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विरासत

 "मोहित, फोन क्यों काट रहे हो? बाबूजी पिछले दो घंटे से दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए देख रहे हैं। उन्होंने अपनी दवा भी नहीं खाई है। तुम जानते हो न, जब तक तुम उनसे बात नहीं कर लेते, वो बेचैन रहते हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया जो तुम अपने ही पिता को सजा दे रहे हो?"

बड़े भाई विहान की आवाज़ में हताशा और गुस्सा दोनों घुले हुए थे। फोन के स्पीकर से आती वो आवाज़ बंद कमरे की खामोशी में गूंज रही थी, लेकिन मोहित ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने फोन उठाकर बिस्तर पर उल्टा रख दिया, मानो आवाज़ दबाने से हकीकत दब जाएगी। उसके सामने एक खुला हुआ सूटकेस रखा था, जिसमें वह बेतरतीबी से अपने कपड़े ठूंस रहा था। कमरे की दीवारों पर लगी उसकी बचपन की तस्वीरें, क्रिकेट के मेडल और कॉलेज की डिग्री, सब उसे घूरते हुए प्रतीत हो रहे थे। आज वह इस घर, इस शहर और उन यादों को हमेशा के लिए छोड़कर जा रहा था।

मोहित के सीने में एक ज्वालामुखी धधक रहा था। यह गुस्सा एक दिन का नहीं था, यह बरसों की टीस थी जो आज नासूर बन गई थी। वह विहान से प्यार करता था, लेकिन बाबूजी... बाबूजी के लिए उसके मन में अब सिर्फ कड़वाहट बची थी।

"मैं जा रहा हूँ, भैया," मोहित ने मन ही मन बुदबुदाया, "उस घर में मेरा अब कोई काम नहीं जहाँ मेरी जगह हमेशा दूसरे नंबर पर रही हो।"

उसने सूटकेस की चेन बंद की। उसकी नज़र टेबल पर रखे उस पुराने 'वायलिन' पर पड़ी जिसे उसने पिछले साल अपने पहले कॉन्सर्ट में बजाया था। उसे याद आया कि कैसे बाबूजी उस कॉन्सर्ट में नहीं आए थे। कारण? विहान भैया की फैक्ट्री का उद्घाटन था। हमेशा विहान, हर जगह विहान।

नीचे हॉल में, सत्तर वर्षीय पंडित रघुनाथ शास्त्री अपनी व्हीलचेयर पर बैठे, कांपते हाथों से बार-बार मुख्य दरवाजे का पर्दा हटाकर देख रहे थे। उनकी आँखों में मोतियाबिंद का धुंधलापन था, लेकिन उससे कहीं गहरा धुंधलापन उनके दिल में था। वे समझ नहीं पा रहे थे कि उनका 'छोटू', जो कल तक उनकी गोद में सिर रखकर सोता था, अचानक उनसे इतना दूर क्यों हो गया।

विहान उनके पास आया और घुटनों के बल बैठ गया। "बाबूजी, उसने फोन नहीं उठाया। शायद... शायद वह बिजी होगा।"

रघुनाथ जी ने विहान का हाथ कसकर पकड़ लिया। उनकी जुबान लकवे के हल्के असर के कारण लड़खड़ा रही थी। "वो... वो मुझसे नाराज़ है, विहान। मुझे पता है। उसे लगता है मैंने... मैंने तुम्हारे और उसके बीच..."

विहान ने पिता के मुंह पर हाथ रख दिया। "शांत हो जाइए बाबूजी। मोहित नासमझ है। उसे वक्त दीजिए। वह गुस्सा है, पर आपसे नफरत नहीं कर सकता।"

लेकिन विहान भी जानता था कि यह सच नहीं है। पिछले हफ्ते वसीयत को लेकर जो बवाल हुआ था, उसने घर की नींव हिला दी थी।

तभी सीढ़ियों से धड़धड़ाते हुए मोहित नीचे उतरा। उसके हाथ में सूटकेस था और आंखों में अंगारे। उसे जाता देख रघुनाथ जी ने अपनी व्हीलचेयर आगे बढ़ाने की कोशिश की, "मोहित... बेटा..."

मोहित रुका। उसने एक नज़र अपने पिता को देखा। उस नज़र में इतना ठंडापन था कि रघुनाथ जी सिहर उठे।

"कहाँ जा रहे हो मोहित?" विहान ने आगे बढ़कर रास्ता रोका।

"वहाँ, जहाँ मेरी कद्र हो, भैया," मोहित ने कड़े स्वर में कहा। "इस घर में मेरा दम घुटता है। मुझे लगा था कि मैं भी इस परिवार का हिस्सा हूँ, लेकिन बाबूजी ने साबित कर दिया कि मैं सिर्फ एक एक्स्ट्रा बोझ हूँ।"

