बरामदे में बिछी हुई आरामकुर्सी अब माधव बाबू की दुनिया बन गई थी। साठ की उम्र पार करते ही उनके बाल चांदी जैसे सफ़ेद हो गए थे और चेहरे पर झुर्रियों ने एक लंबा इतिहास लिख दिया था। पास की मेज पर रखी चाय ठंडी हो रही थी, लेकिन माधव का ध्यान सड़क के उस मोड़ पर था जहाँ से डाकिया आता था।
आज बीस साल हो गए थे। बीस साल, जब माधव ने अपनी पत्नी सुलभा के मायके की तरफ मुड़कर भी नहीं देखा था। लोग कहते थे कि माधव बहुत ज़द्दी हैं, लेकिन माधव खुद को उसूलों का पक्का कहते थे। बात बस इतनी थी कि शादी के कुछ सालों बाद, एक पारिवारिक विवाद में सुलभा के भाइयों ने माधव के चरित्र पर सवाल उठा दिया था और उन्हें 'घर जमाई' बनने का ताना दे दिया था। उस एक कड़वे शब्द ने माधव के भीतर ऐसी आग लगाई कि उन्होंने उसी वक्त प्रतिज्ञा कर ली थी— "अब इस घर का पानी भी नहीं पियूंगा।"
समय अपनी गति से चलता रहा। सुलभा के भाइयों ने कई बार माफी मांगी, बड़े साले के बेटे की शादी का न्योता आया, तब सुलभा ने मिन्नतें कीं, बच्चों ने ज़िद की, यहाँ तक कि खुद माधव के ससुर ने झुककर हाथ जोड़े, लेकिन माधव टस से मस नहीं हुए। वे ज़िद की उस ऊंची दीवार पर चढ़कर बैठ गए थे जहाँ से उन्हें अपनों की सिसकियाँ भी सुनाई नहीं देती थीं।
इसी बीच, माधव के ससुर यानी सुलभा के पिता गंभीर रूप से बीमार पड़े। उन्हें शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया। माधव को जब खबर मिली, तो वे अस्पताल भागे। उन्होंने अस्पताल में दिन-रात जागकर अपने ससुर की सेवा की। दवाइयों का इंतजाम किया, डॉक्टरों से लड़े, यहाँ तक कि उनके शरीर की गंदगी भी साफ की, लेकिन अस्पताल के उस कमरे से बाहर निकलते ही वे फिर 'माधव बाबू' बन जाते थे। ससुर ने बार-बार कहा, "बेटा, घर चलो, सब इंतज़ार कर रहे हैं," पर माधव का जवाब हमेशा वही होता— "अस्पताल में सेवा करना मेरा दामाद धर्म है, पर उस घर की चौखट लांघना मेरे स्वाभिमान के खिलाफ है।"
अस्पताल से ससुर डिस्चार्ज होकर घर गए और कुछ महीनों बाद गुज़र गए। फिर सास का भी देहांत हो गया। माधव के अपने पिता भी इस दुनिया को छोड़ गए। उनकी बेटी अंजलि अब मुंबई में एक बड़ी कंपनी में मैनेजर थी। समय के साथ सब कुछ बदल गया, बस नहीं बदला तो माधव का वह गुस्सा, जो अब एक ठंडी राख बन चुका था, लेकिन फिर भी उसमें चिंगारी बाकी थी।
सुलभा अक्सर कहती, "अब तो कोई बचा भी नहीं वहाँ जिनसे आप लड़ रहे थे। भाई अलग हो गए, माँ-बापू चले गए, अब तो घर चलिए।"
माधव बस इतना कहते, "जिस ज़मीन ने मेरा अपमान किया, वहाँ मेरी परछाईं भी नहीं जाएगी।"
एक दिन अंजलि मुंबई से वापस आई। उसके हाथ में एक पुराना, मटमैला सा लिफाफा था। वह माधव के पास आई और कुर्सी के पास ज़मीन पर बैठ गई।
"पापा, आज मैं मुंबई के अपने फ्लैट की सफाई कर रही थी, तो मुझे यह पुराना संदूक मिला जो माँ ने मुझे दिया था। इसमें नानाजी की कुछ आखिरी यादें थीं," अंजलि ने लिफाफा माधव की ओर बढ़ाते हुए कहा।
