दीवारें सिर्फ ईंट और सीमेंट की नहीं होतीं, कुछ दीवारें गलतफहमी और चुप्पी की भी होती हैं, जो एक बार खड़ी हो जाएं तो पीढ़ियों को अलग कर देती हैं। शहर के पॉश इलाके में स्थित 'शांति सदन' आज फूलों और रोशनी से सजा हुआ था। घर के इकलौते बेटे, अर्नव की शादी थी। जश्न का माहौल था, शहनाइयां गूंज रही थीं, लेकिन घर के मुखिया, **अजीत** के चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता थी।
अजीत की पत्नी, **अवंतिका**, लाल रेशमी साड़ी में सजी मेहमानों का स्वागत कर रही थी, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार घर के मुख्य द्वार पर जाकर टिक जाती थीं। वह जानती थी कि अजीत ने आज के दिन के लिए क्या उम्मीद पाल रखी थी।
बीस साल हो गए थे। बीस साल पहले एक व्यापारिक घाटे और ज़मीन के बंटवारे को लेकर हुई मामूली बहस ने दो परिवारों को ऐसे अलग किया कि फिर कभी मुड़कर नहीं देखा गया। अजीत का सगा साला और अवंतिका का भाई, **अतुल**, जो कभी अजीत का सबसे करीबी दोस्त हुआ करता था, आज एक पराया नाम बन चुका था। बीस साल से न कोई फोन, न कोई संदेश।
अवंतिका ने धीरे से अजीत के पास जाकर उनके कंधे पर हाथ रखा। "अजी, तैयार हो जाइये। बारात निकलने का समय हो रहा है।"
अजीत ने एक लंबी सांस ली। "अवंतिका, मैंने सुना है कि अतुल अब इसी शहर में वापस आ गया है। मैंने उसे कार्ड भिजवाया था, क्या तुम्हें लगता है वह आएगा?"
अवंतिका की आँखों में नमी आ गई। "पता नहीं। बीस साल बहुत लंबा समय होता है। कड़वाहट अब पत्थर बन चुकी होगी।"
बारात निकलने ही वाली थी कि अचानक भीड़ के बीच से एक सफेद रंग की पुरानी गाड़ी घर के सामने रुकी। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और एक सफेद बालों वाला व्यक्ति बाहर निकला। उसके चेहरे पर झुर्रियां थीं और आँखों में एक अजीब सी हिचकिचाहट। यह अतुल था।
पूरे आंगन में सन्नाटा छा गया। बैंड बाजे रुक गए। अवंतिका के हाथ से पूजा की थाली लगभग छूटने ही वाली थी। अजीत अपनी जगह पर बुत बनकर खड़े रह गए।
अतुल धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए अजीत के सामने आकर खड़ा हो गया। उसके हाथ में एक छोटा सा उपहार का पैकेट था, जो शायद कांप रहा था।
अजीत ने आगे बढ़कर बड़े ही भारी स्वर में कहा, "आ गए अतुल? मुझे लगा था कि शायद मेरा यह निमंत्रण भी पुराने खतों की तरह रद्दी में चला जाएगा।"
अतुल की नज़रें नीची थीं। उसने वह पैकेट अजीत की तरफ बढ़ाया। "अर्नव के लिए छोटा सा उपहार लाया हूँ। बस दूर से आशीर्वाद देकर चला जाऊंगा।"
अजीत का चेहरा तमतमा उठा। "सिर्फ आशीर्वाद? बीस साल का सूखा क्या एक उपहार से खत्म हो जाएगा? क्या तुम्हें याद है कि जब अर्नव पैदा हुआ था, तो तुमने वादा किया था कि तुम उसे अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाओगे? कहाँ थे तुम तब, जब उसे स्कूल भेजा गया? कहाँ थे जब वह बीमार था? आज उसकी शादी है, और तुम मेहमानों की तरह 'आशीर्वाद' देकर जाने की बात कर रहे हो?"
