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रिश्तों की दीमक और खामोश त्याग

 घर के आंगन में तुलसी के पौधे के पास खड़ी होकर सुलेखा ने गहरी सांस ली। शादी को अभी महज छह महीने हुए थे, लेकिन इस "शांति निवास" में उसे शांति कम और एक अजीब सा तनाव ज्यादा महसूस होता था। यह तनाव दीवारों से नहीं, बल्कि रिश्तों के बीच खिंची अदृश्य लकीरों से उपजता था।


सुलेखा की शादी रमन से हुई थी, जो घर के छोटे बेटे थे। बड़े भाई आलोक और उनकी पत्नी, यानी सुलेखा की जेठानी 'मंजरी', इसी घर में साथ रहते थे। और इन सबके बीच एक धुरी थीं—सुलेखा की ननद, 'विमी दीदी'। विमी की शादी पास के ही शहर में हुई थी, लेकिन उनका अधिकतर समय मायके में ही बीतता था।


सुलेखा जब नई-नई ब्याह कर आई थी, तो उसे लगा था कि जेठानी मंजरी बहुत सख्त और घमंडी हैं। मंजरी कम बोलती थीं, घर की जिम्मेदारियों में मशीन की तरह जुटी रहती थीं और चेहरे पर हमेशा एक गंभीरता ओढ़े रहती थीं। इसके ठीक उलट, विमी दीदी थीं। चहकती हुई, हंसमुख और सुलेखा को पलकों पर बिठाने वाली।


पहले ही हफ्ते विमी ने सुलेखा को अकेले में पकड़ लिया था। छत पर कपड़े सुखाते हुए उन्होंने बड़े प्यार से कहा था, "सुलेखा, तू अभी नई है, भोली है। इस घर के तौर-तरीके नहीं जानती। देख, मैं तो तेरी बड़ी बहन जैसी हूँ, इसलिए समझा रही हूँ। मंजरी भाभी से थोड़ा बचकर रहना।"


सुलेखा चौंक गई थी। "क्यों दीदी? भाभी तो ठीक ही लगती हैं।"


विमी ने नाक सिकोड़ी थी। "यही तो उनकी कला है। ऊपर से शांत, अंदर से तूफान। तुझे पता है, माँ जी (सास) की तबीयत जब खराब हुई थी पिछले साल, तो भाभी ने साफ कह दिया था कि उनके पास इलाज के पैसे नहीं हैं। जबकि भाई साहब ने अपनी पूरी सैलरी उनके हाथ में दी थी। वो तो मैं थी, जिसने अपने गहने गिरवी रखकर माँ का ऑपरेशन करवाया। भाभी ने तो माँ को मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।"


सुलेखा का दिल दहल गया था। एक बहू अपनी सास के साथ ऐसा कैसे कर सकती है? उस दिन के बाद से सुलेखा का नजरिया बदल गया। उसे मंजरी के हर काम में खोट दिखने लगा। अगर मंजरी रसोई में बर्तन थोड़े जोर से रखती, तो सुलेखा को लगता कि वो गुस्सा दिखा रही हैं। अगर मंजरी रमन (सुलेखा के पति) से कुछ कहती, तो लगता कि वो भाइयों में झगड़ा करवा रही हैं।


विमी अक्सर सुलेखा के कान भरती रहती।

"देख रही है सुलेखा? आज भाभी ने खीर बनाई, लेकिन काजू-किशमिश सिर्फ आलोक भैया की कटोरी में डाले। हम तो जैसे सौतेले हैं।"

"अरे, तूने वो नई साड़ी देखी भाभी की? तीन हज़ार की है। और जब मैंने पिछले महीने पांच सौ रुपये मांगे थे दवाई के लिए, तो कह दिया हाथ तंग है। सारा पैसा अपने मायके भेजती हैं ये महारानी।"


सुलेखा के मन में जेठानी के लिए नफरत की एक दीवार खड़ी हो गई थी। वह मंजरी से सीधे मुंह बात नहीं करती, काम में हाथ बंटाने से कतराती और अपनी सारी बातें विमी दीदी से शेयर करती। विमी दीदी उसकी सगी बन गई थीं और मंजरी पराई।


