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नींव के पत्थर

 घड़ी की सुई ने अभी सुबह के साढ़े पांच भी नहीं बजाए थे कि 'रघुनाथ टेक्सटाइल्स' के शटर के ताले खुलने की आवाज गूंज उठी। यह पिछले पंद्रह सालों का अटूट नियम था। केशव बाबू का मानना था कि लक्ष्मी जी का आगमन सूर्योदय के साथ ही होता है और जो व्यापारी सूरज चढ़ने के बाद दुकान खोलता है, उसकी बरकत कभी नहीं होती।

केशव बाबू अपने काम में उतने ही पक्के थे, जितने पुराने बरगद की जड़ें जमीन में। साठ की उम्र पार करने के बाद भी, कपड़े के थान को छूकर ही बता देते थे कि इसमें कॉटन कितना है और सिंथेटिक मिलावट कितनी। उनकी दुकान शहर की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित दुकानों में से एक थी। लेकिन उनका छोटा भाई, विकास, जो अब उनके साथ ही व्यापार में हाथ बटाता था, उसे केशव बाबू का यह 'फौजी अनुशासन' फूटी आंख नहीं सुहाता था।

विकास एमबीए करके आया था। उसे लगता था कि भाई साहब अभी भी बैलगाड़ी के जमाने में जी रहे हैं। "भैया, आजकल सब कुछ ऑनलाइन है, डिजिटल मार्केटिंग का जमाना है। आप अभी भी वही पुराने बही-खाते और मुनीम जी वाली स्टाइल में फंसे हैं," विकास अक्सर झुंझलाते हुए कहता।

केशव बाबू बस मुस्कुरा देते और अपनी एनक ठीक करते हुए कहते, "विकास, व्यापार डिग्री से नहीं, जुबान की साख और समय की पाबंदी से चलता है। ग्राहक को एसी की हवा नहीं, भरोसे का कपड़ा चाहिए।"

विकास को सबसे ज्यादा चिढ़ तब होती जब केशव बाबू हर छोटी बात पर उसे टोकते। अगर विकास ने गद्दी पर बैठते समय पैर ऊपर कर लिए, तो टोक दिया। अगर किसी ग्राहक से थोड़ी ऊँची आवाज़ में बात कर ली, तो टोक दिया। अगर लंच के लिए आधा घंटा ज्यादा ले लिया, तो नसीहत शुरू। स्टॉक रजिस्टर में एक मीटर कपड़े का हिसाब भी इधर-उधर होता, तो केशव बाबू पूरा गोदाम सिर पर उठा लेते।

"तुम समझते नहीं हो विकास," केशव बाबू कहते, "एक छोटी सी दीमक पूरी अलमारी को खोखला कर सकती है। लापरवाही व्यापार की दीमक है।"

विकास मन ही मन कुढ़ता रहता। उसे लगता था कि भैया उसे बच्चा समझते हैं और उसे अपनी काबिलियत साबित करने का मौका ही नहीं देते। वह सोचता, "अगर मुझे पूरी छूट मिले, तो मैं इस दुकान को शोरूम में बदल दूं। ये पुराना फर्नीचर, ये सफेद वर्दी पहने पुराने कर्मचारी... सब बदल डालूं।"

तभी एक दिन, केशव बाबू की तबीयत अचानक बिगड़ गई। डॉक्टर ने उन्हें सख्त हिदायत दी कि उन्हें कम से कम बीस दिन तक पूरी तरह आराम करना होगा और हवा-पानी बदलने के लिए पहाड़ों पर जाना बेहतर रहेगा। केशव बाबू जाना तो नहीं चाहते थे, दुकान की चिंता उन्हें खाए जा रही थी, लेकिन पत्नी और डॉक्टर के दबाव के आगे उन्हें झुकना पड़ा।

जाते समय केशव बाबू ने चाबियों का गुच्छा विकास के हाथ में थमाया। उनकी आँखों में चिंता थी। "विकास, अब सब तुम्हारे भरोसे है। रामू काका और मुनीम जी पुराने हैं, उनकी सलाह लेना। और देखो, समय पर दुकान खोलना और स्टॉक का मिलान रोज रात को करना मत भूलना।"

विकास ने ऊपरी मन से सिर हिलाया, "भैया, आप चिंता मत करो। आप बस अपनी सेहत पर ध्यान दो। मैं सब संभाल लूंगा।"

