सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वक्त' के साथ

 "आज जब मेरे पास गाड़ियाँ हैं, बांग्ला है, शोहरत है, तो आप सब यहाँ गुलदस्ते लेकर खड़े हैं। आप कह रहे हैं कि आप मेरे साथ थे? नहीं। आप मेरे 'वक्त' के साथ हैं, मेरे साथ नहीं। जब मेरा वक्त बुरा था, तो मैं आपके लिए अजनबी था। आज मेरा वक्त अच्छा है, तो मैं बेटा हूँ।"


शहर के सबसे बड़े बैंक्वेट हॉल में आज जश्न का माहौल था। झूमर की रोशनी आँखों को चकाचौंध कर रही थी और महँगे इत्र की खुशबू हवा में घुली हुई थी। मौका था आलोक के नए बिज़नेस एम्पायर की सफलता की पार्टी का। वेटर चाँदी की तश्तरियों में ड्रिंक्स और स्नैक्स लेकर इधर-उधर दौड़ रहे थे।


आलोक, जो एक शानदार काले सूट में किसी राजकुमार सा लग रहा था, स्टेज पर खड़ा था। उसके चारों तरफ रिश्तेदारों और दोस्तों का जमघट था।

"अरे आलोक बेटा, हमें तो पहले से पता था कि तुम एक दिन हम सबका नाम रोशन करोगे," आलोक के बड़े मामाजी, हरीश बाबू, ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा। उनके हाथ में एक बड़ा सा गुलदस्ता था।

"हाँ-हाँ, हमारे खानदान का हीरा है ये," बुआ जी ने सुर में सुर मिलाया, "बचपन से ही इसकी आँखों में वो चमक थी।"


आलोक मुस्कुरा रहा था, लेकिन उसकी मुस्कान में वो गर्माहट नहीं थी जो कभी हुआ करती थी। उसकी नज़रें भीड़ को चीरते हुए कोने में खड़ी अपनी पत्नी, वंदना, को ढूँढ रही थीं। वंदना एक साधारण सी साड़ी में थी, चेहरे पर शांति थी, लेकिन आँखों में एक गहरी थकान, जिसे सिर्फ आलोक ही पढ़ सकता था।


स्टेज पर केक काटने की रस्म शुरू होने वाली थी। हरीश मामा ने माइक थाम लिया।

"देवियों और सज्जनों," उन्होंने ज़ोरदार आवाज़ में कहा, "आज मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। मेरे भांजे ने साबित कर दिया कि मेहनत से सब कुछ हासिल किया जा सकता है। हम सब पूरा परिवार हमेशा इसके साथ खड़ा था, और आज इसकी जीत हमारी जीत है।"


हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। आलोक ने धीरे से माइक हरीश मामा के हाथ से लिया। सन्नाटा छा गया। सबको लगा कि आलोक धन्यवाद भाषण देगा।


"शुक्रिया मामाजी," आलोक ने शांत आवाज़ में कहा, "वाकई, परिवार का साथ बहुत ज़रूरी होता है। पर मुझे एक किस्सा याद आ रहा है। इजाज़त हो तो सुनाऊँ?"

सबने उत्सुकता से सिर हिलाया।


आलोक ने बोलना शुरू किया, "तीन साल पहले की बात है। इसी शहर के एक सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में एक आदमी भर्ती था। एक्सीडेंट में उसके दोनों पैर टूट चुके थे। डॉक्टरों ने कहा था कि अगर 48 घंटे के अंदर ऑपरेशन नहीं हुआ, तो वो शायद कभी चल नहीं पाएगा। ऑपरेशन का खर्चा था पाँच लाख रुपये।"


हॉल में खामोशी गहराने लगी। हरीश मामा के चेहरे की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई।


"उस आदमी की पत्नी," आलोक ने वंदना की तरफ इशारा किया, "पागलों की तरह फोन घुमा रही थी। उसने अपने एक बहुत ही करीबी रिश्तेदार को फोन किया, जो शहर के रईस थे। उसने कहा, 'मामाजी, कुछ पैसों की मदद चाहिए, आलोक की जान खतरे में है।' जानते हैं जवाब क्या मिला?"

