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ममता की छांव और झूठा कलंक

  

“बड़ी बहु, कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम छोटी बहु की गलतियों पर पर्दा डाल रही हो??”


कौशल्या देवी की कड़क आवाज़ ने पूरे रायजादा सदन को थर्रा दिया। उनके हाथ में एक अधजली दवाई की पर्ची थी जो उन्होंने अभी-अभी कूड़ेदान से निकाली थी। सामने सिर झुकाए उनकी छोटी बहू, शिखा खड़ी थी, और उसके बगल में ढाल बनकर खड़ी थी बड़ी बहू, प्रेरणा।


शाम का वक्त था। घर में पूजा की तैयारी चल रही थी, लेकिन माहौल में अगरबत्ती की खुशबू की जगह शक और गुस्से का धुआं भरा हुआ था। कौशल्या देवी पिछले पाँच सालों से पोते का मुँह देखने के लिए तरस रही थीं। प्रेरणा के दो बच्चे थे, लेकिन शिखा की गोद पाँच साल बाद भी सूनी थी। और इस सूनी गोद का सारा दोष, रवायत के मुताबिक, सिर्फ और सिर्फ शिखा के माथे मढ़ा जा रहा था।


“जवाब दो प्रेरणा!” कौशल्या देवी ने चिल्लाकर कहा। “यह पर्ची उस डॉक्टर की है ना, जिसके पास मैंने शिखा को भेजा था? और यह दवाइयां… ये कूड़ेदान में क्यों पड़ी हैं? क्या यह छोकरी चाहती ही नहीं कि इस घर का वंश आगे बढ़े? या इसे अपने फिगर की चिंता है?”


शिखा की आँखों से आँसू टपक कर फर्श पर गिर रहे थे, पर उसके होंठ सिले हुए थे। प्रेरणा ने एक गहरी सांस ली और अपनी सास की आँखों में देखा।


“माँ जी, वो दवाइयां एक्सपायर हो गई थीं, इसलिए मैंने ही फेंकी हैं। शिखा की कोई गलती नहीं है,” प्रेरणा ने शांति से झूठ बोला।


कौशल्या देवी की अनुभवी आँखों ने उस झूठ को पकड़ लिया। “तुम मुझे बेवकूफ समझती हो? एक्सपायर हो गई थीं? कल ही तो मंगवाई हैं मैंने! प्रेरणा, तुम जेठानी हो, माँ समान होती हो। अगर तुम ही इसकी लापरवाहियों को छिपाओगी, तो यह घर कैसे चलेगा? पाँच साल हो गए हैं! लोग बातें बनाते हैं। मेरी सहेलियाँ पूछती हैं कि छोटी बहू में कोई खोट तो नहीं? और आज मुझे यकीन हो गया कि खोट इसके शरीर में नहीं, इसकी नीयत में है।”


“माँ जी, बस कीजिये!” शिखा पहली बार रोते हुए बोली, “मेरी नीयत में खोट नहीं है।”


“तो फिर दवा क्यों नहीं खाई?” कौशल्या देवी आगे बढ़ीं। “बता, क्यों फेंकी दवा? तुझे पता है वो कितनी महंगी आयुर्वेदिक दवा थी? वैद्य जी ने कहा था कि इससे तीन महीने में कोख भर जाएगी।”


शिखा फिर चुप हो गई। वह कांप रही थी। प्रेरणा ने कसकर शिखा का हाथ पकड़ लिया। उसे पता था कि शिखा क्यों चुप है। उसे वो सच पता था जो इस घर की दीवारों में दीमक की तरह लगा था, पर जिसे बाहर लाने की हिम्मत किसी में नहीं थी।


रात का सन्नाटा गहरा गया था, लेकिन प्रेरणा की आँखों में नींद नहीं थी। वह शिखा के कमरे में गई। शिखा खिड़की के पास बैठी चाँद को घूर रही थी, जैसे उससे अपनी पीड़ा साझा कर रही हो।


“शिखा,” प्रेरणा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।


शिखा मुड़ी और प्रेरणा के गले लगकर फफक पड़ी। “दीदी, अब और नहीं सहा जाता। रोज-रोज के ताने, रोज-रोज यह ज़हर… माँ जी मुझे ‘बांझ’ कहती हैं, ‘कुलक्षणी’ कहती हैं। मैं कब तक चुप रहूँ?”