समय बीतता गया। दीवाली का त्योहार सिर पर था। घर में सफेदी और साफ-सफाई चल रही थी। रमन और आलोक दोनों दुकान के काम में व्यस्त थे, इसलिए घर की सारी जिम्मेदारी औरतों पर थी।


तभी एक दोपहर, घर में कोहराम मच गया। आलोक जी को दुकान से फोन आया कि हार्ट में तेज दर्द उठा है और उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा है।

मंजरी के हाथ से थाली छूट गई। चेहरा फक पड़ गया। रमन तुरंत अस्पताल भागा। सुलेखा और सास घबराए हुए थे।


विमी भी संयोग से घर पर ही थीं। जैसे ही खबर मिली, उन्होंने रोना-पीटना शुरू कर दिया। "हाय मेरे भैया! हाय भगवान, ये किसकी नज़र लग गई!"

मंजरी ने खुद को संभाला। उसने तुरंत अपनी अलमारी खोली, पासबुक और कुछ नकदी निकाली और अस्पताल जाने के लिए तैयार हो गई।


अस्पताल में डॉक्टर ने बताया कि तुरंत एंजियोप्लास्टी करनी होगी। खर्चा लगभग तीन लाख रुपये आएगा। रमन के पास उस वक्त पचास हज़ार ही थे। दुकान में मंदी चल रही थी, ज्यादा सेविंग्स नहीं थीं।

मंजरी ने रमन को नकद पैसे दिए और कहा, "ये एक लाख हैं, अभी जमा करो। बाकी का इंतजाम मैं करती हूँ।"


विमी वहीं खड़ी थीं। उन्होंने सुलेखा के कान में फुसफुसाया, "देख रही है? जब भैया की जान पर बन आई तब एक लाख निकले। वैसे कहती थी पैसे नहीं हैं। न जाने कितना काला धन दबा रखा है इसने। अभी भी नाटक कर रही है कि इंतजाम करती हूँ, देखना अभी तेरे पति रमन से ही मांगेगी।"


सुलेखा को गुस्सा आया। उसे लगा कि मंजरी भाभी सचमुच बहुत स्वार्थी हैं। पति अस्पताल में है और ये पैसों का खेल खेल रही हैं।


शाम को मंजरी घर आई। वह बहुत परेशान लग रही थी। वह सीधे सास के कमरे में गई। सुलेखा पानी देने के बहाने दरवाजे के पास रुक गई, यह सुनने के लिए कि अंदर क्या बात हो रही है।

मंजरी कह रही थी, "माँ जी, ऑपरेशन जरूरी है। मेरे पास जो एफडी (FD) थी, वो मैंने तोड़ दी है, पर अभी भी एक लाख कम पड़ रहे हैं। मैं सोच रही हूँ कि अपने कंगन बेच दूँ।"


सुलेखा को विमी की बात याद आई—'इसके पास बहुत पैसा है।' सुलेखा को लगा कि ये कंगन बेचने का नाटक सिर्फ सहानुभूति बटोरने के लिए है।


तभी विमी वहां आ धमकी। उसने कमरे में घुसते ही मंजरी पर हमला बोल दिया।

"भाभी! शर्म नहीं आती आपको? भैया वहां मौत से लड़ रहे हैं और आप यहाँ कंगन-कंगन खेल रही हैं? वो जो पिछले साल पापा जी की जमीन बिकी थी, उसका हिस्सा कहाँ गया? वो तो आलोक भैया ने आपको ही दिया था ना? वो पैसे निकालिये! क्यों मेरे रमन का खून चूसना चाहती हैं?"


मंजरी ने हैरान होकर विमी को देखा। "विमी, वो पैसे तो..."


