सहारनपुर की तपती दोपहर में भी 'शांति विला' के बरामदे में एक ठंडी खामोशी पसरी हुई थी। अवंतिका, जो कभी पूरे घर में चहकती फिरती थी, अब एक ज़िंदा लाश की तरह खिड़की के पास बैठी रहती। उसकी नज़रों में न कोई चमक थी, न कोई सपना। वह घंटों शून्य को ताकती रहती। माँ सुजाता जब भी खाने के लिए पूछती, वह बस गर्दन हिलाकर मना कर देती या दो निवाले खाकर उठ जाती।
अवंतिका का यह मौन उसके पिता, मणिकांत जी को अंदर ही अंदर काट रहा था। मणिकांत जी शहर के प्रतिष्ठित कॉलेज के रिटायर्ड प्रिंसिपल थे। उसूलों के पक्के और अनुशासन के धनी। तीन महीने पहले जब अवंतिका अपनी पढ़ाई पूरी कर दिल्ली से वापस लौटी थी, तब वह वैसी नहीं थी। उसके लौटते ही घर में जैसे मातम छा गया था। उसने साफ़ कह दिया था कि वह शादी नहीं करेगी, लेकिन वजह कभी नहीं बताई।
"सुजाता, यह लड़की ऐसे ही खत्म हो जाएगी," मणिकांत जी ने एक रात चिंता में डूबे स्वर में कहा।
"अजी, दिल्ली में कुछ तो हुआ है। कोई तो बात है जो उसने अपने दिल के संदूक में बंद कर रखी है। वह न हमसे लड़ती है, न रोती है, बस पत्थर हो गई है," सुजाता ने सिसकते हुए जवाब दिया।
मणिकांत जी ने ठान लिया कि वह अपनी फूल सी बच्ची को ऐसे कुम्हलाते नहीं देख सकते। उन्होंने अपनी पुरानी डायरी निकाली और अवंतिका के उन दोस्तों के नंबर ढूंढे जिनके साथ वह दिल्ली में रहती थी। कड़ी से कड़ी जुड़ी और उन्हें एक नाम मिला—'असीम'।
अवंतिका और असीम दिल्ली विश्वविद्यालय में साथ पढ़ते थे। असीम के पिता, रामस्वरूप जी, मणिकांत जी के बचपन के दोस्त थे, लेकिन तीस साल पहले एक छोटी सी गलतफहमी और ज़मीनी विवाद ने दोनों परिवारों के बीच नफरत की एक ऊँची दीवार खड़ी कर दी थी। मणिकांत जी ने कसम खाई थी कि वह कभी रामस्वरूप का मुँह नहीं देखेंगे।
अगले दिन, मणिकांत जी ने किसी को कुछ नहीं बताया। उन्होंने अपनी पुरानी अटैची उठाई और सुबह की बस पकड़कर दिल्ली के लिए रवाना हो गए। सहारनपुर से दिल्ली तक का सफर उनके लिए आत्ममंथन का सफर था। उनका स्वाभिमान उन्हें रोक रहा था, पर अवंतिका का उतरा हुआ चेहरा उन्हें धक्का दे रहा था।
दिल्ली पहुँचकर वह सीधे रामस्वरूप जी के पते पर पहुंचे। एक साधारण सा घर, जिसके बाहर छोटा सा बागीचा था। दरवाज़ा खुद असीम ने खोला।
मणिकांत जी को सामने देख असीम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह कांपते स्वर में बोला, "अंकल... आप? अंदर आइये।"
घर के अंदर रामस्वरूप जी सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। जैसे ही उनकी नज़र अपने पुराने दोस्त और अब के कट्टर दुश्मन मणिकांत पर पड़ी, उनके हाथ से अखबार गिर गया। तीस साल का सन्नाटा कमरे में गूंज उठा।
"रामस्वरूप... कैसे हो?" मणिकांत जी ने भारी आवाज़ में पूछा।
रामस्वरूप जी की आँखों में पानी भर आया। "मणिकांत! तुम... इतने बरसों बाद? रास्ता भूल गए या पुरानी दुश्मनी याद दिलाने आए हो?"
