रामेश्वर दयाल अपने गांव के सबसे पुराने और सम्मानित पोस्टमास्टर थे। उनका जीवन सादगी की एक मिसाल था। सफेद कुर्ता-पायजामा, आँखों पर मोटा चश्मा और साइकिल की घंटी—यही उनकी पहचान थी। उनका मानना था कि इंसान का जीवन उसके नसीब से चलता है। "जो विधाता ने लिख दिया, उसे कोई नहीं मिटा सकता," यह वाक्य उनकी जुबान पर हमेशा रहता था।
लेकिन उस काली रात को, जब उनकी लाडली बेटी 'सुधा' की डोली की जगह उसकी एम्बुलेंस घर के दरवाजे पर रुकी, तो रामेश्वर जी का यह विश्वास डगमगा गया।
सुधा की शादी को अभी मात्र दो साल हुए थे। एक सड़क हादसे ने उसके पति, आलोक, को उससे छीन लिया था। सुधा, जो कभी घर की चहकती गौरैया थी, आज 24 साल की उम्र में सफेद साड़ी में लिपटी एक ज़िंदा लाश बनकर मायके लौटी थी। उसके माथे का सिंदूर पुछ चुका था और कलाइयाँ सूनी थीं।
गाँव वालों की भीड़ जमा थी। सांत्वना देने वालों की कमी नहीं थी, लेकिन उनकी बातों में हमदर्दी कम और ताने ज़्यादा थे।
"हाय राम! बेचारी सुधा। अभी उम्र ही क्या थी। अब तो पूरा जीवन पहाड़ जैसा पड़ा है।"
"ज़रूर कुंडली में कोई दोष होगा, वरना भरा-पूरा सुहाग ऐसे नहीं उजड़ता।"
"अब तो भगवान का नाम ले और कोने में पड़ी रहे, यही इसका नसीब है।"
रामेश्वर जी अपनी चारपाई पर सिर पकड़े बैठे थे। पत्नी, जानकी देवी, रसोइye में आँसू बहा रही थीं। सुधा अपने पुराने कमरे में घुटनों में सिर दिए बैठी थी। जिस घर में उसकी पायल की छन-छन गूंजती थी, आज वहां मातम का सन्नाटा था।
दिन बीतते गए। सुधा ने घर से निकलना बंद कर दिया। वह सुबह उठती, नहा-धोकर पूजा करती और फिर अपने कमरे में बंद हो जाती। उसे लगता था कि उसका बाहर निकलना लोगों के लिए अपशगुन है। रामेश्वर जी भी चुपचाप यह सब देखते रहते। उन्हें लगता था कि बेटी के भाग्य में यही लिखा है, और भाग्य से कौन लड़ सकता है?
एक दिन, रामेश्वर जी की बड़ी बहन, 'कमला बुआ', शहर से आईं। आते ही उन्होंने घर का माहौल और सख्त कर दिया।
"अरे जानकी! सुधा ने यह क्या रंगीन चादर ओढ़ रखी है? विधवा है वो, उसे सफेद या हल्का रंग ही शोभा देता है। और उसे कहो कि शाम को तुलसी के पास दीया जलाने न जाया करे, शुभ काम में विधवा का साया ठीक नहीं होता।"
जानकी देवी ने दबी आवाज़ में कहा, "जीजी, बच्ची है अभी। उसका मन बहल जाता है।"
"मन?" कमला बुआ ने आँखें तरेरीं। "अब उसका मन मारना ही धर्म है। नसीब खोटा था उसका, अब उसे कहो कि रामायण पाठ करे और अपना जीवन काटे। यही दुनिया की रीत है।"
सुधा दूसरे कमरे में यह सब सुन रही थी। उसे लगा जैसे कोई उसका गला घोंट रहा हो। उसने एम.ए. (M.A.) किया था, वह कॉलेज की टॉपर थी। लेकिन आज उसकी डिग्रियां रद्दी हो गई थीं और उसकी पहचान सिर्फ 'एक विधवा' रह गई थी।
रामेश्वर जी बरामदे में बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। बुआ की बातें उनके कानों में भी पड़ीं। "नसीब खोटा था..." यह शब्द उन्हें चुभने लगे। उन्हें याद आया सुधा का बचपन। जब वह साइकिल से गिरती थी, तो रामेश्वर जी दौड़कर उसे उठाते थे और कहते थे, "शेरनी है मेरी बेटी, अभी उठ खड़ी होगी।" आज उनकी शेरनी गिर गई थी, और वो उसे उठाने के बजाय 'नसीब' का हवाला देकर लेटे रहने को मजबूर कर रहे थे।
शाम को, जब कमला बुआ सो रही थीं, रामेश्वर जी दबे पाँव सुधा के कमरे में गए।
सुधा खिड़की से बाहर देख रही थी। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे।
"सुधा..." रामेश्वर जी ने पुकारा।
सुधा पलटी। उसकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो पहले हुआ करती थी।
"जी बाबूजी?"
