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रसोई की वो खुशबू जिसने रिश्ते महका दिए

  सावित्री देवी के घर में आज कोहराम मचा हुआ था। शहर की प्रतिष्ठित 'महिला समिति' की मासिक बैठक आज उन्हीं के घर पर थी। यह सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि सावित्री देवी के लिए अपनी नाक का सवाल था। शहर की मेयर की पत्नी और कई बड़े अधिकारियों की पत्नियां आने वाली थीं।

सावित्री देवी अपनी बहू, अंजलि को निर्देश देने के बजाय उसे हिदायतें ज्यादा दे रही थीं। "अंजलि, देख, तू बस मेहमानों के सामने पानी और चाय रखकर अंदर चली जाना। ज्यादा बात करने की जरूरत नहीं है। तू बहुत धीरे बोलती है और तेरी वो 'मिडिल क्लास' वाली बातें इन हाई-प्रोफाइल लेडीज को समझ नहीं आएंगी। मैंने कैटरिंग वाले को बोल दिया है, वो कॉन्टिनेंटल खाना ला रहा है। तुझे बस प्लेट सजानी है।"

अंजलि ने सिर झुकाकर "जी माँजी" कहा और किचन की तरफ मुड़ गई। अंजलि एक साधारण परिवार से थी। उसमें वो तेज़-तर्रारपन नहीं था जो सावित्री देवी अपनी बहू में देखना चाहती थीं। सावित्री देवी अक्सर अपनी सहेलियों से कहती थीं, "मेरा बेटा तो हीरा है, पर बहू थोड़ी सुस्त मिल गई। मॉडर्न जमाने के हिसाब से नहीं है।"

घड़ी की सुई 12 बजा रही थी। मेहमानों के आने में सिर्फ एक घंटा बाकी था। तभी सावित्री देवी का फोन बजा।

"क्या? एक्सीडेंट हो गया? अब खाना नहीं आ पाएगा?" सावित्री देवी के चेहरे से रान उड़ गया। कैटरर की गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया था और सारा खाना खराब हो चुका था। अब इतने कम समय में न तो कोई दूसरा ऑर्डर लिया जा सकता था और न ही होटल से इतना खाना आ सकता था।

सावित्री देवी सोफे पर धम्म से बैठ गईं। "हे भगवान! अब क्या होगा? मेरी तो नाक कट जाएगी। मिसेज शर्मा तो पहले ही ताक में रहती हैं कि कब मुझे नीचा दिखाएं। अब मैं उन्हें क्या खिलाऊंगी? बिस्कुट?"

अंजलि ने सास को परेशान देखा। वह समझ गई कि मामला गंभीर है। वह धीरे से सावित्री देवी के पास आई।

"माँजी..."

"हटो अंजलि! अभी मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है," सावित्री देवी ने झिड़क दिया।

"माँजी, अगर आप इजाजत दें, तो मैं कुछ बना लूं?" अंजलि ने संकोच के साथ कहा।

"तू?" सावित्री देवी ने अविश्वास से देखा। "तुझे दाल-चावल और सब्जी के अलावा आता ही क्या है? ये बड़े घरों की औरतें हैं, ये पास्ता और लजानिया खाने वाली हैं। तेरे हाथ की कढ़ी-चावल खाकर वो मेरी हंसी उड़ाएंगी।"

"माँजी, एक घंटा है। कुछ न होने से तो कुछ होना बेहतर है। मुझे एक मौका दीजिये। मैं अपनी माँ के हाथ की स्पेशल 'शाही थाली' बना दूंगी। स्वाद की गारंटी मेरी है," अंजलि की आवाज़ में आज एक अजीब सा आत्मविश्वास था।

सावित्री देवी के पास कोई विकल्प नहीं था। उन्होंने बेमन से सिर हिला दिया। "जो करना है कर, वैसे भी इज्जत तो जानी ही है।"

अगले एक घंटे तक अंजलि ने जैसे साक्षात अन्नपूर्णा का रूप ले लिया। किचन से खटपट की आवाज़ें और मसालों की एक सौंधी महक आने लगी। वह महक कॉन्टिनेंटल खाने की नहीं थी, बल्कि शुद्ध देसी घी, हींग और खड़े मसालों की थी।

मेहमान आ गए। ड्राइंग रूम में हंसी-ठिठोली चल रही थी, लेकिन सावित्री देवी का दिल धक-धक कर रहा था। जब खाने की बारी आई, तो अंजलि ने सलीके से सजी हुई थालियां टेबल पर लगाईं।