प्रेरणा की आँखों में भी नमी आ गई। “मैं जानती हूँ शिखा। तू देवी है जो इतना विष पी रही है।”


सच यह था कि कमी शिखा में नहीं थी। कमी कौशल्या देवी के लाड़ले, छोटे बेटे और शिखा के पति, समीर में थी। शादी के दो साल बाद जब बच्चा नहीं हुआ, तो शिखा और समीर ने चेकअप करवाया था। रिपोर्ट्स साफ़ थीं—शिखा पूर्ण रूप से स्वस्थ थी, लेकिन समीर पिता नहीं बन सकता था।


समीर उस दिन बहुत रोया था। उसने शिखा के पैर पकड़ लिए थे। “शिखा, अगर यह बात माँ या समाज को पता चली, तो मैं जीते जी मर जाऊँगा। मेरी मर्दानगी का मजाक उड़ेगा। प्लीज, यह राज़ अपने तक रखो। हम इलाज करवाएंगे, सब ठीक हो जाएगा।”


और उस दिन शिखा ने एक पत्नी होने का, एक प्रेमिका होने का ऐसा फर्ज निभाया कि उसने अपनी ही सासू माँ की नज़रों में खुद को ‘दोषी’ मान लिया। उसने वो सारे कड़वे काढ़े पिए जिनकी उसे ज़रूरत नहीं थी, वो सारे टोने-टोटके सहे जो उसके लिए बेमानी थे।


लेकिन समीर… समीर का अहंकार और डर समय के साथ इतना बढ़ गया कि वह शिखा के त्याग को उसका ‘फर्ज’ समझने लगा। वह अपनी माँ के सामने चुप रहता जब कौशल्या देवी शिखा को कोसतीं। वह ऑफिस चला जाता, दोस्तों के साथ घूमता, और घर में शिखा अकेले उस मानसिक प्रताड़ना को झेलती।


प्रेरणा को यह बात छह महीने पहले पता चली थी जब उसने शिखा को समीर की पुरानी रिपोर्ट्स देखते हुए पकड़ लिया था। तब से प्रेरणा ढाल बनी हुई थी। लेकिन आज पानी सिर से ऊपर जा चुका था।


अगली सुबह, घर में कोहराम मच गया।


नाश्ते की मेज पर कौशल्या देवी ने अपना फैसला सुना दिया। “मैंने सोच लिया है। अगर इस दिवाली तक शिखा ने खुशखबरी नहीं दी, तो समीर की दूसरी शादी होगी।”


चम्मच शिखा के हाथ से छूटकर प्लेट में गिरा। समीर, जो अखबार पढ़ रहा था, एकदम से सकपका गया। “माँ, यह आप क्या कह रही हैं?”


“सही कह रही हूँ!” कौशल्या देवी की आवाज़ पत्थर जैसी सख्त थी। “खोट जब मशीन में हो, तो मशीन बदली जाती है। मुझे मेरा वंश चाहिए। अगर शिखा माँ नहीं बन सकती, तो उसे इस घर में रहने का कोई हक़ नहीं। मैं पंडित जी से बात करके आई हूँ। अगले महीने एक अच्छी लड़की देखनी है।”


शिखा का चेहरा सफेद पड़ गया। वह समीर की तरफ देखने लगी, उम्मीद थी कि आज तो उसका पति बोलेगा। आज तो वह कहेगा कि ‘माँ, शिखा को मत निकालो, कमी मुझमें है’।


लेकिन समीर ने नज़रें झुका लीं। उसने धीरे से कहा, “माँ, अभी जल्दी क्या है? थोड़ा वक्त और…”


“पाँच साल कम नहीं होते समीर!” कौशल्या देवी चिल्लाईं। “तू चुप रह। तू अपनी बीवी के मोह में अंधा हो गया है।”