रामेश्वर जी ने अपनी जेब से एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ निकाला और सुधा की हथेली पर रख दिया।
"यह क्या है बाबूजी?" सुधा ने हैरान होकर पूछा।
"पुलिस सब-इंस्पेक्टर भर्ती का फॉर्म है," रामेश्वर जी ने शांत स्वर में कहा। "अगले महीने परीक्षा है। मैंने पता किया है, विधवाओं के लिए उम्र में छूट है। तू तैयारी शुरू कर।"
सुधा के हाथ कांपने लगे। "बाबूजी? आप यह क्या कह रहे हैं? बुआ जी कह रही थीं कि मुझे अब घर में..."
"बुआ जी को जो कहना है कहने दे," रामेश्वर जी की आवाज़ में एक नई दृढ़ता थी। "सुधा, मैंने तुझे पैदा किया है, नसीब ने नहीं। और मैं अपने जीते-जी अपनी बेटी को नसीब के भरोसे नहीं छोड़ सकता। आलोक चला गया, यह दुख बहुत बड़ा है। लेकिन उसके साथ तेरी ज़िंदगी भी चली जाए, यह मैं नहीं होने दूंगा। तेरी साँसें अभी चल रही हैं, इसका मतलब ईश्वर का तुझसे अभी कोई काम बाकी है।"
सुधा रो पड़ी। "पर बाबूजी, लोग क्या कहेंगे? समाज जीने नहीं देगा।"
रामेश्वर जी ने सुधा के सिर पर हाथ रखा। "बेटा, समाज का काम है बोलना। जब तू सफल हो जाएगी, तो यही समाज तालियां बजाएगा। और अगर तू हारकर कोने में बैठी रही, तो यही समाज तुझे 'मनहूस' कहेगा। चुनाव तेरा है—तुझे 'बेचारी' बनना है या 'साहब'?"
सुधा ने अपने पिता की आँखों में देखा। वहां उसे दया नहीं, भरोसा दिखा। उसने आंसू पोंछे और फॉर्म को कसकर पकड़ लिया। "मैं परीक्षा दूंगी बाबूजी।"
अगले दिन से रामेश्वर जी का घर एक युद्ध का मैदान बन गया।
कमला बुआ ने जब सुना कि सुधा पुलिस की तैयारी कर रही है, तो उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया।
"रामेश्वर! तू पागल हो गया है? विधवा बेटी घर से बाहर जाएगी? मर्दों के बीच नौकरी करेगी? हमारी नाक कट जाएगी! अरे, नसीब में जो लिखा है उसे स्वीकारना सीखो।"
रामेश्वर जी ने अपनी साइकिल उठाई और बुआ की आँखों में आँखें डालकर बोले, **"जीजी, नसीब की लकीरें हाथों में होती हैं, माथे पर नहीं। और अगर लकीरें खराब भी हों, तो मेहनत के पसीने से उन्हें मिटाकर नई लकीरें खींची जा सकती हैं। मेरी बेटी नसीब की गुलाम नहीं बनेगी, वो अपना नसीब खुद लिखेगी।"**
रामेश्वर जी ने बुआ की परवाह नहीं की। वो रोज़ सुबह 4 बजे सुधा को उठाते, उसे दौड़ाने ले जाते। गाँव वाले मज़ाक उड़ाते—"देखो, बुढ़ापे में रामेश्वर की मति मारी गई है। जवान विधवा को नचा रहा है।"
लेकिन रामेश्वर जी के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती थी। वो अपनी पुरानी एफ.डी. (Fixed Deposit) तुड़वाकर सुधा के लिए किताबें लाए। घर का सारा काम जानकी देवी और रामेश्वर जी ने संभाल लिया ताकि सुधा पढ़ाई कर सके।
सुधा ने दिन-रात एक कर दिया। उसका दर्द, उसका अकेलापन, समाज के ताने—सब उसने अपनी किताबों में झोंक दिए। वह जब दौड़ती, तो उसे लगता कि वह अपने अतीत से दूर भाग रही है।
परीक्षा का दिन आया। रामेश्वर जी खुद उसे शहर लेकर गए। परीक्षा हॉल के बाहर इंतज़ार करते रहे। जब सुधा बाहर आई, तो उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में संतोष था।
