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काँच का महल

  "मुझे माफ़ कर दे बेटा," दीवानचंद जी रो पड़े, "मैं चकाचौंध में अंधा हो गया था। मैंने तेरे पसीने की कमाई की कद्र नहीं की और उसके झूठ पर अपना सब कुछ लुटा दिया।"

कमल ने पिता के आँसू पोंछे, "पापा, विमल भैया ने जो किया वो उनकी समझ थी। पर परिवार का मतलब ही यही है कि जब एक गिरे, तो दूसरा उसे संभाल ले। पैसा फिर कमा लेंगे, पर आपका साथ रहना ज़रूरी है।"

शहर की पॉश कॉलोनी में बनी कोठी 'शांति-निवास' आज वाकई बहुत शांत थी। लेकिन यह शांति सुकून की नहीं, बल्कि तूफान के बाद की तबाही जैसी थी। दीवानचंद जी अपने कमरे में सिर पकड़े बैठे थे। सामने टेबल पर ब्लड प्रेशर की गोलियाँ और कुछ बैंक के नोटिस पड़े थे।

दीवानचंद जी के दो बेटे थे—बड़ा विमल और छोटा कमल। विमल हमेशा से महत्त्वाकांक्षी था। एमबीए करने के बाद उसने कहा, "पापा, मैं नौकरी नहीं करूँगा, अपना स्टार्ट-अप शुरू करूँगा।" दीवानचंद जी ने खुशी-खुशी अपनी जमा-पूँजी उसे दे दी। विमल शहर चला गया। हर महीने उसकी सफलता की खबरें आतीं। कभी वो नई कार के साथ फोटो भेजता, कभी किसी फाइव स्टार होटल से चेक-इन करता। दीवानचंद जी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता। वो पूरे मोहल्ले में कहते, "अरे, मेरा विमल तो लाखों में खेल रहा है।"

दूसरी तरफ कमल था, जिसने पिता की छोटी सी हार्डवेयर की दुकान संभाली थी। वो सुबह जाता, शटर उठाता, और रात को धूल-धूसरित होकर घर लौटता। दीवानचंद जी अक्सर उसे ताना देते, "तू बस पेंच और कील ही बेचता रह जाएगा। कुछ सीख अपने बड़े भाई से। इसे कहते हैं लाइफस्टाइल।" कमल चुपचाप सुन लेता और मुस्कुरा देता।

बात तब बिगड़ी जब विमल घर आया। वो एक बड़ी एसयूवी गाड़ी से उतरा। उसने पिता के पैर छुए और कहा, "पापा, मेरा बिज़नेस अब इंटरनेशनल होने वाला है। बस, थोड़ी सी फंडिंग की कमी है। अगर हम यह पुश्तैनी घर गिरवी रख दें, तो बैंक से बड़ा लोन मिल जाएगा। मैं वादा करता हूँ, छह महीने में लोन चुका दूँगा और घर भी छुड़ा लूँगा। वैसे भी यह घर पुराना हो गया है, इसके बाद हम पेंटहाउस लेंगे।"

कमल ने विरोध किया, "पापा, घर गिरवी रखना ठीक नहीं है। बिज़नेस में ऊँच-नीच होती रहती है। हमारी छत चली गई तो हम कहाँ जाएंगे?"

दीवानचंद जी ने कमल को डाँट दिया, "तू अपनी छोटी सोच अपने पास रख। विमल इतना बड़ा बिजनेसमैन है, उसे तुझसे ज़्यादा समझ है। वो झूठ क्यों बोलेगा?"

विमल की मीठी बातों और सुनहरे भविष्य के सपनों में आकर दीवानचंद जी ने घर के कागज़ात बैंक को सौंप दिए। लोन पास हुआ, पैसा विमल के खाते में गया, और विमल शहर वापस चला गया।

छह महीने बीते। एक साल बीत गया। विमल का फोन आना कम हो गया। जब भी दीवानचंद जी पूछते, वो बहाने बना देता—"पापा, अभी मार्केट डाउन है," "क्लाइंट का पेमेंट फँसा है," "अगले हफ्ते पक्का भेजता हूँ।"

धीरे-धीरे बैंक के नोटिस आने लगे। किश्तें नहीं भरी गई थीं।

एक दिन बैंक के अधिकारी घर आ धमके। "मिस्टर दीवानचंद, अगर अगले हफ्ते तक बकाया राशि नहीं जमा हुई, तो घर की कुर्की होगी," बैंक मैनेजर ने साफ कह दिया।