"ये तुम क्या कह रहे हो?" विहान चिल्लाया।

"सच कह रहा हूँ!" मोहित का सब्र का बांध टूट गया। उसने सूटकेस जमीन पर पटका। "बचपन से देखता आ रहा हूँ। विहान को कॉन्वेंट स्कूल, मुझे सरकारी स्कूल। विहान को नई साइकिल, मुझे उसकी पुरानी। विहान को बिजनेस संभालने को दिया, और मुझे? मुझे कहा कि तुम अपनी संगीत की धुन में रमो। और अब... अब यह वसीयत।"

मोहित ने अपनी जेब से वसीयत की एक कॉपी निकालकर हवा में लहराई। "पुश्तैनी हवेली विहान के नाम। शहर वाली दुकानें विहान के नाम। और मेरे नाम क्या? गाँव का वो पुराना खंडर और आपका यह पुराना, दीमकों वाला संगीत का कमरा? वाह बाबूजी, वाह! क्या इंसाफ है आपका। आपने जीते जी तो मुझे कभी विहान के बराबर समझा नहीं, मरने के बाद भी मुझे फकीर बनाकर जाना चाहते हैं?"

रघुनाथ जी की आँखों से आंसू बहने लगे। वे कुछ बोलना चाहते थे, उनका गला घड़घड़ा रहा था, "बेटा... मेरी बात... सुन..."

"अब क्या सुनना बाकी है?" मोहित चीखा। "आप हमेशा कहते थे कि संगीत में सरस्वती बसती है, पर असलियत में तो आप भी लक्ष्मी के पुजारी निकले। आपने सारी संपत्ति बड़े बेटे को दे दी क्योंकि वो पैसे कमाता है, और मैं, जो एक स्ट्रगलर म्यूजिशियन हूँ, मुझे आपने उस टूटे हुए कमरे के लायक समझा। आप भेदभाव करते हैं बाबूजी। आपने हमेशा किया है।"

विहान ने मोहित का कॉलर पकड़ लिया। "जुबान संभाल मोहित! तू बाबूजी से कैसे बात कर रहा है?"

"छोड़िए मुझे भैया!" मोहित ने विहान को धक्का दिया। "आप क्यों नहीं बोलेंगे? फायदा तो आपका ही हुआ है। आप भी यही चाहते थे न? मुबारक हो आपको आपकी दौलत। मैं भीख नहीं मांगूंगा। मैं अपनी दुनिया खुद बना लूंगा।"

माहौल में तनाव इतना गहरा था कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था। नौकर-चाकर कोने में दुबक गए थे। रघुनाथ जी का चेहरा पीला पड़ चुका था। वे बुरी तरह से खांसने लगे।

विहान ने मोहित को धक्का देकर पिता को संभाला। उसने पानी पिलाया और फिर मुड़कर मोहित की ओर देखा। विहान की आँखों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी करुणा थी।

"तुझे लगता है बाबूजी ने तेरे साथ भेदभाव किया है?" विहान ने धीमी लेकिन सख्त आवाज़ में पूछा।

"कागज़ तो यही कहते हैं," मोहित ने मुंह फेर लिया।

"तो फिर सुन," विहान अंदर कमरे में गया और एक पुरानी, धूल भरी डायरी और एक चाबी लेकर आया। उसने उसे मोहित के सामने फेंक दिया। "पढ़ इसे। और यह चाबी ले, उस 'टूटे हुए संगीत के कमरे' की जिसे तू दीमकों वाला कह रहा था।"

मोहित ने झिझकते हुए डायरी उठाई।

"तुझे लगता है तुझे खंडर मिला है?" विहान की आवाज़ गूंजी। "बाबूजी ने मुझे हवेली दी क्योंकि उन्हें पता है कि इसे मेंटेन करने में, इसके टैक्स भरने में मेरी पूरी जिंदगी निकल जाएगी। यह हवेली संपत्ति नहीं, जिम्मेदारी है, एक सफेद हाथी है जिसे पालना मेरे नसीब में लिखा है। दुकानें मुझे दीं, क्योंकि उन दुकानों पर करोड़ों का कर्ज है जो बाबूजी ने तेरी संगीत की पढ़ाई के लिए लिया था, जिसे अब मुझे चुकाना है।"

मोहित सन्न रह गया। उसे कर्ज के बारे में कुछ नहीं पता था।

"और जिस 'पुराने कमरे' को तू बेकार समझ रहा है," विहान ने मोहित को उस कमरे की तरफ खींचा। उसने ताला खोला और दरवाजा धक्का देकर खोला।

अंधेरे कमरे में धूल थी, लेकिन जैसे ही विहान ने लाइट जलाई, मोहित की आँखें फटी की फटी रह गईं।

कमरा कबाड़खाना नहीं था। दीवारों पर भारत के महानतम संगीतकारों के ऑटोग्राफ किए हुए वाद्ययंत्र टंगे थे। और कमरे के बीचों-बीच, एक कांच के बक्से में, एक बेहद नायाब, प्राचीन 'रूद्र वीणा' रखी थी।