शिखा ने एक बार फिर समीर को देखा। उस नज़र में सवाल था— *‘क्या मेरा त्याग, मेरा प्रेम, मेरे आत्म-सम्मान से भी सस्ता है समीर?’* समीर खामोश रहा।


प्रेरणा से अब रहा नहीं गया। वह उठी और सीधे अपने कमरे में गई। दो मिनट बाद वह एक फाइल लेकर लौटी।


“माँ जी, दूसरी शादी जरूर कीजियेगा,” प्रेरणा की आवाज़ में एक अजीब सी शांति थी। उसने वह फाइल डाइनिंग टेबल के बीचों-बीच रख दी।


“यह क्या है?” कौशल्या देवी ने पूछा।


“यह वो सच है जिस पर मैं और शिखा अब तक पर्दा डाल रहे थे। लेकिन आज पर्दा हटाना जरूरी है, क्योंकि अब बात शिखा के अस्तित्व पर आ गई है,” प्रेरणा ने समीर की तरफ देखा। समीर का पसीना छूटने लगा।


“भाभी, प्लीज…” समीर गिड़गिड़ाया।


“चुप रहो समीर!” प्रेरणा ने पहली बार ऊंची आवाज़ में कहा। “बहुत हो गया। तुम्हारी झूठी शान के लिए इस लड़की ने अपनी आत्मा को छलनी कर लिया। इसने रोज ज़हर पिया ताकि तुम समाज में सिर उठा सको। और तुम? तुम अपनी माँ के सामने कायर बनकर बैठे हो जब वो इसे घर से निकालने की बात कर रही हैं? शर्म नहीं आती तुम्हें?”


कौशल्या देवी ने कांपते हाथों से फाइल खोली। वह पढ़ी-लिखी थीं। मेडिकल रिपोर्ट्स की भाषा समझती थीं। जैसे-जैसे उनकी नज़रें पन्नों पर घूम रही थीं, उनके चेहरे का रंग उड़ता जा रहा था। ‘मेल इनफर्टिलिटी’ (पुरुष बांझपन)… शब्द उनकी आँखों में चुभ रहे थे।


कमरे में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।


कौशल्या देवी ने फाइल बंद की और धीरे से मेज पर रख दी। उन्होंने समीर की तरफ देखा। समीर से नज़रें नहीं मिलाई जा रही थीं।


“यह सच है?” कौशल्या देवी ने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा।


समीर ने सिर्फ सिर झुका लिया।


कौशल्या देवी कुर्सी पर ढह सी गईं। “हाय राम… तो कमी… कमी मेरे बेटे में थी? और मैं… मैं पिछले पाँच सालों से इस निर्दोष बच्ची को कोस रही थी? मैंने क्या कुछ नहीं कहा इसे… बांझ, कुलक्षणी, मनहूस…”


उनका गला भर आया। वह उठकर शिखा के पास गईं। शिखा अभी भी पत्थर की मूरत बनी बैठी थी।


कौशल्या देवी ने शिखा के सिर पर हाथ रखा। “मुझे माफ़ कर दे बेटी। मैं एक सास बनकर इतनी अंधी हो गई कि मुझे एक औरत का दर्द नहीं दिखा। मैं अपने बेटे के मोह में राक्षस बन गई थी।”


फिर वह समीर की तरफ मुड़ीं। उनकी आँखों में आग थी। एक ज़ोरदार तमाचा समीर के गाल पर पड़ा। ‘चटाक!’


“लानत है तुझ पर समीर! अपनी कमी को छिपाने के लिए तूने अपनी पत्नी को मेरी गालियाँ सुनवाईं? तू मर्द है? अरे, मर्द वो होता है जो अपनी पत्नी के सम्मान की रक्षा करे, न कि उसे अपनी ढाल बनाए। अगर आज प्रेरणा ने यह सच न बताया होता, तो तू क्या करता? अपनी दूसरी शादी होने देता? एक और लड़की की ज़िंदगी बर्बाद करता?”