"झूठ मत बोलियेगा!" विमी चिल्लाई। "मुझे पता है आपने वो पैसे अपने भाई को दे दिए। अपना घर भरने के लिए ससुराल को कंगाल कर दिया आपने। और सुलेखा, तू सुन ले, ये औरत किसी की सगी नहीं है। आज भैया बीमार हैं तो नाटक कर रही है, कल रमन बीमार होगा तो ये एक पैसा नहीं निकालेगी।"


मंजरी की आँखों में आंसू आ गए। वह कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन विमी की तेज आवाज के आगे उसकी घिग्घी बंध गई। वह चुपचाप कमरे से निकल गई। सुलेखा ने देखा कि मंजरी अपमान के घूंट पीकर रह गई।


अगले दिन सुबह, मंजरी कहीं बाहर गई और दोपहर में पैसों का बैग लेकर लौटी। आलोक का ऑपरेशन सफल हो गया। सबने राहत की सांस ली।


तीन दिन बाद आलोक घर आ गए। घर का माहौल थोड़ा सामान्य हुआ।

एक शाम, सुलेखा स्टोर रूम में कुछ सामान ढूंढ रही थी। वहां पुराने बक्से रखे थे। गलती से एक फाइल उसके हाथ से गिर गई और कुछ कागजात बिखर गए। सुलेखा उन्हें समेटने लगी तो उसकी नज़र एक 'स्टांप पेपर' और कुछ बैंक की रसीदों पर पड़ी।


उसने कौतूहलवश उसे पढ़ा। वो एक 'लोन एग्रीमेंट' था। तारीख दो साल पुरानी थी। उसमें लिखा था कि आलोक ने पांच लाख रुपये का पर्सनल लोन लिया है। लेकिन लोन लेने का कारण पढ़कर सुलेखा के पैरों तले जमीन खिसक गई।


कारण लिखा था—*"मिस्टर राजेश (विमी के पति) के बिजनेस कर्ज़ को चुकाने हेतु।"*


सुलेखा का दिमाग चकरा गया। विमी दीदी के पति का कर्ज़? लेकिन विमी दीदी तो कहती थीं कि उनके ससुराल वाले बहुत अमीर हैं और वो अक्सर यहाँ मदद करती हैं।


सुलेखा ने और पन्ने पलटे। वहां एक डायरी मिली। वो मंजरी भाभी की थी। उसमें हिसाब-किताब लिखा था।

एक पन्ने पर लिखा था—

*"आज विमी को 20,000 दिए, उसके बेटे की फीस के लिए। आलोक ने मना किया था, पर ननद है, खाली हाथ कैसे लौटाती।"*

दूसरे पन्ने पर लिखा था—

*"माँ जी का ऑपरेशन। मेरे कंगन गिरवी रखे। विमी कह रही थी कि उसने पैसे दिए, पर असल में उसने तो रमन से 10,000 उधार लिए थे जाने के लिए। मैंने सबके सामने झूठ बोल दिया कि विमी ने मदद की, ताकि ससुराल में उसकी इज्जत बनी रहे।"*


सुलेखा के हाथ कांपने लगे। डायरी का हर पन्ना चीख-चीख कर एक अलग ही कहानी बयां कर रहा था।

वह "जमीन के पैसे" वाली बात ढूंढने लगी। उसे एक रसीद मिली। उस पर लिखा था कि जमीन के पैसे एफडी में डाले गए थे, और वो एफडी दो दिन पहले ही तोड़ी गई है—आलोक के ऑपरेशन के लिए।


और सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उसे सुनार की रसीद मिली। मंजरी ने अपने कंगन बेच दिए थे। वही कंगन, जिसे लेकर विमी ने ताना मारा था।


सुलेखा वहीं फर्श पर बैठ गई। आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। जिसे वह 'मीठी बहन' समझती थी, वो दरअसल एक शातिर खिलाड़ी थी। और जिसे वह 'घमंडी और स्वार्थी' समझ रही थी, वो इस घर की नींव को अपने गहनों और स्वाभिमान से सींच रही थी। मंजरी ने कभी अपनी ननद की पोल नहीं खोली, उल्टा उसके झूठ को सच बनाकर उसकी लाज बचाई।


सुलेखा को याद आया कि विमी ने कहा था—"मैंने गहने गिरवी रखकर माँ का ऑपरेशन करवाया।" कितना सफेद झूठ!