मेनू में पास्ता नहीं था। वहां थे—गरमा-गरम हींग-जीरे वाले आलू, मखमली पनीर, केसरिया पुलाव, बूंदी का रायता और ताजी फूली हुई पूरियां। और मीठे में, अंजलि ने झटपट तैयार किया हुआ 'मूंग दाल का हलवा' रखा था।

मिसेज शर्मा ने थाली देखी और भौहें सिकोड़ीं। "अरे सावित्री! आज थीम 'देसी' है क्या? हम तो इटालियन की उम्मीद कर रहे थे।"

सावित्री देवी जवाब देने ही वाली थीं कि मेयर की पत्नी ने हलवे का एक चम्मच खाया। उनकी आँखें बंद हो गईं।

"अद्भुत!" उन्होंने कहा। "सावित्री जी, सच कहूँ तो होटलों का बेस्वाद खाना खा-खाकर हम बोर हो गए थे। आज बरसों बाद ऐसा लगा जैसे माँ के हाथ का खाना खा रही हूँ। यह हलवा... इसमें जो स्वाद है, वो किसी फाइव स्टार होटल में नहीं मिल सकता।"

देखते ही देखते, सारी महिलाएं चटकारे लेकर खाने लगीं। जो खाना सावित्री देवी को 'साधारण' लग रहा था, वह उन रईस महिलाओं के लिए 'लग्जरी' बन गया था। सबने एक स्वर में पूछा, "यह किस शेफ ने बनाया है?"

सावित्री देवी की आँखों में पानी आ गया। उन्होंने किचन के दरवाजे पर खड़ी अंजलि को देखा, जो पसीने से तर-बतर थी, लेकिन चेहरे पर संतोष था।

सावित्री देवी उठीं, अंजलि का हाथ पकड़ा और उसे सबके बीच ले आईं।

"यह किसी शेफ ने नहीं, मेरी बहू अंजलि ने बनाया है। और सिर्फ एक घंटे में," सावित्री देवी ने गर्व से कहा।

सबने अंजलि के लिए तालियां बजाईं। मिसेज शर्मा भी चुप रह गईं।

शाम को जब सब चले गए, तो घर में शांति थी। अंजलि किचन में बर्तन समेट रही थी। उसे लगा कि अब फिर वही रोज की दिनचर्या शुरू होगी।

तभी सावित्री देवी किचन में आईं। उनके हाथ में एक मखमली डिब्बा था।

"अंजलि," उन्होंने पुकारा।

अंजलि पलटी। "जी माँजी? कुछ और चाहिए?"

"हाँ," सावित्री देवी ने कहा। "माफ़ी।"

अंजलि चौंक गई।

सावित्री देवी ने डिब्बा खोला। उसमें सोने के कंगन थे, जो उन्होंने अपनी बेटी की शादी के लिए रखे थे। उन्होंने वो कंगन अंजलि के हाथ में पहना दिए।

"माँजी, ये तो..."

"ये तेरे हैं," सावित्री देवी का गला भर आया। "आज तूने सिर्फ मेरी नाक नहीं बचाई, मेरी आँखें भी खोल दीं। मैं बाहर की चमक-दमक में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे घर में मौजूद हीरा दिखाई ही नहीं दिया। मुझे लगा था कि तू 'मॉडर्न' नहीं है, इसलिए तू किसी काम की नहीं। लेकिन आज समझ आया कि असली मॉडर्न होना कपड़े पहनने में नहीं, बल्कि मुसीबत के वक्त परिवार की ढाल बनने में है। तूने आज मेरा मान रख लिया।"

अंजलि की आँखों से आंसू बह निकले। उसने झुककर सास के पैर छुए, लेकिन सावित्री देवी ने उसे गले लगा लिया।

"देर से ही सही बहू," सावित्री देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "पर आज मैंने तेरी कद्र जान ली। अब से इस घर की रसोई ही नहीं, हर फैसले में तेरी जगह सबसे ऊपर होगी।"

उस दिन अंजलि को महसूस हुआ कि कंगन का वजन उसकी कलाई पर नहीं, बल्कि उसके दिल पर पड़े बोझ को हल्का कर रहा था। सम्मान की भूख हर रिश्ते को होती है, और जब वह मिलता है, तो रूखी रोटियों में भी अमृत का स्वाद आ जाता है।


दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि किसी की सादगी को उसकी कमजोरी नहीं समझना चाहिए। अक्सर मुश्किल वक्त में वही लोग काम आते हैं जिन्हें हम सबसे ज्यादा नजरअंदाज करते हैं।

इस कहानी को लेकर आपकी क्या राय है? क्या आपके साथ या आसपास भी कभी ऐसा हुआ है जब किसी ने वक्त रहते अपनों की कद्र नहीं की? अपने अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें।

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