समीर घुटनों पर गिर पड़ा। “माँ, मैं डर गया था… समाज क्या कहेगा…”


“समाज?” कौशल्या देवी ने चीखकर कहा। “समाज मेरे घर के अंदर आकर रोटी नहीं देता। समाज के डर से तूने घर की लक्ष्मी को नरक दिया? अगर कमी शिखा में होती तो हम उसे और प्यार देते, उसका इलाज कराते। लेकिन कमी तुझमें थी तो तूने उसे अपराधी बना दिया?”


प्रेरणा शिखा के पास आई और उसे गले लगा लिया। “शिखा, अब तुझे किसी के लिए झुकने की ज़रूरत नहीं है। तूने साबित कर दिया कि तेरे जैसा बड़ा दिल किसी का नहीं है।”


शिखा रो पड़ी, लेकिन इस बार ये आंसू राहत के थे। आज उसे न्याय मिला था।


उस शाम घर का माहौल बदल गया। कौशल्या देवी ने खुद अपने हाथों से वो सारी कड़वी दवाइयां, वो झाड़-फूंक के तावीज़ कूड़े में फेंक दिए।


शाम को चाय के वक्त कौशल्या देवी ने शिखा को अपने पास सोफे पर बैठाया।


“शिखा,” उन्होंने प्यार से कहा, “अब इस घर में बच्चे की किलकारी गूंजे या न गूंजे, यह ऊपर वाले के हाथ में है। और विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है, हम समीर का इलाज करवाएंगे, आईवीएफ देखेंगे, और अगर कुछ न हुआ तो हम बच्चा गोद लेंगे। लेकिन आज के बाद… आज के बाद इस घर में तुझे कोई उंगली नहीं उठाएगा। तू मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है।”


उन्होंने प्रेरणा की तरफ देखा, जो चाय ला रही थी।


“और प्रेरणा… आज तुमने साबित कर दिया कि जेठानी सिर्फ जेठानी नहीं होती। अगर सास, माँ बनने से चूक जाए, तो जेठानी माँ बनकर रिश्ते बचा लेती है। तूने आज मेरी आँखें खोल दीं। तूने शिखा की गलती पर पर्दा नहीं डाला, तूने मेरे बेटे के पाप को ढक रखा था, सिर्फ परिवार की शांति के लिए। मैं धन्य हूँ जो मुझे तुम जैसी बहुएं मिलीं।”


उस रात, शिखा ने अपनी जेठानी का हाथ पकड़कर कहा, “दीदी, अगर आज आप न होतीं, तो मेरा घर टूट जाता।”


प्रेरणा ने मुस्कुराते हुए कहा, “पागल, घर ईंट-पत्थर से नहीं, एक-दूसरे के सम्मान से टिकते हैं। और याद रखना, एक औरत ही औरत की सबसे बड़ी ताकत होती है। जब हम एक-दूसरे के लिए खड़े होंगे, तभी यह दुनिया बदलेगी।”


**समापन:**


दोस्तों, यह कहानी सिर्फ शिखा की नहीं है, यह हमारे समाज के उस कड़वे सच की है जहाँ आज भी निःसंतान होने का सारा दोष सिर्फ महिला के मत्थे मढ़ा जाता है। हम विज्ञान के युग में जी रहे हैं, फिर भी हमारी सोच वही पुरानी है। एक पत्नी अपने पति के सम्मान के लिए विष पी लेती है, लेकिन क्या पतियों का फर्ज नहीं बनता कि वे सच स्वीकार करें? रिश्ते विश्वास पर टिकते हैं, थोपे गए दोषारोपण पर नहीं। और सलाम उन जेठानियों को, उन ननदों को, उन सहेलियों को जो दूसरी औरत के लिए ढाल बनकर खड़ी होती हैं।


**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपने भी अपने आसपास किसी ऐसी महिला को देखा है जो परिवार या पति की कमियों को छिपाने के लिए खुद दोषी बनकर जी रही है? क्या समीर का चुप रहना सही था? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।


**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और सच्चाई से रूबरू कराती कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।**


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