दीवानचंद जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उन्होंने काँपते हाथों से विमल को फोन लगाया।

"नंबर नेटवर्क क्षेत्र से बाहर है।"

उन्होंने विमल के ऑफिस के लैंडलाइन पर फोन किया जो विमल ने अपने विजिटिंग कार्ड पर दिया था।

उधर से जवाब आया, "सर, यह नंबर किसी 'विमल एंटरप्राइजेज' का नहीं है। यह एक को-वर्किंग स्पेस है और विमल जी ने तीन महीने पहले यहाँ आना छोड़ दिया है। उन पर यहाँ का भी काफी उधार है।"

दीवानचंद जी को चक्कर आ गया। वो सोफे पर गिर पड़े। जिस बेटे पर उन्हें नाज़ था, उसने झूठ का ऐसा महल खड़ा किया था जिसकी नींव में पिता का भरोसा दफन हो गया था। पता चला कि विमल का कोई बिज़नेस था ही नहीं। वो बस लोन और क्रेडिट कार्ड के पैसों पर अय्याशी कर रहा था और घर वालों को झूठी शान दिखा रहा था।

उस रात घर में चूल्हा नहीं जला। दीवानचंद जी को अपनी गलती का एहसास हो रहा था, पर अब देर हो चुकी थी। तभी कमल कमरे में आया। उसके हाथ में एक बैग था।

"पापा, उठिए। हमें बैंक जाना है," कमल ने शांत स्वर में कहा।

"बैंक? अब क्या बचा है बेटा? सब खत्म हो गया," दीवानचंद जी की आँखों से आँसू बह निकले।

कमल ने बैग मेज़ पर रखा और उसे खोला। उसमें नोटों की गड्डियाँ थीं और कुछ गहने थे।

"ये क्या है?" दीवानचंद जी चौंक गए।

"पापा, पिछले दस सालों से दुकान से जो भी एक्स्ट्रा मुनाफा होता था, मैं उसे जोड़ता रहा। मैंने और आपकी बहू ने कभी नए कपड़े या घूमने-फिरने पर खर्च नहीं किया। ये मेरी और आपकी बहू के गहने हैं। इतना पैसा है कि बैंक का ब्याज और कुछ मूलधन चुकता हो जाएगा। बैंक वाले हमें और समय दे देंगे।"

दीवानचंद जी ने कमल को देखा। साधारण कपड़े, माथे पर चिंता की लकीरें, लेकिन आँखों में गजब का आत्मविश्वास। जिसे वो 'नाकामयाब' समझते थे, आज उसी ने उनकी इज़्ज़त बचाई थी। और जो 'हीरा' था, वो काँच का टुकड़ा निकला जिसने हाथ ही काट दिया।

"मुझे माफ़ कर दे बेटा," दीवानचंद जी रो पड़े, "मैं चकाचौंध में अंधा हो गया था। मैंने तेरे पसीने की कमाई की कद्र नहीं की और उसके झूठ पर अपना सब कुछ लुटा दिया।"

कमल ने पिता के आँसू पोंछे, "पापा, विमल भैया ने जो किया वो उनकी समझ थी। पर परिवार का मतलब ही यही है कि जब एक गिरे, तो दूसरा उसे संभाल ले। पैसा फिर कमा लेंगे, पर आपका साथ रहना ज़रूरी है।"

दीवानचंद जी को उस दिन समझ आया कि झूठ और बहाने आपको कुछ पल के लिए राजा बना सकते हैं, लेकिन जब जीवन की असल परीक्षा होती है, तो सच्चाई की छोटी सी झोपड़ी ही काम आती है। विमल आज भी शहर में कहीं छिपता फिर रहा था, और कमल, अपनी ईमानदारी के दम पर, पिता का सिर गर्व से ऊँचा कर रहा था।


दोस्तों, हम अक्सर सोशल मीडिया और समाज में अपनी झूठी शान बनाए रखने के लिए झूठ का सहारा लेते हैं। हम अपनों से ही सच छिपाते हैं। लेकिन याद रखिए, झूठ की उम्र बहुत छोटी होती है। जिस दिन सच सामने आता है, उस दिन इंसान सिर्फ भरोसा नहीं खोता, बल्कि उन रिश्तों को भी खो देता है जो उसकी असली ताकत थे। सादा जीवन और सच्ची कमाई ही सुख की असली कुंजी है।

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