जैसे ही केशव बाबू की गाड़ी ओझल हुई, विकास ने एक गहरी सांस ली। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके कंधों से कई मन का बोझ हटा दिया हो। "आज़ादी!" उसने मन ही मन सोचा। "अब मैं दिखाऊंगा कि मॉडर्न बिज़नेस कैसे होता है।"

अगले दिन सुबह, विकास 9 बजे सोकर उठा। "अरे, साढ़े पांच बजे कौन दुकान खोलता है? ग्राहक तो 11 बजे के बाद ही आते हैं," उसने खुद को समझाया और आराम से तैयार होकर 10:30 बजे दुकान पहुंचा। रामू काका और बाकी कर्मचारी बाहर खड़े इंतज़ार कर रहे थे।

"छोटे मालिक, आज बड़ी देर हो गई। गांव से आने वाले ग्राहक लौट गए," रामू काका ने दबी जुबान में कहा।

"अरे काका, जाने दो। वो इक्का-दुक्का ग्राहक थे। हमें बड़े क्लाइंट्स पर फोकस करना है," विकास ने लापरवाही से कहा और शटर खोलने का इशारा किया। उसने आते ही दुकान का माहौल बदलना शुरू कर दिया। सबसे पहले उसने वह पुराना नियम तोड़ा कि कर्मचारी गद्दी पर नहीं बैठ सकते। उसने अपने दोस्तों को बुलाना शुरू कर दिया। दुकान में जहाँ पहले केवल कपड़े के भाव और 'जय सिया राम' की आवाजें आती थीं, अब वहां ठहाके और राजनीति की बातें होने लगीं।

शुरुआत के तीन-चार दिन तो बड़े मजे में बीते। विकास को लगा कि वह बहुत अच्छा मैनेजर है। उसने कर्मचारियों को भी थोड़ी ढील दे दी थी, जिससे वे खुश थे। लंच ब्रेक जो पहले 45 मिनट का होता था, अब डेढ़ घंटे तक खिंचने लगा।

मुनीम जी ने एक दिन टोका, "छोटे मालिक, सूरत से माल आने वाला था, उसका पेमेंट आज करना है। बड़े मालिक हमेशा एडवांस भिजवा देते थे।"

विकास फोन पर किसी दोस्त से बात कर रहा था, उसने हाथ के इशारे से कहा, "अरे मुनीम जी, बोल दो कल भिजवा देंगे। आजकल क्रेडिट पर काम चलता है, इतना डरने की क्या बात है?"

लेकिन पांचवें दिन से स्थिति बदलने लगी। जिस सूरत वाले सप्लायर को पेमेंट नहीं गया था, उसने नया माल भेजने से मना कर दिया। ठीक उसी समय, शादी-ब्याह का सीजन शुरू होने वाला था और दुकान में लाल रंग की बनारसी साड़ियों का स्टॉक खत्म हो चुका था। केशव बाबू होते तो वे सीजन शुरू होने से एक महीने पहले ही गोदाम भर लेते, लेकिन विकास को 'इन्वेंटरी मैनेजमेंट' का यह व्यावहारिक पाठ किताबों में नहीं मिला था।

एक पुराना और बड़ा ग्राहक, सेठ बिशनदास, दुकान पर आए। उन्हें अपनी बेटी की शादी के लिए थोक में कपड़ा चाहिए था। "अरे विकास बेटा, केशव नहीं है क्या? मुझे वो खास मलमल चाहिए जो वो हर साल मेरे लिए मंगवाता है।"

विकास ने स्टॉक रजिस्टर देखा (जो पिछले चार दिनों से अपडेट नहीं हुआ था) और कॉन्फिडेंस के साथ कहा, "चाचा जी, गोदाम में होगा। रामू काका, निकाल लाओ।"

रामू काका खाली हाथ लौटे, "मालिक, वो माल तो परसों ही खत्म हो गया था। मैंने परची भी बना कर रखी थी, लेकिन आपने आर्डर देने को मना कर दिया था, कहा था अभी जरूरत नहीं है।"

सेठ बिशनदास का चेहरा तमतमा गया। "तुम लोगों के भरोसे मैंने किसी और को आर्डर नहीं दिया। केशव की जुबान की कीमत थी, मुझे नहीं पता था कि उसके जाते ही दुकान का यह हाल हो जाएगा।" सेठ जी बिना कुछ लिए, बड़बड़ाते हुए चले गए। विकास के हाथ से एक बहुत बड़ा आर्डर निकल गया।

विकास का मूड खराब हो गया। उसने खीझकर रामू काका पर चिल्ला दिया, "आपको मुझे याद दिलाना चाहिए था न!"