माधव ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला। अंदर एक पत्र था, जिसकी स्याही वक्त के साथ धुंधली पड़ गई थी। यह उनके ससुर का आखिरी पत्र था, जो उन्होंने मरने से कुछ दिन पहले माधव के नाम लिखा था, लेकिन शायद भेजने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे।
पत्र में लिखा था:
*"प्रिय माधव, मुझे पता है जब तुम यह पत्र पढ़ोगे, मैं मिट्टी में मिल चुका हूँगा। तुमने अस्पताल में मेरी जो सेवा की, उसने मुझे यह तो बता दिया कि तुम्हारा दिल सोने का है, लेकिन तुम्हारी ज़िद पत्थर की है। बेटा, स्वाभिमान और अहंकार के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है। तुमने उस घर को सज़ा नहीं दी, तुमने खुद को और अपनी पत्नी को सज़ा दी। तुम जिस 'घर जमाई' वाले ताने से आहत थे, क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे भाइयों ने वो बात गुस्से में क्यों कही थी? क्योंकि वे तुमसे जलते थे कि मैं तुमसे अपनी बेटों से ज्यादा प्यार करता था। तुमने उनकी चाल को सफल कर दिया माधव। तुम दूर रहे, तो वे जीत गए और हमारा परिवार हार गया। स्वाभिमान वो होता है जो अपनों को जोड़े, वो नहीं जो अपनों से मुख मोड़ ले। मेरी आत्मा को शांति तब मिलेगी जब तुम एक बार उस पुराने कमरे में जाकर मेरी कुर्सी पर बैठोगे।"*
चिट्ठी माधव के हाथ से छूटकर गिर गई। उनकी आँखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। बीस साल! बीस साल उन्होंने उस गुस्से को पाला जो असल में उनका था ही नहीं। वे जिस दीवार को अपनी सुरक्षा समझ रहे थे, वह दरअसल उनकी कैद थी।
"अंजलि... गाड़ी निकालो," माधव की आवाज़ फफक कर निकली।
"कहाँ के लिए पापा?" अंजलि ने चकित होकर पूछा।
"वहाँ... जहाँ मेरा इंतज़ार बीस साल पहले खत्म हो जाना चाहिए था," माधव ने अपने सफ़ेद बालों को सहलाते हुए कहा।
दो घंटे बाद, गाड़ी उस पुरानी हवेली के सामने रुकी। हवेली का रंग उतर चुका था, दीवारें झड़ रही थीं। माधव ने कांपते हुए कदमों से उस चौखट पर पैर रखा। जैसे ही उन्होंने अंदर कदम रखा, उन्हें ससुर की हँसी, सासों की लोरी और सुलभा के बचपन की शरारतें याद आने लगीं। घर के एक कोने में ससुर की वही पुरानी कुर्सी धूल से सनी पड़ी थी।
माधव उस कुर्सी के पास गए, उसे अपने पल्लू से साफ किया और वहीं सिर झुकाकर बैठ गए। आज उनका स्वाभिमान छोटा हो गया था, लेकिन उनका व्यक्तित्व बहुत बड़ा हो गया था।
तभी उनके साले, जो अब खुद बूढ़े हो चुके थे, कमरे में आए। माधव को वहाँ देख उनकी आँखों में आँसू आ गए। बिना किसी शब्द के, दोनों गले लग गए। बीस साल का सूखा एक पल में बह गया।
माधव ने महसूस किया कि ज़िंदगी बहुत छोटी है नफ़रत पालने के लिए। बाल सफ़ेद होने तक उन्होंने जो नाराज़गी बरकरार रखी थी, उसने उन्हें सिवाय अकेलेपन के कुछ नहीं दिया था। आज वे हार कर भी जीत गए थे।
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अक्सर हम अपने स्वाभिमान (Ego) को इतना बड़ा बना लेते हैं कि उसके पीछे हमारे सबसे प्यारे रिश्ते छिप जाते हैं। याद रखिये, इंसानियत और माफ़ी किसी भी ज़िद से बड़ी होती है। बीस साल बाद माधव को अपनी गलती समझ आई, आप इतनी देर मत कीजियेगा।
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