मणिकांत जी चुपचाप एक कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने असीम की ओर देखा, जिसकी आँखों में अवंतिका के प्रति अथाह प्रेम और बिछड़ने का दर्द साफ़ झलक रहा था। मणिकांत जी समझ गए कि अवंतिका की चुप्पी की वजह क्या थी। वह जानती थी कि उसके पिता कभी उस परिवार में रिश्ता नहीं करेंगे जिससे उनकी पुरानी दुश्मनी है। उसने अपने प्यार की बलि अपने पिता के 'सम्मान' के लिए दे दी थी।
असीम ने सिर झुकाकर कहा, "अंकल, अवंतिका ने मुझसे रिश्ता तोड़ दिया क्योंकि वह आपको दुखी नहीं देख सकती थी। उसने कहा था कि उसके पिता का स्वाभिमान उसके प्यार से ऊपर है। मैंने बहुत कोशिश की, पर वह नहीं मानी।"
मणिकांत जी के अंदर का 'प्रिंसिपल' आज हार गया और 'पिता' जीत गया। उन्हें समझ आया कि असीम कितना सुलझा हुआ और संस्कारी लड़का है। असीम ने अवंतिका के फैसले का सम्मान किया था और उसका पीछा नहीं किया, बल्कि चुपचाप उसकी खुशी के लिए तड़पता रहा।
मणिकांत जी खड़े हुए और धीरे-धीरे रामस्वरूप के पास गए। उन्होंने रामस्वरूप के कंधे पर हाथ रखा और फिर उसे गले लगा लिया।
"रामस्वरूप... भाई, पुरानी बातें मिट्टी में दबा दो। हमारी ईर्ष्या ने हमारे बच्चों की मुस्कान छीन ली है। मैं यहाँ अपनी हार मानने नहीं, बल्कि अपनी जीत मांगने आया हूँ। मुझे मेरा दोस्त वापस चाहिए और मेरी बेटी को उसकी ज़िंदगी।"
रामस्वरूप जी फूट-फूट कर रोने लगे। "मणिकांत, मैं भी यही चाहता था, पर मेरी हिम्मत नहीं हुई।"
मणिकांत जी ने असीम का हाथ पकड़ा और रामस्वरूप से बोले, **"भाई, बेटे के ब्याह की तैयारी करो.. आज से असीम मेरा हुआ... और अवंतिका तुम्हारी।"**
पूरा घर खुशियों से भर गया। मणिकांत जी उस रात दिल्ली ही रुके। उन्होंने असीम और रामस्वरूप के साथ बैठकर पुरानी यादें ताज़ा कीं।
अगले दिन जब मणिकांत जी सहारनपुर वापस पहुंचे, तो अवंतिका उसी खिड़की के पास बैठी थी। सुजाता घबराई हुई थी कि मणिकांत कहाँ चले गए थे।
मणिकांत जी सीधे अवंतिका के पास गए। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा। अवंतिका ने बेरुखी से देखा।
"बेटा, पैकिंग शुरू करो। हमें दिल्ली जाना है," मणिकांत जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
अवंतिका की आँखों में डर समा गया। "दिल्ली? क्यों पापा? मैं वहां नहीं जाऊंगी।"
मणिकांत जी ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली, जिसमें वह और रामस्वरूप गले मिल रहे थे (जो उन्होंने दिल्ली में खिंचवाई थी)। "बेटा, तुम्हारे पुराने दुश्मन पिता ने एक नया दोस्त पाया है। और मैंने असीम से कह दिया है कि अगर वह सहारनपुर बारात लेकर नहीं आया, तो मैं खुद तुम्हें लेकर दिल्ली आ जाऊंगा।"
अवंतिका को यकीन नहीं हो रहा था। उसकी आँखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। वह दौड़कर अपने पिता के गले लग गई। तीन महीने का मौन एक पल में टूट गया।
"पापा... आपने यह सब मेरे लिए किया?"
"नहीं बेटा, यह मैंने अपने लिए किया। मुझे एक ऐसा दामाद चाहिए था जो मेरी बेटी के खामोश फैसले का भी सम्मान करना जानता हो। असीम से बेहतर कोई नहीं हो सकता था।"
सहारनपुर की उस शाम 'शांति विला' में फिर से चहचहाहट लौट आई। मणिकांत जी ने साबित कर दिया कि एक पिता का सबसे बड़ा गौरव उसके उसूल नहीं, बल्कि उसकी संतान की आँखों का सुकून होता है।
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**कहानी का सार:**
अक्सर बड़े लोग अपनी झूठी आन-बान और शान की खातिर बच्चों की भावनाओं की बलि चढ़ा देते हैं। लेकिन मणिकांत जी ने दिखाया कि अगर पहल की जाए, तो बरसों पुरानी नफरत को भी प्यार में बदला जा सकता है। रिश्ते कागज़ों और ज़मीनों से नहीं, जज्बातों से चलते हैं।
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