"मालिक, मैंने तीन बार याद दिलाया था, पर आप मोबाइल में गेम खेल रहे थे," रामू काका ने सिर झुकाकर लेकिन सख्त आवाज में कहा।

हफ्ता बीतते-बीतते अराजकता फैलने लगी। चूंकि दुकान देर से खुलती थी, इसलिए सुबह के नियमित ग्राहक दूसरी दुकान पर जाने लगे। कर्मचारी, जिन्हें ढील मिली थी, अब कामचोरी करने लगे थे। कोई भी कपड़ा दिखाने के बाद उसे करीने से तय करके वापस नहीं रखता था। पूरा शोरूम किसी कबाड़खाने जैसा दिखने लगा था। कीमती साड़ियाँ धूल खा रही थीं।

सबसे बड़ी मुसीबत तब आई जब शनिवार की रात को हिसाब करने बैठे। गल्ले (कैश बॉक्स) में तीन हज़ार रुपये कम थे। विकास के पसीने छूट गए। केशव बाबू के राज में एक रुपये का भी इधर-उधर होना नामुमकिन था। विकास ने मुनीम जी की तरफ देखा, मुनीम जी ने सफाई दी, "छोटे मालिक, आप ही तो दिन भर गल्ले से पैसे निकालकर चाय-नाश्ता और दोस्तों के लिए मंगाते रहे। आपने कोई पर्ची भी नहीं लिखवाई। अब मुझे क्या पता किस मद में कितना गया?"

विकास सिर पकड़ कर बैठ गया। उसे वह बात याद आई जो केशव बाबू कहते थे—"अनुशासन पिंजरा नहीं है, विकास। अनुशासन वह धागा है जो मोतियों को बिखरने से रोकता है।" आज उसकी दुकान के मोती बिखर चुके थे।

रविवार की छुट्टी के दिन विकास घर पर अकेला था। दुकान बंद थी, लेकिन उसका दिमाग अशांत था। उसे एहसास हो रहा था कि जिसे वह 'टोका-टाकी' समझता था, वह असल में 'मैनेजमेंट' था। जिसे वह 'पुराना तरीका' कहता था, वह 'अनुभव' था। एसी की हवा में बैठकर वह भूल गया था कि पसीना बहाकर बनाई गई साख कितनी नाजुक होती है।

सोमवार की सुबह एक और धमाका हुआ। बिजली विभाग के लोग आ गए। बिल जमा न होने के कारण वे कनेक्शन काटने की धमकी देने लगे। केशव बाबू हमेशा बिल आते ही अगले दिन चेक काट देते थे। विकास ने बिल टेबल के किसी कोने में यह सोचकर डाल दिया था कि "बाद में कर दूंगा।" अब उसे पेनल्टी के साथ तुरंत भुगतान करना पड़ा, जिसके लिए उसे अपनी जेब से पैसे लगाने पड़े क्योंकि गल्ले में नकदी कम थी।

दसवें दिन, विकास दुकान की सीढ़ियों पर बैठा था। शाम के 7 बज रहे थे, लेकिन वह बहुत थका हुआ महसूस कर रहा था। शारीरिक थकान नहीं, मानसिक थकान। उसे वह सुरक्षा और सुकून याद आ रहा था जो भाई साहब के होने पर महसूस होता था। तब उसे सिर्फ अपने काम से मतलब होता था, बाकी सारी सिरदर्दी—बिजली, पानी, स्टॉक, कर्मचारी, बैंक—सब केशव बाबू चुपचाप संभाल लेते थे। और बदले में विकास उन्हें सिर्फ ताने देता था।

तभी उसकी नज़र सामने वाली सड़क पर पड़ी। एक टैक्सी आकर रुकी। केशव बाबू और भाभी उतर रहे थे। वे तय समय से दो दिन पहले ही आ गए थे।

विकास दौड़कर उनके पास गया। केशव बाबू ने उसे देखा, चेहरे पर वही शांत मुस्कान थी। "अरे, तुम दुकान पर नहीं हो? जल्दी बंद कर दी क्या?"