अतुल का गला रुंध गया। "भाई साहब, मुझे लगा कि शायद आप मुझे कभी माफ नहीं करेंगे। उस दिन जो मैंने आपसे कहा था, वो मेरा अहंकार था। मुझे अपनी गलती का अहसास होने में बहुत वक्त लगा, लेकिन तब तक फासले इतने बढ़ चुके थे कि वापस आने की हिम्मत नहीं जुटा सका।"
अजीत ने कड़क आवाज़ में कहा, "हिम्मत? हिम्मत तो तब चाहिए थी जब तुमने एक छोटी सी ज़मीन के टुकड़े के लिए अपने भांजे के बचपन का हक छीन लिया था। तुमने सोचा कि तुम अमीर बन जाओगे तो रिश्तों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। आज देखो, मेरे पास सब कुछ है, लेकिन बीस सालों तक मेरा साला और मेरा दोस्त मेरे साथ नहीं था। इसका हर्जाना कौन देगा?"
अतुल अब खुद को संभाल नहीं पा रहा था। उसकी आँखों से आंसू बहने लगे। वह ज़ोर-ज़ोर से कांपने लगा।
"नहीं भाई साहब... अब और शर्मिंदा मुझे नहीं कीजिये। मुझे क्षमा कर दीजिये।" कहते हुए असीम भावुक होकर अतुल, अजीत के पैरों पर झुक गये।
अजीत का दिल, जो अभी तक कठोरता का ढोंग कर रहा था, पिघल गया। उन्होंने झुककर अतुल को उठाया और उसे अपने सीने से लगा लिया। बरसों से दबा साले-बहनोई का स्नेह अश्रु-रूप में आँखों से बहने लगा था। दोनों अधेड़ उम्र के आदमी बच्चों की तरह एक-दूसरे के गले लगकर रो रहे थे।
अवंतिका के लिये सब कुछ एक स्वप्न-सा था। वह स्तब्ध खड़ी अपनी आंखों से आंसुओं को बहते देख रही थी। जो दीवार उसने सोचा था कि कभी नहीं टूटेगी, वह आज स्नेह की एक लहर में बह गई थी।
अर्नव, जो दूल्हे के लिबास में खड़ा था, नीचे आया और उसने अपने मामा के पैर छुए। अतुल ने उसे गले लगाया और पहली बार उसे एक मर्द के रूप में देखा।
"मामा जी, मैंने सुना था कि आप बहुत अच्छे किस्से सुनाते हैं। आज रात बारात में आपको मेरे साथ बैठना होगा," अर्नव ने मुस्कुराते हुए कहा।
पूरे घर का माहौल बदल गया। वह भारीपन जो बरसों से 'शांति सदन' की फिज़ाओं में घुला था, अब गायब हो चुका था। अजीत और अतुल हाथ में हाथ डाले बारात के आगे चलने लगे, जैसे वही बीस साल पुराने जवान लड़के हों।
अवंतिका ने भगवान की मूरत के आगे माथा टेका और बुदबुदाई, "धन्यवाद प्रभु। आज मेरा घर सच में पूरा हो गया।"
रात को जब विदाई का समय आया, तो अतुल ने अवंतिका का हाथ थाम लिया। "दीदी, क्या अब भी मेरे घर के दरवाजे मेरे लिए बंद रहेंगे?"
अवंतिका ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ रखा। "पागल, दरवाजे कभी बंद नहीं थे, बस उन पर धूल जम गई थी। आज आंसुओं ने वो धूल साफ कर दी है।"
रिश्ते कभी मरते नहीं, वे बस सो जाते हैं। उन्हें जगाने के लिए कभी-कभी शब्दों की नहीं, बस एक निस्वार्थ आलिंगन और 'क्षमा' के एक छोटे से शब्द की ज़रूरत होती है। 'शांति सदन' आज फिर से एक परिवार बन चुका था।
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**कहानी का सार:**
अहंकार रिश्तों को तोड़ता है, लेकिन पश्चाताप उन्हें जोड़ता है। परिवार में कभी-कभी हार मान लेना ही सबसे बड़ी जीत होती है।
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**प्रिय पाठकों,**
क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा रिश्ता है जो सालों की चुप्पी के पीछे कहीं दब गया है? क्या आपको लगता है कि गलतियों को माफ कर देना उन्हें ढोने से बेहतर है?
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