"यह..." मोहित हकलाया।

"हाँ," विहान ने कहा। "यह परदादा जी की रूद्र वीणा है। इसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में करोड़ों में है, मोहित। लेकिन इसकी कीमत पैसे से नहीं, इसकी विरासत से है। बाबूजी ने पूरी दुनिया से छिपाकर इसे रखा था। कई कलेक्टर इसे मुंहमांगी कीमत पर खरीदना चाहते थे, पर बाबूजी कहते थे—'यह मेरे मोहित के लिए है। वही इसका असली वारिस है।'"

मोहित डायरी के पन्ने पलटने लगा। उसमें बाबूजी की लिखावट थी।

'विहान समझदार है, वह दुनियादारी संभाल लेगा। लेकिन मोहित... मोहित की आत्मा कोमल है। उसे व्यापार की कठोरता में नहीं फंसाना चाहता। मैं उसे कर्ज के बोझ से मुक्त रखना चाहता हूँ। उसे वो आज़ादी मिले जो मुझे कभी नहीं मिली। वो संगीत को जिए, उसे संपत्ति की चौकीदारी न करनी पड़े। हवेली विहान की बेड़ियाँ हैं, लेकिन संगीत का कमरा मोहित के पंख हैं। यह वीणा उसे कभी भूखा नहीं मरने देगी, और न ही कभी उसकी उड़ान रोकेगी।'

मोहित के हाथ से डायरी छूट गई। वह घुटनों के बल वहीं गिर पड़ा। वह जिसे भेदभाव समझ रहा था, वह असल में सुरक्षा थी। जिसे वह उपेक्षा समझ रहा था, वह सबसे गहरा प्रेम था। उसके पिता ने उसे 'बेदखल' नहीं किया था, बल्कि उसे दुनियादारी के उस दलदल से 'आज़ाद' किया था जिसमें विहान अब जीवन भर फंसा रहने वाला था।

बाबूजी ने अपनी संपत्ति विहान को देकर उसे जिम्मेदारियों में बांध दिया था, और मोहित को अपनी सबसे कीमती विरासत देकर उसे उड़ने के लिए आसमान दे दिया था।

मोहित को अपनी कही हर बात, हर इल्ज़ाम किसी कोड़े की तरह अपने ही शरीर पर पड़ते महसूस हो रहे थे। 'लक्ष्मी का पुजारी', 'भेदभाव करने वाला'... ये शब्द अब उसके कानों में शीशे की तरह चुभ रहे थे।

वह उठा और पागलों की तरह दौड़ता हुआ बाहर लॉन में आया।

रघुनाथ जी अभी भी व्हीलचेयर पर सिर झुकाए बैठे थे, मानो किसी अपराधी की तरह अपनी सजा का इंतज़ार कर रहे हों।

मोहित उनके पैरों में गिर पड़ा। उसने अपना सिर उनकी गोद में रख दिया और फूट-फूट कर रोने लगा। कोई शब्द नहीं निकला, बस एक जानवरों जैसा विलाप। वह अपने पिता के उन कांपते हुए, झुर्रियों भरे पैरों को अपने आंसुओं से धो रहा था।

रघुनाथ जी ने धीरे से अपना हाथ उठाया। वह हाथ, जो अभी कुछ देर पहले उपेक्षा का इल्जाम झेल रहा था, अब मोहित के सिर पर था। उनकी उंगलियां मोहित के बालों में फिरने लगीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा। न कोई शिकायत, न कोई सफाई, न कोई डांट।

विहान दरवाजे पर खड़ा यह दृश्य देख रहा था। उसने चुपचाप वहां से हट जाना बेहतर समझा।

वहाँ सिर्फ सन्नाटा था। न फोन की घंटी, न वसीयत के कागज़ों की सरसराहट, न ही शिकायतों का शोर। बस एक पिता का कांपता हुआ हाथ और एक बेटे के पश्चाताप के आंसू।

उस सन्नाटे में मोहित ने सुन लिया जो बाबूजी कभी कह नहीं पाए थे—कि प्रेम हमेशा बराबरी का बंटवारा नहीं करता, प्रेम ज़रूरत का बंटवारा करता है। जिसे उड़ना हो उसे पंख देता है, और जिसे जड़ें चाहिए, उसे ज़मीन।

शाम का धुंधलका गहरा रहा था। मोहित ने अपना सूटकेस अंदर रख दिया था। वह अब कहीं नहीं जा रहा था। उसे अपनी विरासत मिल गई थी, और उससे भी बड़ी चीज़—उसे अपने पिता की वो खामोश भाषा समझ आ गई थी, जो वसीयत के पन्नों से कहीं ज़्यादा भारी थी।

हवेली के उस पुराने संगीत कक्ष से, बरसों बाद, रूद्र वीणा की एक गंभीर और गहरी तान गूंजी, जो उस सन्नाटे को चीरती हुई सीधे रूह में उतर गई।


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