महीने बीत गए।
एक दोपहर, डाकिया रामेश्वर जी के घर आया। हाथ में एक खाकी लिफाफा था।
"रामेश्वर जी, बधाई हो! बिटिया का जॉइनिंग लेटर आया है।"
रामेश्वर जी के कांपते हाथों ने लिफाफा खोला। सुधा ने पुलिस सब-इंस्पेक्टर की परीक्षा पास कर ली थी।
पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई। जानकी देवी रो रही थीं। सुधा ने दौड़कर पिता के पैर छुए। रामेश्वर जी ने उसे उठाकर गले लगा लिया।
"आज तूने साबित कर दिया बेटा कि नसीब भी उसी के आगे झुकता है जो लड़ना जानता है," रामेश्वर जी की आँखों से गर्व के आंसू बह रहे थे।
जिस दिन सुधा वर्दी पहनकर, कमर में पिस्तौल लगाकर और सिर पर पुलिस की टोपी पहनकर घर से निकली, पूरा गाँव देखने आया।
वही कमला बुआ, जो कल तक उसे 'कोने में पड़ने' की सलाह दे रही थीं, आज आरती की थाली लेकर खड़ी थीं।
"अरे, हमारी सुधा तो शेरनी है, शेरनी! मुझे तो बचपन से पता था यह कुछ बड़ा करेगी," बुआ ने पड़ोसियों से कहा।
पड़ोसी, जो कल तक ताने मारते थे, आज हाथ जोड़कर खड़े थे। "दरोगा जी, हमारे लड़के की नौकरी की भी बात कर लेना।"
सुधा अपनी जीप की तरफ बढ़ी। उसने मुड़कर अपने पिता को देखा। रामेश्वर जी अपनी पुरानी साइकिल के पास खड़े थे, सीना चौड़ा किए। उनकी आँखों में एक ही भाव था—"मैंने कहा था न!"
सुधा ने सबके सामने अपने पिता को सैल्यूट किया। यह सैल्यूट एक अफ़सर का नहीं, एक बेटी का था—उस पिता के लिए जिसने उसे नसीब के भरोसे नहीं छोड़ा।
सुधा जीप में बैठ गई और सायरन बजाते हुए आगे बढ़ गई। धूल का गुबार उड़ा और उस गुबार में वो सारी पुरानी रूढ़ियाँ, वो सारे ताने और वो 'बदनसीबी' कहीं पीछे छूट गई।
रामेश्वर जी ने अपनी पत्नी से कहा, "जानकी, आज मुझे नींद अच्छी आएगी। क्योंकि मुझे पता है कि मेरे जाने के बाद मेरी बेटी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएगी, बल्कि दूसरों को सहारा देगी।"
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**कहानी का सार:**
बेटियां कांच की गुड़िया नहीं होतीं जो टूट जाने पर फेंक दी जाएं। अगर समय की चोट उन्हें तोड़ दे, तो पिता का फर्ज़ है कि उन्हें फिर से जोड़े और उन्हें फौलाद बना दे। नसीब का रोना वो रोते हैं जो कायर होते हैं; पिता अगर साथ हो, तो बेटी अपनी किस्मत की लेखिका खुद बन जाती है।
**अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या रामेश्वर जी ने समाज के खिलाफ जाकर सही किया? क्या हमें विधवा या तलाकशुदा बेटियों को "नसीब" के नाम पर घर में बिठा देना चाहिए या उन्हें दूसरी उड़ान भरने का मौका देना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
**“अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। इस संदेश को हर पिता और हर बेटी तक पहुँचाएं। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही प्रेरणादायक और मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!”**
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