सुलेखा को अपने आप पर घिन आने लगी। उसने बिना जांचे-परखे एक तपस्या जैसी औरत को अपने मन में विलेन बना लिया था।


तभी पीछे से आहट हुई। सुलेखा ने मुड़कर देखा। मंजरी खड़ी थी। हाथ में चाय की ट्रे लिए।

"अरे सुलेखा, तुम यहाँ अंधेरे में क्या कर रही हो? और रो क्यों रही हो?" मंजरी ने चिंता से पूछा।


सुलेखा दौड़कर गई और मंजरी के पैरों में गिर पड़ी।

"भाभी! मुझे माफ कर दीजिये। मैंने बहुत बड़ा पाप किया है।"


मंजरी ने हड़बड़ा कर ट्रे रखी और उसे उठाया। "अरे पगली, क्या हुआ? शांत हो जा।"


सुलेखा ने वो डायरी और कागज़ दिखाए। "मैंने सब देख लिया भाभी। आप इतनी महान कैसे हो सकती हैं? विमी दीदी ने आपके बारे में इतना जहर उगला, और आपने उनकी इज्जत बचाने के लिए अपने गहने तक बेच दिए और उफ तक नहीं की?"


मंजरी ने एक फीकी मुस्कान के साथ डायरी ली और बंद कर दी।

"सुलेखा, घर ईंटों से नहीं, पर्दों से चलता है। अगर मैं रमन या माँ जी को बता देती कि उनकी लाडली बेटी ने अपने पति के कर्ज़ के लिए भाई को डुबो दिया, तो क्या वो बर्दाश्त कर पाते? माँ जी तो जीते जी मर जातीं। विमी जैसी भी है, इस घर की बेटी है। उसका सम्मान रहेगा, तो इस घर की शांति रहेगी। और गहने? गहने तो फिर बन जाएंगे, पर अगर रिश्तों में गांठ पड़ गई, तो वो कभी नहीं खुलती।"


"लेकिन भाभी, वो आपको डायन, चोर और न जाने क्या-क्या कहती हैं! वो मुझे आपके खिलाफ भड़काती रहीं और मैं मूर्ख मानती रही," सुलेखा सिसक रही थी।


"मैं जानती हूँ," मंजरी ने सुलेखा के आंसू पोंछे। "मुझे पता था कि वो तुम्हारे कान भर रही है। पर मुझे विश्वास था कि एक न एक दिन सच्चाई तुम्हारे सामने आएगी। नए बर्तन बजते हैं सुलेखा, पर जब साथ रहते हैं तो अपनी जगह बना ही लेते हैं। मुझे खुशी है कि तुमने मुझसे लड़ने की जगह सच जानने की कोशिश की।"


उसी शाम, विमी दीदी फिर से पधारीं। आते ही शुरू हो गईं।

"भाभी! आज खाने में फिर वही दाल? रमन, तुझे पता है, भाभी जानबूझकर सादा खाना बनाती हैं ताकि पैसे बचा सकें। कंजूस कहीं की!"


रमन और आलोक हॉल में बैठे थे। सुलेखा चाय लेकर आई।

विमी ने सुलेखा को आंख मारी, मानो कह रही हो—'देखा, मैंने कहा था ना।'


सुलेखा ने चाय की ट्रे जोर से मेज पर पटकी। सबकी नज़रें उस पर गईं।

"दीदी," सुलेखा की आवाज़ में एक अजीब सी कड़कड़ाहट थी। "कंजूसी और मजबूरी में फर्क होता है। भाभी पैसे इसलिए नहीं बचा रहीं कि उन्हें तिजोरी भरनी है, बल्कि इसलिए बचा रही हैं ताकि आपके पति का बचा-खुचा कर्ज़ भी चुका सकें।"


कमरे में सन्नाटा छा गया। विमी का चेहरा सफेद पड़ गया। "क्या... क्या बकवास कर रही है?"