विकास कुछ बोल नहीं पाया। उसकी आँखों में आंसू आ गए। उसने लपककर केशव बाबू के पैर छुए और फिर कसकर गले लग गया।

केशव बाबू हैरान रह गए। "अरे, क्या हुआ भाई? सब ठीक तो है? कोई नुकसान हो गया क्या?"

विकास ने अपने आंसू पोंछे और कहा, "नुकसान तो बहुत हुआ भैया, लेकिन फायदा उससे ज्यादा हुआ है।"

"वो कैसे?" केशव बाबू ने पूछा।

"मुझे यह समझ आ गया कि मैं सिर्फ कपड़ा बेचना जानता हूँ, लेकिन 'दुकान चलाना' तो सिर्फ आप जानते हैं," विकास ने रुंधे गले से कहा। "मुझे माफ़ कर दीजिये भैया। मुझे आपकी हर रोक-टोक, हर डांट और हर नियम से नफरत थी। लेकिन इन दस दिनों ने मुझे बता दिया कि उस कड़वे नीम के बिना पेड़ में कीड़े लग जाते हैं। मैंने दुकान का कबाड़ा कर दिया है।"

केशव बाबू ने प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखा। वे समझ गए थे कि छोटे भाई को जीवन का सबसे बड़ा पाठ मिल चुका है।

अगले दिन सुबह, घड़ी में 5:25 हो रहे थे। केशव बाबू तैयार होकर नीचे आए, तो देखा विकास पहले से ही तैयार खड़ा है। हाथ में चाबियों का गुच्छा था।

"चले भैया?" विकास ने उत्साह से पूछा।

दुकान पहुंचकर, विकास ने सबसे पहले शटर खोला, फिर भगवान के आगे अगरबत्ती जलाई और फिर झाड़ू लेकर खुद काउंटर साफ़ करने लगा। रामू काका और मुनीम जी एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराए।

दोपहर में जब मुनीम जी पेमेंट के लिए आए, तो विकास ने तुरंत चेक साइन किया और रजिस्टर में एंट्री की। केशव बाबू अपनी गद्दी पर बैठकर अखबार पढ़ रहे थे, लेकिन बीच-बीच में कनखियों से विकास को देख लेते थे।

एक ग्राहक आया और उसने डिस्काउंट के लिए बहस शुरू की। विकास को गुस्सा आने ही वाला था कि उसे केशव बाबू की वह बात याद आ गई—"ग्राहक से बहस जीतना मतलब व्यापार हारना।" उसने गहरी सांस ली, मुस्कुराया और विनम्रता से कहा, "सर, दाम तो कम नहीं हो पाएगा, लेकिन कपड़े की गारंटी मेरी है। अगर रंग भी फीका पड़े, तो आप मुझे वापस दे जाइयेगा।" ग्राहक खुश होकर कपड़ा ले गया।

केशव बाबू ने यह देखा। उन्होंने विकास को अपने पास बुलाया। विकास थोड़ा डर गया, क्या फिर कोई गलती हो गई?

"हाँ भैया?"

केशव बाबू ने अपनी जेब से गल्ले की मुख्य चाबी (जो अब तक वे अपने पास ही रखते थे) निकाली और विकास के हाथ पर रख दी।

"यह क्या भैया?"

"अब तुम तैयार हो," केशव बाबू ने कहा। "व्यापार सिर्फ मुनाफे का नाम नहीं है, जिम्मेदारी का नाम है। और आज मैंने तुम्हें जिम्मेदारी उठाते हुए देखा। अब मुझे यकीन है कि मेरे बाद यह दुकान बंद नहीं होगी, बल्कि और आगे जाएगी।"

विकास की आँखों में फिर से नमी आ गई, लेकिन इस बार यह कमजोरी की नहीं, बल्कि गर्व और सम्मान की थी। उसने समझ लिया था कि नींव के पत्थर भले ही जमीन के नीचे दबे हों और दिखाई न दें, लेकिन पूरी इमारत का बोझ उन्हीं के कंधों पर होता है। उस दिन के बाद से, 'रघुनाथ टेक्सटाइल्स' में दो मालिक नहीं, बल्कि एक रक्षक और एक सारथी थे, जो एक-दूसरे के पूरक बनकर उस विरासत को आगे बढ़ा रहे थे।


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