पगली, माँ से भी कोई माफ़ी मांगता है क्या? मैं तो बस तेरी खुशी चाहती थी।"
"मेरी खुशी आपके बिना अधूरी है माँजी," मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया। "घर ईंट-पत्थर से नहीं, बड़ों के आशीर्वाद से बनता है। वो घर आपका है, और आप उस घर की नींव हैं। अगर आप नहीं चलेंगी, तो मैं भी रोहन के पास वापस नहीं जाऊंगी। हम दोनों यहीं बैठेंगे।"
माँजी की आँखों में पानी भर आया। यह दुख के आंसू नहीं थे, यह उस स्वीकारोक्ति के आंसू थे जिसका इंतज़ार हर बुजुर्ग को होता है।
हम घर वापस आए।
उस रात मैंने माँजी को गेस्ट रूम में नहीं, बल्कि अपने साथ अपने कमरे में सुलाया। मैंने रोहन को फोन किया और सब कुछ बताया। रोहन भी फोन पर रो पड़े।
अगले दिन जब सुबह हुई, तो घर का नज़ारा बदला हुआ था।
मैंने माँजी से कहा, "माँजी, आज नाश्ते में आप अपनी पसंद के वो गाँव वाले आलू के परांठे बनाओगी? मुझे आपसे सीखना है।"
माँजी का चेहरा खिल उठा। "अरे, अभी बनाती हूँ। तू बस देखती जा।"
रसोई में चूल्हे के पास खड़ी माँजी के चेहरे पर जो चमक थी, वो किसी भी मॉडर्न फेस-पैक से नहीं आ सकती थी। उस दिन मैंने जाना कि सास का साथ 'दखलअंदाजी' नहीं, बल्कि 'सहारा' होता है।
थोड़े दिनों बाद जब मेरी सहेलियाँ दोबारा आईं, तो मैंने गर्व से माँजी को उनसे मिलवाया।
"मीट माय मदर-इन-लॉ, नहीं... माय मदर, सुमित्रा देवी। यह इस घर की बॉस हैं।"
माँजी मुस्कुराईं और बड़े प्यार से सब से मिलीं। मेरी सहेलियों ने कहा, "शिखा (मेरा नाम), तू कितनी लकी है जो तुझे ऐसी सास मिली।"
मैंने माँजी की तरफ देखा और मन ही मन कहा, "हाँ, मैं सच में लकी हूँ। क्योंकि इन्होंने मुझे सिर्फ बहू नहीं माना, बल्कि मेरी नादानियों को भी बेटी समझकर माफ़ कर दिया।"
आज हमारे घर में तीन लोग नहीं, बल्कि एक 'परिवार' रहता है। अब मुझे अपनी प्राइवेसी की चिंता नहीं होती, क्योंकि मुझे पता है कि जब मैं गिरूँगी, तो संभालने के लिए माँजी के अनुभवी हाथ मेरे पास हैं। और वो सुकून, जो मैं अकेलेपन में ढूंढ रही थी, वो मुझे माँजी की गोद में सिर रखकर मिला।
कहानी का शीर्षक:
बूढ़ी डायरी और अनकहा दर्द
निष्कर्ष:
रिश्ते नाज़ुक धागे होते हैं। अक्सर नई पीढ़ी अपनी जगह बनाने के चक्कर में यह भूल जाती है कि पुरानी पीढ़ी ने उनके लिए कितनी ज़मीन छोड़ी है। सास-ससुर पुराना फर्नीचर नहीं होते जिन्हें स्टोर रूम में डाल दिया जाए, वो वो बरगद के पेड़ होते हैं जिनकी छांव के बिना घर, घर नहीं लगता।
लेखक का संदेश:
दोस्तों, अगर आपके घर में भी बुजुर्ग हैं, तो उन्हें बोझ मत समझिये। उनकी खामोशी को पढ़िए। हो सकता है वो भी आपकी खुशी के लिए किसी कोने में चुपचाप अपने आंसू पी रहे हों। इससे पहले कि वो डायरी के पन्नों की तरह हमेशा के लिए बंद हो जाएं, उन्हें गले लगा लीजिये। क्योंकि खोने के बाद सिवाय यादों के और कुछ नहीं बचता।
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