सुलेखा अंदर गई और वो फाइल ले आई। उसने वो लोन के कागज़ रमन और आलोक के सामने रख दिए।

"रमन, देखिये। आलोक भैया ने लोन अपने लिए नहीं, जीजाजी के लिए लिया था। और विमी दीदी, जो आप कह रही थीं कि माँ जी के ऑपरेशन के पैसे आपने दिए, ये देखिये रसीद। वो पैसे भाभी के पिता ने भेजे थे। आपने तो उल्टा उस वक्त रमन से दस हज़ार उधार लिए थे।"


आलोक ने सिर झुका लिया। रमन हैरान होकर कभी अपनी बहन को देखता, कभी भाभी को।

"विमी? ये सच है?" रमन ने पूछा। "तूने कहा था कि तूने गहने बेचे माँ के लिए? और भाभी ने..."


विमी हकलाने लगी। "वो... वो तो... ये कल की आई छोकरी घर फोड़ रही है!"


"घर मैं नहीं, आप फोड़ रही हैं दीदी," सुलेखा ने दृढ़ता से कहा। "भाभी ने अपने कंगन बेचकर भैया की जान बचाई और आपने क्या किया? उस त्याग को 'नाटक' का नाम दे दिया? सिर्फ इसलिए ताकि आपकी असलियत छुप सके? शर्म आनी चाहिए आपको। जिस भाभी ने आपकी गृहस्थी बचाने के लिए अपनी गृहस्थी दांव पर लगा दी, आप उसी की जड़ें काट रही थीं?"


मंजरी ने सुलेखा को रोकने की कोशिश की, "सुलेखा, रहने दो।"


"नहीं भाभी, आज नहीं," सुलेखा ने हाथ दिखाया। "आज सच का सामने आना जरूरी है। वरना कल ये मेरे और रमन के बीच भी जहर घोल देंगी।"


उस दिन "शांति निवास" में असली शांति की स्थापना हुई। विमी का झूठ बेनकाब हो चुका था। रमन और आलोक ने अपनी पत्नी मंजरी को जो सम्मान भरी नज़रों से देखा, वो किसी भी गहने से ज्यादा कीमती था। विमी रोती हुई अपने घर चली गई, लेकिन इस बार उसे रोकने वाला कोई नहीं था।


देर रात, सुलेखा रसोई में काम कर रही थी। मंजरी आई और चुपचाप उसके साथ सब्जी कटवाने लगी।

दोनों के बीच कोई शब्द नहीं बोला गया, लेकिन उस खामोशी में एक अटूट बंधन बन चुका था। अब वे जेठानी-देवरानी नहीं, बल्कि दो बहनें थीं जिन्होंने एक बाहरी 'दीमक' से अपने घर को बचा लिया था।


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**कहानी का शीर्षक:**

**रिश्तों की दीमक और खामोश त्याग**


**हूक लाइन:**

*परिवार को तोड़ने के लिए किसी दुश्मन की ज़रूरत नहीं होती, कभी-कभी घर की 'लाडली' ही वो दीमक बन जाती है जो रिश्तों को खोखला कर देती है। जानिए कैसे एक नई बहू ने उस मीठे ज़हर का पर्दाफाश किया।*


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**लेखक का संदेश:**

रिश्ते विश्वास पर टिके होते हैं, कानों से सुनी बातों पर नहीं। अक्सर हम किसी की मीठी बातों में आकर उस इंसान को गलत समझ लेते हैं जो खामोशी से हमारे लिए सब कुछ न्योछावर कर रहा होता है। घर की बड़ी बहुएं अक्सर 'मंजरी' की तरह होती हैं—मौन और त्यागी। उनकी कद्र कीजिये, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।


**क्या आपके परिवार में भी कोई ऐसी 'विमी दीदी' है? या आप किसी 'मंजरी' को जानते हैं? अपने अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें।**


**"अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया और दिल को झकझोर दिया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। सच्चाई और रिश्तों की गहराई समझने के लिए हमारे पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!"**


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