आलोक रुका। उसकी नज़रें सीधे हरीश मामा पर थीं।

"जवाब मिला- 'बेटा, अभी तो मंदी चल रही है, पैसा फँसा हुआ है। सरकारी अस्पताल में ही देख लो, प्राइवेट का खर्चा हम नहीं उठा सकते।' फोन कट गया। फिर उस पत्नी ने अपनी ननद को फोन किया। जवाब आया- 'हम तो बाहर घूमने आए हैं, नेटवर्क नहीं है'।"


भीड़ में फुसफुसाहट शुरू हो गई। बुआ जी ने नज़रें चुरा लीं।


"वो 48 घंटे बीत रहे थे," आलोक की आवाज़ भारी हो गई, "उस आदमी के पास कोई नहीं आया। न वो मामा, जो आज उसे हीरा बता रहे हैं। न वो बुआ, जिन्हें बचपन से उसकी आँखों में चमक दिखती थी। उस रात उस आदमी के पास सिर्फ एक इंसान था - उसकी पत्नी। वंदना ने अपने शादी के गहने बेचे, अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रख दिया, लेकिन उस आदमी का इलाज करवाया। उसने उस आदमी का मल-मूत्र साफ़ किया, उसे चम्मच से खाना खिलाया, और जब वो डिप्रेशन में जाकर चिल्लाता था, तो उसकी डाँट भी सही।"


आलोक की आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ में चट्टान जैसी मज़बूती थी।

"आज जब मेरे पास गाड़ियाँ हैं, बांग्ला है, शोहरत है, तो आप सब यहाँ गुलदस्ते लेकर खड़े हैं। आप कह रहे हैं कि आप मेरे साथ थे? नहीं। आप मेरे 'वक्त' के साथ हैं, मेरे साथ नहीं। जब मेरा वक्त बुरा था, तो मैं आपके लिए अजनबी था। आज मेरा वक्त अच्छा है, तो मैं बेटा हूँ।"


आलोक ने वंदना को स्टेज पर बुलाया। वंदना झिझकते हुए ऊपर आई। आलोक ने उसका हाथ थामा।

"रिश्ता खून का नहीं, एहसास का होता है। अगर दुख में कोई साथ न दे, तो सुख में उस रिश्ते का कोई अर्थ नहीं रह जाता। आज की यह पार्टी मेरी सफलता के लिए नहीं, बल्कि इस औरत के संघर्ष के लिए है। और माफ कीजिएगा मामाजी," आलोक ने गुलदस्ता वापस हरीश मामा की तरफ बढ़ा दिया, "ये फूल बहुत नाजुक हैं। इन्हें धूप और छाँव दोनों चाहिए होती हैं। आप लोग सिर्फ धूप में आते हैं। मुझे ऐसे रिश्तों की ज़रूरत नहीं जो मौसम देखकर रंग बदलते हों।"


आलोक ने वंदना का हाथ पकड़कर केक काटा। हॉल में सन्नाटा था, लेकिन उस सन्नाटे में कई लोगों के लिए एक बहुत बड़ा सबक गूंज रहा था। हरीश मामा और बाकी रिश्तेदार नज़रे झुकाए, धीरे-धीरे हॉल से खिसकने लगे। उन्हें समझ आ गया था कि उन्होंने आलोक को नहीं, बल्कि हमेशा के लिए एक बेटे को खो दिया है।


उस रात आलोक ने महसूस किया कि भीड़ कम होने से तन्हाई नहीं बढ़ती, बल्कि जब सही इंसान साथ हो, तो पूरी दुनिया मुट्ठी में होती है।


---


दोस्तों, जीवन में ऐसे लोगों को कभी मत खोना जो तब आपके साथ खड़े थे जब आपके पास कुछ नहीं था। अक्सर हम अमीरी और दिखावे की चकाचौंध में उन सच्चे रिश्तों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जो हमारी असली ताकत होते हैं। याद रखिये, सुख में हाथ मिलाने वाले बहुत मिलेंगे, लेकिन दुख में जो आँसू पोंछे, वही अपना है।


**क्या आपके जीवन में भी वंदना जैसा कोई शख्स है जिसने मुश्किल वक्त में आपका साथ दिया? कमेंट में उनका नाम लिखकर उन्हें सम्मान ज़रूर दें।**


अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद।

लेखक : मुकेश पटेल


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...