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कर्ज़ की शान और सुकून की नींद

सुरेश बाबू अपने पुराने दीवान पर बैठे बैंक की पासबुक और कुछ फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के कागजात को बार-बार पलट रहे थे। माथे पर पसीने की बूंदें थीं और चेहरे पर एक गहरी चिंता। उनकी इकलौती बेटी, नेहा की शादी तय हो चुकी थी। लड़का अच्छा था, परिवार सुलझा हुआ था, लेकिन समस्या 'बजट' की थी।

सुरेश जी एक साधारण सरकारी क्लर्क के पद से रिटायर हुए थे। उनकी जमा-पूंजी सीमित थी। उन्होंने अपनी हैसियत के हिसाब से एक अच्छे मैरिज गार्डन और साधारण खाने-पीने का बजट बनाया था। लेकिन कल शाम उनके साढ़ू भाई, विमल जी आए थे और उन्होंने सुरेश जी के मन में एक डर का बीज बो दिया था।

"अरे सुरेश," विमल जी ने नाक सिकोड़ते हुए कहा था, "तुम 'मिलन वाटिका' में शादी कर रहे हो? वो तो बहुत ही साधारण जगह है। देखो, नेहा हमारी इकलौती भांजी है। मेरी बेटी की शादी देखी थी न तुमने? 'ग्रैंड पैलेस' में की थी। पूरा शहर देखता रह गया था। अगर तुम ऐसे शादी करोगे, तो बिरादरी में क्या इज़्ज़त रह जाएगी? लोग कहेंगे सुरेश ने कंजूसी कर दी। और लड़के वाले भी क्या सोचेंगे कि समधी जी की हैसियत नहीं है।"

विमल जी की वो बातें सुरेश जी के कानों में गूंज रही थीं। उन्हें लग रहा था कि शायद वो सचमुच अपनी बेटी के साथ अन्याय कर रहे हैं। क्या समाज की नज़रों में ऊँचा उठने के लिए उन्हें भी 'ग्रैंड पैलेस' बुक करना चाहिए? लेकिन उसके लिए उन्हें अपनी बुढ़ापे की लाठी—वो 10 लाख की एफडी—तोड़नी पड़ती, जो उन्होंने अपनी और अपनी पत्नी सुधा की बीमारियों और इमरजेंसी के लिए बचाकर रखी थी।

"सुधा," सुरेश जी ने पत्नी को आवाज़ दी। "मुझे लगता है विमल भाईसाहब ठीक कह रहे थे। हमें बजट बढ़ाना चाहिए। मैं कल ही बैंक जाकर एफडी तुड़वा देता हूँ। नेहा की शादी धूमधाम से होगी। कोई कसर नहीं रहनी चाहिए।"

सुधा जी, जो रसोई में सब्जी काट रही थीं, बाहर आईं। उनके चेहरे पर भी चिंता थी, पर वो पति की बात टाल नहीं सकीं। "जैसा आपको ठीक लगे। पर... वो पैसे तो हमने..."

"अरे, पैसे तो फिर आ जाएंगे," सुरेश जी ने बात काट दी, हालाँकि वो भी जानते थे कि रिटायरमेंट के बाद पैसे 'आते' नहीं, सिर्फ़ 'जाते' हैं।

नेहा, जो अपने कमरे में लैपटॉप पर काम कर रही थी, सब सुन रही थी। वह बाहर आई और पिता के पास बैठ गई।

"पापा, आप एफडी क्यों तोड़ रहे हैं?" नेहा ने सीधा सवाल किया।

"बेटा, तुम्हारी शादी है। लोग क्या कहेंगे? विमल मौसाजी कह रहे थे कि हमारी नाक कट जाएगी अगर इंतज़ाम शाही नहीं हुआ," सुरेश जी ने नज़रें झुकाकर कहा।

नेहा ने पिता के हाथ से वो पासबुक ले ली और उसे बंद करके मेज पर रख दिया।

"पापा, विमल मौसाजी की बेटी, रिया दीदी की शादी याद है आपको?" नेहा ने पूछा।

"हाँ, बहुत शानदार थी। क्या सजावट थी, पचास तरह के पकवान थे," सुरेश जी ने याद करते हुए कहा।

"और पापा, आपको यह याद है कि उस शानदार शादी के छह महीने बाद ही मौसाजी को हार्ट अटैक आया था? क्यों? क्योंकि उन्होंने उस शादी के लिए 20 लाख का पर्सनल लोन लिया था और अपनी पूरी ग्रेच्युटी लगा दी थी। आज वो उस लोन की ईएमआई भरने के लिए अपनी रिटायरमेंट के बाद भी एक प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं। रिया दीदी खुश हैं अपने घर में, लेकिन उनके पिता आज भी कर्ज़ के बोझ तले दबे हैं। क्या आप भी वही ज़िंदगी जीना चाहते हैं?"

सुरेश जी चुप हो गए। नेहा की बातों में कड़वी सच्चाई थी।

नेहा ने पिता का हाथ थाम लिया। "पापा, शादी मेरी है, मौसाजी की या समाज की नहीं। मुझे वो 'ग्रैंड पैलेस' नहीं चाहिए जहाँ आप मेहमानों के सामने मुस्कुराएं, लेकिन अंदर ही अंदर यह सोचकर घुटते रहें कि अगले महीने का खर्चा कैसे चलेगा। मुझे वो दिखावे की इज़्ज़त नहीं चाहिए जो आपके सुकून को छीन ले।"

"लेकिन बेटा, लड़के वाले..." सुरेश जी ने संकोच से कहा।

"लड़के वालों ने हमसे दहेज़ माँगा? नहीं। उन्होंने कोई डिमांड की? नहीं। वो लोग समझदार हैं पापा। और अगर कोई सिर्फ़ इसलिए नाराज़ हो जाए कि हमने खाने में 50 की जगह 20 डिशेज रखी हैं, तो ऐसे लोगों को खुश करने का कोई फ़ायदा नहीं है। जो हमारे अपने हैं, वो आपकी मजबूरी समझेंगे, और जो नहीं समझेंगे, वो हमारे अपने हैं ही नहीं।"

नेहा ने दृढ़ता से कहा, "हम शादी उसी 'मिलन वाटिका' में करेंगे। और आप अपनी एफडी को हाथ भी नहीं लगाएंगे। वो आपका बुढ़ापा है, उसे किसी की 'वाह-वाह' के लिए आग में मत झोंकिये।"

सुरेश जी की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें लगा जैसे उनके कंधों से मनों बोझ उतर गया हो। बेटी ने उन्हें वो आईना दिखा दिया था जिसे वो 'लोग क्या कहेंगे' की धुंध में देख नहीं पा रहे थे।

शादी का दिन आया।

'मिलन वाटिका' में सादगी थी, लेकिन अपनापन भरपूर था। सजावट फूलों की थी, नोटों की नहीं। खाना सीमित था, लेकिन स्वादिष्ट था। सुरेश जी मेहमानों का स्वागत पूरे दिल से कर रहे थे, माथे पर चिंता की एक भी लकीर नहीं थी।

विमल मौसाजी आए और चारों तरफ देखकर नाक सिकोड़ने लगे। "अरे सुरेश, कहा था न मैंने। थोड़ी और चमक-धमक होती तो बात ही कुछ और होती। देखो, शर्मा जी भी कह रहे थे कि इंतज़ाम थोड़ा हल्का है।"

सुरेश जी मुस्कुराए। एक बहुत ही सुकून भरी मुस्कान।

"विमल भाईसाहब," सुरेश जी ने शालीनता से कहा, "इंतज़ाम भले ही हल्का हो, लेकिन मेरा मन बहुत भारी नहीं है। आज रात जब मैं अपनी बेटी को विदा करके घर जाऊंगा, तो मुझे यह चिंता नहीं सताएगी कि कल बैंक की किश्त कैसे भरनी है। मैंने फैसला अपनी जेब देखकर लिया है, दुनिया को देखकर नहीं। शर्मा जी खुश हों या न हों, मेरा भविष्य सुरक्षित है।"

तभी लड़के के पिता, रमन जी, वहां आए। उन्होंने सुरेश जी के हाथ पकड़े। "सुरेश जी, बहुत ही सुंदर व्यवस्था है। न कोई शोर-शराबा, न कोई दिखावा। सच कहूँ तो ऐसी शालीन शादी बरसों बाद देखी। आपने साबित कर दिया कि खुशियाँ पैसों की मोहताज नहीं होतीं।"

यह सुनकर विमल जी का चेहरा देखने लायक था।

विदाई के वक्त नेहा ने पिता को गले लगाया। "पापा, आप दुनिया के सबसे अमीर पिता हैं, क्योंकि आपने मुझे 'कर्ज़ का बोझ' नहीं, बल्कि 'आत्मसम्मान की विरासत' दी है।"

उस रात सुरेश बाबू और सुधा जी घर लौटे। घर खाली था, बेटी जा चुकी थी, लेकिन एक अजीब सी शांति थी। उन्होंने अपनी पासबुक अलमारी में रखी। वो 10 लाख रुपये सुरक्षित थे, और उससे भी ज़्यादा सुरक्षित थी उनकी आने वाली ज़िंदगी।

सुरेश जी को उस रात बहुत गहरी नींद आई। वो नींद, जो दुनिया के दिखावे की दौड़ में भागने वालों को कभी नसीब नहीं होती। उन्होंने समझ लिया था कि दूसरों की नक़ल करके बनाए गए महल से बेहतर, अपनी हकीकत की झोपड़ी होती है, जहाँ कम से कम चैन की नींद तो आती है।


दोस्तों, यह कहानी आज के दौर की सबसे बड़ी सच्चाई है। हम अक्सर 'स्टेटस' के चक्कर में अपनी मानसिक शांति और आर्थिक सुरक्षा को दांव पर लगा देते हैं।

इस कहानी को लेकर आपकी क्या राय है? क्या आपने भी कभी किसी को समाज के दबाव में गलत फैसले लेते देखा है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

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